अंतरराष्ट्रीय प्रकाश दिवस
प्रत्येक वर्ष 16 मई को अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस मनाया जाता है।यूनेस्कोइसके अनुसार, इसके उद्देश्य सहयोग को मजबूत बनाना और शांति एवं विकास को बढ़ावा देना इसकी क्षमता का लाभ बढ़ाता है। प्रकाश आधारित प्रौद्योगिकी शिक्षा, विज्ञान, कला, संस्कृति, सतत विकास, संचार, ऊर्जा और चिकित्सा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह वार्षिक उत्सव प्रदर्शन द्वारा आयोजित किया जाता है। पहला अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस समारोह 16 मई, 2018 को आयोजित किया गया था, 1960 में उस तिथि की सालगिरह जब इंजीनियर और भौतिक विज्ञानीथियोडोर मैमन नेसबसे पहले लेजर से आंदोलन और चप्पलें प्राप्त की गई थीं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस 2015अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश वर्ष केबाद में मनाया गया। इस दिन का प्रस्ताव घाना, मैक्सिको, न्यूजीलैंड और रूसी संघ द्वारा रखा गया था और इसे कार्यकारी बोर्ड द्वारा आयोजित किया गया था। अवलोकन महासभा ने नवंबर 2017 में प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
प्रकाश और प्रकाश-आधारित संरचनाओं के अध्ययन ने हमें दुनिया को एक इकाई से जोड़ने में मदद की है। लाइट-आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट्स, एक्स-रे मॉड्यूल, टेलीस्कोप, कैमरे, इलेक्ट्रिक लाइट और टेलीविज़न स्क्रीन शामिल हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस का उद्देश्य शांति और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक सहायता का उपयोग करना है।
सूर्य के निर्माण और उसके द्वारा हमारी दुनिया को प्राकृतिक प्रकाश प्रदान करने के क्षण से लेकर, मनुष्यों द्वारा कृत्रिम प्रकाश बनाने के अनेक तरीकों की खोज तक, प्रकाश प्रौद्योगिकी ने इतिहास भर में व्यापक विकास किया है, जिससे हमारी दैनिक आवश्यकताओं के लिए सुविधाजनक प्रकाश समाधान उपलब्ध हुए हैं। इसी कारण, हमें उन सभी वैज्ञानिकों, खोजकर्ताओं, आविष्कारकों और शोधकर्ताओं के अथक परिश्रम और प्रयासों को पहचानना चाहिए और प्रकाश प्रौद्योगिकी को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने में उनके योगदान की सराहना करनी चाहिए। उनकी खोजों और आविष्कारों ने प्रकाश डिजाइन में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाए हैं। उनके बिना, हमारे पास आज की आधुनिक प्रकाश प्रौद्योगिकी नहीं होती। इसलिए, हर बार जब आप स्विच ऑन करें, दुकान से बल्ब खरीदें या बारबेक्यू ग्रिल को गर्म करें, तो सोचें कि इन चीजों को करने के लिए आपको कितनी मेहनत करनी पड़ी है, और याद रखें कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों के अन्य प्रेरित और प्रतिभाशाली व्यक्तियों ने आज आपके जीवन को आसान, अधिक आरामदायक और आनंददायक बनाया है। #जागरूकता दिवस
सिक्किम राज्य दिवस
सिक्किम 16 मई, 1975 को भारत संघ में शामिल हुआ था। तब से, हर साल 16 मई को सिक्किम राज्य का स्थापना दिवस (Sikkim Statehood Day) मनाया जाता है। 1950 में, भारत-सिक्किमीज़ संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके साथ, सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य (protectorate) बन गया। सिक्किम पर 1975 तक नामग्याल वंश (Namgyal Dynasty) का शासन था। सिक्किम 100% जैविक बनने वाला देश का पहला राज्य है। आज सिक्किम में सभी कृषि गतिविधियाँ कीटनाशकों और सिंथेटिक उर्वरकों के उपयोग के बिना की जाती हैं
कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान (Kanchenjunga National Park) एक विश्व धरोहर स्थल है जो सिक्किम में स्थित है।
तीस्ता नदी (River Teesta) इस राज्य में बहने वाली प्रमुख नदी है। तीस्ता की सहायक नदियाँ ल्होनक (Lhonak), लाचुंग (Lachung) और तालुंग (Talung) हैं। तीस्ता नदी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है। 1975 में सिक्किम के प्रधानमंत्री ने भारत से सिक्किम को भारत संघ में शामिल करने की अपील की। इसके बाद, भारतीय सेना ने गंगटोक शहर को अपने नियंत्रण में लिया और चोग्याल महल के रक्षकों को निशस्त्र कर दिया गया। एक जनमत संग्रह हुआ जिसमें 97.5% ने राजशाही को खत्म करके भारत में शामिल होने का समर्थन किया।
