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#शब्द संवाद
शब्द संवाद - बेगाना శ్ాడాన ना तुमने कुछ जाना और ना हमने कुछ जाना। इश्क हो गया यह भी तो पहले लोगों ने पहचाना। दिए की लौ जल रही है यह उसका एक भ्रम था, खुद जल रही है बाती, दिए ने यह भी ना जाना।  मैं आज  भी भ्रम में और कल भी था मै भ्रम में। सोचता  रोज हूं मैं कुछ बात करू होकर तुम में।  মঁমন ही कुछ भूल जाता हूं पास जात H हकीकत मेंबफा का राज भी मैने नही जाना। बफा के भाव में दिन रात नए पैगाम लिखता हूंl रात भर तेरा ही हर ख्वाब लिखता हू। ज।ग कर हकीकत में नहीं तू मेरा, फिर यह रिश्ता कैसा मेरे जेह़न में तू बसा मैंने खुद से ही है पहचाना।  तड़पती आंख में दिलबर हमेशा साथ रहते हो। बैठकर पास में मेरे कान में कुछ बात कहते हो। में हमेशा एक ख्वाब ही मिलता, टूटती मुदाओं कशिश में रहकर भी रिश्ता मुझे पूं ही निभाना। व्योम में उड़ते ये पंछी मुझे कुछ याद दिलाते हैं। खतों के वाहक थे कभी आज याद बन जाते हैं। तेरी जरूरत का बेशक , कभी  था एक ठिकाना मैं गर्दिशों का मारा फकीर, जैसे खुद से बेगाना। पूछता हूं मैं खुद से॰मैं कैसे अभी तक जिंदा हूँl शर्मिदा हूं। में उसके , मैं सांसो से খভক্রন पास सामने जो नहीं मेरे ख्वाब में आज बही आता, बहुृुत मुश्किल है उस कातिल को पूं भूल पाना। चुपके से रोना और चुपके से खुद पे मुस्कुराना। बहुत मुश्किल है खुद की किस्मत  बदल पाना। सांसें हिं तब तलक तो ,निगाहों मैं बसा रहने दो, मर कर किसे पता कहां पर, किसको है जाना। बेगाना శ్ాడాన ना तुमने कुछ जाना और ना हमने कुछ जाना। इश्क हो गया यह भी तो पहले लोगों ने पहचाना। दिए की लौ जल रही है यह उसका एक भ्रम था, खुद जल रही है बाती, दिए ने यह भी ना जाना।  मैं आज  भी भ्रम में और कल भी था मै भ्रम में। सोचता  रोज हूं मैं कुछ बात करू होकर तुम में।  মঁমন ही कुछ भूल जाता हूं पास जात H हकीकत मेंबफा का राज भी मैने नही जाना। बफा के भाव में दिन रात नए पैगाम लिखता हूंl रात भर तेरा ही हर ख्वाब लिखता हू। ज।ग कर हकीकत में नहीं तू मेरा, फिर यह रिश्ता कैसा मेरे जेह़न में तू बसा मैंने खुद से ही है पहचाना।  तड़पती आंख में दिलबर हमेशा साथ रहते हो। बैठकर पास में मेरे कान में कुछ बात कहते हो। में हमेशा एक ख्वाब ही मिलता, टूटती मुदाओं कशिश में रहकर भी रिश्ता मुझे पूं ही निभाना। व्योम में उड़ते ये पंछी मुझे कुछ याद दिलाते हैं। खतों के वाहक थे कभी आज याद बन जाते हैं। तेरी जरूरत का बेशक , कभी  था एक ठिकाना मैं गर्दिशों का मारा फकीर, जैसे खुद से बेगाना। पूछता हूं मैं खुद से॰मैं कैसे अभी तक जिंदा हूँl शर्मिदा हूं। में उसके , मैं सांसो से খভক্রন पास सामने जो नहीं मेरे ख्वाब में आज बही आता, बहुृुत मुश्किल है उस कातिल को पूं भूल पाना। चुपके से रोना और चुपके से खुद पे मुस्कुराना। बहुत मुश्किल है खुद की किस्मत  बदल पाना। सांसें हिं तब तलक तो ,निगाहों मैं बसा रहने दो, मर कर किसे पता कहां पर, किसको है जाना। - ShareChat