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#आज जिनकी जयंती है #आज जिनकी जयन्ती है #🇮🇳 देशभक्ति
आज जिनकी जयंती है - जिस वीर सेनानी के कारण आज भारत में है, उनका नाम है जनरल लद्दाख जोरावर सिंह। १३ अप्रैल, १७८६ को इनका जन्म ग्राम अनसरा (जिला हमीरपुर  हिमाचल प्रदेश) में ठाकुर हरजे सिंह के घर में हुआ था।  सिंह बिलासपुर की कहलूर रियासत में काम करते थे। अतः गाँव की हरजे खेती उनके भाई देखते थे। १६ वर्ष की अवस्था में जोरावर का अपने चाचा से ये घर छोड़कर हरिद्वार लाहोर और फिर जम्मृ पहुँचक विवाद हो সন: गया।  महाराजा गुलाब सिंह की डोगरा सेना में भर्ती हो गये। राजा ने इनके सैन्य कौशल से प्रभावित होकर कुछ समय में ही इन्हें सेनापति बना दिया।वे अपनी विजय पताका लद्दाख ओर बाल्टिस्तान तक फहराना चाहते थे। अतः जोरावर सिंह মনিক্ী ক্রী কূঠিন পহি্থ্থিনিণী ৯ লিব प्रशिक्षित किया ओर लेह की ओर कूच कर दिया। किश्तवाड़ के मेहता बस्तीराम के रूप में इन्हें एक अच्छा सलाहकार मिल गया।  यह समाचार सुनकर सुरू के तट पर वकारसी ने २०० सेनिकों के साथ तथा  ५,००० सैनिकों के साथ सुनकू में मुकाबला कियाः पर  दोरजी नामग्याल हारकर वे रूसी दर्रे (जोत) से होकर शोरगुल की ओर भाग गये। डोगरा सेना लेह में घुस गयी। इस प्रकार लद्दाख जम्मृ राज्य के अधीन हो गया। जोरावर ने बाल्टिस्तान पर हमला किया। लद्दाखी सैनिक भी अब उनके  अव साथ थे। अहमदशाह ने जब देखा कि उसके सैनिक बुरी तरह कट रहे हैं तो उसे सन्धि करनी पड़ी। जोरावर ने उसके बेटे को गद्दी पर बैठाकर 7 ००० रु का फैसला कराया। अब उन्होने तिब्बत की ओर कूच किया।  वार्षिक जुर्माने और गांग को पारकर वे आगे बढ गये। ताशी  గTTన सिंह और उनकी विजयी सेना का नाम इतना फैल चुका था अब तक जोरावर कि रूडोक तथा गाटो ने बिना युद्ध किये हथियार डाल दिये। अब ये लोग  मानसरोवर के पार तीर्थपुरी पहुँच गये। ८००० तिब्बती सैनिकों ने परखा में किया, पर वे पराजित हुए। जोरावर सिंह तिब्बत भारत तथा नेपाल স্কু ্মানল   पहुँचे। वहाँ का प्रबन्ध उन्होंने मेहता संगम स्थल तकलाकोट तक जा बस्तीराम को सौंपा तथा वापस तीर्थपुरी आ गये। यह देखकर अंग्रेजों के कान खड़े हो गये। उन्होने पंजाब के राजा रणजीत सिंह पर उन्हें नियन्त्रित करने का दबाव डाला। निर्णय हुआ कि १० दिसम्बर  १८४१ को तिब्बत को उसका क्षेत्र वापस कर दिया जाये। इसी बीच जनरल छातर की कमान में दस हजार तिब्बती सेनिरकों की ३०० डोगरा सेनिकों से मुठभेड़ हुई। राक्षसताल के पास वे सब मारे गये। जोरावर सिंह ने गुलामखान  तथा नोनो के नेतृत्व में सेनिक भेजेः परवे सब भी मारे गये। अब वीर जोरावर सिंह स्वयं आगे बढ़े। वे तकलाकोट को युद्ध का केन्द्र  तिब्बतियों की विशाल सेना ने १० दिसम्बर १८४१ को बनाना चाहते थेः पर टोयो में इन्हें घेर लिया। दिसम्बर की भीषण बर्फीली ठण्ड में तीन दिन तक युद्ध चला।  घमासान १२ दिसम्बर को जोरावर सिंह को गोली लगी और वे घोडे़ से गिर पड़। डोगरा सेना तितर बितर हो गयी। तिब्बती सैनिकों में जोरावर सिंह का इतना भय था कि उनके शव को करने का भी वे साहस नहीं कर पा रहे थे। बाद मे स्पर्श उनके अवशेषों को चुनकर एक स्तूप बना दिया गया। सिंह छोतरन नामक यह खंडित स्तूप आज भी टोयो में देखा जा सकता हे। নিল্নী पूजा करते है। इस प्रकार जोरावर सिंह ने भारत की विजय  इसकी पताका भारत से बाहर तिब्बत और बाल्टिस्तान तक फहरायी।  सिंह जनरल जोरावर তন্স 13 ওসল 1786 जिस वीर सेनानी के कारण आज भारत में है, उनका नाम है जनरल लद्दाख जोरावर सिंह। १३ अप्रैल, १७८६ को इनका जन्म ग्राम अनसरा (जिला हमीरपुर  हिमाचल प्रदेश) में ठाकुर हरजे सिंह के घर में हुआ था।  सिंह बिलासपुर की कहलूर रियासत में काम करते थे। अतः गाँव की हरजे खेती उनके भाई देखते थे। १६ वर्ष की अवस्था में जोरावर का अपने चाचा से ये घर छोड़कर हरिद्वार लाहोर और फिर जम्मृ पहुँचक विवाद हो সন: गया।  महाराजा गुलाब सिंह की डोगरा सेना में भर्ती हो गये। राजा ने इनके सैन्य कौशल से प्रभावित होकर कुछ समय में ही इन्हें सेनापति बना दिया।वे अपनी विजय पताका लद्दाख ओर बाल्टिस्तान तक फहराना चाहते थे। अतः जोरावर सिंह মনিক্ী ক্রী কূঠিন পহি্থ্থিনিণী ৯ লিব प्रशिक्षित किया ओर लेह की ओर कूच कर दिया। किश्तवाड़ के मेहता बस्तीराम के रूप में इन्हें एक अच्छा सलाहकार मिल गया।  यह समाचार सुनकर सुरू के तट पर वकारसी ने २०० सेनिकों के साथ तथा  ५,००० सैनिकों के साथ सुनकू में मुकाबला कियाः पर  दोरजी नामग्याल हारकर वे रूसी दर्रे (जोत) से होकर शोरगुल की ओर भाग गये। डोगरा सेना लेह में घुस गयी। इस प्रकार लद्दाख जम्मृ राज्य के अधीन हो गया। जोरावर ने बाल्टिस्तान पर हमला किया। लद्दाखी सैनिक भी अब उनके  अव साथ थे। अहमदशाह ने जब देखा कि उसके सैनिक बुरी तरह कट रहे हैं तो उसे सन्धि करनी पड़ी। जोरावर ने उसके बेटे को गद्दी पर बैठाकर 7 ००० रु का फैसला कराया। अब उन्होने तिब्बत की ओर कूच किया।  वार्षिक जुर्माने और गांग को पारकर वे आगे बढ गये। ताशी  గTTన सिंह और उनकी विजयी सेना का नाम इतना फैल चुका था अब तक जोरावर कि रूडोक तथा गाटो ने बिना युद्ध किये हथियार डाल दिये। अब ये लोग  मानसरोवर के पार तीर्थपुरी पहुँच गये। ८००० तिब्बती सैनिकों ने परखा में किया, पर वे पराजित हुए। जोरावर सिंह तिब्बत भारत तथा नेपाल স্কু ্মানল   पहुँचे। वहाँ का प्रबन्ध उन्होंने मेहता संगम स्थल तकलाकोट तक जा बस्तीराम को सौंपा तथा वापस तीर्थपुरी आ गये। यह देखकर अंग्रेजों के कान खड़े हो गये। उन्होने पंजाब के राजा रणजीत सिंह पर उन्हें नियन्त्रित करने का दबाव डाला। निर्णय हुआ कि १० दिसम्बर  १८४१ को तिब्बत को उसका क्षेत्र वापस कर दिया जाये। इसी बीच जनरल छातर की कमान में दस हजार तिब्बती सेनिरकों की ३०० डोगरा सेनिकों से मुठभेड़ हुई। राक्षसताल के पास वे सब मारे गये। जोरावर सिंह ने गुलामखान  तथा नोनो के नेतृत्व में सेनिक भेजेः परवे सब भी मारे गये। अब वीर जोरावर सिंह स्वयं आगे बढ़े। वे तकलाकोट को युद्ध का केन्द्र  तिब्बतियों की विशाल सेना ने १० दिसम्बर १८४१ को बनाना चाहते थेः पर टोयो में इन्हें घेर लिया। दिसम्बर की भीषण बर्फीली ठण्ड में तीन दिन तक युद्ध चला।  घमासान १२ दिसम्बर को जोरावर सिंह को गोली लगी और वे घोडे़ से गिर पड़। डोगरा सेना तितर बितर हो गयी। तिब्बती सैनिकों में जोरावर सिंह का इतना भय था कि उनके शव को करने का भी वे साहस नहीं कर पा रहे थे। बाद मे स्पर्श उनके अवशेषों को चुनकर एक स्तूप बना दिया गया। सिंह छोतरन नामक यह खंडित स्तूप आज भी टोयो में देखा जा सकता हे। নিল্নী पूजा करते है। इस प्रकार जोरावर सिंह ने भारत की विजय  इसकी पताका भारत से बाहर तिब्बत और बाल्टिस्तान तक फहरायी।  सिंह जनरल जोरावर তন্স 13 ওসল 1786 - ShareChat