भारतीय संसद ने अपने 35वें संशोधन में शर्तें रखीं, जिसने सिक्किम को एक “सहयोगी राज्य” (Associate State) बना दिया। सिक्किम इस स्थिति को पाने वाला एकमात्र राज्य है। 36वें संशोधन ने 35वें संशोधन को निरस्त कर दिया और सिक्किम एक पूर्ण राज्य बन गया । सिक्किम के निवासी नेपाली मूल के हैं। सिक्किम के मूल निवासी भूटिया (Bhutia) हैं। वे 14वीं शताब्दी में तिब्बत से स्थानांतरित हुए थे। भूटिया से पहले लेप्चा रहते थे। तिब्बती ज्यादातर राज्य के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में रहते थे। #शुभ कामनाएँ 🙏
वट सावित्री अमावस्या व्रत
मान्यता है कि ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण बचाए थे। तभी से सुहागिन महिलाएं भी अपने पति की लंबी आयु के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। पंचांग के अनुसार, हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इसे बरगदाही भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत रखती है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर बरगद के पेड़ की विधिवत पूजा करने के साथ परिक्रमा करते हुए सफेद या पीले रंग का कच्चा सूत या सफेद धागा बांधती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन पतिव्रता सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लेकर आ गई थी। इसलिए पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें महिलाएं इस दिन व्रत रखने के साथ वट वृक्ष की पूजा करती हैं और कामना करती हैं कि उनके पति की आयु लंबी हो और स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहे।
वट सावित्री व्रत सत्यवान-सावित्री की कथा से जुड़ा है, कहते हैं इस दिन सावित्री ने अपनी चतुराई से यमराज को मात देकर सत्यवान के प्राण बचाए थे. तभी से पति की लंबी उम्र के लिए निर्जल व्रत कर पूजा करती हैं। सावित्री ने अपने पति के जीवन के लिए लगातार 3 दिनों तक व्रत रखा था, इसलिए ये व्रत 3 दिनों तक रखा जाता है. वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा और परिक्रमा कर के सौभाग्य की चीजों का दान करती हैं। व्रत वाले दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफाई कर के नहाती हैं. इसके बाद पूजा की तैयारियों के साथ नैवेद्य बनाती हैं. फिर बरगद के पेड़ के नीचे भगवान शिव-पार्वती और गणेश की पूजा करती हैं. कच्चे सूत से 11, 21 या 108 बार बरगद के पेड़ की परिक्रमा करें। ये व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को किया जाता है. वहीं देश के कुछ हिस्सों में ज्येष्ठ पूर्णिमा पर ये व्रत किया जाता है। #शुभ कामनाएँ 🙏
शनि जयंती
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन शनि जयंती मनाई जाती है। इस विशेष दिन पर शनि देव की उपासना करने से साधक को रोग, दोष और बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि शनि जयंती के दिन शनि देव की उपासना करने से शनि ढैया, साढ़ेसाती और शनि की महादशा से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। ज्योतिष विद्वानों के अनुसार, शनि जयंती के दिन 3 राशियां ऐसी हैं, जिन्हें इस दौरान सर्वाधिक लाभ मिलने वाला है। आइए जानते हैं, किन राशियों पर बरसेगी शनिदेव की कृपा।
तुला राशि
बता दें कि शुक्र तुला राशि के स्वामी ग्रह हैं और शनिदेव के मित्र भी हैं। ऐसे में तुला राशि को शनि की उच्च राशि भी माना जाता है। ऐसे में शनि देव अधिकांश समय तुला राशि पर मेहरबान रहते हैं। शनि जयंती के विशेष दिन पर शनि देव की उपासना करने से जातक को सफलता, समृद्धि और आर्थिक उन्नति की प्राप्ति होती है। शनि देव की उपासना करने से नौकरी और व्यापार में भी लाभ मिलता है।
मेष राशि
ज्योतिष विद्यानों के अनुसार, शनि जयंती के कुछ दिन पहले मेष राशि में गुरु और चंद्रमा की युति से गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है। जिससे मेष राशि को इस अवधी में धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। साथ ही वह काई क्षेत्र में उन्नति भी हासिल करेंगे। इस दौरन कर्ज से राहत मिलेगा, वहीं आय के नए स्त्रोत खुलेंगे।
मिथुन राशि
