-Naveen Lal
भागवत गीता भाग ७ सारांश / निष्कर्ष :- समग्र जानकारी
इस सातवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया की – अनन्य भाव से मुझमें समर्पित होकर, मेरे आश्रित होकर जो योग में लगता है वह समग्र रूप से मुझे जनता है। मुझे जानने के लिये हजारो में कोई विरला ही प्रयत्न करने वालो में विरला ही कोई जानता है। वह मुझे पिण्ड रूप में एक देशीय नहीं वरन सर्वत्र वियाप्त दिखता है।
आठ भेदों वाली मेरी जड़ प्राकर्ति है और इसके अन्तराल में जीवरूप मेरी चेतन प्रकर्ति है। इन्ही दोनों के संयोग से पूरा जगत खड़ा है। तेज और बल से मेरे ही द्वारा राग और काम से रहित बल तथा कामना भी मैं ही हूँ। जैसा की सब कामनाये तो वर्जित है, लेकिन मेरी प्राप्ति के लिए कामना कर। ऐसी इच्छा का अभ्युदय होना मेरा ही प्रसाद है। केवल परमात्मा को पाने की कामना ही “धर्मानुकूल कामना” है।
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