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छोड़ो दुनिया के झूठे रंग, खेलो राम नाम की होली। सतभक्ति से ही खुलेगी, मोक्ष के सुख की झोली। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी से सतभक्ति प्राप्त करके अपना मोक्ष कराएं।
होली पर जानें कि प्रह्लाद भक्त की रक्षा किसने की थी?
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भगवान अपने भक्त की पल पल रक्षा करता है। अगर आप प्रहलाद की तरह राम नाम के रंग में रंगे हो तो भगवान आपको कांटा भी नहीं लगने देगा।
इस होली पर जानें कौन है वो असली राम जिसकी साधना हम सभी को करनी चाहिए।
अडिग विश्वास और अटूट भक्ति की जीत"
राजा हिरण्यकश्यप के अहंकार और भयंकर यातनाओं के सामने नन्हा प्रह्लाद अपनी भक्ति पर अडिग रहा। यह कथा सिद्ध करती है कि जब भक्ति सच्ची हो, तो परमात्मा स्वयं रक्षक बनकर आते हैं। अंततः अहंकार का विनाश होता है और सत्य की ही विजय होती है। #🙏गुरु महिमा😇 #🙏🏻गुरबानी #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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असली होली तो राम नाम की होली खेलना है अर्थात परमात्मा के नाम का हर स्वांस में जाप करना है।
कबीर परमात्मा कहते हैं कि:
स्वांस उसवांस में नाम जपो, व्यर्था स्वांस मत खोये।
न जाने इस स्वांस का, आवन होक ना हो।।
उपरोक्त वाणी का अर्थ है कि हमें हर स्वांस में परमात्मा का नाम लेना चाहिए क्योंकि हमें नहीं पता कि अगले ही पल हमारे साथ क्या हो जाना है।समर्थ का शरणा गहो, रंग होरी हो।
कदै न हो अकाज, राम रंग होरी हो।।
समर्थ परमात्मा कबीर साहेब जी की शरण में( पूर्ण सतगुरु के माध्यम से) आने के बाद सारे काम सफल होते हैं। और मोक्ष भी प्राप्त होता है।
सच्चा सुख और मोक्ष केवल पूर्ण परमात्मा की शरण में है; अपनी भक्ति को 'सतनाम' के रंग में रंगें।
सतनाम का रहस्य जेवल तत्वदर्शी संत ही बता सकता है।
जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी की शरण में आकर मोक्ष कराएं।
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और गलत क्या हैं ! जब तक अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होगा तब तक भक्ति मार्ग के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते हैं !
संत रामपाल जी महाराज के विशेष सत्संग का प्रसारण साधना टीवी पर किया जा रहा है।आप इस विशेष सत्संग कार्यक्रम का सीधा प्रसारण हमारे सोशल मीडिया चैनल्स पर भी देख सकते है: अधिक जानने के लिए देखे SA News YouTube Channel
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परमेश्वर कबीर साहेब जी ने एक ऐसी लीला की जो इतिहास बन गई और इस तरह की लीला परमात्मा स्वयं ही करते हैं।
कबीर साहेब जी 120 वर्ष की आयु में मगहर में शरीर त्यागने की बात कह कर हजारों लोगों समेत मगहर गए और सफेद चादर ओढ़कर लेट गए।
तभी आकाशवाणी होती है -
"उठा लो पर्दा,नहीं है मुर्दा।"
चादर उठाने पर, शरीर के स्थान पर सुगंधित फूल मिले। उनका शरीर नहीं मिला था।
चदरि फूल बिछाये सतगुरू, देखै सकल जिहाना हो। च्यारि दाग से रहत जुलहदी, अबिगत अलख अमाना हो।।
(- सतग्रन्थ साहेब में राग मारू से शब्द)
संत गरीबदास जी ने अपनी वाणी में प्रमाण दिया है कि बंदीछोड कबीर परमेश्वर जी चार दाग में नहीं आते। अजरो अमर हैं। न मां के गर्भ से जन्म लेते।वर्तमान समय में मगहर में कबीर परमेश्वर जी की याद में मुस्लिम लोगों ने मज़ार और हिंदुओं ने समाधि बनाई हुई है जिसमें मात्र सौ फीट की दूरी का अंतर है। जहां बैठकर कबीर साहेब सत्संग किया करते थे वहां काशी-चौरा नाम से यादगार बनाई गई है।
कबीर परमात्मा सशरीर सतलोक गए थे। #🙏🏻गुरबानी #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏 माँ वैष्णो देवी #🙏गुरु महिमा😇
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वेदों में प्रमाण है कि पूर्ण परमात्मा सशरीर पृथ्वी पर प्रकट होता है और सशरीर ही वापस अपने लोक सतलोक में चला जाता है।प्रमाण ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 94 मंत्र 2
कलयुग में इसका साक्षात प्रमाण मगहर में है, जहां बंदीछोड कबीर परमेश्वर जी के सतलोक प्रस्थान के बाद उनके शरीर के स्थान पर सुगंधित पुष्प मिले थे। और कबीर परमात्मा लहरतारा तालाब पर सशरीर प्रकट हुए थे।
पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा, जानुं ज्ञान अपारा।सत्य स्वरूपी नाम साहेब का, सोई नाम हमारा।।
हाड़, चाम, लहु नहीं मेरे, कोई जाने सत्य नाम उपासी।
तारन तरन अभय पद दाता, मैं हूं कबीर अविनाशी।।
कबीर परमेश्वर जी ने स्वयं कहा था कि मेरा पांच तत्व से बना शरीर नहीं है। मैं अविनाशी परमात्मा हूँ। न मेरा जन्म होता, न मृत्यु। सबका उद्धार करने आया हूँ।
मगहर से सतलोक गया कबीरा, जाका पाया नहीं शरीरा।
आदरणीय धर्मदास जी ने परमेश्वर कबीर साहेब जी की महिमा में कहा है :-
हिन्दू के तुम देव कहाये, मुसलमान के पीर।
दोनो दीन का झगड़ा छिड़ गया, टोहे न पाया शरीर।।
कबीर परमेश्वर जी अजरो अमर हैं और सशरीर अपने सतलोक गए थे। हिंदू और मुसलमानों ने जब उनके शरीर का अंतिम संस्कार करना चाहा। तब उनका शरीर नहीं मिला था। शरीर के स्थान पर सुगन्धित फूल मिले थे। #🙏 माँ वैष्णो देवी #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏🏻गुरबानी #🙏गुरु महिमा😇
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आज से लगभग 507 वर्ष पूर्व (मास माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि एकादशी वि. स. 1575 सन् 1518 को) परमेश्वर कबीर बंदी छोड़ जी ने उत्तरप्रदेश के मगहर कस्बे से लाखों लोगों के सामने सशरीर सतलोक (ऋतधाम) को प्रस्थान किया था। वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज जी के सानिध्य में 27 से 29 जनवरी 2026 तक निर्वाण दिवस सतलोक आश्रमों में मनाया जा रहा है। इस उपलक्ष्य में तीन दिवसीय शुद्ध देसी घी से निर्मित निःशुल्क विशाल भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें आप सभी सह परिवार सादर आमंत्रित हैं।
इन समागमों में भोजन प्राप्त करने वाले श्रद्धालुओं को गीता में वर्णित पांचो यज्ञों का फल प्राप्त होता है ।
निर्वाण दिवस पर संपूर्ण विश्व को निमंत्रण
लगभग 508 वर्ष पूर्व कबीर परमेश्वर मगहर से सशरीर सतलोक गए जिसे निर्वाण दिवस के रूप में जाना जाता है।
इसी उपलक्ष्य में संत रामपाल जी महाराज के सानिध्य में दिनांक 27 से 29 जनवरी 2026 को देश-विदेश में सतलोक आश्रमों में संत गरीबदास जी महाराज की अमरवाणी का अखंड पाठ, शुद्ध देसी घी से निर्मित विशाल भंडारा, रक्तदान शिविर, नशामुक्त कार्यक्रम, दहेजमुक्त विवाह जैसे अद्भुत समाज सेवी कार्यक्रम होंगे।
इस महासमागम में आप सभी सहपरिवार सादर आमंत्रित हैं।
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परमेश्वर कबीर बंदी छोड़ जी के 508वें निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में सतगुरु रामपाल जी महाराज के सानिध्य में 27 से 29 जनवरी 2026 को अमरग्रन्थ साहेब के 3 दिवसीय अखंड पाठ का आयोजन किया जा रहा है।
आप सभी सहपरिवार सादर आमंत्रित हैं।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी परमेश्वर कबीर जी के निर्वाण दिवस के अवसर पर संत रामपालजी महाराज के सानिध्य में सतलोक आश्रमों में दिनांक 27 से 29 जनवरी 2026 को तीन दिवसीय महासमागम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमे संत गरीबदास जी महाराज की अमरवाणी अखंड पाठ व अखंड ज्योति यज्ञ किया जाएगा तथा दहेज मुक्त विवाह, रक्तदान शिवर एवं शुद्ध देशी घी युक्त विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जा रहा है। इस अद्वितीय महासमागम में आप सभी सहपरिवार सादर आमंत्रित है। #🙏 माँ वैष्णो देवी #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏🏻गुरबानी #🤗जया किशोरी जी🕉️
#गला_भी_कटाया_मोक्ष_नहींपाया
