Sanjay Kumar
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#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 महादेव के नाम से जल का आचमन करने की मान्यता विशेष रूप से शिव पुराण और लोक विश्वासों में बहुत गहरी है। हिंदू धर्म और विशेष रूप से शिव भक्तों के बीच यह माना जाता है कि भगवान शिव का 'कुंडेश्वर' स्वरूप आरोग्य (स्वास्थ्य) प्रदान करने वाला है। ​यहाँ इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है: ​पौराणिक मान्यता और प्रभाव ​शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव के अनेक नामों में से 'कुंडेश्वर' नाम का स्मरण रोगों के निवारण के लिए किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जब व्यक्ति लंबे समय से बीमार हो या किसी शारीरिक कष्ट से जूझ रहा हो, तो महादेव के इस नाम का सहारा लेना फलदायी होता है। ​जल पीने की विधि (मान्यता के अनुसार) ​धार्मिक परंपराओं और कथाकारों (जैसे पंडित प्रदीप मिश्रा जी) द्वारा बताई गई विधि के अनुसार: ​जलाभिषेक: सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित किया जाता है। ​नाम स्मरण: जल अर्पित करते समय और फिर उसे प्राप्त करते समय मन में "ओम् कुंडेश्वराय नमः" या सिर्फ "कुंडेश्वर महादेव" का जाप करना चाहिए। ​आचमन: शिवलिंग से बहकर आने वाले उस चरणामृत (जल) को थोड़ा सा अपने हाथ की हथेली में लेकर पीने (आचमन करने) का विधान है। ​इसके पीछे का विश्वास ​रोग मुक्ति: यह माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी से ग्रस्त है, तो कुंडेश्वर महादेव के नाम का जल पीने से उसकी दवाइयां तेजी से असर करने लगती हैं और शारीरिक कष्ट कम होता है। ​मानसिक शांति: महादेव के इस रूप का स्मरण करने से मानसिक तनाव और भय से भी मुक्ति मिलती है। ​महत्वपूर्ण बात ​धार्मिक आस्था अपनी जगह है और यह मानसिक शक्ति प्रदान करती है, लेकिन चिकित्सा (Medical Treatment) का कोई विकल्प नहीं होता। ​यदि कोई गंभीर बीमारी है, तो डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं और उपचार को जारी रखना सबसे जरूरी है। ​भक्ति और विश्वास मन को सकारात्मक रखते हैं, जिससे शरीर को ठीक होने में मदद मिलती है। ​निष्कर्ष: कुंडेश्वर महादेव का नाम लेकर जल ग्रहण करना श्रद्धा का विषय है। यदि आप पूरी आस्था के साथ महादेव का ध्यान करते हैं, तो वह निश्चय ही संकटों को दूर करने वाले 'संकटमोचन' हैं।
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#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 उठकर बिस्तर से नीचे पैर रखने से पहले के नियम 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सुबह की शुरूवात जैसी होती है बाकि दिन भी उसी अनुसार बीतता है ऐसे में जरूरी है कि सुबह को बेहतर बनाया जाया .. शास्त्रों में सुबह के समय उठते ही कुछ विशेष कार्य करने की सलाह ही दी गई है। मान्यता है कि अगर सुबह उठकर जमीन पर पैर रखने से पहले आप ये कार्य कर लें तो आपका पूरा दिन बन जाएगा और हर काम-काज में सफलता मिलेगी ।आज हम आपको इसी के बारे में बताने जा रहे हैं ताकि आप भी उसका अनुसरण कर जीवन में सफलता और सुख-समृद्धी पा सकें। प्राचीन शास्त्र भले ही आज से कई वर्षों पहले लिखे गए हों पर उनमें कही गई बातें आज भी हमारे लिए उतनी ही उपयोगी हैं.. जो कि हमे आदर्श जीवन जीन की सीख देते हैं और व्यक्ति को हर कार्य करने की उचित विधि बतलाते हैं। ऐसे में अगर हम शास्त्रों में बताए उन नियमों और आदर्शों का पालन करें तो हमारा जीवन बेहतर और सफल हो सकता है। विशेषकर अगर हम अपने दिन की शुरूवात शास्त्रों के नियमानुसार करें तो हम हमेशा सुखी रह सकते हैं। तो चलिए जानते हैं सुबह के लिए शास्त्रों में क्या नियम और आदर्श बताए गए हैं। दरअसल शास्त्रों के अनुसार सुबह उठकर बिस्तर से जमीन पर अपने पैर रखने से पहले व्यक्ति को धरती को प्रणाम करने की बात कही गई । क्योकि शास्त्रों में भूमि को भी देवी मां माना गया है और ऐसे में जब हम धरती पर पैर रखते हैं तो उससे हमें दोष लगता है। इसलिए हमें इस दोष को दूर करने के लिए धरती को प्रणाम कर उनसे क्षमा मांगनी चाहिए और जब हम इस तरह धरती का सम्मान करते हैं तो धरती मां की कृपा हमारे घर-परिवार पर बरसती है और हमारे जीवन की मुसीबतें कम होती हैं।