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।। ॐ ।। अवजानन्ति मां मूढा मांनुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे मनुष्य-शरीर के आधारवाला और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य-शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पड़ता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ।। ऊँ अवजानन्ति मां मूढा मांनुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।  सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को मूढ़लोग मुझे मनुष्य शरीर के न जाननेवाले और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण आधारवाला प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पडता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज  ।। ऊँ अवजानन्ति मां मूढा मांनुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।  सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को मूढ़लोग मुझे मनुष्य शरीर के न जाननेवाले और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण आधारवाला प्राणियों के ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ मनुष्य शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का शरीर ही तो दिखायी पडता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" - ShareChat