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ब्राह्मणों ने वृद्धों की भीड़ से बचने और अपने लाभ के लिए काशी में करौंत का षड्यंत्र रचा। इसे परमात्मा का आदेश बताकर जनता को धोखा दिया।
सच्चे गुरु का सत्संग और तत्त्वज्ञान ही सत्य साधना की राह दिखा सकते हैं। बिना गुरु के सही मार्ग पर चलना संभव नहीं है।
काशी के ब्राह्मणों ने करौंत स्थापित कर यह भ्रम फैलाया कि इससे स्वर्ग मिल सकता है। यह एक पाखंड था, जो अज्ञानता के कारण लोगों ने सच मान लिया।
आदरणीय गरीबदास जी ने कहा कि यदि स्वर्ग इतनी सरलता से मिलता, तो सत्य युग से ही यह विधि प्रचलित होती। यह सब शास्त्र-विरुद्ध है।
शास्त्र अनुकूल भक्ति के बिना कुछ भी लाभ नहीं होगा चाहे काशी में करौंत से गर्दन भी कटवा लो। कुछ बुद्धिजीवी व्यक्ति विचार किया करते थे कि स्वर्ग प्राप्ति के लिए तो राजाओं ने राज्य त्यागा। जंगल में जाकर कठिन तपस्या की। शरीर के नष्ट होने की भी चिंता नहीं की। यदि स्वर्ग प्राप्त करना इतना सरल था तो यह विधि सत्य युग से ही प्रचलित होती। यह तो सबसे सरल है। सारी आयु कुछ भी करो। वृद्ध अवस्था में काशी में निवास करो या करौंत से शीघ्र मरो और स्वर्ग में मौज करो।
गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है कि शास्त्रानुसार साधना करने से ही मोक्ष संभव है। मनमानी साधना व्यर्थ और निरर्थक है। #✝यीशु वचन #🙏🏻गुरबानी #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #🙏 माँ वैष्णो देवी
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काशी के ब्राह्मणों ने करौंत स्थापित कर यह भ्रम फैलाया कि इससे स्वर्ग मिल सकता है। यह एक पाखंड था, जो अज्ञानता के कारण लोगों ने सच मान लिया।
गरीबदास जी ने स्पष्ट कहा कि भक्ति के बिना मोक्ष संभव नहीं है। काशी में मरने या करौंत से गर्दन कटाने से मोक्ष नहीं मिलता। केवल सत्य साधना से ही जीव का उद्धार होता है।
हिन्दू धर्म के धर्मगुरू जो साधना साधक समाज को बताते हैं, वह शास्त्र प्रमाणित नहीं है। जिस कारण से साधकों को परमात्मा की ओर से कोई लाभ नहीं मिला जो भक्ति से अपेक्षित किया। फिर धर्मगुरूओं ने एक योजना बनाई कि भगवान शिव का आदेश हुआ है कि जो काशी नगर में प्राण त्यागेगा, उसके लिए स्वर्ग का द्वार खुल जाएगा। वह बिना रोक-टोक के स्वर्ग चला जाएगा। जो मगहर नगर (गोरखपुर के पास उत्तरप्रदेश में) वर्तमान में जिला-संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) में है, उसमें मरेगा, वह नरक जाएगा या गधे का शरीर प्राप्त करेगा। गुरूजनों की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अनुयाईयों का परम धर्म माना गया है। इसलिए हिन्दू लोग अपने-अपने माता-पिता को आयु के अंतिम समय में काशी (बनारस) शहर में किराए पर मकान लेकर छोड़ने लगे।
अंधविश्वास और पाखंड के कारण लोग करौंत जैसी विधियों में फंसे रहे। यह केवल अज्ञानता और शास्त्रज्ञान की कमी का परिणाम है।
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गरीब, बिना भक्ति क्या होत है, भावैं काशी करौंत लेह। मिटे नहीं मन बासना, बहुबिधि भर्म संदेह।।
काशी नगर के विषय में ब्राह्मणों ने दंतकथा बताई थी कि भगवान शिव ने काशी की भूमि को वरदान दे रखा था कि जो यहाँ मरेगा, वह स्वर्ग जाएगा। जब देखा कि काशी में वृद्धों की भीड़ लग गई तो नया षड़यंत्र रखा।
करौंत को स्वर्ग का मार्ग बताकर जनता को भ्रमित किया गया। यह योजना ब्राह्मणों द्वारा वृद्धों की समस्या से बचने और धन कमाने के लिए बनाई गई थी।
काशी करौंत काहे लेही, बिना भजन नहीं ढंग रे।
कोटी ग्रंथ का योही अर्थ है, करो साध सत्संग रे।।
मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्ण और सच्चे संत की शरण में जाना अनिवार्य है। इसी का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता भी करती है:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उस परम ज्ञान को जानने के लिए तत्वदर्शी संत के पास जाओ, उन्हें दंडवत प्रणाम करो और निष्कपट भाव से सेवा करो।
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