1.5.2026
रूप रस गंध आदि विषयों को ग्रहण करने का साधन आंख रसना नासिका आदि इंद्रियां हैं। इन पांच विषयों का ग्रहण पांच इंद्रियों से होता है। इन्हें ज्ञानेंद्रियां कहते हैं। और *"जो सुख-दुख का ग्रहण है, वह आंतरिक इंद्रिय मन से होता है।"*
अब जीवन में सुख और दुख दोनों आते रहते हैं। जब कोई समस्या आपत्ति परेशानी आती है, तो लोग दुखी हो जाते हैं। और वे सोचते हैं, कि *"जब ये सारी समस्याएं आपत्तियां परेशानियां दूर हो जाएंगी, तब मन प्रसन्न होगा।"*
*"परंतु इस बात में आधा सत्य है और आधी भ्रांति है।"* इतना तो ठीक है, कि *"जब बाहर की आपत्तियां परेशानियां दूर हो जाती हैं, तो मन प्रसन्न हो जाता है।" "परंतु बहुत सी परेशानियां तो व्यक्ति अपनी अविद्या के कारण अपने मन में स्वयं उत्पन्न करता रहता है। उसकी सोचने की पद्धति ठीक न होने से, अर्थात उसका चिंतन नकारात्मक होने से वह अपने मन में बहुत से दुखों को उत्पन्न करता रहता है, और प्रसन्न नहीं रहता।"*
*"यदि व्यक्ति अपने सोचने का ढंग ठीक कर ले, सकारात्मक चिंतन करे, तो बहुत से मानसिक दुख दूर हो सकते हैं। और व्यक्ति बहुत मात्रा में प्रसन्न रह सकता है।"*
*"फिर जो बाहर की आपत्तियां और परेशानियां हैं, उन्हें भी दूर करने का प्रयत्न करे। यदि व्यक्ति ये दोनों काम कर ले, तो उस का मन पूरा प्रसन्न हो जाएगा।"*
(नोट -- यह जो हम भाषा में बोलते हैं,कि *"मन प्रसन्न हो जाएगा।"* यह केवल बोलने की भाषा है, वास्तविकता नहीं है। *"वास्तव में मन जड़ पदार्थ है। न वह दुखी होता है, और न ही वह प्रसन्न होता है। आत्मा चेतन पदार्थ है। वही प्रसन्न होता है, और वही दुखी होता है।"* केवल मोटी भाषा में हम ऐसा कह देते हैं, कि *"आज मेरा मन प्रसन्न है, अथवा मेरा मन दुखी है।"* जैसे हम मोटी भाषा में ऐसा कह देते हैं, कि *"चलो भाई उतरो, अहमदाबाद स्टेशन आ गया।"* जबकि अहमदाबाद स्टेशन नहीं आता, आती तो रेलगाड़ी है। जैसे यह मोटी भाषा है। ऐसे ही मोटी भाषा में कह देते हैं, कि *"आज मेरा मन बहुत दुखी है, और आज मेरा मन बहुत प्रसन्न है। वास्तव में आत्मा ही सुखी और दुखी होता है।")*
*"अतः अपना चिंतन सकारात्मक रखें। अपनी समस्याओं को बुद्धिमत्ता से सुलझाएं। स्वयं न सुलझा पाएं, तो दूसरे बुद्धिमान लोगों की सहायता लेवें।" "नकारात्मक चिंतन कर करके व्यर्थ ही मन में दुखों को उत्पन्न न करें। चिंताएं न करें, बल्कि सकारात्मक चिंतन करें। इससे आपका मन प्रसन्न रहेगा।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
30.4.2026
संसार में देखने में ऐसा आता है कि आजकल बुरे लोग अधिक मिलते हैं, और अच्छे लोग कम मिलते हैं। *"अच्छे लोगों को ढूंढना बहुत कठिन होता है।"* जन्म-जन्मांतरों के संस्कारों के कारण व्यक्ति बुराई की ओर जल्दी आकर्षित होता है, और अच्छाई की ओर बढ़ने में बहुत परिश्रम करना पड़ता है। *"व्यक्ति परिश्रम करना नहीं चाहता ऐसी मनोवृत्ति अधिकतर देखी जाती है। इसलिए अच्छे लोग कम मिल पाते हैं।"*
