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#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔
मेरे विचार - रजस्तमश्चाभिभूय भवति মন भारत | रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा II रजोगुण  37 mಗಾ ಕಾಾ್ ೯ 3ತ್೯! सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणको दवाकर रजोगुण और  वैसे ही सत्त्वगुण रजोगुणको दवाकर तमोगुण होता हैं अर्थात् वढ़ता हैंIl १० Il Hdangூ देहेउस्मिन्प्रकाश ತಂೆಾಗ / ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत I। जिस समय इस देहमें तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती हैं, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है Il ११ II लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते   विवृद्धे भरतर्पभ ।। हे अर्जुन! रजोगुणके वढ़नेपर लोभ॰ प्रवृत्ति, स्वार्थवुद्धिसे सकामभावसे कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और विपयभोगोंको लालसाये ٦٩ उत्पन्न होते हैँं Il  १२ Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार रजस्तमश्चाभिभूय भवति মন भारत | रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा II रजोगुण  37 mಗಾ ಕಾಾ್ ೯ 3ತ್೯! सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणको दवाकर रजोगुण और  वैसे ही सत्त्वगुण रजोगुणको दवाकर तमोगुण होता हैं अर्थात् वढ़ता हैंIl १० Il Hdangூ देहेउस्मिन्प्रकाश ತಂೆಾಗ / ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत I। जिस समय इस देहमें तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती हैं, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है Il ११ II लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते   विवृद्धे भरतर्पभ ।। हे अर्जुन! रजोगुणके वढ़नेपर लोभ॰ प्रवृत्ति, स्वार्थवुद्धिसे सकामभावसे कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और विपयभोगोंको लालसाये ٦٩ उत्पन्न होते हैँं Il  १२ Il श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १४ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat