ShareChat
click to see wallet page
search
।। ॐ।। त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले, सोम अर्थात् चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म होता है; जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ।
❤️जीवन की सीख - Il 3Il त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-्यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। Trna  पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि Oalhantk Cvmzu II देवभोगान्।। W आराधना विद्या के तीनों अंग ऋक्॰ साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और करनेवाले , सोम अर्थात् यजन का आचरण को पानेवाले पाप से मुक्त चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित होकर प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका होता है; पुनर्जन्म  जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। Il 3Il त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा-्यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। Trna  पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि Oalhantk Cvmzu II देवभोगान्।। W आराधना विद्या के तीनों अंग ऋक्॰ साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और करनेवाले , सोम अर्थात् यजन का आचरण को पानेवाले पाप से मुक्त चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित होकर प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका होता है; पुनर्जन्म  जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। - ShareChat