Abhilas Chauhan
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#💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी - चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, बुध की स्थिति व्यक्ति के  महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर ಕ೯ಣ: ೯: समझते 7 माध्यम *লন স ব্রুঃ* "बुधो मूर्तिगो मार्जयेदन्यरिष्टं वरिष्ठा थियोे वैखरीवृत्तिभाजः| दिव्यचामीकरीभूतदेहा श्चिकित्साविदो दुश्चिकित्स्या जना भवन्ति। । ' अर्थः लग्न में बुध होने से व्यक्ति अन्य ग्रहों के दो्षों को निवृत्त करता है, और वह श्रेष्ठ बुद्धिवाला, के सदृश  सुवर्ण य सुंदर वर्णवाला और पुस्तक आदि लिखने से आजीविका  करनेवाला होता है। वह भिषविद्या ्में निपुण होता है, लेकिन स्वयं रोगग्रस्त होने पर उसकी चिकित्सा कठिनाई से எபளி31 *द्वितीय भाव में बुध* "धने बुद्धिमान् बोधने बाहुतेजाः सभासंगतो भासते व्यास एव। पृथूदारता कल्पवृक्षस्य तद्वद बुधैर्भख्यते भोगतः षट्पदोड्यम्।।" अर्थः द्वितीय भाव में बुध होने से व्यक्ति बुद्धिमान, तेजस्वी, भुजप्रतापवान , सभा में व्यासजी के समान शोभा पाता है, और उसकी उदारता कल्पवृक्ष के समान होती है। वह भोगों का आनंद लेने वाला होता है, लेकिन उसकी तुलना एक छह पैर वाले से की जाती है।  चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, बुध की स्थिति व्यक्ति के  महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर ಕ೯ಣ: ೯: समझते 7 माध्यम *লন স ব্রুঃ* "बुधो मूर्तिगो मार्जयेदन्यरिष्टं वरिष्ठा थियोे वैखरीवृत्तिभाजः| दिव्यचामीकरीभूतदेहा श्चिकित्साविदो दुश्चिकित्स्या जना भवन्ति। । ' अर्थः लग्न में बुध होने से व्यक्ति अन्य ग्रहों के दो्षों को निवृत्त करता है, और वह श्रेष्ठ बुद्धिवाला, के सदृश  सुवर्ण य सुंदर वर्णवाला और पुस्तक आदि लिखने से आजीविका  करनेवाला होता है। वह भिषविद्या ्में निपुण होता है, लेकिन स्वयं रोगग्रस्त होने पर उसकी चिकित्सा कठिनाई से எபளி31 *द्वितीय भाव में बुध* "धने बुद्धिमान् बोधने बाहुतेजाः सभासंगतो भासते व्यास एव। पृथूदारता कल्पवृक्षस्य तद्वद बुधैर्भख्यते भोगतः षट्पदोड्यम्।।" अर्थः द्वितीय भाव में बुध होने से व्यक्ति बुद्धिमान, तेजस्वी, भुजप्रतापवान , सभा में व्यासजी के समान शोभा पाता है, और उसकी उदारता कल्पवृक्ष के समान होती है। वह भोगों का आनंद लेने वाला होता है, लेकिन उसकी तुलना एक छह पैर वाले से की जाती है। - ShareChat
#🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी
🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 - भौमभावफल के अनुसार , मंगल की स्थिति व्यक्ति के महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर माध्यम से इसे समझते हैंः *एकादश भाव में मंगल* पीडयेल्लाभगोडपत्यशत्रून् भवेत्सम्मुखो दुर्मुखोषपि  कुजः प्रतापात्। धनं वर्द्धते गोधनैर्वाहनैर्वा सकृच्छून्यतार्थे च  पैशुन्यभावात्।।" अर्थः एकादश भाव में मंगल होने से व्यक्ति के पुत्र आदि को और शत्रुओं को पीड़ा होती है। वह अधिक प्रतापशाली होता है और सब मनुष्यों के देखने योग्य होता है। गोधन और वाहन आदि के व्यापार से उसके धन की वृद्धि होती है, लेकिन मूर्खता के कारण एक बार उसका द्रव्य नष्ट সম্সুত: हा जाता है। *द्वादश भाव में मंगल* "शताक्षोपि तत्सक्षतो लौहघातैः कुजो द्वादशोडर्थस्य नाशं करोति। मृषा किंवदन्तीभयं दस्युतो वा कलि पारधीहेतुदुःखंविचिन्त्यम्।।" अर्थः द्वादश भाव में मंगल होने से व्यक्ति के द्रव्य का नाश होता है, और वह शत्रुरओं का नाश करनेवाला होता है। उसे झूठी निंदा के कारण या चोरों से भय होता है, और कलियुग  में उसे अनेक प्रकार के दुःखों का सामना करना पड़ता है।  