अजय ओमप्रकाश आर्य
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अजय ओमप्रकाश आर्य
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22.4.2026 ईश्वर में ज्ञान बाल आनन्द न्याय दया सेवा परोपकार आदि आदि सैकड़ों प्रकार के गुण और शक्तियां हैं। हम जीवात्मा लोग उसके पुत्र शिष्य आदि हैं। *"क्योंकि वैदिक शास्त्रों में ईश्वर को माता-पिता गुरु आचार्य राजा और न्यायाधीश आदि आदि इन अनेक स्वरूपों में स्वीकार किया गया है।"* तो ईश्वर के साथ जो हमारे ये संबंध हैं। इन पर गहराई से विचार करें। इनमें से आपको जो भी संबंध अच्छा लगे, वही संबंध बनाकर ईश्वर से प्रार्थना करें कि *"हे ईश्वर! आप हमारे माता-पिता गुरु आचार्य राजा और न्यायाधीश हैं। आप हमारी सब प्रकार से रक्षा करें। हमारी बुद्धि को बढ़ाएं। हमें पवित्र मार्ग पर चलावें। न्याय एवं सत्य आचरण के मार्ग पर चलावें, जिससे कि हम सदा सुखी रहें। बुरे काम कभी न करें, जिससे कि आपके न्यायालय में हमें दंड का पात्र न बनना पड़े।"* *"इस प्रकार से ईश्वर से प्रार्थना भी करें, और व्यवहार में अपने कार्यों की सिद्धि के लिए पूरा पुरुषार्थ भी करें।"* यदि आप ऐसा करेंगे, तो *"ईश्वर माता-पिता के समान सबका रक्षक है ही। वह आपकी हमारी सब की रक्षा करेगा। सबको उत्तम गुणों से मालामाल कर देगा।"* *"अतः बुराइयों से बचें और अच्छे काम करें। ईश्वर से लाभ उठाकर अपने जीवन को सफल बनाएं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
❤️जीवन की सीख - ईश्वर में हजारों गुण हैं और अनन्त शक्तियां हैं। 341697 और आप  हैंl यदि आप अपने ম ক্রুম্ভ? पिता = ईश्वर  गुण और शक्तियां प्राप्त करें, तथा पूर्ण पुरुषार्थ करें आपका जोवन सफल हा जाएगा। వాdaా अज का २२ अप्रैल स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:lldarshanyog org ईश्वर में हजारों गुण हैं और अनन्त शक्तियां हैं। 341697 और आप  हैंl यदि आप अपने ম ক্রুম্ভ? पिता = ईश्वर  गुण और शक्तियां प्राप्त करें, तथा पूर्ण पुरुषार्थ करें आपका जोवन सफल हा जाएगा। వాdaా अज का २२ अप्रैल स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:lldarshanyog org - ShareChat
21.4.2026 बहुत से लोग रात को बिस्तर पर लेट कर कुछ सोचते रहते हैं। भविष्य की योजनाएं बनाते रहते हैं। और सोने से पहले ही जागृत अवस्था में वे लोग सपने देखते हैं, कि *"हम अपने जीवन में क्या-क्या कर सकते हैं? यह काम करें अथवा वह काम करें, किस में अधिक उन्नति होगी। किस में अधिक लाभ होगा। किस काम में हमें शांति मिलेगी, किसमें हमारा भविष्य उज्जवल होगा।"* आदि आदि इस प्रकार के सपने देखते रहते हैं। इस प्रकार के सपने देखते देखते वे रात को सो जाते हैं। फिर सुबह उठते ही वे संकल्प करते हैं, कि *"यह काम तो करना ही है। बस, संकल्प करके उस काम के पीछे लग जाते हैं। पूरी शक्ति लगाते हैं और विश्राम के समय विश्राम भी पूरा करते हैं। इस प्रकार से पूरा पुरुषार्थ करते हुए वे अपने सपनों को साकार कर लेते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन में सफल हो जाते हैं, और सुखी रहते हैं।" "जो लोग ऐसा नहीं करते, वे अपना सामान्य जीवन जीते हैं, और यूं ही संसार से चले जाते हैं।"* *"इसलिए किसी भी व्यक्ति को आलसी नहीं होना चाहिए, और प्रत्येक व्यक्ति को जागृत अवस्था में कुछ सपने अवश्य देखने चाहिएं। फिर उन सपनों को पूरा करने के लिए पूरी शक्ति लगानी चाहिए, जिससे कि उसका जीवन सफल और सुखमय बन सके।