खुशी मनाओ मंगल गाओ | Sant Rampal Ji Maharaj
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अनमोल पुस्तक
जीने की राह पढ़िए……………)
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जीने की राह पार्ट - 23
पृष्ठ: 56-59
"माता-पिता की सेवा व आदर करना परम कर्तव्य"
प्रत्येक माता-पिता की तमन्ना होती है कि मेरी संतान योग्य बने। समाज में बदनामी न ले। अच्छे चरित्र वाली हो, आज्ञाकारी हो। वृद्धावस्था में हमारी सेवा करे। हमारी बहु हमारे कहने में चलने वाली आए। समाज में हमारी इज्जत रखे वृद्धावस्था में हमारी सेवा करे। प्यार से व्यवहार करे। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तक यह मर्यादा चरम पर रही। सब सुखी जीवन जीते थे। कलयुग में कुछ समय तक तो ठीक रहा, परंतु वर्तमान में स्थिति विपरीत ही है। इसे सुधारने का उद्देश्य लेखक (रामपाल दास) रखता है। आशा भी करता हूँ कि भगवान की कृपा से ज्ञान के प्रकाश से सब संभव हो जाता है, हो भी रहा है और होगा, यह मेरी आत्मा मानती है।
> माता का संतान के प्रति प्यार :-
एक लड़के का पिता मृत्यु को प्राप्त हो गया। उस समय वह 10-11 वर्ष का था। माता ने अपने इकलौते पुत्र की परवरिश की। माता तथा पिता दोनों का प्यार माता जी ने दिया कि कहीं पुत्र को पिता का अभाव कष्ट न दे। लड़का युवा होकर शराब का आदी हो गया तथा वैश्या गमन करने लगा। माता से नित्य रूपये माँगे और आवारागर्दी में उड़ाए। एक दिन माता के पास पैसे नहीं थे। शराब के नशे में माता को पीटा तथा वैश्या के पास गया। उस दिन पैसे नहीं थे तो वैश्या ने कहा कि अपनी माता का दिल निकाल ला। उल्टा घर आया, माता बेहोश थी। छुरा मारकर माता का दिल निकालकर चल पड़ा। नशे में ठोकर लगी और गिर गया। माता के दिल से आवाज आई कि बेटा ! तेरे को चोट तो नहीं लगी।
नशे से बना शैतान वैश्या के पास माता का दिल लेकर पहुँचा तो वैश्या ने कहा कि जब तू अपनी माता का हितैषी नहीं है तो मेरा क्या होगा? किसी के बहकावे में आकर तू मुझे भी मार डालेगा। मेरे को तो तेरे से पीछा छुड़ाना था कि तू अब निर्धन हो गया है, मेरे किस काम का। इसलिए यह शर्त रखी थी कि तू माता का दिल निकाल नहीं सकता क्योंकि वह तेरे को कभी किसी वस्तु के लिए मना नहीं करती थी। हे शैतान ! चला जा मेरी आँखों के सामने से। यह कहकर वैश्या ने उसे घर से बाहर धक्का देकर द्वार बंद कर लिया। वह शैतान घर आया। माता के शव पर विलाप करने लगा। कहा कि माता जी! हो सके तो भगवान के दरबार में भी मुझे बचाना। आवाज आई कि बेटा ! कुछ नहीं हुआ, बस तेरे को खुश देखना चाहती हूँ। उसी समय नगर के लोग आए। थाने में सूचना दी। उस अपराधी को राजा ने फाँसी की सजा दी।
