#सत_भक्ति_संदेश
कर्म
सत का सौदा जो करै,दम्भ छल छिद्र त्यागै।
अपने भाग का धन लहै,परान विष सम लागे ।।
अपने जीवन में परमात्मा से डरकर सत्य के आधार से सर्व कर्म करने चाहिएं जो अपने भाग्य में धन लिखा है, उसी में संतोष करना चाहिए।
परधन को विष के समान समझे।
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सुमिरन सुरति - निरति तथा मन व श्वांस
(पवन) के साथ स्मरण करने से एक ही नाम जाप से चार युगों तक की गई शास्त्रविरुद्ध मन्त्रों के जाप की भक्ति से भी अधिक फल मिल जाता है।
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#सत_भक्ति_संदेश
कबीर, लोकवेद की छोड़ो आशा, अगम ज्ञान का करो विश्वासा।
सारनाम का मिले उपदेशा, सतगुरु काटें सकल कलेशा।।
शास्त्रविरुद्ध ज्ञान
परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि
लोकवेद यानि शास्त्रविरुद्ध ज्ञान की आशा
छोड़कर अगम यानि आगे का तवज्ञान ग्रहण करो। जब सतगुरु से सारनाम प्राप्त होगा,
तब जन्म मरण का सब कष्ट समाप्त हो जाएंगे।
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पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने के लिए
मनमुखी (मनमानी) साधना त्याग कर,
पूर्ण सदगुरु को समर्पण कर सच्चे नाम के
जाप से ही मोक्ष संभव है नकली नाम के जाप
से नहीं। नहीं तो मृत्यु के उपरांत नरक जाएगा।
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सतलोक
कबीर जी ने स्पष्ट कर दिया है किः-
कहाँ नाद कहाँ बिन्द ने भाई। नाम भक्ति बिन लोक न जाई ।।
भावार्थः- चाहे कोई नाद वाला है, चाहे बिन्द वाला है। यदि नाम की वास्तविक भक्ति है तो सतलोक जा सकेगा।
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वाणी
बिन उपदेश अचम्भ है, क्यों जिवत हैं प्राण।
भक्ति बिना कहाँ ठौर है, ये नर नाहीं पाषाण।।
भावार्थ:-
परमात्मा कबीर जी कह रहे हैं कि हे भोले मानव ! मुझे आश्चर्य है कि बिना गुरू से दीक्षा लिए किस आशा को लेकर जीवित है।
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कबीर कमाई आपनी, कबहु ना निष्फल जाय।
सात समुद्र आडे पड़ो, मिले अगाऊ आय॥
कबीर परमेश्वर जी ने कहा कि अपनी भक्ति की मजदूरी (कमाई) कभी व्यर्थ नहीं जाती, चाहे कितनी बाधाऐं आ जायें। वह अवश्य मिलती है।
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भक्ति बीज होवे जो हंसा
तारु तास के एकोत्तर वंशा
कबीर साहेब की भक्ति करने वाले की
एक सौ एक पीढ़ी पार होगी।
आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे।
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संत के सामने यह मन भाग जाता है
और ये आत्मा ऊपर आ जाती है क्योंकि परमात्मा आत्मा का साथी है।
"अन्तर्यामी एक तू आत्म के आधार ।"
आत्मा का आधार कबीर भगवान है।
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बिना गुरु के किया गया नाम जाप व दिया गया दान निष्फल होता है।
कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान। गुरू बिन दोनों निष्फल हैं, पूछो वेद पुराण ।।
अर्थात कबीर जी ने कहा है कि गुरु बिन नाम स्मरण करना व दान देना व्यर्थ है। अपने वेदों व पुराणों में पढ़ लो यही लिखा है।