फिर कभी कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आ जाती हैं,कि किसी को नौकरी के कारण से अथवा अन्य किसी कारण से स्थान बदलना पड़ता है। एक नगर छोड़कर दूसरे नगर में जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में वे अच्छे लोग छूट जाते हैं। *"उन्हें छोड़ना बहुत कठिन लगता है।"* फिर दूरी होने के कारण उनसे अधिकतर मिलना जुलना नहीं हो पाता। अब तो फोन की सुविधा हो गई है। इसलिए लोग फोन पर बातचीत कर लेते हैं, और जैसे-तैसे अपना टाइम पास कर लेते हैं। *"परंतु अच्छे लोगों की याद बहुत सताती है। संसार के लोग, अच्छे लोगों से दूर रहते हुए भी उन्हें भूल नहीं पाते।"* इसलिए यह कहावत बनी है, कि *"अच्छे लोगों को भूल पाना तो असंभव है।"*
आप भी शायद अच्छे लोगों में से होंगे। *"हो सकता है, आपको भी लोग इसी प्रकार से पसंद करते होंगे। कुछ लोग आपके साथ में भी रहते होंगे। और कुछ दूर भी होंगे। वे दूर वाले लोग भी आपको भूल नहीं पाते होंगे। और जब-जब अवसर मिलता होगा, तब तब वे आपसे बातचीत भी अवश्य ही करते होंगे।"*
यदि आप भी ऐसे ही हैं, तो आप बहुत सौभाग्यशाली हैं। *"और यदि आप में कुछ कमी हो, तो आप भी ऐसे ही अच्छे व्यक्ति बनने का प्रयत्न करें। जिससे कि लोग आपको सदा याद करें, और आपके उत्तम गुणों से कुछ शिक्षा प्रेरणा भी प्राप्त करें।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
29.4.2026
पिछले 20 25 वर्षों से, जब से यह इलैक्ट्रोनिक एवं सोशल मीडिया का युग तेजी से चल रहा है, भौतिकवाद और भोगवाद की आंधी सी आई हुई है। *"तब से लोग अपने पुराने उत्तम गुणों को भूल से गए हैं। सभ्यता नम्रता सेवा अनुशासन परोपकार दान दया सहनशक्ति इत्यादि गुणों को छोड़ सा दिया है। इसी का दुष्परिणाम है कि लोगों में लोभ क्रोध ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि दोष बहुत बढ़ गए हैं। छोटी-छोटी बात भी दूसरों की सहन नहीं होती।"*
*"भोगवाद की इस आंधी में बिना गुण कर्म स्वभाव मिलाए, केवल रूप रंग और कुछ पैसा आदि देखकर लोग विवाह कर लेते हैं। एक दूसरे के गुण कर्म स्वभाव की पूरी पहचान नहीं करते। फिर जब छोटी-छोटी बात में परस्पर मतभेद होता है, तो तुनक जाते हैं। सहन नहीं करते।"*
*"पहले छोटे-छोटे झगड़े आरंभ होते हैं। कुछ समय में अभिमान के कारण और सहनशक्ति कम होने के कारण झगड़े बढ़ जाते हैं। और कुछ ही दिनों में संबंध टूट जाते हैं।"*
कोई कितने भी गुण कर्म स्वभाव मिला ले, फिर भी देखा तो यही जाता है, कि *"संसार में कोई भी दो व्यक्ति ऐसे नहीं मिलते, जिनके विचार 100% एक समान हों। कुछ न कुछ तो मतभेद होता ही है।"*
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं जी सकता। इसलिए आपस में मिलजुल कर परिवार और समाज में रहना पड़ता है। इसका उपाय यही है, कि *"अपनी सहनशक्ति को बढ़ाएं। अधिक भोगवादी न बनें। उसमें कहीं पूरी तृप्ति नहीं है। शांति नहीं है, संतोष नहीं है।"*
