#जय बजरंगबली
💐#कनक__भूधराकार__सरीरा।💐
💐#समर_भयंकर_अतिबल_बीरा।।💐
💐#सीता_मन_भरोस_तब_भयऊ।💐
💐#पुनि_लघुरूप_पवनसुत_लयऊ।।💐
प्रभु श्री राम के जीवन पर
अनेक रामायण लिखी गई
है जिनमे प्रमुख है वाल्मीकि
रामायण,श्री राम चरित मानस,
कबंद रामायण(कबंद एक राक्षस
का नाम था),अद्भुत रामायण और
आनंद रामायण।
लेकिन क्या आप जानते है अपने
आराध्य प्रभु श्री राम को समर्पित
एक रामायण स्वयं हनुमान जी ने
लिखी थी जो ‘हनुमद रामायण’ के
नाम से जानी जाती है।
इसे ही प्रथम रामायण होने का
गौरव प्राप्त है।
लेकिन स्वयं हनुमान जी ने ही
अपनी उस रामायण को समुद्र
में फ़ेंक दिया था।
लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया
आइये जानते है शास्त्रों में वर्णित
एक गाथा-
शास्त्रों के अनुसार सर्वप्रथम
रामकथा हनुमानजी ने लिखी
थी और वह भी एक शिला
(चट्टान) पर अपने नाखूनों
से लिखी थी।
यह रामकथा वाल्मीकिजी की
रामायण से भी पहले लिखी गई
थी और यह ‘हनुमद रामायण’ के
नाम से प्रसिद्ध है।
यह घटना तब की है जब
भगवान श्रीराम रावण पर
विजय प्राप्त करने के बाद
अयोध्या में राज करने लगते
हैं और श्री हनुमानजी हिमालय
पर चले जाते हैं।
वहां वे अपनी शिव तपस्या के
दौरान एक शिला पर प्रतिदिन
अपने नाखून से रामायण की
कथा लिखते थे।
इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम
की महिमा का उल्लेख करते
हुए ‘हनुमद रामायण’ की
रचना की।
कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि
ने भी ‘वाल्मीकि रामायण’ लिखी
और लिखने के बाद उनके मन में
इसे भगवान शंकर को दिखाकर
उनको समर्पित करने की इच्छा
हुई।
वे अपनी रामायण लेकर शिव
के धाम कैलाश पर्वत पहुंच गए।
वहां उन्होंने हनुमानजी को और
उनके द्वारा लिखी गई ‘हनुमद
रामायण’ को देखा।
हनुमद रामायण के दर्शन कर
वाल्मीकिजी निराश हो गए।
वाल्मीकिजी को निराश देख
कर हनुमानजी ने उनसे उनकी
निराशा का कारण पूछा तो महर्षि
बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन
परिश्रम के बाद रामायण लिखी
थी लेकिन आपकी रामायण
देखकर लगता है कि अब मेरी
रामायण उपेक्षित हो जाएगी,
क्योंकि आपने जो लिखा है
उसके समक्ष मेरी रामायण
तो कुछ भी नहीं है।
तब वाल्मीकिजी की चिंता का
शमन करते हुए श्री हनुमानजी
ने हनुमद रामायण पर्वत शिला
को एक कंधे पर उठाया और
दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि
को बिठाकर समुद्र के पास गए
और स्वयं द्वारा की गई रचना
को श्रीराम को समर्पित करते
हुए समुद्र में समा दिया।
तभी से हनुमान द्वारा रची गई
हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।
हनुमानजी द्वारा लिखी रामायण
को हनुमानजी द्वारा समुद्र में फेंक
दिए जाने के बाद महर्षिवाल्मीकि
बोले कि हे रामभक्त श्री हनुमान,
आप धन्य हैं !
