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#इतिहास स्मृति #भारत का इतिहास #मध्य भारत का इतिहास
इतिहास स्मृति - आनंदपुर साहिब, गुरु गोबिंद सिंह जी का दरबार वैसाखी 1६९९ से गुरु साहिब ने सिंह बना दिये। पांच प्यारों का सृजन लाल, चंद या राम सिंह Rగ' সিক, भाई मोहकम सिंह, भाई भाई साहिब भाई हिम्मत भाई धरम होडगेफी  सिंह सिंह और स्वयं गोबिंद राय से गोबिंद दया से एक লভান और शुरू हुई चि़ड़ियों से बाज़ बनाने व सवा लाख प्रक्रिया आनंदपुर साहिब, गुरु गोबिंद सिंह जी का दरबार वैसाखी 1६९९ से गुरु साहिब ने सिंह बना दिये। पांच प्यारों का सृजन लाल, चंद या राम सिंह Rగ' সিক, भाई मोहकम सिंह, भाई भाई साहिब भाई हिम्मत भाई धरम होडगेफी  सिंह सिंह और स्वयं गोबिंद राय से गोबिंद दया से एक লভান और शुरू हुई चि़ड़ियों से बाज़ बनाने व सवा लाख प्रक्रिया - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन आज जिनकी आधुनिक भारत के महान अभियता भारत रत सर डॉ॰ मोक्षगुंडम  विश्वेश्वरैया जी की पुष्यतिचि परउहेविनप सद्ानति राहुल सांकृत्यायन a a 59 प्रतिवादी भयंकर श्रीनिवास mmu1e ागणत ೧9r 2013  a a - a पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन आज जिनकी आधुनिक भारत के महान अभियता भारत रत सर डॉ॰ मोक्षगुंडम  विश्वेश्वरैया जी की पुष्यतिचि परउहेविनप सद्ानति राहुल सांकृत्यायन a a 59 प्रतिवादी भयंकर श्रीनिवास mmu1e ागणत ೧9r 2013  a a - a - ShareChat
#🇮🇳 देशभक्ति #शहीद दिवस #🙏🏻माँ तुझे सलाम #आज जिनकी पुण्यतिथि है #बलिदान दिवस
🇮🇳 देशभक्ति - अनुपम क्रांति तीर्थ जलियांवाला बाग जब भून दिए गए मां १३ अप्रैल १९१९ भारती के हजारों लाल। शहीदों को TT अनुपम क्रांति तीर्थ जलियांवाला बाग जब भून दिए गए मां १३ अप्रैल १९१९ भारती के हजारों लाल। शहीदों को TT - ShareChat
#आज जिनकी जयंती है #आज जिनकी जयन्ती है #🇮🇳 देशभक्ति
आज जिनकी जयंती है - जिस वीर सेनानी के कारण आज भारत में है, उनका नाम है जनरल लद्दाख जोरावर सिंह। १३ अप्रैल, १७८६ को इनका जन्म ग्राम अनसरा (जिला हमीरपुर  हिमाचल प्रदेश) में ठाकुर हरजे सिंह के घर में हुआ था।  सिंह बिलासपुर की कहलूर रियासत में काम करते थे। अतः गाँव की हरजे खेती उनके भाई देखते थे। १६ वर्ष की अवस्था में जोरावर का अपने चाचा से ये घर छोड़कर हरिद्वार लाहोर और फिर जम्मृ पहुँचक विवाद हो সন: गया।  महाराजा गुलाब सिंह की डोगरा सेना में भर्ती हो गये। राजा ने इनके सैन्य कौशल से प्रभावित होकर कुछ समय में ही इन्हें सेनापति बना दिया।वे अपनी विजय पताका लद्दाख ओर बाल्टिस्तान तक फहराना चाहते थे। अतः जोरावर सिंह মনিক্ী ক্রী কূঠিন পহি্থ্থিনিণী ৯ লিব प्रशिक्षित किया ओर लेह की ओर कूच कर दिया। किश्तवाड़ के मेहता बस्तीराम के रूप में इन्हें एक अच्छा सलाहकार मिल गया।  यह समाचार सुनकर सुरू के तट पर वकारसी ने २०० सेनिकों के साथ तथा  ५,००० सैनिकों के साथ सुनकू में मुकाबला कियाः पर  दोरजी नामग्याल हारकर वे रूसी दर्रे (जोत) से होकर शोरगुल की ओर भाग गये। डोगरा सेना लेह में घुस गयी। इस प्रकार लद्दाख जम्मृ राज्य के अधीन हो गया। जोरावर ने बाल्टिस्तान पर हमला किया। लद्दाखी सैनिक भी अब उनके  अव साथ थे। अहमदशाह ने जब देखा कि उसके सैनिक बुरी तरह कट रहे हैं तो उसे सन्धि करनी पड़ी। जोरावर ने उसके बेटे को गद्दी पर बैठाकर 7 ००० रु का फैसला कराया। अब उन्होने तिब्बत की ओर कूच किया।  