ऊपर बताए सभ्यता नम्रता सहनशक्ति आदि गुणों को धारण करके लोग कुछ अच्छे ढंग से अपना जीवन जी सकते हैं। जैसे कि *"सुबह शाम बैठकर ईश्वर का ध्यान करें। वेदों का अध्ययन करें। ऋषियों के ग्रंथ पढ़ें। थोड़ा व्यायाम करें। दिनचर्या ठीक रखें। रात को जल्दी सोएं। सुबह जल्दी उठें। जहां कहीं छोटी बड़ी बातों में मतभेद हो जाए, उसको आपस में बैठकर चर्चा से सुलझाएं। अपनी सहनशक्ति बढ़ाएं, इत्यादि।"*
*"मिथ्या अभिमान और हठ दुराग्रह आदि दोषों के कारण संसार में असंख्य लोग पहले भी दुखी हुए हैं, आज भी दुखी हैं, और आगे भी होते रहेंगे।"*
*"अतः इन दोषों को छोड़ने का प्रयत्न करें। तथा ऊपर बताए उत्तम गुणों को धारण करें। तभी आपका व्यक्तिगत पारिवारिक सामाजिक जीवन सुखमय हो सकता है, अन्यथा नहीं।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख
28.4.2026
व्यक्ति चाहता है, *"मैं सदा सुखी रहूं।"* और वह सुख के लिए नए-नए उपाय भी खोजता रहता है। इस खोज में वह बहुत बार गलतियां भी करता है। *"जो सुख के उपाय नहीं होते, उन्हें वह सुख का उपाय मानकर भारी भूलें करता है। फिर अंत में दुखी होता है।"*
आजकल बहुत से युवक यह सोचते हैं, कि *"हम भारत में 12 कक्षा तक पढ़कर आगे पढ़ने के लिए विदेश जाएंगे। और वहां अच्छी पढ़ाई करके अच्छे पैसे कमाएंगे, खाएंगे पिएंगे मौज करेंगे।"* ऐसा सोचकर वे विदेश या भारत देश में ही, परिवार से कहीं दूर चले जाते हैं। अपने सुख-दुख के साथी परिवार के लोगों को, मित्रों और संबंधियों को छोड़ जाते हैं।
5-7 वर्ष वे विदेश में या बंगलौर मंगलौर आदि किसी दूर स्थान पर पढ़ाई करते हैं। कुछ काम धंधा करते हैं। धीरे-धीरे वहीं सेट हो जाते हैं। परंतु उनके माता-पिता मित्र और संबंधी लोग भारत में रहते हुए भी उनसे अलग हो जाते हैं।
फिर वे युवक विदेश में रहते हुए ऐसा मान लेते हैं, कि बस यही जीवन है, और ऐसे ही जीना है। वे भूल जाते हैं कि *"हम पर हमारे माता-पिता का परिवार जनों का मित्रों का संबंधियों का और पूरे देश के लोगों का कोई ऋण भी है। हमने 18-20 साल तक अपने माता-पिता और भारत देश वालों की सेवाएं ली। उनका पैसा खर्च करवाया। अनाज फल फूल शाक सब्जी रोटी कपड़ा मकान रेल सड़क विमान आदि की सारी सुविधाएं भोगी। और आज जब कुछ उन्हें वापस प्रतिफल देने का समय आया, तो हम भाग कर विदेश आ गए।"* ये बातें उनको समझ में नहीं आती। *"न तो विदेश में उन्हें माता-पिता और परिवार का सुख मिलता, और न ही वहां के लोगों की सहानुभूति। क्योंकि वे तो वहां विदेशी हैं। विदेशी होने के कारण वहां तो वे द्वितीय स्तर का नागरिक बनकर रहते हैं। इस प्रकार से उनका आत्म सम्मान तक खो जाता है।"*