आप जैसा कोई दूसरा ज्ञानी
और दयावान नहीं है।
हे हनुमान,आपकी महिमा
का गुणगान करने के लिए
मुझे एक जन्म और लेना होगा
और मैं वचन देता हूं कि कलयुग
में मैं एक और रामायण लिखने
के लिए जन्म लूंगा।
तब मैं यह रामायण आम
लोगों की भाषा में लिखूंगा।
माना जाता है कि रामचरितमानस
के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास
कोई और नहीं बल्कि महर्षि
वाल्मीकि का ही पुनर्जन्म था।
तुलसीदासजी अपनी ‘रामचरित
मानस’ लिखने के पूर्व हनुमान
चालीसा लिखकर हनुमानजी
का गुणगान करते हैं और
हनुमानजी की प्रेरणा से
ही वे फिर रामचरित मानस
लिखते हैं।
माना जाता है महाकवि कालिदास
के समय में एक पटलिका को समुद्र
के किनारे पाया गया जिसे कि एक
सार्वजनिक स्थल पर टांग दिया गया
था ताकि विद्यार्थी उस गूढ़लिपि को
पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें।
ऐसा माना जाता है कि कालीदास ने
उसका अर्थ निकाल लिया था और वो
ये भी जान गये थे कि ये पटलिका कोई
और नहीं अपितु हनुमानजी द्वारा रचित
हनुमद रामायण का ही एक अंश है जो
कि पर्वत शिला से निकल कर जल के
साथ प्रवाहित होकर यहां तक आ गया है।
#साभार_संकलित★
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💐#ॐहनुमतेनमः💐
धर्मग्रंथों में हनुमानजी के बारह
नाम बताए गए हैं,जिनके द्वारा
उनकी स्तुति की जाती है।
गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा
प्रकाशित श्रीहनुमान अंक
के अनुसार हनुमानजी के
इन बारह नामों का जो रात
में सोने से पहले व सुबह उठने
पर अथवा यात्रा प्रारंभ करने से
पहले पाठ करता है,उसके सभी
भय दूर हो जाते हैं और उसे अपने
जीवन में सभी सुख प्राप्त होते हैं।
वह अपने जीवन में अनेक
उपलब्धियां प्राप्त करता है।
हनुमानजी की बारह नामों
वाली स्तुति इस प्रकार है-
स्तुति;-
हनुमानअंजनी
सूनुर्वायुपुत्रो महाबल:।
रामेष्ट: फाल्गुनसख:
पिंगाक्षोअमितविक्रम:।।
उदधिक्रमणश्चेव
सीताशोकविनाशन:।
लक्ष्मणप्राणदाता च
दशग्रीवस्य दर्पहा।।
एवं द्वादश नामानि
कपीन्द्रस्य महात्मन:।
स्वापकाले प्रबोधे च
यात्राकाले च य: पठेत्।।
तस्य सर्वभयं नास्ति
रणे च विजयी भवेत्।
राजद्वारे गह्वरे च भयं
नास्ति कदाचन।।
हनुमान जी के इन बारह नामों
का स्मरण करने से व्यक्ति भय
मुक्त हो जाता है,यात्रा के आरम्भ
में स्मरण करने से यात्रा सुगम एवं
सफल होती है।
युद्ध में स्मरण करने से विजयश्री
प्राप्त होती है।
प्रनवउँ पवनकुमार खल
बन पावक ग्यानघन।
जासु ह्रदय आगार
बसहिं राम सर चाप धर॥
अतुलितबलधामं
हेमशैलाभदेहं,
दनुजवनकृशानुं
ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं
वानराणामधीशं,
रघुपतिप्रियभक्तं
वातजातं नमामि!!
गोष्पदीकृतवारीशं
मशकीकृतराक्षसम्।
रामायणमहामालारत्नं
वन्देऽनिलात्मजम्॥
अञ्जनानन्दनं वीरं
जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे
लङ्काभयङ्करम्॥
महाव्याकरणाम्भो
धिमन्थमानसमन्दरम्।
कवयन्तं रामकीर्त्या
हनुमन्तमुपास्महे॥
उल्लङ्घ्य सिन्धोः
सलिलं सलीलं यः
शोकवह्निं
जनकात्मजायाः।
आदाय तेनैव ददाह
लङ्कां नमामि तं
प्राञ्जलिराञ्जनेयम्॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
आञ्जनेयमतिपाटलाननं
काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्।
पारिजाततरुमूलवासिनं
भावयामि पवमाननन्दनम्॥
यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र
-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।
बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं
मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥
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हर हर महादेव💐
ॐ हनुमते नमः💐
जय सियाभवानी💐
जय श्रीराम💐


