#जय श्री राम
प्रथम भाग: मौन, ध्वनि और नाम की महिमा
राम से ही मौन है, राम से ही सब ध्वनि।
राम से ही जप हैं सब, राम से ही हैं धुनि॥
भावार्थ: इस संसार में जो गहरी शांति या मौन है, वह राम का ही रूप है और जो भी ध्वनियाँ या गूँज सुनाई देती हैं, वे भी उन्हीं से उत्पन्न हैं। ईश्वर की आराधना के लिए किए जाने वाले सभी प्रकार के जप, मंत्र और मन को एकाग्र करने वाली पवित्र धुनें (नाद) सब राम के ही अलग-अलग स्वरूप हैं। उनके बिना न शब्द का अस्तित्व है और न ही मौन का।
द्वितीय भाग: साधना और कला के केंद्र
राम ही हैं साधना, राम ही हर साध्य में।
राम ही हर गीत में हैं, राम ही हर वाद्य में॥
भावार्थ: किसी भी भक्त या साधक द्वारा की जाने वाली तपस्या या साधना स्वयं राम हैं, और उस साधना से जिस परम लक्ष्य (साध्य या मोक्ष) की प्राप्ति होती है, वह भी राम ही हैं। संगीत के क्षेत्र में भी उन्हीं का वास है; गाए जाने वाले हर मधुर गीत के सुरों में राम हैं और उन्हें बजाने वाले हर वाद्य यंत्र (संगीत के उपकरणों) की झंकार में भी राम ही प्रकट होते हैं।
तृतीय भाग: प्रकृति और समय के नियंता
राम से सागर बने हैं, राम से नदिया बनीं।
राम से हर क्षण बना है, राम से सदियाँ बनीं॥
भावार्थ: इस विशाल प्रकृति का कण-कण राम की ही रचना है। अथाश और गहरा समंदर हो या कल-कल बहती नदियाँ, इन सब का निर्माण राम की चेतना से ही हुआ है। सिर्फ प्रकृति ही नहीं, बल्कि समय का चक्र भी उन्हीं के अधीन है। समय की सबसे छोटी इकाई यानी एक 'क्षण' भी राम से है और युगों-युगों का लंबा समय यानी 'सदियाँ' भी उन्हीं से निर्मित हैं। वे समय से परे और सर्वव्यापी हैं।
निष्कर्ष:
यह कविता संदेश देती है कि सृष्टि का कोई भी कोना, चाहे वह प्रकृति हो, संगीत हो, अध्यात्म हो या समय, श्री राम से अलग नहीं है। वे इस ब्रह्मांड के कण-कण में रमे हुए हैं।


