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।। ॐ ।। यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान् वायु आकाश में सदैव स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान। ठीक इसी प्रकार मैं आकाशवत् निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन नहीं कर पाते। प्रश्न पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता है? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏
यथार्थ गीता - ப13 |1 यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। मत्स्थानीत्युपधारय।l तथा सर्वाणि भूतानि जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान् वायु आकाश में सदैव स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण मुझमें स्थित हैं , ऐसा जान। ठीक इसी 9గ निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन प्रकार मैं आकाशवत् नहीं कर पाते। प्रश्न पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता है? इस पर कहते हैं-" यथार्थ गीता ' परमहस स्वामी अइगडानन्दर्जी ப13 |1 यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। मत्स्थानीत्युपधारय।l तथा सर्वाणि भूतानि जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान् वायु आकाश में सदैव स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण मुझमें स्थित हैं , ऐसा जान। ठीक इसी 9గ निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन प्रकार मैं आकाशवत् नहीं कर पाते। प्रश्न पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता है? इस पर कहते हैं-" यथार्थ गीता ' परमहस स्वामी अइगडानन्दर्जी - ShareChat