जब माता-पिता की वृद्धावस्था में उन पर कोई समस्या आती है, तो वे इतनी दूर रहकर उसका समाधान नहीं कर पाते। *"परिणाम यह होता है कि वे युवक विदेश में दुखी रहते हैं और उनके माता-पिता भारत में। वृद्धावस्था में भी उन्हें कोई प्रेम से भोजन खिलाने वाला नहीं होता। रोगी होने पर कोई डॉक्टर से दवा लाने वाला नहीं होता। कोई सेवा करने वाला नहीं होता।"* तब वे माता-पिता पश्चाताप की अग्नि में जलते रहते हैं, कि *"हमने अपने बच्चों को विदेश क्यों भेजा?"*
विदेश में रहने वाले बच्चे कभी-कभी ऐसा अनुभव करते हैं, कि *"हमने भारत देश और अपने माता-पिता को छोड़कर भारी गलती की है।" "परंतु फिर भी वे वहां के वातावरण में ऐसे जकड़ जाते हैं, कि चाह कर भी भारत वापस नहीं लौट पाते, और अपने माता-पिता एवं परिवार मित्रों आदि के साथ रहकर सुख नहीं भोग पाते, और न ही माता-पिता आदि की सेवा कर पाते।" "जो लोग ऐसी गलती कर चुके हैं, वे तो कर ही चुके हैं। कम से कम और लोग तो इन बातों से शिक्षा लेकर आगे ऐसी गलतियां न करें।"*
भारत में ही, अपने माता-पिता के पास रहकर अपना जीवन सुखपूर्वक बिताएं। माता-पिता भी इस प्रकार से सोचें। *"भले ही हमारे बच्चे कम पढ़ें, पैसा कम कमाएं, परंतु हमारे साथ रहें।* इसी में उन बच्चों का और परिवार का सुख है।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख
27.4.2026
कभी-कभी व्यक्ति जीवन में असफल हो जाता है। तब वह अपने साथियों मित्रों या परिवार वालों की सहायता चाहता है। उसके साथी उसकी सहायता करते भी हैं।
परंतु हर बार ऐसा नहीं समझना चाहिए, कि जब भी कोई सहायता करे, तो आप यह समझें, कि *"आप अपने जीवन में फेल हो गए हैं।"*
आपके कुछ प्रशंसक आपके चाहने वाले, मित्र रिश्तेदार परिवार वाले या परिचित व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो आपसे बहुत अधिक प्रेम करते हैं, और आपको सदा प्रसन्न देखना चाहते हैं। *"यदि आप के जीवन में थोड़ी सी भी परेशानी उन्हें दिखाई देती है, तो वे तुरंत आपकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाते हैं।"*
ऐसी स्थिति में उनकी भावनाओं को आप समझें। वे आपके हितकारी हैं। *"आपके विशेष गुणों के कारण वे आपसे प्रेम करते हैं। इसलिए तत्काल आपकी सहायता करने को तैयार रहते हैं।"* तब आपको यह नहीं समझना चाहिए, कि *"मैं अपने जीवन में फेल हो गया हूं। इसलिए लोग मुझ पर तरस खाकर मेरी मदद कर रहे हैं."* बल्कि ऐसी स्थिति में तो आपको प्रसन्न होना चाहिए कि *"आप एक सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि एक विशेष व्यक्ति हैं। आपकी विशेषता को दूसरे लोग समझते हैं, इसीलिए वे आपसे प्रेम करते हैं। और उन्हें आपकी थोड़ी सी भी परेशानी सहन नहीं होती। इसीलिए वे आपकी सहायता करने को तत्पर रहते हैं।"*
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26.4.2026
