ShareChat
click to see wallet page
search
#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - फिजाओं में थोड़ी नमी थी शायद हममें भी थोड़ी कमी थी रूठे लोगों को मना ना सके क्या करें झूठ बोलने की आदत नहीं थी गुजरे वक्त की घड़ी थी शायद हमारी नहीं चली थी हम पर हावी रही जुबान सबकी क्या करें हमने तहजीब ना खराब की थी जिंदगी उलझी पड़ी थी डोर ना खुली थी सुलझी ' G लूटा कर देखा अपना सब कुछ क्या करें सबकी पाने की नुमाइश बड़ी थी किस्मत बंद पड़ी थी शायद अमावस की रैन जगी थी तभी तो साफ ना दिखा कुछ भी क्या करें अपनी ही चांदनी वहां छिपी थी स्वाती छीपा फिजाओं में थोड़ी नमी थी शायद हममें भी थोड़ी कमी थी रूठे लोगों को मना ना सके क्या करें झूठ बोलने की आदत नहीं थी गुजरे वक्त की घड़ी थी शायद हमारी नहीं चली थी हम पर हावी रही जुबान सबकी क्या करें हमने तहजीब ना खराब की थी जिंदगी उलझी पड़ी थी डोर ना खुली थी सुलझी ' G लूटा कर देखा अपना सब कुछ क्या करें सबकी पाने की नुमाइश बड़ी थी किस्मत बंद पड़ी थी शायद अमावस की रैन जगी थी तभी तो साफ ना दिखा कुछ भी क्या करें अपनी ही चांदनी वहां छिपी थी स्वाती छीपा - ShareChat