3.2.2026
जब कोई व्यक्ति किसी को सुझाव देता है तो यह मान कर देता है, कि *"वह मुझसे कम बुद्धि वाला है, या इस विषय में मुझसे कम बुद्धि वाला है, जिस विषय में मैं उसे सुझाव देना चाहता हूं। मैं उससे अधिक बुद्धि वाला हूं। मुझे इसको यह सुझाव देकर उसे उस गलती से बचाना चाहिए, जो गलती यह व्यक्ति करने वाला है।"*
सारी बात कहने का तात्पर्य यह हुआ, कि *"सुझाव देने वाला व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति को अपने से कम बुद्धिमान मानता है, तथा स्वयं को उससे अधिक बुद्धिमान मानता है।" जबकि अनेक बार इससे उल्टा ही होता है। "बिना सोचे समझे, बिना पूरा विचार किये ही, वह अपने से भी अधिक बुद्धिमान व्यक्ति को भी, अपनी मूर्खता के कारण सुझाव देने लगता है।"* ऐसी गलती करने से बचना चाहिए।
पहले तो दूसरे की स्थिति को ठीक से समझना चाहिए, कि *"वह जो कर रहा है, वह ठीक काम कर रहा है या कुछ गलती कर रहा है? बिना सोचे समझे, बिना परीक्षा किए यूं ही किसी को सुझाव देना ही, अपने आप में मूर्खता है, बुद्धिमत्ता नहीं।"*
और यदि कहीं आपको पता चल भी जाए कि *"सामने वाला व्यक्ति कुछ गलती कर रहा है, और यदि आप उसे कोई सुझाव देना भी चाहते हों, तो सभ्यता की दृष्टि से पहले उससे पूछना चाहिए, कि "मैं आपको इस विषय में एक सुझाव देना चाहता हूं। क्या आप मेरा सुझाव सुनना चाहते हैं? यदि वह कहे, हां। मैं आपका सुझाव सुनना चाहता हूं। तब तो उसे अपना सुझाव सुनाएं।"*
यदि वह मना कर दे, कि *"मुझे इस विषय में आपका सुझाव नहीं चाहिए।"* तो उसे सुझाव नहीं देना चाहिए।
जब व्यक्ति बिना स्थिति को समझे, बिना दूसरे व्यक्ति से स्वीकृति लिए अथवा स्थिति को समझ कर भी, दूसरे व्यक्ति से बिना पूछे, यूं ही सुझाव देने लगता है, तो इससे यह सिद्ध होता है कि *"वह स्वयं को अधिक बुद्धिमान और दूसरे को मूर्ख समझता है।"* ऐसा करने का अर्थ है कि *"वह व्यक्ति दूसरे का अपमान कर रहा है। और किसी को किसी का अपमान करने का अधिकार नहीं है। इसलिए बिना पूछे या बिना स्वीकृति लिए किसी को सुझाव न दें, और ऐसा अपराध करने से बचें।"*
यह बात अध्यापकों वेद प्रचारकों और वैदिक उपदेशकों पर लागू नहीं होती। क्योंकि उनको तो समाज ने पहले से ही यह अधिकार दे रखा है कि *"आप हमें अच्छे-अच्छे उपदेश देवें और अच्छे-अच्छे सुझाव देवें, जिससे कि हम अपनी उन्नति और अपने जीवन में सुख को प्राप्त कर सकें।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
1.2.2026
अधिकतर लोग ऐसा मानते हैं, कि *"उपदेश दूसरों के लिए होता है, अपने लिए नहीं।" "लोग जितना उपदेश या सुझाव दूसरों को देते हैं, यदि उस पर वे स्वयं आचरण कर लेते, तो उनका कल्याण हो जाता।*
परंतु मनुष्य की अधिकतर मनोवृत्ति ऐसी देखी जाती है, कि वह जो भी उपदेश या सुझाव दूसरे व्यक्ति को देता है, तो वह सोचता है, कि *"यह तो दूसरे के लिए है, मेरे लिए नहीं।" "इसलिए वह स्वयं उस उपदेश पर आचरण नहीं करता। जिसका परिणाम यह होता है, कि उसकी उन्नति नहीं हो पाती।"*
और जो सुनने वाला व्यक्ति है, वह भी ऐसा सोचता है, कि *"मुझे जो उपदेश या सुझाव दिया जा रहा है, यह भी दूसरे लोगों के लिए है, मेरे लिए नहीं है।" "इसका परिणाम यह होता है, कि वह सुनने वाला भी उस उपदेश या सुझाव पर आचरण नहीं करता। इसलिए न तो वक्ता का कल्याण हो पाता है, और न ही श्रोता का।"*
दूसरी बात -- *"कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो दूसरे के उपदेश या सुझाव को सुन तो लेते हैं, परंतु उसमें से जितना उनको अपने अनुकूल लगता है, उतना वे स्वीकार कर लेते हैं, और जितना उनको अपने प्रतिकूल लगता है, उसे वे छोड़ देते हैं।"* उनकी उन्नति भी अधिक नहीं हो पाती।
अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि *"दूसरे योग्य व्यक्ति का उपदेश उनके लिए हितकारी भी होता है, परंतु वे ऐसा मानते हैं कि "मैं इसके सुझाव या उपदेश पर आचरण क्यों करूं? इससे तो मैं समाज में छोटा गिना जाऊंगा, और यह मुझसे बड़ा गिना जाएगा।" "यह मिथ्या अभिमान उन्हें उन्नति नहीं करने देता। उनके अंदर बहुत सारा हठ और मूर्खता भी होती है, जो उन्हें सत्य को स्वीकार नहीं करने देती। इस कारण से उनकी उन्नति नहीं हो पाती।"*
*"तो ऐसे हठ अभिमान और मूर्खता आदि दोषों से बचने का प्रयत्न करें, अन्यथा आपकी भी वही स्थिति होगी, जो संसार के अन्य लोगों की है।" "आप भी दूसरों की बातें सुन लेंगे। उनमें से जो आपको अपने अनुकूल लगेगी, जिसमें आपको कष्ट कम प्रतीत होता होगा, या नहीं होता होगा, उतनी बात तो आप मान लेंगे। उससे आगे की बातें, जो आपके लिए अधिक हितकारी होंगी, परन्तु उन पर आचरण करने में आपको अधिक कष्ट प्रतीत होता होगा, उन्हें आप छोड़ देंगे। इस कारण से आपकी भी कोई विशेष उन्नति नहीं हो पाएगी।"*
*"अतः यदि आप वास्तव में अपनी उन्नति करना चाहते हों, तो संसार के अन्य लोगों की नकल न करें। बुद्धिमत्ता से काम लें। अपना लक्ष्य बनाएं, और उसकी प्राप्ति के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें।"*
यदि आज आपने मेरी इस बात पर ध्यान नहीं दिया, तो हो सकता है, कि आपकी वृद्धावस्था में आपको मेरी यह बात समझ में आवे, कि *"हमने उस समय अपने हठ अभिमान और मूर्खता के कारण बहुत सारी गलतियां की, और अपनी उन्नति करने से वंचित रहे।" "परंतु तब पश्चाताप करने से क्या लाभ होगा? बुद्धिमत्ता तो इसी बात में है कि आज ही इन बातों से लाभ उठाया जाए।"*
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात." #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
31.1.2026
जीवन में अनेक बार परिस्थितियां सही गलत होती रहती हैं।
*"सही का मतलब अनुकूल, और गलत का मतलब प्रतिकूल।"*
जब जीवन में परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं, तो व्यक्ति चाहता है, कि *"किसी योग्य व्यक्ति का सहयोग मिल जाए। उस समय पर यदि किसी योग्य व्यक्ति का सहयोग उसे मिल जाए, तो उसकी परिस्थितियां शीघ्र ही अनुकूल हो जाती हैं।"*
*"और यदि सही समय पर उसे वह सहयोग न मिल पाए, तो परिस्थितियां प्रतिकूल ही रहती हैं, जिसका परिणाम होता है, कि उसके जीवन में परेशानियां बढ़ती जाती हैं, और उसे शांति नहीं मिल पाती।"*
*"इसलिए अपने जीवन में दो-चार व्यक्ति ऐसे योग्य समर्थ अपने परिचय में बना कर रखें, जो सही समय पर आपको सही प्रकार का सहयोग दे दें। और आपकी परिस्थितियां अनुकूल या सही हो जावें।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
30.1.2026
प्रत्येक व्यक्ति में पूर्व जन्मों के संस्कार होते हैं। कुछ अच्छे भी होते हैं, और कुछ बुरे भी। *"क्योंकि अभी उसके पूरे संस्कार अच्छे नहीं हो पाए, इसीलिए उसका संसार में जन्म होता है।"*
*"यदि सारे संस्कार अच्छे हो गए होते, तो उसकी अविद्या नष्ट हो जाती, और उसका मोक्ष हो जाता।"* क्योंकि उसका जन्म हुआ है, इसका अर्थ है कि *"उसमें अभी कुछ अविद्या बची हुई है। उसी अविद्या का नाश करने के लिए ही ईश्वर ने उसे यहां संसार में जन्म दिया है, ताकि वह अपनी अविद्या का नष्ट कर ले। अपने पिछले कर्मों का फल भोग ले, और आगे अच्छे कर्म करके मोक्ष भी प्राप्त कर ले।"*
अब इस विषय में विचार यह करना चाहिए, कि *"प्रत्येक व्यक्ति में जो अच्छे बुरे संस्कार होते हैं। यदि वह उनमें से अपने अच्छे संस्कारों को प्रोत्साहन देगा, तो अच्छे काम करेगा। और यदि बुरे संस्कारों को प्रोत्साहन देगा, तो बुरे काम करेगा।"*
अब यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी इच्छा और बुद्धि पर निर्भर करता है, कि वह अच्छाई को प्रोत्साहन दे, या बुराई को। *"जिसको भी वह बार-बार प्रोत्साहन देगा, उसके वही संस्कार और वैसे ही कर्म आगे बढ़ते जाएंगे।"*
*"अतः बुराई से बचें और अच्छाई को सदा प्रोत्साहित करें। जिससे आप भविष्य में अच्छे कर्म करते हुए सदा सुखी रहें, और धीरे-धीरे अपनी अविद्या का नाश करके मोक्ष को भी प्राप्त कर सकें।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇













