
Kamlesh Das
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#sanatandharma #🙏राम राम जी #🙏गुरु महिमा😇
#🙏राम राम जी अनमोल पुस्तक
जीने की राह पढ़िए……………)
📖📖📖📖📖
जीने की राह पार्ट - 30
पृष्ठ: 70-71
(शब्द नं. 2)
नाम सुमरले सुकर्म करले, कौन जाने कल की।। खबर नहीं पल की (टेक)
कोड़ि-2 माया जोड़ी बात करे छल की,
पाप पुण्य की बांधी पोटरिया, कैसे होवे हल्की ।।1।।
मात-पिता परिवार भाई बन्धु, त्रीरिया मतलब की,
चलती बरियाँ कोई ना साथी, या माटी जंगल की।।2।।
तारों बीच चंद्रमा ज्यों झलकै, तेरी महिमा झला झल्की,
बनै कुकरा, विष्टा खावै, अब बात करै बल की।।3।।
ये संसार रैन का सपना, ओस बूंद जल की,
सतनाम बिना सबै साधना गारा दलदल की।।4।।
अन्त समय जब चलै अकेला, आँसू नैन ढलकी,
कह कबीर गह शरण मेरी हो रक्षा जल थल की।।5।।
भावार्थ :- परमात्मा कबीर जी ने बताया है कि हे भोले मानव (स्त्री/पुरुष)! परमात्मा का नाम जाप कर, शुभ कर्म कर। पता नहीं कल यानि भविष्य में क्या दुर्घटना हो जाएगी। एक पल का भी ज्ञान नहीं है।
धन का संग्रह छल-कपट किए बिना होगा ही नहीं जिसमें से कुछ धर्म पा भी खर्च कर देता है। इस प्रकार पाप तथा पुण्य की दो गठरी बाँध ली। ये कैसे हल्की होंगी। पाप नरक में पुण्य स्वर्ग में भोगता है। माता-पिता, भाई-पर्ल आदि-आदि परिजन अपने-अपने मतलब की बातें सोचते हैं। पूर्व जन्मों के कारण परिवार रूप में जुड़े हैं। जिस-जिसका समय पूरा हो जाएगा, संस्कार समाप्त होता जाएगा, वह तुरंत परिवार छोड़कर चला जाएगा। जैसे रेल में डिब्बा भरा होता है जिस-जिसने जहाँ-जहाँ की टिकट ले रखी है, वहाँ-वहाँ उतरकर चले जाते हैं। यह परिवार रेल के डिब्बे की तरह है। मृत्यु के उपरांत यह शरीर मिट्टी हो जाता है। उस समय तेरा कोई परिवार का सदस्य साथी नहीं होगा।
एक व्यक्ति अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था। वृद्ध हुआ तो उसकी मृत्यु निकट थी। उसने अपनी पत्नी से कहा कि आप मेरे साथ चलोगी। वह तुरंत मना कर गई कि "ना मैं ना मरूं तेरे साथ। तेरे तै तीन साल छोटी सूं।" वृद्ध को उन दिन सदमा हो गया। उसने उससे बात करना भी बंद कर दिया। निकट आए मुँह मोड़ ले। बोले कुछ नहीं। 60 वर्ष के साथ में उस वृद्ध को पहली बार अहसार हुआ कि कोई किसी का नहीं है। यदि उस वृद्धा को समझ होती और वास्तविक प्रेम होता तो कहती कि मुझे भी साथ ले चलना। वृद्ध ने क्या साथ ले जाना था। उसका मन खुश हो जाता। आसानी से मर जाता। समय से पूर्व वृद्धा को कौन मारता? इससे सिद्ध है कि वास्तविक प्रेम की बातें दूर की कौड़ी है। सब स्वार्थ कारण जुड़े हैं। हे मानव! पूर्व जन्म के जप-तप तथा धर्म संस्कार से वर्तमान में मंत्री, प्रधानमंत्री या उच्च अधिकारी बनकर ऐसे सुशोभित हो रहा है जैसे रात्रि में तारों के मध्य में चाँद की शोभा होती है। यदि सत्संग विचार नहीं सुने तो आत्मा ज्ञान के बिना परमात्मा की भक्ति न करके भविष्य के जन्म में कुत्ता बनकर बिष्टा (गोबर-टट्टी) खाएगा। अब तू अपने बल यानि शारीरिक शक्ति, पद की ताकत की बातें करता है।फिर पशु बनकर महान कष्ट उठाएगा।