वार्षिक जुर्माने और गांग को पारकर वे आगे बढ गये। ताशी  గTTన सिंह और उनकी विजयी सेना का नाम इतना फैल चुका था अब तक जोरावर कि रूडोक तथा गाटो ने बिना युद्ध किये हथियार डाल दिये। अब ये लोग  मानसरोवर के पार तीर्थपुरी पहुँच गये। ८००० तिब्बती सैनिकों ने परखा में किया, पर वे पराजित हुए। जोरावर सिंह तिब्बत भारत तथा नेपाल স্কু ্মানল   पहुँचे। वहाँ का प्रबन्ध उन्होंने मेहता संगम स्थल तकलाकोट तक जा बस्तीराम को सौंपा तथा वापस तीर्थपुरी आ गये। यह देखकर अंग्रेजों के कान खड़े हो गये। उन्होने पंजाब के राजा रणजीत सिंह पर उन्हें नियन्त्रित करने का दबाव डाला। निर्णय हुआ कि १० दिसम्बर  १८४१ को तिब्बत को उसका क्षेत्र वापस कर दिया जाये। इसी बीच जनरल छातर की कमान में दस हजार तिब्बती सेनिरकों की ३०० डोगरा सेनिकों से मुठभेड़ हुई। राक्षसताल के पास वे सब मारे गये। जोरावर सिंह ने गुलामखान  तथा नोनो के नेतृत्व में सेनिक भेजेः परवे सब भी मारे गये। अब वीर जोरावर सिंह स्वयं आगे बढ़े। वे तकलाकोट को युद्ध का केन्द्र  तिब्बतियों की विशाल सेना ने १० दिसम्बर १८४१ को बनाना चाहते थेः पर टोयो में इन्हें घेर लिया। दिसम्बर की भीषण बर्फीली ठण्ड में तीन दिन तक युद्ध चला।  घमासान १२ दिसम्बर को जोरावर सिंह को गोली लगी और वे घोडे़ से गिर पड़। डोगरा सेना तितर बितर हो गयी। तिब्बती सैनिकों में जोरावर सिंह का इतना भय था कि उनके शव को करने का भी वे साहस नहीं कर पा रहे थे। बाद मे स्पर्श उनके अवशेषों को चुनकर एक स्तूप बना दिया गया। सिंह छोतरन नामक यह खंडित स्तूप आज भी टोयो में देखा जा सकता हे। নিল্নী पूजा करते है। इस प्रकार जोरावर सिंह ने भारत की विजय  इसकी पताका भारत से बाहर तिब्बत और बाल्टिस्तान तक फहरायी।  सिंह जनरल जोरावर তন্স 13 ওসল 1786 जिस वीर सेनानी के कारण आज भारत में है, उनका नाम है जनरल लद्दाख जोरावर सिंह। १३ अप्रैल, १७८६ को इनका जन्म ग्राम अनसरा (जिला हमीरपुर  हिमाचल प्रदेश) में ठाकुर हरजे सिंह के घर में हुआ था।  सिंह बिलासपुर की कहलूर रियासत में काम करते थे। अतः गाँव की हरजे खेती उनके भाई देखते थे। १६ वर्ष की अवस्था में जोरावर का अपने चाचा से ये घर छोड़कर हरिद्वार लाहोर और फिर जम्मृ पहुँचक विवाद हो সন: गया।  महाराजा गुलाब सिंह की डोगरा सेना में भर्ती हो गये। राजा ने इनके सैन्य कौशल से प्रभावित होकर कुछ समय में ही इन्हें सेनापति बना दिया।वे अपनी विजय पताका लद्दाख ओर बाल्टिस्तान तक फहराना चाहते थे। अतः जोरावर सिंह মনিক্ী ক্রী কূঠিন পহি্থ্থিনিণী ৯ লিব प्रशिक्षित किया ओर लेह की ओर कूच कर दिया। किश्तवाड़ के मेहता बस्तीराम के रूप में इन्हें एक अच्छा सलाहकार मिल गया।  यह समाचार सुनकर सुरू के तट पर वकारसी ने २०० सेनिकों के साथ तथा  ५,००० सैनिकों के साथ सुनकू में मुकाबला कियाः पर  दोरजी नामग्याल हारकर वे रूसी दर्रे (जोत) से होकर शोरगुल की ओर भाग गये। डोगरा सेना लेह में घुस गयी। इस प्रकार लद्दाख जम्मृ राज्य के अधीन हो गया। जोरावर ने बाल्टिस्तान पर हमला किया। लद्दाखी सैनिक भी अब उनके  अव साथ थे। अहमदशाह ने जब देखा कि उसके सैनिक बुरी तरह कट रहे हैं तो उसे सन्धि करनी पड़ी। जोरावर ने उसके बेटे को गद्दी पर बैठाकर 7 ००० रु का फैसला कराया। अब उन्होने तिब्बत की ओर कूच किया।  वार्षिक जुर्माने और गांग को पारकर वे आगे बढ गये। ताशी  గTTన सिंह और उनकी विजयी सेना का नाम इतना फैल चुका था अब तक जोरावर कि रूडोक तथा गाटो ने बिना युद्ध किये हथियार डाल दिये। अब ये लोग  मानसरोवर के पार तीर्थपुरी पहुँच गये। ८००० तिब्बती सैनिकों ने परखा में किया, पर वे पराजित हुए। जोरावर सिंह तिब्बत भारत तथा नेपाल স্কু ্মানল   पहुँचे। वहाँ का प्रबन्ध उन्होंने मेहता संगम स्थल तकलाकोट तक जा बस्तीराम को सौंपा तथा वापस तीर्थपुरी आ गये। यह देखकर अंग्रेजों के कान खड़े हो गये। उन्होने पंजाब के राजा रणजीत सिंह पर उन्हें नियन्त्रित करने का दबाव डाला। निर्णय हुआ कि १० दिसम्बर  १८४१ को तिब्बत को उसका क्षेत्र वापस कर दिया जाये। इसी बीच जनरल छातर की कमान में दस हजार तिब्बती सेनिरकों की ३०० डोगरा सेनिकों से मुठभेड़ हुई। राक्षसताल के पास वे सब मारे गये। जोरावर सिंह ने गुलामखान  तथा नोनो के नेतृत्व में सेनिक भेजेः परवे सब भी मारे गये। अब वीर जोरावर सिंह स्वयं आगे बढ़े। वे तकलाकोट को युद्ध का केन्द्र  तिब्बतियों की विशाल सेना ने १० दिसम्बर १८४१ को बनाना चाहते थेः पर टोयो में इन्हें घेर लिया। दिसम्बर की भीषण बर्फीली ठण्ड में तीन दिन तक युद्ध चला।  घमासान १२ दिसम्बर को जोरावर सिंह को गोली लगी और वे घोडे़ से गिर पड़। डोगरा सेना तितर बितर हो गयी। तिब्बती सैनिकों में जोरावर सिंह का इतना भय था कि उनके शव को करने का भी वे साहस नहीं कर पा रहे थे। बाद मे स्पर्श उनके अवशेषों को चुनकर एक स्तूप बना दिया गया। सिंह छोतरन नामक यह खंडित स्तूप आज भी टोयो में देखा जा सकता हे। নিল্নী पूजा करते है। इस प्रकार जोरावर सिंह ने भारत की विजय  इसकी पताका भारत से बाहर तिब्बत और बाल्टिस्तान तक फहरायी।  सिंह जनरल जोरावर তন্স 13 ওসল 1786 - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन आज जिनकी पंपरमानंद -ruciಞಬ4 कांतिकारी mrino २७ वर्ष सेल्यूलर  जेल 13Jivri 1963 अंडमान में रहे १३ अप्रेल १९८२ बतरान साहन अभनित মী ৭ী সভল बिहार 13 मुख्यमंत्री 9 १३ अप्रेल १९८२ पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन आज जिनकी पंपरमानंद -ruciಞಬ4 कांतिकारी mrino २७ वर्ष सेल्यूलर  जेल 13Jivri 1963 अंडमान में रहे १३ अप्रेल १९८२ बतरान साहन अभनित মী ৭ী সভল बिहार 13 मुख्यमंत्री 9 १३ अप्रेल १९८२ - ShareChat
#🥹मशहूर गायिका आशा भोसले का निधन👨‍🎤 #आज जिनकी पुण्यतिथि है