निन्दा चुगली करना, यह दोष तो सदा से चला आ रहा है। कुछ लोग निंदा चुगली में बहुत मजा लेते हैं। उन्हें दूसरों पर सच्ची झूठी टीका टिप्पणी करने में बहुत आनंद आता है। *"ऐसे लोग कभी-कभी सच बात भी कहते हैं, परंतु अधिकतर झूठे आरोप लगाकर लोगों को बदनाम करते हैं। भले ही उन्हें इस कार्य में सुख मिलता हो, परंतु वे इसका दुष्परिणाम नहीं जानते, कि इससे समाज की बहुत बड़ी-बड़ी हानियां होती हैं। और ऐसे निंदा चुगली करने वाले लोगों को ईश्वर की ओर से बहुत भारी दंड भी भोगना पड़ता है।"*
समाज में कुछ बुद्धिमान लोग भी होते हैं। जो इस बात को समझते हैं, कि *"यदि कोई किसी पर झूठे आरोप लगाए, तो वह अच्छा नहीं है।" "ऐसी स्थिति में वे उन झूठी बातों का खंडन करते हैं, और समाज में भ्रांति फैलाने वाले लोगों को रोकते हैं।"*
जिस पर ये झूठे आरोप लगाए जाते हैं, यदि कोई व्यक्ति उस समय उन बातों को अच्छी तरह से जानता हो, कि *"उस व्यक्ति को व्यर्थ ही बदनाम किया जा रहा है। उस पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं। तब वह झूठे आरोपों का खंडन करके उस व्यक्ति की रक्षा करता है। इतना ही नहीं बल्कि उसके उत्तम गुणों को समाज में स्थापित करता है।"* और बताता है, कि *"वह तो बहुत अच्छा व्यक्ति है, उसे व्यर्थ बदनाम नहीं करना चाहिए। अन्यथा समाज के लोग उसके उत्तम गुणों से लाभ नहीं उठा पाएंगे। इससे समाज की बड़ी हानि होगी।"*
*"इस तरह से यदि कोई सत्य बात कह कर उस निर्दोष व्यक्ति की रक्षा करता है, तो यह उस व्यक्ति के लिए बहुत बड़ा सम्मान है," कि "जो उसकी अनुपस्थिति में उस पर लगाए गए मिथ्या आरोपों का खंडन करके समाज में उसके गुणों को स्थापित किया गया।"*
आप भी यदि कहीं ऐसा होते हुए देखें, तो *"अवश्य ही उन निंदक एवं चुगलखोरों का विरोध करें, तथा समाज में भ्रांति फैलने से रोकें। आपको इसका बहुत बड़ा पुण्य मिलेगा, और तत्काल आनन्द भी मिलेगा।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
25.4.2026
जब लोग आपस में मिलते हैं। एक दूसरे का स्वागत करते हैं। एक दूसरे को देखकर प्रसन्न होते हैं। फिर आपस में कुछ बातचीत करते हैं। फिर चर्चा करने के बाद जब वे अलग होते हैं, तो *"एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। उनके उत्तम भविष्य की सुखमय जीवन की अपने-अपने ढंग से अनेक प्रकार की शुभकामनाएं देते हैं।"*
हमारी दृष्टि में सबसे अच्छी शुभकामनाएं इस प्रकार से हैं, कि लोग एक दूसरे से कहें, कि *"आपका स्वास्थ्य अच्छा रहे। आपका शरीर बलवान रहे। आप दीर्घायु होवें। आपका मन सदा शांत और स्थिर रहे। संसार के अच्छे लोग आपके मित्र बनें। आप बुराइयों से दूर रहें। दुष्ट लोगों की छाया भी आप पर कभी न पड़े। सदा सज्जनों का संग रहे, और आप सदा सुखी रहें।"* इस प्रकार की शुभकामनाएं एक दूसरे को देनी चाहिएं। ऐसी शुभकामनाएं सबसे उत्तम होती हैं।
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
24.4.2026
व्यक्ति खाली तो बैठ नहीं सकता। चाहे वह अच्छा कर्म करे, चाहे बुरा करे, कुछ तो करेगा ही।
यदि वह अच्छा कर्म करेगा, तो ही बुराई से बच पाएगा। यदि अच्छा नहीं करेगा, तो बुरा कर्म करेगा। क्योंकि वह खाली तो बैठ नहीं सकता। *"यदि बुरा कर्म करेगा, तो ईश्वर की ओर से उसे दंड मिलेगा। यदि दंड से बचना हो, तो इसी में बुद्धिमत्ता है, कि व्यक्ति अच्छा कर्म करे।"*
अब कौन सा कर्म अच्छा है, और कौन सा बुरा? इस बात का निर्णय करने के लिए प्रमाण और तर्क की आवश्यकता होती है। *"प्रमाण और तर्क को जानने के लिए महर्षि गौतम जी का बनाया हुआ न्याय दर्शन पढ़ना चाहिए।"*
*"वेदों के आधार पर महर्षि गौतम जी ने न्याय दर्शन की रचना की, और उसमें विस्तार से बताया कि प्रमाण और तर्क क्या होता है, और वह कैसे काम करता है। यदि आप भी प्रमाण और तर्क के विषय में ठीक प्रकार से जानना चाहते हों, तो न्याय दर्शन का अध्ययन अवश्य करें।"*
यदि न्याय दर्शन कठिन लगे, तो इसी पद्धति पर *"महर्षि दयानंद सरस्वती जी की लिखी हुई एक पुस्तक है जिसका नाम है सत्यार्थ प्रकाश। उसको पढ़ें। तो भी आपको प्रमाण और तर्क की बहुत अच्छी जानकारी हो सकती है।"*
इस प्रकार से प्रमाण और तर्क से जानकारी करके ही कोई भी कर्म करें। *"यज्ञ करना दान देना सेवा करना ईश्वर की उपासना करना वेद प्रचार करना इत्यादि शुभ कर्म कहलाते हैं। इन शुभ कर्मों का आचरण करें। अन्यथा बुरे कर्मों से बचना तथा अच्छे कर्मों को कर पाना बहुत कठिन है।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏कर्म क्या है❓
24.4.2026
व्यक्ति खाली तो बैठ नहीं सकता। चाहे वह अच्छा कर्म करे, चाहे बुरा करे, कुछ तो करेगा ही।
यदि वह अच्छा कर्म करेगा, तो ही बुराई से बच पाएगा। यदि अच्छा नहीं करेगा, तो बुरा कर्म करेगा। क्योंकि वह खाली तो बैठ नहीं सकता। *"यदि बुरा कर्म करेगा, तो ईश्वर की ओर से उसे दंड मिलेगा। यदि दंड से बचना हो, तो इसी में बुद्धिमत्ता है, कि व्यक्ति अच्छा कर्म करे।"*
अब कौन सा कर्म अच्छा है, और कौन सा बुरा? इस बात का निर्णय करने के लिए प्रमाण और तर्क की आवश्यकता होती है। *"प्रमाण और तर्क को जानने के लिए महर्षि गौतम जी का बनाया हुआ न्याय दर्शन पढ़ना चाहिए।"*
*"वेदों के आधार पर महर्षि गौतम जी ने न्याय दर्शन की रचना की, और उसमें विस्तार से बताया कि प्रमाण और तर्क क्या होता है, और वह कैसे काम करता है। यदि आप भी प्रमाण और तर्क के विषय में ठीक प्रकार से जानना चाहते हों, तो न्याय दर्शन का अध्ययन अवश्य करें।"*
यदि न्याय दर्शन कठिन लगे, तो इसी पद्धति पर *"महर्षि दयानंद सरस्वती जी की लिखी हुई एक पुस्तक है जिसका नाम है सत्यार्थ प्रकाश। उसको पढ़ें। तो भी आपको प्रमाण और तर्क की बहुत अच्छी जानकारी हो सकती है।"*
इस प्रकार से प्रमाण और तर्क से जानकारी करके ही कोई भी कर्म करें। *"यज्ञ करना दान देना सेवा करना ईश्वर की उपासना करना वेद प्रचार करना इत्यादि शुभ कर्म कहलाते हैं। इन शुभ कर्मों का आचरण करें। अन्यथा बुरे कर्मों से बचना तथा अच्छे कर्मों को कर पाना बहुत कठिन है।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓