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - व्सुविचाव ओण का २६ अप्रैल जो लोग रात को कुछ करने का सपना देखकर सोते हैं और सुबह उठते ही संकल्प करते हैंl विश्राम भी उचित मात्रा में करते हैं और पुरुषार्थ भी जी भर कर करते हैं ऐसे लोग ही जीवन में सफल होते हैं। {বরামী ব্িবকরানব্র এবিবাতক্র निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:lldarshanyog org व्सुविचाव ओण का २६ अप्रैल जो लोग रात को कुछ करने का सपना देखकर सोते हैं और सुबह उठते ही संकल्प करते हैंl विश्राम भी उचित मात्रा में करते हैं और पुरुषार्थ भी जी भर कर करते हैं ऐसे लोग ही जीवन में सफल होते हैं। {বরামী ব্িবকরানব্র এবিবাতক্র निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:lldarshanyog org - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
❤️जीवन की सीख - जिस "मनुष्य" को "परमात्मा" के "विश्वास" है, "न्याय" पर उसे "रसंसोर"की ব্রূীততন্ী ৭হি্িনি" "विचलित" a नहीं कर सकती..!! जिस "मनुष्य" को "परमात्मा" के "विश्वास" है, "न्याय" पर उसे "रसंसोर"की ব্রূীততন্ী ৭হি্িনি" "विचलित" a नहीं कर सकती..!! - ShareChat
20.4.2026 जो लोग अपना जीवन सुख से जीना चाहते हैं, तो उनके लिए यह आवश्यक है, कि *"वे कुछ मात्रा में दूसरों की गलतियों को सहन करें। और आत्मनिरीक्षण करते हुए अपनी गलतियों को भी दूर करें, उन्हें उखाड़ फेंकें।"* यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार से पुरुषार्थ पूर्वक अपना जीवन जीए, तो वह सुखपूर्वक जी सकता है, और अपने जीवन में पर्याप्त उन्नति कर सकता है। *"और यदि कोई व्यक्ति विशेष योगाभ्यासी हो, तो उसके लिए तो यह अनिवार्य ही है। अन्यथा उसकी योगाभ्यास में वर्षों तक भी कोई प्रगति नहीं हो पाएगी।"* *"इसलिए चाहे कोई सामान्य व्यक्ति हो, चाहे विशेष योगाभ्यासी हो, सभी को ये दो काम अवश्य ही करने चाहिएं। दूसरों के दोषों को कुछ सीमा तक सहन करना, और अपने दोषों को उखाड़ फेंकना।"* *"और जब दूसरों के दोष बहुत अधिक बढ़ जाएं, तथा आपकी सहनशक्ति की सीमा समाप्त हो जाए, तब उनसे दूर हो जाना चाहिए। अर्थात उनके साथ व्यवहार कम कर देना चाहिए, अथवा संबंध तोड़ देना चाहिए।" "परंतु झगड़ा तो किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए, अन्यथा आप शांतिपूर्वक नहीं जी सकेंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏कर्म क्या है❓ - आज का व्सुविचाव २० अप्रैल योगाभ्यास में उन्नति करने के लिए दो वस्तुओं की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। की गलतियों को सहन करना , दूसरों ; और अपनी गलतियों को उखाड़ फेंकना। {বরামী বিবকরানব্ এয়িবাসক্র  निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:Ildarshanyog.org आज का व्सुविचाव २० अप्रैल योगाभ्यास में उन्नति करने के लिए दो वस्तुओं की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। की गलतियों को सहन करना , दूसरों ; और अपनी गलतियों को उखाड़ फेंकना। {বরামী বিবকরানব্ এয়িবাসক্র  निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:Ildarshanyog.org - ShareChat
19.4.2026 जब एक स्त्री और एक पुरुष विवाह के बंधन में बंध जाते हैं। तब वह बंधन दुखदायक भी हो सकता है, और सुखदायक भी। प्रथम पक्ष -- *"यदि वे दोनों अपनी सोच को शुद्ध नहीं रख पाते। एक दूसरे को दबाने का प्रयास करते हैं। दूसरे को अपने से छोटा कम बुद्धिमान एवं कमजोर आदि आदि मानकर जीवन चलाने का प्रयास करते हैं। तब उन दोनों के लिए यह विवाह का बंधन दुखदायक और पराधीनता की अनुभूति कराने वाला होता है।"