🥹मशहूर गायिका आशा भोसले का निधन👨‍🎤 - श्रद्धासुमन जागरण jagran com 3 'মুহীকীহানী' (८ सितंबर १९३३ 12 3দল 2026) श्रद्धासुमन जागरण jagran com 3 'মুহীকীহানী' (८ सितंबर १९३३ 12 3দল 2026) - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - आज जिनकी पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन দার গুলী নাত 36 ٥ श्री गुरु नानक देव जी মাচিনকোয के द्वितीय स्वरूप 12 আল 1978 गुरू अंगद देव जी की पुण्यतिथि पर कोटि फोटि बगन १२ अप्रैल सश चद अगवाल मोक्षगुंडम विश्वेश्वरया Mo l  থাল ২ महान वेज्ञानिक इंजीनियर 12 M 12 স9ল 962 ٥٧   ا    1204099 1242019 Ruaಲ आज जिनकी पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन দার গুলী নাত 36 ٥ श्री गुरु नानक देव जी মাচিনকোয के द्वितीय स्वरूप 12 আল 1978 गुरू अंगद देव जी की पुण्यतिथि पर कोटि फोटि बगन १२ अप्रैल सश चद अगवाल मोक्षगुंडम विश्वेश्वरया Mo l  থাল ২ महान वेज्ञानिक इंजीनियर 12 M 12 স9ল 962 ٥٧   ا    1204099 1242019 Ruaಲ - ShareChat
#आज जिनकी पुण्यतिथि है
आज जिनकी पुण्यतिथि है - आज जिनकी पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन महेश नारायण भट्टाचार्य २२ फरवरी १८३६ 1906 12 April Mahesh Chandra Nyayratna Bhattacharyya; Indian scholar; academic; and philanthropist Away Passed बालाजी विश्वनाथ भट्ट ঐথানা जनवरी १६६२ अप्रैल १७२० 9 LLNILIDI  आज जिनकी पुण्यतिथि है श्रद्धासुमन महेश नारायण भट्टाचार्य २२ फरवरी १८३६ 1906 12 April Mahesh Chandra Nyayratna Bhattacharyya; Indian scholar; academic; and philanthropist Away Passed बालाजी विश्वनाथ भट्ट ঐথানা जनवरी १६६२ अप्रैल १७२० 9 LLNILIDI - ShareChat
#🙏🏻माँ तुझे सलाम #आज जिनकी पुण्यतिथि है
🙏🏻माँ तुझे सलाम - HERO OF LADAKH Bienen Slachen GlaCe { Kargil Karoas Srarrahen 603/ 00/ Pangong Lake 8<8 Leh शतःशत नमन Slacheng Pangong Sarhen Lari Lake a [ a कर्नल सोनम वांगचुक लद्दाख का॰शेर 49 महावीर @captamrishkumar Colonel Sonam Wangchuk, MVC 10 April 2026) (11 1964 May 4 ASSAM REGIMENT HERO OF LADAKH Bienen Slachen GlaCe { Kargil Karoas Srarrahen 603/ 00/ Pangong Lake 8<8 Leh शतःशत नमन Slacheng Pangong Sarhen Lari Lake a [ a कर्नल सोनम वांगचुक लद्दाख का॰शेर 49 महावीर @captamrishkumar Colonel Sonam Wangchuk, MVC 10 April 2026) (11 1964 May 4 ASSAM REGIMENT - ShareChat
#🙏🏻माँ तुझे सलाम #🇮🇳 देशभक्ति #आज जिनकी जयन्ती है #आज जिनकी जयंती है
🙏🏻माँ तुझे सलाम - सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू सगे भाई थे जिन्होने १८५५-१८५६ के नेतृत्व  किया था। सन्थाल विद्रोह ब्रिटिश शासन सन्थाल विद्रोह का থা|[1] fse और भ्रष्ट जमींदारी प्रथा दोनों के काह्नू मुर्मू को  भारत 400 Rg मुर्मू को  INDIA भोगनाडीह में पंचकठिया में फांसी दी गई। बरगद से लटकाकर দামী মী गई। सिदो   मुर्मू - काव्हू मुर्मू SIDO MURMU KNIU MURMU 2002 सिद्धू मुर्मू की जयंती (१८२५) पर आज ११ अप्रैल शत शत नमन सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू सगे भाई थे जिन्होने १८५५-१८५६ के नेतृत्व  किया था। सन्थाल विद्रोह ब्रिटिश शासन सन्थाल विद्रोह का থা|[1] fse और भ्रष्ट जमींदारी प्रथा दोनों के काह्नू मुर्मू को  भारत 400 Rg मुर्मू को  INDIA भोगनाडीह में पंचकठिया में फांसी दी गई। बरगद से लटकाकर দামী মী गई। सिदो   मुर्मू - काव्हू मुर्मू SIDO MURMU KNIU MURMU 2002 सिद्धू मुर्मू की जयंती (१८२५) पर आज ११ अप्रैल शत शत नमन - ShareChat