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दिव्य जन्म और अलौकिक वैराग्य
यह उस कालखंड की बात है जब इस धरा पर भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य की भूमिका तैयार हो रही थी। उसी समय एक मुस्लिम परिवार में जन्मे हरिदास ठाकुर के हृदय में भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम अंकुरित हुआ। रूढ़िवादी सामाजिक बंधनों और सांसारिक वैभव को ठुकराकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन हरि-नाम संकीर्तन को समर्पित कर दिया। सांसारिक सुख-सुविधाओं, समाज में मान-प्रतिष्ठा, यहाँ तक कि भूख और नींद से भी परे होकर वे अहर्निश (दिन-रात) महामंत्र का मानसिक और मुखर जाप करते रहते थे। उनके चेहरे का आध्यात्मिक ओज और नाम की यह अलौकिक शक्ति तत्कालीन कट्टरपंथी मुस्लिम शासकों और अधिकारियों को खटकने लगी। वे हरिदास को एक बागी और अपने मजहब के लिए खतरा मानने लगे। उनका सोचना था कि यदि एक मुस्लिम होकर कोई हिंदू नाम जपेगा, तो समाज में विद्रोह फैल जाएगा। इसी सोच के साथ काजी ने उन्हें बंदी बनाकर अपने दरबार में पेश करने का क्रूर आदेश दे दिया।
काजी की अदालत और निडर हुंकार
क्रोध से उफनते काजी और एक उन्मादी भीड़ के सामने हरिदास जी को खड़ा किया गया। काजी ने तीखे स्वर में पूछा, "तुम एक पाकीजा खानदान में पैदा होकर इन गैर-मजहबी नामों की रट क्यों लगा रहे हो? भलाई इसी में है कि अपने मजहब में लौट आओ, वरना मौत के घाट उतार दिए जाओगे!"
मृत्यु के साये के सामने भी हरिदास जी के चेहरे पर भय की एक शिकन तक न थी। उन्होंने अत्यंत विनम्र परंतु दृढ़ स्वर में कहा, "हे काजी साहब! परमात्मा का पावन नाम किसी एक धर्म, जाति या संप्रदाय की बपौती नहीं है। वह शाश्वत है, जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे है। ईश्वर का नाम तो वह पारस है जो किसी भी कुल में जन्मे मनुष्य की आत्मा को शुद्ध कर देता है। आप मुझे डराने का प्रयास न करें, यदि आप मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े भी कर दें, तब भी मेरे प्राणों से प्रभु का नाम अलग नहीं हो सकता।"
हरिदास का यह दोटूक जवाब सुनकर काजी का अहंकार छिन्न-भिन्न हो गया। उसने गुस्से से तमतमाते हुए जल्लादों को हुक्म दिया, "इस गुस्ताख को बाईस बाजारों में ले जाओ और तब तक कोड़ों से पीटो, जब तक इसके प्राण न निकल जाएं। दुनिया देखे कि धर्म छोड़ने का क्या अंजाम होता है।"
क्रूरता पर भारी पड़ी करुणा और दैवीय कवच
जल्लाद हरिदास जी को घसीटते हुए सड़कों पर ले गए और एक-एक बाजार में उन पर कोड़ों की बर्बर बौछार शुरू कर दी। कोड़े जैसे ही उनकी पीठ पर पड़ते, खाल उधड़ जाती और रक्त की धारा बह निकलती। परंतु इस भीषण यातना के बीच भी हरिदास जी के होंठ थमे नहीं; वे परम शांति के साथ गा रहे थे:
"हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे..."
कुछ ही समय में जल्लाद बुरी तरह थक गए और खौफ से कांपने लगे। उन्होंने आपस में कहा, "यह कैसा चमत्कार है? इतने कोड़े खाने के बाद तो हाथी भी दम तोड़ दे, पर यह शख्स मुस्कुराते हुए मंत्र पढ़ रहा है, जैसे इसे दर्द का अहसास ही न हो रहा हो!"
सत्य तो यह था कि अपने अनन्य भक्त को तड़पता देख स्वयं गोलोक बिहारी श्री कृष्ण ने आकर अदृश्य रूप से हरिदास जी को अपने आलिंगन में ले लिया था। कोड़ों की हर मार हरिदास के बजाय स्वयं भगवान अपने शरीर पर झेल रहे थे। अंततः हार मानकर जल्लाद उनके चरणों में गिर पड़े और बोले, "हे सिद्ध पुरुष! हमें क्षमा करें, हम तो केवल हुक्म के गुलाम हैं।" हरिदास जी ने करुणा भरी आँखें खोलीं और कहा, "घबराओ मत भाई, तुम तो केवल माध्यम हो। मेरा ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे।"
गंगा की लहरें और सत्य का प्रकाश
जल्लादों ने काजी के पास जाकर हाथ खड़े कर दिए कि वे उसे मार नहीं सकते, क्योंकि उसके पास कोई दैवीय शक्ति है। इस पर झुंझलाकर काजी ने कहा, "अगर वह मरता नहीं, तो उसके हाथ-पैर बांधकर उसे एक लाश की तरह नदी में बहा दो।" जल्लादों ने वैसा ही किया और हरिदास जी को उफनती हुई गंगा की लहरों के हवाले कर दिया। भक्तजन विलाप करने लगे कि एक संत का अंत हो गया।
परंतु जिसकी रक्षा स्वयं गोविंद कर रहे हों, उसे गंगा की लहरें कैसे डुबो सकती थीं? कुछ ही समय बाद, हरिदास जी का शरीर तैरता हुआ स्वतः ही किनारे लग गया। वे पूरी तरह स्वस्थ और चैतन्य थे। वे उठकर सहज भाव से अपनी कुटिया की ओर चल दिए और पहले से भी अधिक गहरे प्रेम में डूबकर पुनः हरि-नाम का कीर्तन करने लगे।
महिमा की गूँज और अमर संदेश
इस अकल्पनीय घटना की खबर पूरे क्षेत्र में दावानल (जंगल की आग) की तरह फैल गई। लोग हैरत में थे कि बाईस बाजारों की मार और गंगा की लहरों को मात देकर एक संत जीवित लौट आया है। यहाँ तक कि अत्याचारी शासक और काजी भी थर-थर कांपने लगे। उस दिन के बाद किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि श्रील हरिदास ठाकुर की साधना में विघ्न डाल सके। इतिहास ने उन्हें उनके जन्म से नहीं, बल्कि उनकी अगाध भक्ति और पावनता के कारण 'नामाचार्य' के रूप में पूजा।
इस पावन प्रसंग की अमर सीख:
अनन्य रक्षा: जब संकट की घड़ियां मनुष्य को चारों ओर से घेर लेती हैं, तब प्रभु का नाम एक अभेद्य ढाल बनकर भक्त की रक्षा करता है।
निर्भयता: सच्ची ईश्वर-भक्ति मनुष्य के भीतर से मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त कर देती है।
क्षमाशीलता: एक सच्चा भक्त अपने उत्पीड़कों के प्रति भी प्रतिशोध की भावना नहीं रखता, बल्कि उन्हें क्षमा कर उनका कल्याण चाहता है।
नाम की सर्वोपरिता: यह कथा सिद्ध करती है कि ईश्वर का नाम ही इस चराचर जगत में सबसे बड़ी शक्ति है।