#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
नकुल और सहदेव की उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रों के नामकरण-संस्कार...(दिन 364)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
तथा राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणाश्च तपोधनाः ।
चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोऽर्थाय दुष्करम् ।। १३ ।।
'सम्पूर्ण राजर्षियों तथा तपस्वी ब्राह्मणोंने भी यशके लिये छोटे-बड़े कठिन कर्म किये हैं ।। १३ ।।
सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्नुहि ।। १४ ।।
'अनिन्दिते ! इसी प्रकार तुम भी इस माद्रीको नौकापर बिठाकर पार लगा दो; इसे भी संतति देकर उत्तम यश प्राप्त करो' ।। १४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्रीं सकृच्चिन्तय दैवतम् । तस्मात् ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम् ।। १५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! महाराज पाण्डुके यों कहनेपर कुन्तीने माद्रीसे कहा- 'तुम एक बार किसी देवताका चिन्तन करो, उससे तुम्हें योग्य संतानकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है' ।। १५ ।।
ततो माद्री विचार्येवं जगाम मनसाश्विनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ ।। १६ ।।
तब माद्रीने मन-ही-मन कुछ विचार करके दोनों अश्विनीकुमारोंका स्मरण किया। तब उन दोनों ने आकर माद्री के गर्भसे दो जुड़वें पुत्र उत्पन्न किये ।। १६ ।।
नकुलं सहदेवं च रूपेणाप्रतिमी भुवि ।
तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी ।। १७ ।।
उनमेंसे एकका नाम नकुल था और दूसरेका सहदेव। पृथ्वीपर सुन्दर रूपमें उन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। पहलेकी तरह उन दोनों यमल संतानोंके विषयमें भी आकाशवाणीने कहा ।। १७ ।।
सत्त्वरूपगुणोपेतौ भवतोऽत्यश्विनाविति । भासतस्तेजसात्यर्थ रूपद्रविणसम्पदा ।। १८ ।।
'ये दोनों बालक अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणोंसे सम्पन्न होंगे। अपने तेज तथा बढ़ी-चढ़ी रूप-सम्पत्तिके द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे' ।। १८ ।।
नामानि चक्रिरे तेषां शतशृङ्गनिवासिनः ।
भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिर्विशाम्पते ।। १९ ।।
तदनन्तर शतशृंगनिवासी ऋषियोंने उन सबके नामकरण संस्कार किये। उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी भक्ति और कर्मके अनुसार उनके नाम रखे ।। १९ ।।
ज्येष्ठं युधिष्ठिरेत्येवं भीमसेनेति मध्यमम् । अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन् ।। २० ।।
कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम युधिष्ठिर, मझलेका नाम भीमसेन और तीसरे का नाम अर्जुन रखा गया ।। २० ।।
पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् ।
माद्रीपुत्रावकथयंस्ते विप्राः प्रीतमानसाः ।। २१ ।।
उन प्रसन्नचित्त ब्राह्मणों ने माद्री पुत्रों में से जो पहले उत्पन्न हुआ, उसका नाम नकुल और दूसरे का सहदेव निश्चित किया ।। २१ ।।
अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमाः । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव ।। २२ ।।
वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवगण प्रतिवर्ष एक-एक करके उत्पन्न हुए थे, तो भी देवस्वरूप होनेके कारण पाँच संवत्सरोंकी भाँति एक-से सुशोभित हो रहे थे ।। २२ ।।
महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमाः ।
पाण्डुर्दृष्ट्वा सुतांस्तांस्तु देवरूपान् महौजसः ।। २३ ।।
मुदं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिपः । ऋषीणामपि सर्वेषां शतशृङ्गनिवासिनाम् ।। २४ ।।
प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् ।
कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदयत् ।। २५ ।।
वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंको देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशृंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया ।। २३-२५ ।।
तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती।
उक्ता सकृद् द्वन्द्वमेषा लेभे तेनास्मि वञ्चिता ।। २६ ।।
राजन्! जब एकान्तमें पाण्डुने कुन्तीसे वह बात कही, तब सती कुन्ती पाण्डुसे इस प्रकार बोली- 'महाराज! मैंने इसे एक पुत्रके लिये नियुक्त किया था, किंतु इसने दो पा लिये। इससे मैं ठगी गयी ।। २६ ।।
बिभेम्यस्याः परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी ।
नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्वाह्वाने फलद्वयम् ।। २७ ।।
तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषोऽस्तु वरो मम । एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महाबलाः ।। २८ ।।
सम्भूताः कीर्तिमन्तश्च कुरुवंशविवर्धनाः ।
शुभलक्षणसम्पन्नाः सोमवत् प्रियदर्शनाः ।। २९ ।।
'अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अतः राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।' इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था ।। २७-२९।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️


