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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - विनोद शाह सूरत, गुजरात सिद्धांतों से समझौता  उन्होंने कभी नहीं किया मेरे पिताजी असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। वे सरल, संतोषी , स्पष्टवादी और सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे। उन्हें जो सही लगता, वह बिना किसी संकोच के कह देते, चाहे सामने कोई भी हो। संतोष और अपरिग्रह उनके जीवन अटूट हिस्सा थे। एक बार मैंने उन्हें खादी का एक तौलिया  # किया। मेरा मन रखने के लिए उन्होंने उसे स्वीकार तो कर लिया, लेकिन बाद में उन्होंने दो दिन का उपवास रखा।  दरअसल , उनका मानना था कि आवश्यकता से अधिक संग्रह करना किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। 3 इस्तुषां নান ক্ী সন 9ী ওপন তীনন স ওনাং লিয়া] सेवानिवृत्त होने के बाद वे अक्सर मेरे साथ क्लीनिक में बैठने  लगे थे। वहां मैँने उनसे जीवन का एक अमूल्य पाठ सीखा।  वे हर महीने की अंतिम तारीख को हमारे यहां काम करने वाले  दोनों कंपाउंडरों का वेतन समय पर चुका देते और दवाइयों के के चेक भी तैयार कर देते। एक दिन मैंने జ్ఞా आपूर्तिकर्ताओं  इतनी जल्दी क्या है ?' वे मुस्कराकर बोले  ॅजो व्यक्त  महीने हमारे लिए मेहनत करता है, उसके वेतन में कभी नहीं करनी चाहिए। उसके परिवार का चूल्हा उसी आय से जलता है। ' आज भी उनकी यह सीख मेरे साथ है। उन्होंने  नहीं बल्कि दूसरों  fq सिखाया कि ईमानदारी केवल अपने के प्रत़ि निभाई गईं जिम्मेदारियों में भी दिखाई देती है। विनोद शाह सूरत, गुजरात सिद्धांतों से समझौता  उन्होंने कभी नहीं किया मेरे पिताजी असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। वे सरल, संतोषी , स्पष्टवादी और सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे। उन्हें जो सही लगता, वह बिना किसी संकोच के कह देते, चाहे सामने कोई भी हो। संतोष और अपरिग्रह उनके जीवन अटूट हिस्सा थे। एक बार मैंने उन्हें खादी का एक तौलिया  # किया। मेरा मन रखने के लिए उन्होंने उसे स्वीकार तो कर लिया, लेकिन बाद में उन्होंने दो दिन का उपवास रखा।  दरअसल , उनका मानना था कि आवश्यकता से अधिक संग्रह करना किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। 3 इस्तुषां নান ক্ী সন 9ী ওপন তীনন স ওনাং লিয়া] सेवानिवृत्त होने के बाद वे अक्सर मेरे साथ क्लीनिक में बैठने  लगे थे। वहां मैँने उनसे जीवन का एक अमूल्य पाठ सीखा।  वे हर महीने की अंतिम तारीख को हमारे यहां काम करने वाले  दोनों कंपाउंडरों का वेतन समय पर चुका देते और दवाइयों के के चेक भी तैयार कर देते। एक दिन मैंने జ్ఞా आपूर्तिकर्ताओं  इतनी जल्दी क्या है ?' वे मुस्कराकर बोले  ॅजो व्यक्त  महीने हमारे लिए मेहनत करता है, उसके वेतन में कभी नहीं करनी चाहिए। उसके परिवार का चूल्हा उसी आय से जलता है। ' आज भी उनकी यह सीख मेरे साथ है। उन्होंने  नहीं बल्कि दूसरों  fq सिखाया कि ईमानदारी केवल अपने के प्रत़ि निभाई गईं जिम्मेदारियों में भी दिखाई देती है। - ShareChat