कराग्रे वसते लक्ष्मी:, करमध्ये सरस्वती। कर मूले तु गोविन्द:, प्रभाते करदर्शनम॥ १॥ भावार्थ हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती तथा मूल में गोविन्द (परमात्मा ) का वास होता है। प्रातः काल में (पुरुषार्थ के प्रतीक) हाथों का दर्शन करें॥१॥ समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमंड्ले। विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्श्म क्षमस्वे॥ २॥ भावार्थ समुद्ररूपी वस्त्रोवाली, पर्वतरूपी स्तनवाली और विष्णु भगवान की पत्नी हे पृथ्वी देवी ! तुम्हे नमस्कार करता हूँ ! तुम्हे मेरे पैरों का स्पर्श होता है इसलिए क्षमायाचना करता हूँ॥ २॥ ब्रह्मा मुरारीस्त्रिपुरांतकारी भानु: शाशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनि-राहु-केतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ३॥ भावार्थ ब्रह्मा, मुरारि (विष्णु) और त्रिपुर-नाशक शिव (अर्थात तीनों देवता) तथा सूर्य, चन्द्रमा, भूमिपुत्र (मंगल), बुध, बृहस्पति, शुक्र्र, शनि, राहु और केतु ये नवग्रह, सभी मेरे प्रभात को शुभ एवं मंगलमय करें। सनत्कुमार: सनक: सन्दन: सनात्नोप्याsसुरिपिंलग्लौ च। सप्त स्वरा: सप्त रसातलनि कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ४॥ भावार्थ (ब्रह्मा के मानसपुत्र बाल ऋषि) सनतकुमार, सनक, सनन्दन और सनातन तथा (सांख्य-दर्शन के प्रर्वतक कपिल मुनि के शिष्य) आसुरि एवं छन्दों का ज्ञान कराने वाले मुनि पिंगल मेरे इस प्रभात को मंगलमय करें। साथ ही (नाद-ब्रह्म के विवर्तरूप षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद) ये सातों स्वर और (हमारी पृथ्वी से नीचे स्थित) सातों रसातल (अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, और पाताल) मेरे लिए सुप्रभात करें। सप्तार्णवा: सप्त कुलाचलाश्च सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ५॥ भावार्थ सप्त समुद्र (अर्थात भूमण्डल के लवणाब्धि, इक्षुसागर, सुरार्णव, आज्यसागर, दधिसमुद्र, क्षीरसागर और स्वादुजल रूपी सातों सलिल-तत्व) सप्त पर्वत (महेन्द्र, मलय, सह्याद्रि, शुक्तिमान्, ऋक्षवान, विन्ध्य और पारियात्र), सप्त ऋषि (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, और विश्वामित्र), सातों द्वीप (जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौच, शाक, और पुष्कर), सातों वन (दण्डकारण्य, खण्डकारण्य, चम्पकारण्य, वेदारण्य, नैमिषारण्य, ब्रह्मारण्य और धर्मारण्य), भूलोक आदि सातों भूवन (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्य) सभी मेरे प्रभात को मंगलमय करें। पृथ्वी सगंधा सरसास्तापथाप: स्पर्शी च वायु ज्वर्लनम च तेज: नभ: सशब्दम महता सहैव कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ६॥ भावार्थ अपने गुणरूपी गंध से युक्त पृथ्वी, रस से युक्त जल, स्पर्श से युक्त वायु, ज्वलनशील तेज, तथा शब्द रूपी गुण से युक्त आकाश महत् तत्व बुद्धि के साथ मेरे प्रभात को मंगलमय करें अर्थात पांचों बुद्धि-तत्व कल्याण हों। प्रातः स्मरणमेतद यो विदित्वाssदरत: पठेत। स सम्यग धर्मनिष्ठ: स्यात् संस्मृताsअखंड भारत:॥७॥ भावार्थ इन श्लोको का प्रातः स्मरण भली प्रकार से ज्ञान करके आदरपूर्वक पढ़ना चाहिए। ठीक-ठीक धर्म में निष्ठा रखकर अखण्ड भारत का स्मरण करना चाहिए। आपको बता दें इस शास्त्रीय मान्यता के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी हैं.. जैसे कि उठते ही जमीन में पैर रखने से सेहत पर बुरा असर पड़ता है.. इसलिए जागने के साथ ही सीधे अपने पैर जमीन में नहीं रखना चाहिए.. इसकी वजह ये है कि जब हम सुबह के समय उठते हैं तो हमारे शरीर का तापमान और कमरे के तापमान में बहुत अंतर होता है। ऐसे में अगर हम उठते ही अपने गर्म पैर ठंडी जमीन पर रख देंगे तो इससे सेहत को नुकसान हो सकता है और सर्दी-जुकाम जैसी समस्या हो सकती है। इसीलिए सुबह उठने के बाद तुरंत बिस्तर से उतरने की बजाए कुछ देर बर बिस्तर पर ही बैठने की सलाह दी जाती है जिससे कि आपके शरीर का तापमान सामान्य हो सके और फिर जमीन पर पैर रखें । इसके साथ ही शास्त्रों में पूरे दिन को बेहतर बनाने के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठने की सलाह दी गई। ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से ठीक पहले का समय होता है और अगर आपके लिए ये संभव ना हो तो अधिक से अधिक 6 से 7 बजे तक जरूर उठ जाना चाहिए। ऐसा करने से धर्म लाभ के साथ