भौमभावफल के अनुसार , मंगल की स्थिति व्यक्ति के महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर माध्यम से इसे समझते हैंः *एकादश भाव में मंगल* पीडयेल्लाभगोडपत्यशत्रून् भवेत्सम्मुखो दुर्मुखोषपि  कुजः प्रतापात्। धनं वर्द्धते गोधनैर्वाहनैर्वा सकृच्छून्यतार्थे च  पैशुन्यभावात्।।" अर्थः एकादश भाव में मंगल होने से व्यक्ति के पुत्र आदि को और शत्रुओं को पीड़ा होती है। वह अधिक प्रतापशाली होता है और सब मनुष्यों के देखने योग्य होता है। गोधन और वाहन आदि के व्यापार से उसके धन की वृद्धि होती है, लेकिन मूर्खता के कारण एक बार उसका द्रव्य नष्ट সম্সুত: हा जाता है। *द्वादश भाव में मंगल* "शताक्षोपि तत्सक्षतो लौहघातैः कुजो द्वादशोडर्थस्य नाशं करोति। मृषा किंवदन्तीभयं दस्युतो वा कलि पारधीहेतुदुःखंविचिन्त्यम्।।" अर्थः द्वादश भाव में मंगल होने से व्यक्ति के द्रव्य का नाश होता है, और वह शत्रुरओं का नाश करनेवाला होता है। उसे झूठी निंदा के कारण या चोरों से भय होता है, और कलियुग  में उसे अनेक प्रकार के दुःखों का सामना करना पड़ता है। - ShareChat
#💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी - चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर से इसे समझते हैंः মাংয়ম *नवम भाव में मंगल* "भवेन्नादिमः श्यालकः सोदरी वा विक्रमस्तुच्छलाभो தள் विपाके। ।" अर्थः नवम भाव में मंगल होने से व्यक्ति को भाग्य से प्राप्त क्रूर बुद्धिवाला बनाता है। उसका द्रव्यवाला , तेजस्वी और बड़ा साला या बड़ा भ्राता नर्हीं होता, और उसे लाभ का करने से भी तुच्छ फल मिलता है। उद्यम *दशम भाव में मंगल* "कुले तस्य किं मंगलं मंगलो नो जनैर्भूयते मध्यभावे यदि যান] एवावतंसीयतेsसौ वराकोडपि कण्ठीरवः किं Ra स्वतः frd:Il" अर्थः दशम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के कुल ्में सदा मंगल कार्य होता है, और उसके बहुत से नौकर होते हैं। वह है और लो्गों में मुख्य अपने उद्यम से संपत्ति प्राप्त करता अधिकारी बनता है। वह हीनकुल का भी हो तो भी सिंह के समान होता है। चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर से इसे समझते हैंः মাংয়ম *नवम भाव में मंगल* "भवेन्नादिमः श्यालकः सोदरी वा विक्रमस्तुच्छलाभो தள் विपाके। ।" अर्थः नवम भाव में मंगल होने से व्यक्ति को भाग्य से प्राप्त क्रूर बुद्धिवाला बनाता है। उसका द्रव्यवाला , तेजस्वी और बड़ा साला या बड़ा भ्राता नर्हीं होता, और उसे लाभ का करने से भी तुच्छ फल मिलता है। उद्यम *दशम भाव में मंगल* "कुले तस्य किं मंगलं मंगलो नो जनैर्भूयते मध्यभावे यदि যান] एवावतंसीयतेsसौ वराकोडपि कण्ठीरवः किं Ra स्वतः frd:Il" अर्थः दशम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के कुल ्में सदा मंगल कार्य होता है, और उसके बहुत से नौकर होते हैं। वह है और लो्गों में मुख्य अपने उद्यम से संपत्ति प्राप्त करता अधिकारी बनता है। वह हीनकुल का भी हो तो भी सिंह के समान होता है। - ShareChat
#✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 - भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के  महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर से इसे समझते हैंः माध्यम *सप्तम भाव में मंगल* "अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्यतो नो নিবৃনি:[ स्पर्धिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे मुहुर्भगदः दम्पतिघ्नः। ।' अर्थः सप्तम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ आती हैं, और वह अपने शत्रुओं के साथ  संघर्ष ्में रहता है। वह विवाह के लिए या व्यापार के कारण विदेश में यात्रा करता है, लेकिन फिर भी घर नहीं आ पाता। *अष्टम भाव में मंगल* "शुभास्तस्य किं खेचराः कुर्युरन्ये विधानेषपि चंदष्टमे भूमिसूनुः| किं न शत्रूयते सत्कृतोडपि प्रयत्ने कृते " भूयते सखा चोपसर्गः/ ।" अर्थः अष्टम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के भाग्य में स्थित शुभ ग्रह भी कुछ नहीं कर सकते, और उसका मित्र अन्य भी शत्रु बन जाता है। वह जो भी कार्य करता है, उसमें विघ्न आता है। भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के  महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन पर से इसे समझते हैंः माध्यम *सप्तम भाव में मंगल* "अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्यतो नो নিবৃনি:[ स्पर्धिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे मुहुर्भगदः दम्पतिघ्नः। ।' अर्थः सप्तम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ आती हैं, और वह अपने शत्रुओं के साथ  संघर्ष ्में रहता है। वह विवाह के लिए या व्यापार के कारण विदेश में यात्रा करता है, लेकिन फिर भी घर नहीं आ पाता। *अष्टम भाव में मंगल* "शुभास्तस्य किं खेचराः कुर्युरन्ये विधानेषपि चंदष्टमे भूमिसूनुः| किं न शत्रूयते सत्कृतोडपि प्रयत्ने कृते " भूयते सखा चोपसर्गः/ ।" अर्थः अष्टम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के भाग्य में स्थित शुभ ग्रह भी कुछ नहीं कर सकते, और उसका मित्र अन्य भी शत्रु बन जाता है। वह जो भी कार्य करता है, उसमें विघ्न आता है। - ShareChat
#🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✋हस्तरेखा शास्त्र🌌
🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 - चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्पंचम भाव में मंगल* कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेडन्तः सदैव।।" अर्थः पंचम भाव रमें मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति ) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण 7 होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। एक मंगल ही उसकी जन्मी और अजन्मी सब संतान को नष्ट कर देता है, और उसकी बुद्धि अत्यन्त पाप र्मे लीन रहती है। भाव र्मे मंगल* *08 "न तिष्ठन्ति षष्ठेडस्योङ्ङ्गारके वै तदङ्गेरिताः संगरे शक्तिमन्तः| मनीषी सुखी मातुलेयो न तद्र दिलीयेत वित्तं लभेताउपि भूरि।।" होने से व्यक्ति के शत्रु मंत्री आदिकों अर्थः षष्ठ भाव में मंगल के भय से ही भाग जाते हैं, और उसकी बुद्धि तीव्र होती है। उसके ममेरे भाई को सुख नहीं प्राप्त होता है, और उसका एक बार बहुत द्रव्य नष्ट होकर फिर बहुत द्रव्य प्राप्त होता है। *सप्तम भाव में मंगल* अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्यतो नो निवृत्तिः| स्पर्थिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे मुहुर्भगदः दम्पतिघ्नः।।" अर्थः सप्तम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ आती हैं, और वह अपने शत्रुओं के साथ संघर्ष में रहता है। चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्पंचम भाव में मंगल* कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेडन्तः