#🛕बाबा केदारनाथ📿 *श्री राधे राधेश्याम जी* 🌸
एक भिखारी रोज एक दरवाजे पर जाता और भीख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदी - गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यों नहीं करतें, जीवन भर भीख माँगतें रहोगे!!
🌹कभी-कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें!
💐एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था। शायद व्यापार में घाटा हुआ था। वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर दे मारा।
🌾भिखारी के सिर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा - ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, और वहाँ से जाने लगा।
🌸सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वह सोचने लगा - मैंने उसे पत्थर से भी मारा, पर उसने बस दुआ दी! इसके पीछे क्या रहस्य है, जानना पड़ेगा। और वह भिखारी के पीछे चलने लगा। भिखारी जहाँ भी जाता, सेठ उसके पीछे जाता। कहीं कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जलील करता, गालियाँ देता। पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें।
🌹अब अंधेरा हो चला था। भिखारी अपने घर लौट रहा था। सेठ भी उसके पीछे था। भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी, जो भिखारी की पत्नी थी। जैसे ही उसने अपने पति को देखा, उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी। उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी। उसे देखते ही बुढिया बोली - बस इतना ही!! और कुछ नही!! और ये आपका सिर कहा फूट गया ?
💐भिखारी बोला, - हाँ बस इतना ही! किसी ने कुछ नही दिया! सबने गालिया दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सिर फूट गया, भिखारी ने फिर कहा - सब अपने ही पापों का परिणाम है।
🌾याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे! क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया। याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी!! बुढिया की आँखों में आँसू आ गये।
🌸उसने कहा - हाँ, कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे। कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जलील करते थे। कैसे हम उसे कभी-कभी मार और धकेल देते थे।
🎉अब बुढिया ने कहा - हाँ सब याद है मुझे! कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था। जब भी वह रोटिया माँगता, मैंने बस उसे गालियाँ दी। एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया, और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, - तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे, मैं नहीं !!!
🎉आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी। फिर भिखारी ने कहा, - पर मैं किसी को बद्दुआ नहीं देता, चाहे मेरे साथ कितनी भी ज्यादती क्यों ना हो जाए, मेरे लब पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता कि कोई और इतने बुरे दिन देखे। मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूँ, क्योंकि उनको मालूम ही नहीं, वो क्या पाप कर रहें हैं। जो सीधा ईश्वर देख रहा है। जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते, इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती है।
🌹सेठ चुपके-चुपके सब सुन रहा था। उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी। बुढे-बुढिया दोनो मिलकर आधी रोटी खायी, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गये।
💐अगले दिन, वह भिखारी भीख माँगने सेठ कर यहाँ गया। सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी। उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, - माफ करना बाबा, गलती हो गयी।
🌹भिखारी ने कहा, - ईश्वर तुम्हारा भला करे! और वो वहाँ से चला गया।
🌾सेठ को एक बात समझ आ गयी थी। इंसान तो बस दुआ-बद्दुआ देते है पर पूरी वो ईश्वर, वो जादूगर, कर्मो के हिसाब से करता है।
🌸इस जन्म में ना मिले पर भव में मिलता है, अपने-अपने कर्मों का फल सबको मिलता है।
🌾हो सके तो बस अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास।
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#🛕बाबा केदारनाथ📿 *श्री राधे राधेश्याम जी, श्री सीता सीताराम जी* 🌸
📿 *ढंग और ढोंग📿*
यहां ढोंग पर बड़ी चर्चा चलती है, पर आपने कभी गंभीरता से इस बात पर विचार किया कि ढोंग का अर्थ क्या है?
जो तुम नहीं हो, वह दिखाने का प्रयास ढोंग है।
जिसने पाया न हो, वह ऐसा दिखाए कि पा लिया, यदि यह ढोंग है, तो जिसने खोया न हो, वह ऐसा दिखाए कि खो गया, यह ढोंग नहीं है?
इन अर्थों में, हर वह मनुष्य जो कहता है कि मैं अपना आत्मस्वरूप कैसे पाऊँ? ढोंगी ही है। वह तो मानकर ही चल रहा है कि उसका आत्मस्वरूप खो गया है। पहले वह ढूंढने वाला यह तो बताए कि क्या उसका आत्मस्वरूप खो गया है?
*तो जो मैं हूँ,*
*जो मेरा वास्तविक स्वरूप है, जो मेरा होनापना है, उसके सिवा अपने को कुछ भी मानना, और दूसरे को वैसा ही दिखाने भी लगना, ढोंग है।*
इस दृष्टि से एक आत्मज्ञानी के सिवा, यहां कौन है जो ढोंगी नहीं है?
माने आत्मज्ञानी महात्मा के सिवा हर कोई ढोंगी ही है। और हैरानी यह है कि हर ढोंगी अपने को छोड़कर, प्रत्येक दूसरे को ढोंगी मानता है। इस प्रकार सब ढोंगी आपस में ढोंगी-ढोंगी खेलते हैं।
अब विचार करें- ढोंग अज्ञान का फल है। ढोंगी पहले स्वयं भ्रम में पड़ता है, फिर उसे भ्रम से दूसरे की प्रतीति होने लगती है, तब इस कल्पना से उत्पन्न दूसरे को धोखा देने के चक्कर में, वह खुद ही धोखा खा जाता है।
कहावत है कि "कौवा चला हंस की चाल।" पर यहां तो हंस ही कौवे की चाल चल रहा है।
माया ने गजब ढोंग रचा, जो अविनाशी है वह मरणधर्मा होने का ढोंग करने लगा, अजन्मा जन्मने का ढोंग करने लगा, कभी न मिटने वाला कभी न टिकने वाले का ढोंग करने लगा।
यह मेरा नाम है, इतनी मेरी आयु है, ये मेरे संबंधी हैं, यह मेरा संसार है, इस प्रकार के ढोंगयुक्त वचन कहते हुए, उनकी जीभ कांपती तक नहीं। उन्हें खयाल ही नहीं है।
मेरे प्यारे भाई बहन! लोकेशानन्द का अनुभव कहता है कि ढोंगी को ढंग कहां? उसका तो सब ढंग बेढंग है। *जिसे ढंग आ गया, उसका ढोंग सदा सदा के लिए चला गया।*
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