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 घोड़े की नाल और नाव की कील का प्रभाव 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शनिदेव का नाम सुनकर लोगों को पसीना आ जाता है,लेकिन वास्तव में शनि देव बहुत ही दयालु, बहुत ही कृपालु है, यदि आप जीवन में सत्य न्याय के रास्ते पर चलते हैं तो, शनिदेव कभी आपसे नाराज नहीं होंगे, शनिदेव केवल दुष्टों और पापियों से नाराज होते हैं, उन्हें कठोर से कठोर दंड देते हैं ! सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलने वालों को शनिदेव समय समय पर उचित पुरस्कार देते हैं ! ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को क्रूर ग्रह माना जाता है, इसकी स्थिति से किसी भी व्यक्ति का पूरा जीवन प्रभावित होता है। शनि को न्यायाधिश का पद प्राप्त है। यह हमें हमारे कर्मों का फल प्रदान करता है। जिस व्यक्ति के जैसे कर्म होते हैं उसी के अनुसार उन्हें फल की प्राप्ति होती है। शनि साढ़ेसाती और ढैय्या के समय सबसे अधिक प्रभावी होता है। सामान्यत: साढ़ेसाती और ढैय्या के समय अधिकांश व्यक्तियों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इनसे बचने के लिए सबसे जरूरी है कि शनि देव की आराधना और धार्मिक कर्म करें। शनि कृपा प्राप्ति के लिए एक सटिक उपाय बताया गया है नाव की कील। नाव की कील का छल्ला बनवाकर इसे मिडिल फिंगर में शनिवार के दिन पहनें। यह एक सटीक उपाय है। शनि देव का प्रकोप किसी पर पड़ जाए तो उसका जीवन कष्‍टों से भर जाता है। व्‍यक्‍ति के अच्‍छे–बुरे कर्मों का फल शनि देव ही देते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप शनिदेव को प्रसन्‍न रखें और भक्‍ति भाव से उनकी पूजा करें। शनि देव का प्रकोप अत्‍यंत ही भयंकर परिणाम देता है। नाव की कील की अंगूठी धारण करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या में शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। बिगड़े कार्य स्वत: ही बन जाते हैं। सभी परिणाम आपके पक्ष में आने लगते हैं। लोहे की कील शनि की है । और जब यही कील नाव में लग जाती है तो कुछ और बन जाती है । चंद्र के पानी पर यह नाव तैरती है। मंगल के कटाव बहाव को चीरती आगे बढ़ती है । शुक्र के त्रिकोण होते है नाव और कील में । और राहु । राहु का ही तो है यह सारा समन्दर और जलीय जीव । यह समुद्री नांव की कील कीअंगूठी ( ring ) निलम की तरह बेहद असर कारक है । पर इसको निर्माण और धारण करने के कुछ विशेष विधि है । और जब यह सही ढंग से तैयार हो जाती है तो शुरुआत हो जाती है अप्रत्याशित सफलताएं और आश्चर्य जनक रूप से हर मुसीबत , किसी भी परेशानी और क्लेश से छुटकारा । शनिदेव को प्रसन्‍न करने का महाउपाय 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इस समुद्री नाव की कील की अंगूठी शनिवार या शनि जयंती अथवा शनि अमावस्या के विशेष ऊर्जा काल के दिन बिना अग्नि मे तपाये बनाई जाती है। इसे तिल्ली के तेल में 7 दिन शनिवार से शनिवार तक रखा जाता है तथा उस पर शनि मंत्र के 23,000 जाप से सिद्ध तथा प्राण प्रतिष्ठित करके भेजा जाता है। शनिवार के दिन शाम के समय इसे धारण करें। यह अंगूठी मध्यमा (शनि की अंगुली) में ही पहनें तथा इसके लिए पुष्य, अनुराधा, उत्तरा, भाद्रपद एवं रोहिणी नक्षत्र सर्वश्रेष्ठ हैं। धारण करने के बाद रुद्राक्ष की माला से नीचे लिखे किसी एक मंत्र की कम से कम 5 माला जप करें तथा शनिदेव से सुख-संपत्ति के लिए प्रार्थना करें। यदि प्रत्येक शनिवार को इस मंत्र का इसी विधि से जप करेंगे तो शीघ्र लाभ होगा। मंत्र - पौराणिक शनि मंत्र: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्। । क्योंकि यह राहु और शनि की कुछ विशेष प्रिय वस्तुओ में से है । यदि आपकी कुंडली मे राह अथवा केतु नीच राशि मे है, अशुभ स्थिति मे है तो राह केतु की दशा अंतर दशा मे आपको नांव के कील की अंगूठी अवश्य धारण करना चाहिए! 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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