*आसान नौकरी*
*नौकरी बहुत अच्छी लग चुकी है। डयूटी भी बहुत आसान है, जब जी चाहे, तब दफ्तर आओ।*
*तनख्वाह है, हीरे मोती।*
*मालिक भी बहुत अच्छा और दयालू है।*
*परन्तु, फिर भी हम छुट्टियाँ बहुत करते हैं*
*नौकरी है, नाम का दान मिलना!*
*दफ्तर है, सिमरन की बैठक, जब जी चाहे तभी बैठ जाओ, कोई रोक-टोक नहीं, कोई दिखावा भी नहीं करना।*
*तनख्वाह हैं, शब्द की कमाई करके सच्चे नाम का धन इकठ्ठा करना!*
*मालिक हैं सतगुरू जिनकी दया हमारे ऊपर हर पल हो रही है!*
*छुट्टियाँ हैं , सिमरन में नाग़ा करना!*
*सँसार में हमें अपनी नौकरी की कितनी चिन्ता होती है? समय पर दफ्तर पहुँचते हैं, छुट्टी की अर्ज़ी लगाते हैं, मँज़ूर होने पर ही छुट्टी करते हैं, हमेशा नौकरी के छूट जाने का डर लगा रहता है।*
*जैसी प्रीत कुटुम्ब से, तैसी गुरू से होए,*
*कहैं कबीर, उस दास का पल्ला ना पकड़े कोए।
*कबीर साहिब जी हमें जगा रहे हैं कि जितना प्यार परिवार से करते हो, उनका कितना ध्यान रखते हो, बस इतना ही ध्यान अपने "सतगुरू" का करोगे तो सतलोक जाते हुए तुम्हें कोई छू भी नहीं सकेगा, सीधे सचखण्ड पहुँच कर राज करोगे जी।*
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