ShareChat
click to see wallet page
search
।। ॐ ।। यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ अर्जुन! तू जो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता है, दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। #❤️जीवन की सीख #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #यथार्थ गीता
❤️जीवन की सीख - [ಲೊ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। -5 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।  अर्जुन! तूजो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, बह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यहःसब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। [ಲೊ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। -5 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।  अर्जुन! तूजो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, बह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यहःसब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। - ShareChat