राजा ने फाँसी चढ़ाने से पूर्व उसकी अंतिम इच्छा जानी तो उस लड़के ने कि कुछ नागरिकों को बुलाया जाए, मैं अपनी कारगुजारी को सबके साथ साझा करना चाहता हूँ। नगर के व्यक्ति आए। उस लड़के ने अपना जुल्म कबूला और बताया कि मैंने उपरोक्त जुल्म किया। मेरी माँ की आत्मा अंतिम समय में भी मेरे सुखी रहने की कामना करती रही। मेरे को नशे ने शैतान बना दिया। मैंने वैश्या गमन करके समाज को दूषित किया। आप लोग मेरे से नसीहत लेना। जो घोर पाप मैंने अपनी माता जी को परेशान करके किया, कोई मत करना। माता जैसी हमदर्द संसार में पत्नी भी नहीं हो सकती, भले ही वह कितनी ही नेक हो। माता अपने बेटा-बेटी को इतना प्यार करती है कि सर्दियों में बच्चा पेशाब कर देता है तो माता स्वयं उसके पेशाब से भीगे ठण्डे वस्त्र पर लेटती है, बच्चे के नीचे सूखा बिछौना कर देती है। यदि बच्चा भूख से रो रहा होता है तो खाना बीच में छोड़कर - उसे पहले अपना दूध पिलाकर शांत करती है।
"पिता बच्चों की हर संभव गलती क्षमा कर देता है"
परमात्मा कबीर जी ने कहा है कि पिता अपने पुत्र-पुत्री के सर्व अपराध क्षमा कर देता है :-
अवगुण मेरे बाप जी, बक्शो गरीब नवाज ।
जो मैं पूत-कपूत हूँ, तो भी पिता को लाज ।।
शब्दार्थ :- परमात्मा सर्व प्राणियों का पिता है। पिता में विशेषता होती है कि उसका बेटा-बेटी अज्ञानता में गलती कर देते हैं और वे पिता से क्षमा-याचना कर - लेते हैं कि भविष्य में कभी गलती नहीं करेंगे तो पिता उनको तुरंत क्षमा कर देता है। इसलिए भक्त परमात्मा से विनय करता है कि हे दीन दयाल ! आप तो सबके पिता हो। मेरे अवगुण (अपराध) पिता होने के नाते क्षमा करना। मैं कपूत यानि निकम्मा पुत्र भी हूँ तो भी आप पिता का कर्तव्य पालन करके क्षमा करना।
▶️ रामभक्त की पत्नी का देहांत हो गया। उस समय उसका पुत्र तीन वर्ष का था। उस व्यक्ति की रिश्तेदारी में एक घटना ऐसी घटी थी जिसने उसको झंझोर कर रख दिया।
कथा इस प्रकार है :-उसके मामा जी अपनी बहन यानि रामभक्त की माता जी से लगभग दस वर्ष बड़े थे। मामा जी के दो पुत्र थे। रामभक्त की मामी जी का देहांत हो गया। मामा जी ने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी पत्नी को पुत्र हुआ। दूसरी पत्नी पहले वाली के पुत्रों से ईर्ष्या करने लगी। यह विचार किया कि 15 एकड़ जमीन है। तीन जगह बँटेगी। उसने उन बच्चों को काँच पीसकर दूध तथा खाने में खिला-पिला दिया जिससे दोनों की धीरे-धीरे रोगी होकर मृत्यु हो गई। डॉक्टर ने बताया कि बच्चे काँच खा गए हैं। जिस कारण से इनकी मृत्यु हो गई है। एक दिन उसकी पत्नी ने पड़ोसन से बताया कि मैंने ऐसे-ऐसे किया। मेरे बेटे को पन्द्रह एकड़ जमीन मिल गई। उस स्त्री ने मेरे मामा जी को बताया। मामा जी छोटी मामी को बहुत प्यार करते थे और उस पर विश्वास करते थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। एक दिन छोटी मामी अपने भाई से बता रही थी कि मैंने ऐसे-ऐसे किया। तेरे भानजे को पन्द्रह एकड़ जमीन मिल गई। यह बात मेरा मामा भी सुन रहा था क्योंकि यह खिड़की से बाहर स्वाभाविक खड़ा था। मामी का भाई बोला कि बहन! तूने जुल्म कर दिया। इस पाप को कहाँ रखेगी? आज के बाद मैं तेरी शक्ल देखने भी नहीं आऊँगा। मामा जी का दिमाग फटने को हो गया। घर त्यागकर अपनी बहन के घर आ गया यानि हमारे (रामभक्त के) घर पर जीवन व्यतीत किया। कुछ वर्ष के पश्चात् छोटी मामी से जन्मा वह पुत्र भी मर गया। वह छोटी मामी किसी के साथ भाग गई। पता चला कि उस व्यक्ति ने उसके गहने छीनकर मारकर कुएं में डाल दिया। पुलिस को पता चला