सदैव।।" अर्थः पंचम भाव रमें मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति ) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण 7 होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। एक मंगल ही उसकी जन्मी और अजन्मी सब संतान को नष्ट कर देता है, और उसकी बुद्धि अत्यन्त पाप र्मे लीन रहती है। भाव र्मे मंगल* *08 "न तिष्ठन्ति षष्ठेडस्योङ्ङ्गारके वै तदङ्गेरिताः संगरे शक्तिमन्तः| मनीषी सुखी मातुलेयो न तद्र दिलीयेत वित्तं लभेताउपि भूरि।।" होने से व्यक्ति के शत्रु मंत्री आदिकों अर्थः षष्ठ भाव में मंगल के भय से ही भाग जाते हैं, और उसकी बुद्धि तीव्र होती है। उसके ममेरे भाई को सुख नहीं प्राप्त होता है, और उसका एक बार बहुत द्रव्य नष्ट होकर फिर बहुत द्रव्य प्राप्त होता है। *सप्तम भाव में मंगल* अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्यतो नो निवृत्तिः| स्पर्थिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे मुहुर्भगदः दम्पतिघ्नः।।" अर्थः सप्तम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ आती हैं, और वह अपने शत्रुओं के साथ संघर्ष में रहता है। - ShareChat
#✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 - भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्तृतीय भाव र्में मंगल* बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो कुतो बाहुवीर्य ` கள் সাননানাম सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का अर्थः எளிபு  भुजाओं से संचित किया द्रव्य नर्हीं पराक्रम और अपनी मिलता। वह के साथ विवाद ्में हारता है और उसकी বুলযী: तपस्या का उपहास होता है। *चतुर्थ भाव र्में मंगल* भूसुतः संभवेत्तर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला "यदा जनानाम्। सुहृद्वर्गसौख्यं न किंचिदिचिन्त्यं कृपाव स्वभूमीर्लभेद्भूमिपालात्। १" होने से व्यक्ति को सुहृद्वर्ग का भाव में मंगल अर्थः चतुर्थ की कृपा 7 सुख स्वल्प ही होता है, लेकिन राजा होने के कारण उसको राजा से वस्त्र और भूमि का लाभ होता है। *पंचम भाव में मंगल* "कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया  न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेषन्तः सदैव। ।" अर्थः पंचम भाव ्में मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्तृतीय भाव र्में मंगल* बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो कुतो बाहुवीर्य ` கள் সাননানাম सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का अर्थः எளிபு  भुजाओं से संचित किया द्रव्य नर्हीं पराक्रम और अपनी मिलता। वह के साथ विवाद ्में हारता है और उसकी বুলযী: तपस्या का उपहास होता है। *चतुर्थ भाव र्में मंगल* भूसुतः संभवेत्तर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला "यदा जनानाम्। सुहृद्वर्गसौख्यं न किंचिदिचिन्त्यं कृपाव स्वभूमीर्लभेद्भूमिपालात्। १" होने से व्यक्ति को सुहृद्वर्ग का भाव में मंगल अर्थः चतुर्थ की कृपा 7 सुख स्वल्प ही होता है, लेकिन राजा होने के कारण उसको राजा से वस्त्र और भूमि का लाभ होता है। *पंचम भाव में मंगल* "कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया  न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेषन्तः सदैव। ।" अर्थः पंचम भाव ्में मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। - ShareChat
#🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✋हस्तरेखा शास्त्र🌌
🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 - चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्पंचम भाव में मंगल* कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेडन्तः सदैव।।" अर्थः पंचम भाव रमें मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति ) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण 7 होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। एक मंगल ही उसकी जन्मी और अजन्मी सब संतान को नष्ट कर देता है, और उसकी बुद्धि अत्यन्त पाप र्मे लीन रहती है। भाव र्मे मंगल* *08 "न तिष्ठन्ति षष्ठेडस्योङ्ङ्गारके वै तदङ्गेरिताः संगरे शक्तिमन्तः| मनीषी सुखी मातुलेयो न तद्र दिलीयेत वित्तं लभेताउपि भूरि।।" होने से व्यक्ति के शत्रु मंत्री आदिकों अर्थः षष्ठ भाव में मंगल के भय से ही भाग जाते हैं, और उसकी बुद्धि तीव्र होती है। उसके ममेरे भाई को सुख नहीं प्राप्त होता है, और उसका एक बार बहुत द्रव्य नष्ट होकर फिर बहुत द्रव्य प्राप्त होता है। *सप्तम भाव में मंगल* अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्यतो नो निवृत्तिः| स्पर्थिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे मुहुर्भगदः दम्पतिघ्नः।।" अर्थः सप्तम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ आती हैं, और वह अपने शत्रुओं के साथ संघर्ष में रहता है। चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्पंचम भाव में मंगल* कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेडन्तः सदैव।।" अर्थः पंचम भाव रमें मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति ) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण 7 होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। एक मंगल ही उसकी जन्मी और अजन्मी सब संतान को नष्ट कर देता है, और उसकी बुद्धि अत्यन्त पाप र्मे लीन रहती है। भाव र्मे मंगल* *08 "न तिष्ठन्ति षष्ठेडस्योङ्ङ्गारके वै तदङ्गेरिताः संगरे शक्तिमन्तः| मनीषी सुखी मातुलेयो न तद्र दिलीयेत वित्तं लभेताउपि भूरि।।" होने से व्यक्ति के शत्रु मंत्री आदिकों अर्थः षष्ठ भाव में मंगल के भय से ही भाग जाते हैं, और उसकी बुद्धि तीव्र होती है। उसके ममेरे भाई को सुख नहीं प्राप्त होता है, और उसका एक बार बहुत द्रव्य नष्ट होकर फिर बहुत द्रव्य प्राप्त होता है। *सप्तम भाव में मंगल* अनुद्धारभूतेन पाणिग्रहेण प्रयाणेन वाणिज्यतो नो निवृत्तिः| स्पर्थिनां मेदिनीजः प्रहारार्दनैः सप्तमे मुहुर्भगदः दम्पतिघ्नः।।" अर्थः सप्तम भाव में मंगल होने से व्यक्ति के दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ आती हैं, और वह अपने शत्रुओं के साथ संघर्ष में रहता है। - ShareChat
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✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 - भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्तृतीय भाव र्में मंगल* बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो कुतो बाहुवीर्य ` கள் সাননানাম सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का अर्थः எளிபு  भुजाओं से संचित किया द्रव्य नर्हीं पराक्रम और अपनी मिलता। वह के साथ विवाद ्में हारता है और उसकी বুলযী: तपस्या का उपहास होता है। *चतुर्थ भाव र्में मंगल* भूसुतः संभवेत्तर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला "यदा जनानाम्। सुहृद्वर्गसौख्यं न किंचिदिचिन्त्यं कृपाव स्वभूमीर्लभेद्भूमिपालात्। १" होने से व्यक्ति को सुहृद्वर्ग का भाव में मंगल अर्थः चतुर्थ की कृपा 7 सुख स्वल्प ही होता है, लेकिन राजा होने के कारण उसको राजा से वस्त्र और भूमि का लाभ होता है। *पंचम भाव में मंगल* "कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया  न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेषन्तः सदैव। ।" अर्थः पंचम भाव ्में मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। भौमभावफल के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैः *्तृतीय भाव र्में मंगल* बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो कुतो बाहुवीर्य ` கள் সাননানাম सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का अर्थः எளிபு  भुजाओं से संचित किया द्रव्य नर्हीं पराक्रम और अपनी मिलता। वह के साथ विवाद ्में हारता है और उसकी বুলযী: तपस्या का उपहास होता है। *चतुर्थ भाव र्में मंगल* भूसुतः संभवेत्तर्यभावे तदा किं ग्रहाः सानुकूला "यदा जनानाम्। सुहृद्वर्गसौख्यं न किंचिदिचिन्त्यं कृपाव स्वभूमीर्लभेद्भूमिपालात्। १" होने से व्यक्ति को सुहृद्वर्ग का भाव में मंगल अर्थः चतुर्थ की कृपा 7 सुख स्वल्प ही होता है, लेकिन राजा होने के कारण उसको राजा से वस्त्र और भूमि का लाभ होता है। *पंचम भाव में मंगल* "कुजे पञ्चमे जाठराग्निर्बलीया  न्नजातं नु जातं निहन्त्येक एव। तदानीमनल्पा मतिः किल्विषेडपि स्वयं दुग्धवत्तप्यतेषन्तः सदैव। ।" अर्थः पंचम भाव ्में मंगल होने से व्यक्ति की जठराग्नि (पाचनशक्ति) प्रबल होती है, और वह अपने विचारों में निपुण होता है। लेकिन वह अपने अपरार्धों के कारण स्वयं को दोषी मानता है और सदैव दुखी रहता है। - ShareChat
#🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✋हस्तरेखा शास्त्र🌌
🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 - चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन माध्यम से इसे समझते हैः *लग्न ्मे मंगल* "विलग्ने कुजे दण्डलोहाग्निभीति स्तपेन्मानसं केसरी किं द्वितीयः| कलत्रादिघातः शिरोनेत्रपीडा विपाके फलानां सदैवोपसर्गः।।" अर्थः लग्न रमें मंगल होने से व्यक्ति को दंड (लाठी), लोहा , अग्नि से भय होता है, स्त्री॰ पुत्र आदि के नष्ट होने से कष्ट होता है, शिर और नेत्र में पीड़ा होती है, और अपने किये कार्य के सिद्ध होने में सदैव विघ्न होता है। वह उद्यम करने में सिंह के समान पुरुषार्थी होता है।  द्वितीय भाव र्मे मंगल* "भवेत्तस्य किं विद्यमाने थनेङङ्गारको यस्य लब्धे थने कुटम्बे fI  यथा त्रायते मर्कटः कंठहारं पुनः सम्मुखं को भवेद्वाद भग्नः।। " अर्थः द्वितीय भाव में मंगल होने से व्यक्ति को थन और कुटुम्ब होने पर भी सुख नहीं मिलता। वह लोभी होता है और अपने धन को कुटुम्ब के उपयोग में नहीं खर्च करता। उसके साथ वादविवाद रमे लोग हारते हैं और हारने पर कोई उसका सामना नहीं करता। भाव रमे मंगल* *ள4 कुतो बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो "gal बाहुवीर्य  मानवानाम्। सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" अर्थः तृतीय भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का पराक्रम और अपनी भुजाओं से संचित किया द्रव्य नहीं Aeral मिलता। वह के साथ विवाद हे ओर उसकी दूसर्रों " तपस्या का उपहास होता हे। चमत्कारचिन्तामणि के अनुसार, मंगल की स्थिति व्यक्ति के पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के जीवन माध्यम से इसे समझते हैः *लग्न ्मे मंगल* "विलग्ने कुजे दण्डलोहाग्निभीति स्तपेन्मानसं केसरी किं द्वितीयः| कलत्रादिघातः शिरोनेत्रपीडा विपाके फलानां सदैवोपसर्गः।।" अर्थः लग्न रमें मंगल होने से व्यक्ति को दंड (लाठी), लोहा , अग्नि से भय होता है, स्त्री॰ पुत्र आदि के नष्ट होने से कष्ट होता है, शिर और नेत्र में पीड़ा होती है, और अपने किये कार्य के सिद्ध होने में सदैव विघ्न होता है। वह उद्यम करने में सिंह के समान पुरुषार्थी होता है।  