* द्वितीय पक्ष -- *"परंतु जब वे दोनों बुद्धिमान होते हैं। एक दूसरे को दबाने का प्रयास नहीं करते। दोनों ही एक दूसरे का शोषण करना नहीं चाहते। बल्कि बुद्धिमत्ता से परस्पर पूरक बनते हैं, एक दूसरे की परिस्थितियों और समस्याओं को अच्छी तरह से समझते हैं। एक दूसरे का शुद्ध मन से सहयोग करते हैं। एक दूसरे को समस्याओं से बाहर निकलने में पूरी शक्ति लगाते हैं। तब वह विवाह का बंधन दुखदायक नहीं होता, बल्कि सुखदायक होता है। तब वे दोनों विवाह बंधन में बंधने पर भी, स्वयं को बंधन में अनुभव नहीं करते, पराधीनता का अनुभव नहीं करते। बल्कि एक दूसरे का पूरक अनुभव करते हैं। ऐसे पति-पत्नी स्वयं को स्वतंत्र अनुभव करते हुए सुखी रहते हैं।"* आप भी अपना परीक्षण करें। आपका विवाह संबंध ऊपर बताए दोनों पक्षों में से कौन-सा है? *"यदि पहले वाला हो, तो उसे बदलने का प्रयास करें, और दूसरे पक्ष के अनुसार अपना जीवन चलाने का प्रयत्न करें।" "इससे आपका संबंध मधुर एवं दृढ़ हो जाएगा। आप दोनों पति-पत्नी सुख एवं स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे। तभी गृहस्थ जीवन का असली आनंद आएगा, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
❤️जीवन की सीख - ससुविचार ও কা 193 बंधन और शुद्ध संबंध में क्या अंतर है ? और शुद्ध संबंध में दोनों बंधन में दोनों व्यक्ति व्यक्ति सुख तथा स्वतंत्रता दुःख एवं पराधीनता का का अनुभव करते हैं। अनुभव करते हैं। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https:Ildarshanyog.org निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय ससुविचार ও কা 193 बंधन और शुद्ध संबंध में क्या अंतर है ? और शुद्ध संबंध में दोनों बंधन में दोनों व्यक्ति व्यक्ति सुख तथा स्वतंत्रता दुःख एवं पराधीनता का का अनुभव करते हैं। अनुभव करते हैं। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https:Ildarshanyog.org निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय - ShareChat
#🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
🙏कर्म क्या है❓ - (( ओ३म् परमपिता परमात्मा निराकारहिै अर्थात उसका कोई ईश्वर के निराकार के गुण के कारण ही आकार नही है। वह कण कण के वासी है एवं सृष्टि कर्ता हैं। क्योंकि एकदेशीय होता है। जबकि निराकार तत्व साकातत् एक समय मे सभी जगह विद्यमान रहता है वैदिक तथ्य (( ओ३म् परमपिता परमात्मा निराकारहिै अर्थात उसका कोई ईश्वर के निराकार के गुण के कारण ही आकार नही है। वह कण कण के वासी है एवं सृष्टि कर्ता हैं। क्योंकि एकदेशीय होता है। जबकि निराकार तत्व साकातत् एक समय मे सभी जगह विद्यमान रहता है वैदिक तथ्य - ShareChat
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - येषामिन्द्रस्ते जयन्ति। 246 8/16/5. अर्थात ईश्वर जिनका सहायक होता है, वे लोग सदा জীনন ;1 और प्रभु हर नेक दिल इंसान के सहायक होते हैं येषामिन्द्रस्ते जयन्ति। 246 8/16/5. अर्थात ईश्वर जिनका सहायक होता है, वे लोग सदा জীনন ;1 और प्रभु हर नेक दिल इंसान के सहायक होते हैं - ShareChat
18.4.2026 व्यक्ति को दो प्रकार की उन्नति चाहिए, व्यक्तिगत भी और सामाजिक भी। *"दोनों का संतुलन करने से ही जीवन सुखमय बनता है।"* व्यक्तिगत उन्नति के लिए आप जो भी आसमान छूना चाहें, छू लें। अर्थात आप डॉक्टर बनें, पायलट बनें, वकील बनें, वैज्ञानिक बनें, वेद प्रचारक बनें, संन्यासी बनें, जो भी बनें, वह आपका व्यक्तिगत विषय है। *"मोटी भाषा में लोग इसे आसमान को छूना कहते हैं। छू लीजिए, कोई आपत्ति नहीं है।"* परंतु सामाजिक स्तर पर भी आपको कुछ सेवा करके अपनी सामाजिक उन्नति भी करनी चाहिए। *"यदि केवल व्यक्तिगत उन्नति करके, स्वार्थी बन‌कर खा पीकर सो गए, तो यह अधिक अच्छा नहीं है।"