गजकेसरी योग का शुभ प्रभाव मिथुन राशि पर भी पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इस दौरान मान-सम्मान की प्राप्ति होगी और समाज में कद बढ़ेगा। लंबे समय अटके हुए कार्य भी इस अवधि में पूर्ण होंगे और इस दौरान पैतृक संपत्ति के मामले में सुखद समाचार मिलेगा। पदोन्नति के योग भी बन रहे हैं। #शुभ कामनाएँ 🙏
शनिश्चरी ज्येष्ठ अमावस्या
ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को ज्येष्ठ अमावस्या मनाई जाती है. यह कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है. इसके बाद से शुक्ल पक्ष का प्रारंभ होता है. इस बार ज्येष्ठ अमावस्या और ज्येष्ठ दर्श अमावस्या दोनों एक साथ हैं. ज्येष्ठ अमावस्या के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने के बाद दान देने की परंपरा है. ऐसा करने से पाप मिटते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है. स्नान और दान से पितर प्रसन्न होते हैं और वे आशीर्वाद देते हैं। ज्येष्ठ अमावस्या वाले दिन प्रात:काल से ही स्नान और दान प्रारंभ हो जाता है. इस दिन आप सुबह पवित्र नदी में स्नान कर लें और उसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार दान करें. ऐसा करने से पुण्य लाभ होगा। घर में सुख-शांति- ज्येष्ठ अमावस्या पर प्रात: गंगा नदी में स्नान करें या घर पर गंगाजल मिले पानी से स्नान करें. उसके बाद हाथ में कुश और काले तिल लेकर पितरों को जल से तर्पण दें. ऐसा करने से पितर तृप्त होते हैं. कहते हैं इससे कई पीढ़ियों के पितरों को जल प्राप्त होता है और उनकी आत्मा संतुष्ट होती है. घर में खुशहाली आती है.
सुखी गृहस्थी के लिए - ज्येष्ठ अमावस्या पर पीपल, बड़, आंवले, नीम का पौधा लगाने की परंपरा है. नियमित रूप से इन पौधों को लगाने के बाद सेवा करने से पितर खुश होते हैं. इन्हें घर या आसपास लगाने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है.
धन में वृद्धि - कहते हैं अमावस्या पर पूर्वज किसी भी रूप में धरती पर आते हैं. पितरों को प्रसन्न करने के लिए इस दिन ब्राह्मण को भोजन कराएं, साथ ही कौए, गाय, कुत्ते, चीटियों को भी खाना खिलाएं. इससे पितरों को भोजन प्राप्त होता है. धन में वृद्धि और तनाव से मुक्ति के लिए ये उपाय लाभकारी है.
ग्रंथों में बताया गया है कि शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या शुभ फल देती है। इस तिथि पर तीर्थ स्नान और दान का कई गुना पुण्य फल मिलता है। अमावस्या शनि देव की जन्म तिथि भी है। इसलिए इस दिन शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए पीपल के पेड़ की पूजा करने से कुंडली में मौजूद शनि दोष खत्म होते हैं। इस दिन शनि देव की कृपा पाने के लिए व्रत रखना चाहिए और जरूरतमंद लोगों को भोजन करवाना चाहिए। ये शनैश्चरी अमावस्या खास इसलिए है क्योंकि शनि अपनी ही राशि यानी मकर में है। इस पर्व पर सुबह जल्दी नदी, सरोवर, पवित्र कुंड या तीर्थ में स्नान करना चाहिए। नहाने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन व्रत रखकर जहां तक संभव हो मौन रहना चाहिए। जरूरतमंद व भूखे व्यक्ति को भोजन जरूर कराएं। शनैश्चरी अमावस्या पर ऊनी कपड़े या कंबल का दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा करने से शनि दोष तो दूर होते हैं साथ ही जाने अनजाने में हुए पाप भी खत्म हो जाते हैं।शनैश्चरी अमावस्या के दिन भगवान शिव की आराधना करें। कहते हैं शनि ग्रह से शुभ फल पाने के लिए शिव की उपासना एक सिद्ध उपाय है। नियमपूर्वक शिव सहस्त्रनाम या शिव के पंचाक्षरी मंत्र का पाठ करने से शनि के प्रकोप का भय जाता रहता है और सभी बाधाएं दूर होती हैं। इस उपाय से शनि द्वारा मिलने वाला नकारात्मक परिणाम समाप्त हो जाता है।शनैश्चरी अमावस्या पर शनि महाराज को नीले रंग का अपराजिता फूल चढ़ाएं और काले रंग की बाती और तिल के तेल से दीप जलाएं। साथ ही ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: मंत्र का तीन माला जप करें। यह उपाय शनि दोष को दूर करने में बेहद कारगर माना जाता है। शनैश्चरी अमावस्या पर बजरंगबली की पूजा जरूर करें। इस उपाय को करने से शनि से जुड़े दोष दूर होंगे। इस दिन सुंदरकांड का पाठ करना और हनुमान जी के मंदिर में प्रसाद चढ़ाना शनि दोष से मुक्ति पाने का कारगर उपाय है। #शुभ कामनाएँ 🙏











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