तो उस व्यक्ति को फाँसी लगाई गई। इस सर्वनाश महाभारत को याद करके रामभक्त ने दूसरा विवाह नहीं किया। लड़के को अपने साथ रखता। हल जोतता था तो पुत्र को कंधे पर बैठाकर रखता था। थक जाता तो वृक्ष के नीचे लेटा देता। स्वयं खाना बनाता, स्वयं स्नान कराता, कपड़े साफ करता। जैसे-तैसे लड़का जवान हुआ। विवाह कर दिया। फिर भी सब कार्य करता था। लड़का भी काम में हाथ बँटाता था, परंतु कठिन कार्य स्वयं ही करता था। वृद्धावस्था ने जोर दिया। कार्य कुछ नहीं कर पा रहा था। पुत्रवधु को व्यर्थ का खर्च लगने लगा। जिस कारण से अपने ससुर को रूखा-सूखा बासी भोजन देने लगी। फिर पेटभर भोजन भी नहीं देती थी। लड़का पूछता था कि पिता जी! सेवा ठीक हो रही है। पिता जी कहते कि बेटा! कोई कसर नहीं है। बड़ी भाग्यवान बहू आई है। मेरा विशेष ध्यान रखती है। यह बात बहू भी सुनती। और अधिक परेशान करती कि मेरे पति को पता नहीं है। वृद्ध भी मेरी चाल से अपरिचित है। एक दिन लड़के ने देखा कि पिता जी को भोजन ठीक नहीं मिला तो उसने पत्नी को कहा तो पाखण्ड करने लगी कि घर देखकर खाया जाता है। आपको घर की चिंता नहीं है। सारा घर मेरे से चल रहा है। मुझे पता है कि खर्च कैसे चलाना है। एक दिन वृद्ध को चक्कर आए और गिर गया। टाँग टूट गई। वैद्य ने बताया कि आहार पूरा न मिलने से शारीरिक कमजोरी है। दूध दो समय आधा-आधा सेर (किलो) पिलाओ। ताजा भोजन खिलाओ। वैद्य चला गया। पत्नी ने कहा कि ऐसे तो घर का दिवाला निकल जाएगा। पति यानि लड़के को भी बात पसंद आई। वृद्ध की कोई परवाह नहीं की। वृद्ध के ससुराल वाले चोट लगने की खबर सुनकर मिलने आए। उन्होंने पूछा कि बेटा-बहू ठीक सेवा कर रहे हैं क्या? रामभक्त ने कहा कि पूछो ना। ऐसे पुत्र तथा पुत्रवधू सबको दे भगवान। मेरे को कोई कष्ट नहीं होने देते। यह तो कोई कर्म की मार से चोट लग गई है। उसी गाँव में दो बहनों का विवाह हुआ था। एक का रामभक्त से, दूसरी का पड़ोस में। जब वे अपनी दूसरी लड़की के घर गए तो पता चला कि उस रामभक्त की कोई सेवा नहीं हो रही है। लड़का भी निकम्मा है। यह बात ससुराल वालों के गले नहीं उत्तरी क्योंकि वे रामभक्त के मुख से सुनकर आए थे कि सेवा में कोई कसर नहीं है। वे कुछ समय बाद पुनः रामभक्त के घर गए तो उस समय वह बासी रोटी पानी में भिगो-भिगोकर खा रहा था। यह देखकर उनको रोना आ गया। लड़के को बुलाया तथा कहा कि तेरे को शर्म नहीं आती। पता है तेरे को कैसे पाल-पोषकर बड़ा किया है। लड़के की बहू भी आ गई। दोनों बोले कि हम तो ऐसे ही सेवा करेंगे। रामभक्त बोला कि आप जाओ, घर में झगड़ा ना कराओ। मेरी किस्मत में जो लिखा है, वह मिल रहा है। मैं अपने पुत्र को दुःखी नहीं देख सकता। रामभक्त की बूआ का लड़का रामनिवास सत्संगी था। वह रामभक्त को बहुत कहता था कि आप कुछ समय भगवान की भक्ति किया करो। मेरे साथ संत के सत्संग सुनने चला करो तो रामभक्त कहता था कि मैं तो अपने बेटे की पूजा करूंगा, यह सुखी रहे, यही मेरी तमन्ना है। बूआ के लड़के ने कहा कि बेटे की पूजा पूरी हो चुकी हो तो अब भी बना ले कुछ कर्म। फिर भी यह कहा कि बेटे-बहू को देख-देखकर जी रहा हूँ। बहुत कहने