* अपनी स्वार्थ पूर्ति करने के साथ-साथ परोपकारी बनना भी आवश्यक है। क्योंकि आपकी व्यक्तिगत उन्नति में देश और समाज के करोड़ों व्यक्तियों ने आपको सहयोग दिया है। *"उन्होंने आपको भोजन वस्त्र मकान स्कूटर कार रेलगाड़ी हवाई जहाज सड़क बिजली पानी कंप्यूटर मोबाइल फोन इत्यादि की अनेक सुविधाएं प्रदान करके आपकी उन्नति में योगदान किया है। इसलिए आपका भी कर्तव्य है, कि आप भी देश और समाज की कुछ सेवा करें।"* समाज सेवा अनेक प्रकार की है। *"किसी को भोजन देना वस्त्र देना मकान देना रोगी की सेवा सहायता करना विद्वानों का सम्मान करना वेद प्रचार करना वेद प्रचार में दान देना इत्यादि।" "इनमें से सबसे उत्तम है, वेद प्रचार करना। यदि आप यह सेवा न कर पाएं, तो किसी योग्य आर्य विद्वान की सेवा करके उसके हृदय को छू लेना। यह भी बहुत अच्छा कार्य है। यदि आप ऐसा करेंगे, तो यह आपके जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इससे आपका जीवन आनन्दमय बन जाएगा।"* *"अतः अपनी व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ कुछ परोपकार आदि सामाजिक सेवा भी अवश्य करें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
🙏कर्म क्या है❓ - आसमान छूना बात नहींहै। बुरी பப்-=1` परंतु आसमान छूने के মাথ-মাথ য্রি आप किसी योग्य आर्य विद्वान की सेवा करके उसके हृदय को भी छू लें तो यह सोने पर सुहागा है। gfaae| अज का 18 3< स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:Ildarshanyog.org आसमान छूना बात नहींहै। बुरी பப்-=1` परंतु आसमान छूने के মাথ-মাথ য্রি आप किसी योग्य आर्य विद्वान की सेवा करके उसके हृदय को भी छू लें तो यह सोने पर सुहागा है। gfaae| अज का 18 3< स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:Ildarshanyog.org - ShareChat
17.4.2026 ईश्वर से अनेक प्रकार की प्रार्थनाएं करनी चाहिएं। परंतु प्रार्थना का नियम यह है, कि *"पहले अपने कार्य की सिद्धि के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें। और फिर यदि आपके कार्य की सिद्धि में कुछ कमी रह जाए, तो उसकी पूर्ति के लिए ईश्वर से भी प्रार्थना करें। और समाज के बुद्धिमान धनवान सामर्थ्यवान मनुष्यों से भी प्रार्थना करें।" "रोटी कपड़ा मकान आदि वस्तुएं तथा धन आदि के रूप में कुछ सहयोग समाज के लोग करते हैं, और आंतरिक रूप से उत्साह बढ़ाना, बुराई से बचाना, अच्छे काम में प्रेरणा देना इत्यादि, कुछ सहायता ईश्वर करता है।"* तो प्रार्थना अवश्य करें। परंतु पहले पुरुषार्थ करें। उसके बाद आपकी जो आवश्यकता हो, उसकी पूर्ति के लिए प्रार्थना भी करें। *"ईश्वर और समाज के बुद्धिमान लोग जब देखेंगे, कि आप दिखावा नहीं कर रहे, बल्कि ईमानदारी और बुद्धि पूर्वक पुरुषार्थ कर रहे हैं, तो वे भी आपकी यथायोग्य सहायता करेंगे।"* यह ध्यान अवश्य रहे, कि *"ईश्वर वाली सहायता ईश्वर ही करेगा, समाज के लोग नहीं। और समाज के लोगों का जो कार्य है, उसे समाज के लोग ही करेंगे, उसे ईश्वर नहीं करेगा। दोनों का अपना अलग-अलग क्षेत्र है, जैसा कि ऊपर बताया है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार आपकी सहायता करेंगे।"* तो क्या प्रार्थना करें? इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए। *"हे ईश्वर! मुझे ऐसी बुद्धि शक्ति विद्या बल सामर्थ्य आदि प्रदान कीजिए, कि मेरी आंखों में प्रेम हो। मैं सबको प्रेम पूर्वक देखूं। कठोर या घृणा वाली दृष्टि से किसी को न देखूं। मैं अपने दोनों हाथों से दूसरों की सेवा करूं। मेरी बुद्धि में सदा नम्रता और सभ्यता बनी रहे। कभी अभिमान न आ जाए। मेरी वाणी में मिठास हो। मैं सबसे मीठी भाषा बोलूं। और देश धर्म की रक्षा करने के लिए मेरी भुजाओं में बल दीजिए इत्यादि।"