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#इतिहास स्मृति #आज का इतिहास
इतिहास स्मृति - १९५४ प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ पंजाबी की एक कहावत याद आ 11 "आप वाले दिन भुल्ल गई,सस्से ते करें चतराइयां| १९५४ कुंभ मेला भीड़ का गिरना एक बड़ी भीड़ की कुचलने वाली घटना थी जो 3 फरवरी १९५४ को भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज में कुंभ मेले में हुई थी। यह घटना मौनी का मुख्य स्नान दिवस था , जब यह घटना नया चाँद HIqI घटी। उस वर्ष उत्सव में ४ ५ मिलियन तीर्थयात्रियों ने भाग लिया, [1] जो भारत की स्वतंत्रता के बाद पहला कुंभ मेला भी था १९५४ कुंभ मेला भगदड़ Eq तारीख ३ फरवरी १९५४ उत्तर प्रदेश, भारत সমাযাযাত जगह চু भीड़ नियंत्रण उपायों की कारण |& विफलता ؟١٤ 316-800 गैरन्घातक चोटें 2000 विभिन्न स्रोतों के अनुसार इस त्रासदी के आंकड़े अलगन्अलग हैं। आधिकारिक तौर पर, ३१ 6 लोगों की जान चली गई। [ २ ] जबकि द गार्जियन ने बताया कि ८०० से अधिक लोग मारे गए, और १०० से अधिक घायल हुए, [ ३ ] टाइम ने बताया कि कम से कम ३५० लोग गए और डूब गए, २०० लापता बताए गए, और २,००० से कुचले अधिक घायल हुए"। [ ४ ] लॉ एंड ऑर्डर इन इंडिया नामक पुस्तक ५०० से अधिक लोग मारे गए। [ ५ ] के अनुसार  १९५४ प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ पंजाबी की एक कहावत याद आ 11 "आप वाले दिन भुल्ल गई,सस्से ते करें चतराइयां| १९५४ कुंभ मेला भीड़ का गिरना एक बड़ी भीड़ की कुचलने वाली घटना थी जो 3 फरवरी १९५४ को भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज में कुंभ मेले में हुई थी। यह घटना मौनी का मुख्य स्नान दिवस था , जब यह घटना नया चाँद HIqI घटी। उस वर्ष उत्सव में ४ ५ मिलियन तीर्थयात्रियों ने भाग लिया, [1] जो भारत की स्वतंत्रता के बाद पहला कुंभ मेला भी था १९५४ कुंभ मेला भगदड़ Eq तारीख ३ फरवरी १९५४ उत्तर प्रदेश, भारत সমাযাযাত जगह চু भीड़ नियंत्रण उपायों की कारण |& विफलता ؟١٤ 316-800 गैरन्घातक चोटें 2000 विभिन्न स्रोतों के अनुसार इस त्रासदी के आंकड़े अलगन्अलग हैं। आधिकारिक तौर पर, ३१ 6 लोगों की जान चली गई। [ २ ] जबकि द गार्जियन ने बताया कि ८०० से अधिक लोग मारे गए, और १०० से अधिक घायल हुए, [ ३ ] टाइम ने बताया कि कम से कम ३५० लोग गए और डूब गए, २०० लापता बताए गए, और २,००० से कुचले अधिक घायल हुए"। [ ४ ] लॉ एंड ऑर्डर इन इंडिया नामक पुस्तक ५०० से अधिक लोग मारे गए। [ ५ ] के अनुसार - ShareChat
#बलिदान दिवस #शहीद दिवस #🇮🇳 देशभक्ति #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान #आज जिनकी पुण्यतिथि है
बलिदान दिवस - ब्रिटिश सरकार ने १०,००० लिए उमाजी को पकड़ने के रुपये के इनाम की घोषणा की। कालू और नाना ने उसे धोखा दिया और उसे पुणे में मुलशी के कुलकर्णी पास एवलस ले गए और नाना ने १५ दिसंबर १८३१ को उमाजी को पकड़ लिया और ब्रिटिश को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया, पूछताछ की और फिर उन्हें दोषी ठहराया जिसके बाद 3 फरवरी १८३२ को ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें पुणे में मृत्युदंड दिया। पुणे में उमाजी नाइक को ब्रिटिश सरकार ने 3 फरवरी, १८३२ को तहसील कार्यालय में फांसी दी थी। जनता के दिलों में दहशत फैलाने के लिए ওনব থাব ব্রী নীন নিনী तक पीपल के पेड़ से लटका दिया गया था। क्रांतिकारी उमाजी नाईक F = ब्रिटिश सरकार ने १०,००० लिए उमाजी को पकड़ने के रुपये के इनाम की घोषणा की। कालू और नाना ने उसे धोखा दिया और उसे पुणे में मुलशी के कुलकर्णी पास एवलस ले गए और नाना ने १५ दिसंबर १८३१ को उमाजी को पकड़ लिया और ब्रिटिश को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया, पूछताछ की और फिर उन्हें दोषी ठहराया जिसके बाद 3 फरवरी १८३२ को ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें पुणे में मृत्युदंड दिया। पुणे में उमाजी नाइक को ब्रिटिश सरकार ने 3 फरवरी, १८३२ को तहसील कार्यालय में फांसी दी थी। जनता के दिलों में दहशत फैलाने के लिए ওনব থাব ব্রী নীন নিনী तक पीपल के पेड़ से लटका दिया गया था। क्रांतिकारी उमाजी नाईक F = - ShareChat
#🇮🇳 देशभक्ति #आज जिनकी पुण्यतिथि है #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान #बलिदान दिवस #शहीद दिवस
🇮🇳 देशभक्ति - पर ऋषिकेश हार मानने वाले व्यक्तियों में नहीं थे। वह जर्मनी के बर्लिन शहर में पहुंचकर वहां काम कर रहे भारतीय क्रांतिकारियों की टोली में शामिल हो गये। बर्लिन में उन्होंने एक जर्मन से विवाह भी कर युवती पर इस युद्ध में जर्मनी की पराजय से भारत की লিমা; स्वाधीनता का स्वप्न टूट गया। अतः ऋषिकेश एक बार फिर ईरान के तेहरान नगर में जा पहुंचे। जीवन भर संघर्षरत रहने वाले इस क्रांतिवीर का तीन फरवरी, १९३० को तेहरान में ही देहांत हुआ। ऋषिकेश लट्टा के जीवन का प्रत्येक क्षण भारत की स्वाधीनता को समर्पित था। देहावसान 3 फरवरी १९३० पर ऋषिकेश हार मानने वाले व्यक्तियों में नहीं थे। वह जर्मनी के बर्लिन शहर में पहुंचकर वहां काम कर रहे भारतीय क्रांतिकारियों की टोली में शामिल हो गये। बर्लिन में उन्होंने एक जर्मन से विवाह भी कर युवती पर इस युद्ध में जर्मनी की पराजय से भारत की লিমা; स्वाधीनता का स्वप्न टूट गया। अतः ऋषिकेश एक बार फिर ईरान के तेहरान नगर में जा पहुंचे। जीवन भर संघर्षरत रहने वाले इस क्रांतिवीर का तीन फरवरी, १९३० को तेहरान में ही देहांत हुआ। ऋषिकेश लट्टा के जीवन का प्रत्येक क्षण भारत की स्वाधीनता को समर्पित था। देहावसान 3 फरवरी १९३० - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - आज जिनकी पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन 0 Frila1 3ಒ2000 एनगननादर नुख्यमत्री तमिलनाड्  411969 मोहम्मद अलीमुद्दीन  राधा कृष्ण  मणिपुर  मुख्यमंत्री = साहित्यकार ३ फरवरी १९८३ ३ फरवरी १९७९ राज कवर फिल्म निर्देशक ( ३ फखरी २०१२ LOLLa      आज जिनकी पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन 0 Frila1 3ಒ2000 एनगननादर नुख्यमत्री तमिलनाड्  411969 मोहम्मद अलीमुद्दीन  राधा कृष्ण  मणिपुर  मुख्यमंत्री = साहित्यकार ३ फरवरी १९८३ ३ फरवरी १९७९ राज कवर फिल्म निर्देशक ( ३ फखरी २०१२ LOLLa - ShareChat
#बलिदान दिवस #शहीद दिवस #🇮🇳 देशभक्ति #आज जिनकी पुण्यतिथि है #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान
बलिदान दिवस - हलधर भगत, गिरधर भगत, रुनिया झुनिया, लोदरो उनाव, विश्वनाथ भगत सहित 7 जांबाज इतिहास के पन्नों के अनुसार, एक फरवरी १८५७ क रात सातों जांबाज कुड़ू के 'जंगी बगीचा' में विश्राम कर रहे थे. वीर बुधु भगत उस समय ঠীম ক মাথ থ दूसरी इसी बीच इनाम के लालच में एक आंदोलनकारी ने अंग्रेजों को गुप्त सूचना दे दी कि टिको स्थित सेना के डिपो पर हमला करने वाले क्रांतिकारी बगीचे में मौजूद हैं. सूचना मिलते ही अंग्रेजी सेना ने लाव-्लश्कर के साथ जंगी बगीचा को चारों तरफ से घेर लिया. सातों आंदोलनकारियों को धोखे से पकड़ लिया गया. इनमें बुधु भगत के दो पुत्र हलधर व गिरधर और दो वीर बहनें रुनिया ्झुनिया भी शामिल थीं॰. २ फरवरी १८५७ बलिदान पर्व अमानवीय यातनाएं और कत्लेआम पकड़े गये जांबाजों को टिको पोखराटोली स्थित ब्रिटिश कैंप ले जाया गया. वहां उनके साथ अमानवीय अत्याचार किये गये. अंततः दो फरवरी की अहले सुबह, अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए सातों वीरों को एक ही रस्सी से बांधा और 'जोड़ा बर' के पेड़ के नीचे कत्लेआम कर दिया. तब से हर साल दो फरवरी को टिको पोखराटोली में इन शहीदों की याद में भव्य श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है. हलधर भगत, गिरधर भगत, रुनिया झुनिया, लोदरो उनाव, विश्वनाथ भगत सहित 7 जांबाज इतिहास के पन्नों के अनुसार, एक फरवरी १८५७ क रात सातों जांबाज कुड़ू के 'जंगी बगीचा' में विश्राम कर रहे थे. वीर बुधु भगत उस समय ঠীম ক মাথ থ दूसरी इसी बीच इनाम के लालच में एक आंदोलनकारी ने अंग्रेजों को गुप्त सूचना दे दी कि टिको स्थित सेना के डिपो पर हमला करने वाले क्रांतिकारी बगीचे में मौजूद हैं. सूचना मिलते ही अंग्रेजी सेना ने लाव-्लश्कर के साथ जंगी बगीचा को चारों तरफ से घेर लिया. सातों आंदोलनकारियों को धोखे से पकड़ लिया गया. इनमें बुधु भगत के दो पुत्र हलधर व गिरधर और दो वीर बहनें रुनिया ्झुनिया भी शामिल थीं॰. २ फरवरी १८५७ बलिदान पर्व अमानवीय यातनाएं और कत्लेआम पकड़े गये जांबाजों को टिको पोखराटोली स्थित ब्रिटिश कैंप ले जाया गया. वहां उनके साथ अमानवीय अत्याचार किये गये. अंततः दो फरवरी की अहले सुबह, अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए सातों वीरों को एक ही रस्सी से बांधा और 'जोड़ा बर' के पेड़ के नीचे कत्लेआम कर दिया. तब से हर साल दो फरवरी को टिको पोखराटोली में इन शहीदों की याद में भव्य श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है. - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - 05.34 VoE 46 .Ill 83% KBIs पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन सत नरहरि दार ~4 ( C3mc   05.34 VoE 46 .Ill 83% KBIs पुण्यतिथि पर श्रद्धासुमन सत नरहरि दार ~4 ( C3mc - ShareChat
#आज जिनकी जयन्ती है #आज जिनकी जयंती है
आज जिनकी जयन्ती है - पूर्णिमा, श्री गुरु रविदास जयंती माघ गुरु ग्रंथ साहिब में इनके ४० पद संग्रहित हैं। fg एक पद प्रस्तुत है जिसमें आप भगवान को पूजा के क्या भेंट करना है, बता रहे हैं। दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ II फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ IIl II माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ II अवरु न फूलु अनूपु न पावउ IIl II रहाउ Il मैलागर बे्हे है भुइअंगा Il बिखु अम्रितु बसहि इक संगा II२ II धूप दीप नईबेदहि बासा Il कैसे पूज करहि तेरी दासा II३II तनु मनु अरपउ पूज चरावउ ।। निरंजनु 1 गुर परसादि qIq3 II4II पूजा अरचा आहि न तोरी Il कहि रविदास कवन गति मोरी II५ IIl II५२५ पूर्णिमा, श्री गुरु रविदास जयंती माघ गुरु ग्रंथ साहिब में इनके ४० पद संग्रहित हैं। fg एक पद प्रस्तुत है जिसमें आप भगवान को पूजा के क्या भेंट करना है, बता रहे हैं। दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ II फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ IIl II माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ II अवरु न फूलु अनूपु न पावउ IIl II रहाउ Il मैलागर बे्हे है भुइअंगा Il बिखु अम्रितु बसहि इक संगा II२ II धूप दीप नईबेदहि बासा Il कैसे पूज करहि तेरी दासा II३II तनु मनु अरपउ पूज चरावउ ।। निरंजनु 1 गुर परसादि qIq3 II4II पूजा अरचा आहि न तोरी Il कहि रविदास कवन गति मोरी II५ IIl II५२५ - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - guufnfa: पर श्रद्धासुमन आज {    श्रद्वामुमन a   (982 0000000o Society (OTDS) Bnuboneswa omio -1 a 7?008 0 সাবে ঐশলিণম 001.2020 सुर्रेद सिंह चीहान  गाम्यविकास 2013 01999 guufnfa: पर श्रद्धासुमन आज {    श्रद्वामुमन a   (982 0000000o Society (OTDS) Bnuboneswa omio -1 a 7?008 0 সাবে ঐশলিণম 001.2020 सुर्रेद सिंह चीहान  गाम्यविकास 2013 01999 - ShareChat
#इतिहास स्मृति #आज जिनकी पुण्यतिथि है
इतिहास स्मृति - आजाद भारत का पहला # ब्राह्मण नरसंहार १९४८ १९४८ में गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में जो हुआ, उसे आज भी इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया हे। नाथूराम गोडसे के चितपावन ब्राह्मण होने का बदला लेने के नाम पर हजारों निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाया गया। मूँणे गमुंबर्ई भाीगपुनर सतजरला कोल्हागपूरक औपर ग़्चामनीणश्षेत्रों घर जलाए॰ लोगों को पहचान कर संगठित भीड मारा, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए ओर पूरा समाज  भय में डूब गया। यह हिंसा अचानक नहीं थी॰ बल्कि  योजनाबद्ध थी ओर इसमें कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका बताई जाती हे।  वीर सावरकर के घर पर हमला हुआ, उनके भाई की हत्या कर दी गई। सेकड़ों नहीं, बल्कि हजारों ब्राह्मण  परिवार उजड़ गए, पलायन को मजबूर हुए ओर गरीबी मे चले गए की संख्या पर आज भी पर्दा पड़ा हे। कुछ পূনব্ধী इतिहासकार इसे सेकड़ों बताते हें॰ तो कई शोधों के अनुसार यह संख्या दो हजार से आठ हजार तक हो सकती हे। लेकिन पुलिस रिकॉर्ड सील हे॰ मीडिया  खामोश रहा ओर किसी को सजा नहीं मिली।  यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती ओर सबसे भयानक सामुदायिक नरसंहारों में से एक था, जिसे अहिंसा की चादर में ढक दिया गया। १९४८ का यह सत्य आज भी न्याय ओर स्वीकार्यता की प्रतीक्षा कर रहा हे। इतिहास केवल वही नहीं होता जो पढ़ाया जाए, बल्कि वह भी होता हे जिसे जानबूझकर भुला दिया गया हो।  ৩fী ক্রুূত भारत में आज  ऐसी मानसिकता के लोग हे जो इतिहास को दोहराना चाहते हें !! 1948 चितपावन ब्राहण नरसंहार NCYw2o r   ३१ जनवरी से 3 फरवरी आजाद भारत का पहला # ब्राह्मण नरसंहार १९४८ १९४८ में गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में जो हुआ, उसे आज भी इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया हे। नाथूराम गोडसे के चितपावन ब्राह्मण होने का बदला लेने के नाम पर हजारों निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाया गया। मूँणे गमुंबर्ई भाीगपुनर सतजरला कोल्हागपूरक औपर ग़्चामनीणश्षेत्रों घर जलाए॰ लोगों को पहचान कर संगठित भीड मारा, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए ओर पूरा समाज  भय में डूब गया। यह हिंसा अचानक नहीं थी॰ बल्कि  योजनाबद्ध थी ओर इसमें कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका बताई जाती हे।  वीर सावरकर के घर पर हमला हुआ, उनके भाई की हत्या कर दी गई। सेकड़ों नहीं, बल्कि हजारों ब्राह्मण  परिवार उजड़ गए, पलायन को मजबूर हुए ओर गरीबी मे चले गए की संख्या पर आज भी पर्दा पड़ा हे। कुछ পূনব্ধী इतिहासकार इसे सेकड़ों बताते हें॰ तो कई शोधों के अनुसार यह संख्या दो हजार से आठ हजार तक हो सकती हे। लेकिन पुलिस रिकॉर्ड सील हे॰ मीडिया  खामोश रहा ओर किसी को सजा नहीं मिली।  यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती ओर सबसे भयानक सामुदायिक नरसंहारों में से एक था, जिसे अहिंसा की चादर में ढक दिया गया। १९४८ का यह सत्य आज भी न्याय ओर स्वीकार्यता की प्रतीक्षा कर रहा हे। इतिहास केवल वही नहीं होता जो पढ़ाया जाए, बल्कि वह भी होता हे जिसे जानबूझकर भुला दिया गया हो।  ৩fী ক্রুূত भारत में आज  ऐसी मानसिकता के लोग हे जो इतिहास को दोहराना चाहते हें !! 1948 चितपावन ब्राहण नरसंहार NCYw2o r   ३१ जनवरी से 3 फरवरी - ShareChat
#बलिदान दिवस #शहीद दिवस #🇮🇳 देशभक्ति #🙏🏻माँ तुझे सलाम
बलिदान दिवस - भूले बिसरे शहीद शतनशत नमन उस मौलाना की कब्रपर जाकर कहदो= हिंदुस्तान आज़ाद हो गया है हमार तुम्हें भूल गए मगरहम मौलाना फ़ज़ल ए हक खैराबादी की सुनवाई के दौरान उन्होंने अपने जुर्म को मुकदमे कुबूल किया पर झूठ नहीं बोला और कहा - हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं इस फतवे पर कायम हूं। आरोपो को कुबूल करने के बाद उन्हें काले पानी की गई और सारी ज़ायदाद ज़ब्त करने का सुनाई सज़ा ಶಫ್ಠ೯ಾ ' 3<) आदेश दिया गया। अंडमान निकोबार में ही २० अगस्त १८६१ में उनका देहांत हो गया। थे शहीद २० अगस्त १८६१ भूले बिसरे शहीद शतनशत नमन उस मौलाना की कब्रपर जाकर कहदो= हिंदुस्तान आज़ाद हो गया है हमार तुम्हें भूल गए मगरहम मौलाना फ़ज़ल ए हक खैराबादी की सुनवाई के दौरान उन्होंने अपने जुर्म को मुकदमे कुबूल किया पर झूठ नहीं बोला और कहा - हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं इस फतवे पर कायम हूं। आरोपो को कुबूल करने के बाद उन्हें काले पानी की गई और सारी ज़ायदाद ज़ब्त करने का सुनाई सज़ा ಶಫ್ಠ೯ಾ ' 3<) आदेश दिया गया। अंडमान निकोबार में ही २० अगस्त १८६१ में उनका देहांत हो गया। थे शहीद २० अगस्त १८६१ - ShareChat