नर से फिर पशुवा कीजै, गधा-बैल बनाई।
छप्पन भोग कहाँ मन बोरे, कुरड़ी चरने जाई ।।
*शब्दार्थ :- जो मनुष्य (स्त्री/पुरुष) सत्य भक्ति शास्त्र अनुसार गुरू से दीक्षा लेकर नहीं करता। वह मृत्यु के पश्चात् पशु जीवन प्राप्त करता है। वह गधे या बैल के शरीर प्राप्त करता है। मानव शरीर में स्वादिष्ट भोजन खाता था। गधा बनने के पश्चात् अच्छा खाना नहीं मिलता। गधे का शरीर धारण करके जंगल में कुड़े के ढ़ेर से गंदा भोजन व घास खाता है। इसलिए भक्ति करो।
हे मानव ! संसार में तेरा जीवन ऐसे है जैसे सुबह ओस के जल की बूँदें घास पर चमक रही होती हैं जो कुछ समय में समाप्त हो जाती हैं। इसलिए पूर्ण सतगुरू से सतनाम यानि सच्चे नाम जाप मंत्र लेकर भक्ति करके जीव का कल्याण करा ले। सच्चे शास्त्रानुकूल भक्ति मंत्र के अतिरिक्त सब शास्त्रविरूद्ध साधना तो दलदल की गारा के समान है। निकालने की बजाय दुगना फँसाती है। वह साधना परमेश्वर कबीर जी के पास थी तथा कुछ संतों को भी परमेश्वर कबीर जी ने बताई थी, परंतु उनको अन्य को बताने को मना किया था। वर्तमान में (सन् 1997 से) मुझ दास (रामपाल) के पास है। मेरे अतिरिक्त वर्तमान में किसी भी संत व गुरू के पास शास्त्र प्रमाणित भक्ति मंत्र नहीं हैं। आओ दीक्षा लो और अपना तथा अपने परिवार का जीवन सफल बनाओ। यदि आप जी ने मेरे (रामपाल के) अतिरिक्त किसी अन्य पंथ के संत या गुरू से दीक्षा ले ली तो वही बात होगी कि आसमान से गिरे और खजूर में अटके। घर के रहोगे ना घाट के। मैं (लेखक) पहले गाँव-गाँव में सत्संग करता था। मेरा सत्संग सुनते जो आत्मा को हिलाकर रख देता है। मेरे से नाम दीक्षा नहीं लेते, अन्य संतों से दीक्षा लेते थे। वहाँ से कोई लाभ नहीं हुआ। कई वर्ष भटक कर मेरे से दीक्षा ली तो सुखी हुए।
उपरोक्त सत्संग वचनों से निष्कर्ष निकलता है कि यदि सत्संग के विचार सुनने को मिल जाएँ तो घर स्वर्ग बन जाता है। उसके बिना नरक-सा जीवन जीना पड़ता है। इस प्रकार विश्व उद्धार संभव है। सब प्रेम-प्यार से जीवन यापन करके मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। यह अति अनिवार्य है।
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आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।
https://online.jagatgururampalji.org/naam-diksha-inquiry
अनमोल पुस्तक
जीने की राह पढ़िए……………)
📖📖📖📖📖
जीने की राह पार्ट - 29
पृष्ठ: 68-70
निष्कर्ष : परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि :-
मन नेकी कर ले, दो दिन का मेहमान।। टेक ।।
मात-पिता तेरा कुटम कबीला, कोए दिन का रल मिल का मेला।
अन्त समय उठ चले अकेला, तज माया मण्डान ।।1
कहाँ से आया, कहाँ जाएगा, तन छूटै तब कहाँ समाएगा।
आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरू बिन आत्म ज्ञान।।2
कौन तुम्हारा सच्चा सांई, झूठी है ये सकल सगाई ।
चलने से पहले सोच रे भाई, कहाँ करेगा विश्राम । ।3