द्वितीय भाव र्मे मंगल* "भवेत्तस्य किं विद्यमाने थनेङङ्गारको यस्य लब्धे थने कुटम्बे fI  यथा त्रायते मर्कटः कंठहारं पुनः सम्मुखं को भवेद्वाद भग्नः।। " अर्थः द्वितीय भाव में मंगल होने से व्यक्ति को थन और कुटुम्ब होने पर भी सुख नहीं मिलता। वह लोभी होता है और अपने धन को कुटुम्ब के उपयोग में नहीं खर्च करता। उसके साथ वादविवाद रमे लोग हारते हैं और हारने पर कोई उसका सामना नहीं करता। भाव रमे मंगल* *ள4 कुतो बाडुलक्ष्मी स्तृतीये न चेन्मंगलो "gal बाहुवीर्य  मानवानाम्। सहोत्व्यथा भण्यते केन तेषां तपश्चर्यया चोपहास्य कथं स्यात्।।" अर्थः तृतीय भाव में मंगल न होने से व्यक्ति को भुजाओं का पराक्रम और अपनी भुजाओं से संचित किया द्रव्य नहीं Aeral मिलता। वह के साथ विवाद हे ओर उसकी दूसर्रों " तपस्या का उपहास होता हे। - ShareChat
#✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
✋हस्तरेखा शास्त्र🌌 - भौमभावफल के अनुसार , चन्द्रमा और मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैंः *द्वादश भाव में चन्द्रमा* "पितृव्यादिमात्रादितोडन्तविषादो न चाप्नोति कामं प्रियाल्पप्रियत्वम्।।"  में चन्द्रमा होने से व्यक्ति को शत्रुओं के अर्थः द्वादश भाव भय के कारण चिन्ता बनी रहती है, नेत्र आदि विकार्रों से विशेष चिन्ता रहती है, विवाह आदि मंगल कार्यों में द्रव्य होता है। उसे चचा , ताऊ, पिता, भ्राता , पुत्र, और माता व्यय थोड़ा के कुल आदि से चित्त में दुःख बना रहता है। इनसे " स्नेह होता है, और वांछित फल नहीं मिलता। *লনন ম মঁাল*  "विलग्ने कुजे दण्डलोहाग्निभीति स्तपेन्मानसं केसरी किं द्वितीयः| कलत्रादिघातः शिरोनेत्रपीडा विपाके फलानां सदेवोपसर्गः/ ।" अर्थः लग्न में मंगल होने से व्यक्ति को दंड (लाठी), लोहा, अग्नि से भय होता है, स्त्री॰ पुत्र आदि के नष्ट होने से कष्ट होता है, शिर और नेत्र में पीड़ा होती है, और अपने किये कार्य के सिद्ध होने में सदैव विघ्न होता है। भौमभावफल के अनुसार , चन्द्रमा और मंगल की स्थिति व्यक्ति के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। आइए, श्लोकों के माध्यम से इसे समझते हैंः *द्वादश भाव में चन्द्रमा* "पितृव्यादिमात्रादितोडन्तविषादो न चाप्नोति कामं प्रियाल्पप्रियत्वम्।।"  में चन्द्रमा होने से व्यक्ति को शत्रुओं के अर्थः द्वादश भाव भय के कारण चिन्ता बनी रहती है, नेत्र आदि विकार्रों से विशेष चिन्ता रहती है, विवाह आदि मंगल कार्यों में द्रव्य होता है। उसे चचा , ताऊ, पिता, भ्राता , पुत्र, और माता व्यय थोड़ा के कुल आदि से चित्त में दुःख बना रहता है। इनसे " स्नेह होता है, और वांछित फल नहीं मिलता। *লনন ম মঁাল*  "विलग्ने कुजे दण्डलोहाग्निभीति स्तपेन्मानसं केसरी किं द्वितीयः| कलत्रादिघातः शिरोनेत्रपीडा विपाके फलानां सदेवोपसर्गः/ ।" अर्थः लग्न में मंगल होने से व्यक्ति को दंड (लाठी), लोहा, अग्नि से भय होता है, स्त्री॰ पुत्र आदि के नष्ट होने से कष्ट होता है, शिर और नेत्र में पीड़ा होती है, और अपने किये कार्य के सिद्ध होने में सदैव विघ्न होता है। - ShareChat