का दर्द और समाज की सोच
एक बेटी ने अपने पिता से बड़े ही भावुक मन से पूछा— "पिताजी, माँ और आपने अगर मुझे इस धरती पर जन्म दिया है, तो फिर यह समाज बेटियों के साथ इतना भेदभाव क्यों करता है? जितना माता-पिता को अपनी बेटी को घर में रखने की चिंता नहीं होती, उससे कहीं ज्यादा दुख रिश्तेदारों को होता है।"
अक्सर देखा जाता है कि अगर कोई लड़की अपने सपनों को पूरा करना चाहे, तो कई रिश्तेदार उसकी सफलता से जलने लगते हैं। वे खुद के बच्चों को तो बड़े 'इंग्लिश मीडियम' स्कूलों में पढ़ाते हैं, लेकिन अगर कोई गरीब माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भी पढ़ाकर आगे बढ़ाना चाहें, तो उन्हें समाज के तानों का सामना करना पड़ता है।
यह समाज की कितनी घटिया सोच है कि कुछ लोग चाहते हैं कि सिर्फ उनके बच्चे ही आगे बढ़ें और गरीब के बच्चे पिछड़े रहें। एक गरीब पिता जब अपनी बेटी और बेटों को साथ पढ़ाता है, तो वही रिश्तेदार मिलकर उसकी पढ़ाई रुकवाने की कोशिश करते हैं।
मेरा समाज को यही संदेश है:
अगर कोई भी रिश्तेदार आपसे यह कहे कि बच्चों की उम्र हो गई है, पढ़ाई छुड़ाकर शादी कर दो, तो उनकी बातों में बिल्कुल न आएं। यदि आपके बच्चे पढ़ना चाहते हैं, तो उन्हें भरपूर मौका दीजिए। समाज और रिश्तेदार अक्सर आपका साथ देने के बजाय मजाक उड़ाएंगे, लेकिन आपको अपने बच्चों के भविष्य के लिए खड़ा होना होगा।
चाहे बेटी हो या बेटा, शिक्षा लेना सबका समान अधिकार है।
पढ़ेगा हिंदुस्तान, तभी तो बढ़ेगा हिंदुस्तान!
खासकर, पढ़ेगी बेटी, तभी आगे बढ़ेगी बेटी।
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