* इस प्रकार से पुरुषार्थपूर्वक प्रार्थना करने से ईश्वर तथा समाज के समर्थ लोगों से सहायता मिलती है। *"ऐसी सहायता अवश्य लेनी चाहिए और देश धर्म समाज की सेवा करते हुए अपने जीवन को सफल अवश्य ही बनाना चाहिए।" #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख * ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - ससुविचार अज का 17 3< हे प्रभो! मुझे ऐसी विद्या , बुद्धि, शक्ति और सामर्थ्य प्रदान कीजिए कि मेरी आंखों में प्रेप हो। - बुद्धि में नम्रता और सभ्यता हो। हाथों में सेवा हो। देश धर्म की रक्षा करने के लिए मेरी भुजाओं में बल हो। q%ifioaI स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:Ildarshanyog.org ससुविचार अज का 17 3< हे प्रभो! मुझे ऐसी विद्या , बुद्धि, शक्ति और सामर्थ्य प्रदान कीजिए कि मेरी आंखों में प्रेप हो। - बुद्धि में नम्रता और सभ्यता हो। हाथों में सेवा हो। देश धर्म की रक्षा करने के लिए मेरी भुजाओं में बल हो। q%ifioaI स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय https:Ildarshanyog.org - ShareChat
17.4.2026 ईश्वर से अनेक प्रकार की प्रार्थनाएं करनी चाहिएं। परंतु प्रार्थना का नियम यह है, कि *"पहले अपने कार्य की सिद्धि के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें। और फिर यदि आपके कार्य की सिद्धि में कुछ कमी रह जाए, तो उसकी पूर्ति के लिए ईश्वर से भी प्रार्थना करें। और समाज के बुद्धिमान धनवान सामर्थ्यवान मनुष्यों से भी प्रार्थना करें।" "रोटी कपड़ा मकान आदि वस्तुएं तथा धन आदि के रूप में कुछ सहयोग समाज के लोग करते हैं, और आंतरिक रूप से उत्साह बढ़ाना, बुराई से बचाना, अच्छे काम में प्रेरणा देना इत्यादि, कुछ सहायता ईश्वर करता है।"* तो प्रार्थना अवश्य करें। परंतु पहले पुरुषार्थ करें। उसके बाद आपकी जो आवश्यकता हो, उसकी पूर्ति के लिए प्रार्थना भी करें। *"ईश्वर और समाज के बुद्धिमान लोग जब देखेंगे, कि आप दिखावा नहीं कर रहे, बल्कि ईमानदारी और बुद्धि पूर्वक पुरुषार्थ कर रहे हैं, तो वे भी आपकी यथायोग्य सहायता करेंगे।"* यह ध्यान अवश्य रहे, कि *"ईश्वर वाली सहायता ईश्वर ही करेगा, समाज के लोग नहीं। और समाज के लोगों का जो कार्य है, उसे समाज के लोग ही करेंगे, उसे ईश्वर नहीं करेगा। दोनों का अपना अलग-अलग क्षेत्र है, जैसा कि ऊपर बताया है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार आपकी सहायता करेंगे।"* तो क्या प्रार्थना करें? इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए। *"हे ईश्वर! मुझे ऐसी बुद्धि शक्ति विद्या बल सामर्थ्य आदि प्रदान कीजिए, कि मेरी आंखों में प्रेम हो। मैं सबको प्रेम पूर्वक देखूं। कठोर या घृणा वाली दृष्टि से किसी को न देखूं। मैं अपने दोनों हाथों से दूसरों की सेवा करूं। मेरी बुद्धि में सदा नम्रता और सभ्यता बनी रहे। कभी अभिमान न आ जाए। मेरी वाणी में मिठास हो। मैं सबसे मीठी भाषा बोलूं। और देश धर्म की रक्षा करने के लिए मेरी भुजाओं में बल दीजिए इत्यादि।"* इस प्रकार से पुरुषार्थपूर्वक प्रार्थना करने से ईश्वर तथा समाज के समर्थ लोगों से सहायता मिलती है। *"ऐसी सहायता अवश्य लेनी चाहिए और देश धर्म समाज की सेवा करते हुए अपने जीवन को सफल अवश्य ही बनाना चाहिए।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
❤️जीवन की सीख - )9 यह जीवन r तुमने है, संभालोगे भी तुम। आशा नहीं विश्वास है, हर मुश्किल से विधाता निकालोगे भी तुम। )9 यह जीवन r तुमने है, संभालोगे भी तुम। आशा नहीं विश्वास है, हर मुश्किल से विधाता निकालोगे भी तुम। - ShareChat