रहट माल पनघट ज्यों भरिता, आवत जात भरै करै रीता ।
जुगन- जुगन तू मरता जीता, करवा ले रे कल्याण ।।4
लख-चौरासी की सह त्रासा, ऊँच-नीच घर लेता बासा ।
कह कबीर सब मिटाऊँ रासा, कर मेरी पहचान । 5 ।
भावार्थ : परमेश्वर कबीर जी ने अपने मन को सम्बोधित करके हम प्राणियों को सतर्क किया है कि इस संसार में दो दिन का यानि थोड़े समय का मेहमान है। इस थोड़े-से मानव जीवन में आत्म ज्ञान के अभाव से अनेकों पाप इकट्ठे करके अनमोल मानव जीवन नष्ट कर जाता है। धन कमाने की विधि तो संसार के व्यकि बता सकते हैं, परंतु गुरूदेव जी के बिना आत्म ज्ञान यानि जीव कहाँ से आया? मनुष्य जीव का मूल उद्देश्य क्या है? सतगुरू धारण किए बिना यानि दीक्षा लिए बिना जीव का मानव जन्म नष्ट हो जाता है। यह बात गुरू जी के बिना कोई नहीं बताएगा। चाहे पृथ्वी का राजा भी बन जा, परंतु भविष्य में पशु जन्म मिलेगा। जन्म-मरण का चक्र गुरू जी के ज्ञान व दीक्षा मंत्र (नाम) बिना समाप्त नहीं हो सकता। जब तक जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता तो बताया है कि :-
यह जीवन हरहट का कुँआ लोई। या गल बन्धा है सब कोई ।।
कीड़ी-कुंजर और अवतारा। हरहट डोर बन्धे कई बारा।।
भावार्थ :- जैसे रहट के कँए में लोहे की चक्री लगी होती है। उसके ऊपर बाल्टियों की चैन वैल्ड की जाती है। उसको रहट कहा जाता था। पहले बैल या ऊँट से चलाते थे, जैसे कोल्हू बैल-ऊँट से चलाते हैं। (पहले अधिक चलाते थे) रहट की बाल्टियाँ नीचे कँए से पानी भरकर लाती है। ऊपर खाली हो जाती है। यह चक्र सदा चलता रहता है। इसी प्रकार पृथ्वी रूपी कँए से पाप तथा पुण्यों की बाल्टी भरी ऊपर स्वर्ग-नरक में खाली की। इस प्रकार जन्म-मरण के चक्र में जीव सदा रहता है। ऊपर के शब्द में यही समझाया है कि संसार में परिवार-धन सब त्यागकर एक दिन अकेला चला जाएगा। फिर कहीं अन्य स्थान पर जन्म लेकर यही क्रिया करके चला जाएगा। यदि आप घर से किसी अन्य शहर में जाते हैं तो जाने से पहले निश्चित करते हो कि वहाँ जाऐंगे। उसके बाद कहाँ विश्राम करेंगे। परंतु संसार छोड़कर जाते हो तो कभी विचार नहीं करते कि कहाँ विश्राम करोगे। हे जीव! चौरासी लाख प्रकार के प्राणियों के शरीरों में प्रताड़ना सहन करता है। मरता-जीता (नये प्राणी का जीवन प्राप्त करता) है। कभी राजा बनकर उच्च बन जाता है, कभी कंगाल बनकर नीच कहलाता है। परमात्मा कबीर जी समझा रहे हैं कि अवतार गण (राम, कृष्ण आदि-आदि) भी सत्य साधना न मिलने के कारण जन्म-मरण के चक्र में पड़े हैं। सत्य साधना मेरे पास है। हे प्राणी! तू मेरे को पहचान, मैं समर्थ परमात्मा हूँ। मैं तेरा जन्म-मरण का सर्व झंझट समाप्त कर दूँगा।
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थारी रजा में रंग जाऊं - Sant Rampal Ji Maharaj | Sat Kabir Ki Daya #🙏राम राम जी
विश्व में नाम होगा आपके गुरु जी का....
*- संत रामपाल जी महाराज* #🙏राम राम जी





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