के पश्चात् रामभक्त अपनी बुआ के लड़के रामनिवास के साथ सत्संग में गया। फिर रामनिवास अपने घर ले गया, उसकी दवा कराई। अच्छा खाना खिलाया। कई महीने अपने पास रखा। रामभक्त भक्ति पर पूरा दृढ़ हो गया। घर पर गया तो बच्चों से कहा बेटा-बेटी (पुत्रवधु)! आज तक मैंने आप से कुछ नहीं माँगा। आज एक भीख माँग रहा हूँ। आप मेरे साथ सत्संग में एक बार चलो। उन्होंने कहा कि पीछे से पशुओं तथा बच्चों को कौन संभालेगा? रामभक्त ने कहा कि बेटा घर पर रह जाएगा। बेटी तथा पोता-पोती मेरे साथ चलो। ऐसा ही किया। जब उस पुत्रवधु ने सत्संग के वचन सुने, वहाँ आने वाले सब भक्तों की सेवा पुराने भक्त-भक्तमति ऐसे कर रहे थे जैसे विशेष मेहमानों की घर पर करते हैं। वृद्ध, रोगी, अपंग श्रद्धालुओं की भी विशेष सेवा कर रहे थे। सत्संग में यह बताया जाता है कि जीव पर दया बनाए रखने से परमात्मा प्रसन्न होता है। दुःखियों-असहायों की सहायता करना मानव मात्र का परम कर्तव्य है।
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बहुत से महापुरुष सच्चे नामों के बारे में नहीं जानते। वे मनमुखी नाम देते हैं जिससे न सुख होता है और न ही मुक्ति होती है।
कोई कहता है तप, हवन, यज्ञ आदि करो व कुछ महापुरुष आंख, कान और मुंह बंद करके अन्दर ध्यान लगाने की बात कहते हैं जो कि यह उनकी मनमुखी साधना का प्रतीक है।
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Ishwar TV Satsang ll 13-04-2026 ll Episode : 3088 ll Sant Rampal Ji Maharaj Live Satsang #✝चर्च #🕌मस्जिद 🤲 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏
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❄️ संत रामपाल जी महाराज ने आज के विशेष संदेश में एक महत्वपूर्व बात बताई कि हमने किसी का बुरा नहीं करना। ये नोट कर लो, जिस दिन हमने ये सोच लिया कि इसका नाश करें, इसका बुरा करें, उस दिन हमारा बुरा होना शुरू हो जाएगा।
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🌟 आज के विशेष संदेश में संत रामपाल जी महाराज ने कहा, 'यदि भगवान को पाना है, तो सेवा और परमार्थ करो।'
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💥 आज के विशेष संदेश में संत रामपाल जी महाराज ने कहा, 'हमारा लक्ष्य पूरे संसार को सुखी करना है। हम सब एक भगवान के बच्चे हैं, न कोई जाति अलग है, न कोई धर्म अलग है। अपने कर्म सुधारो, भक्ति करो और सबसे प्यार करो; जहाँ कोई दुखी दिखे हमें बताओ, हम मिलकर साथ देंगे उसका।'
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🎇 आज के विशेष संदेश में संत रामपाल जी महाराज ने कहा कि हमारा कभी किसी से द्वेष नहीं था और न रहेगा। हमारे साथ आज भले ही किसी ने बुरा किया हो लेकिन हमें कोई बुरा नहीं दिखता। क्योंकि मुझे पता है जड़ का कि यह बीमारी कहां से है। यह काल करवा रहा है। सारे बहन भाई अपने ही हैं।
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Sadhna TV Satsang ll 12-04-2026 ll Episode : 3591 ।। Sant Rampal Ji Maharaj Live Satsang
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