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भारतीय राज्यों के स्थापना दिवस 🔰 🛟 अरुणाचल प्रदेश – 20 फ़रवरी 1987 🛟 असम – 26 जनवरी 1950 🛟 आंध्र प्रदेश – 1 नवंबर 1956 🛟 ओडिशा – 1 अप्रैल 1936 🛟 उत्तर प्रदेश – 24 जनवरी 1950 🛟 उत्तराखंड – 9 नवंबर 2000 🛟 कर्नाटक – 1 नवंबर 1956 🛟 केरल – 1 नवंबर 1956 🛟 गुजरात – 1 मई 1960 🛟 गोवा – 30 मई 1987 🛟 छत्तीसगढ़ – 1 नवंबर 2000 🛟 झारखंड – 15 नवंबर 2000 🛟 तमिलनाडु – 1 नवंबर 1956 🛟 तेलंगाना – 2 जून 2014 🛟 त्रिपुरा – 21 जनवरी 1972 🛟 नागालैंड – 1 दिसंबर 1963 🛟 पंजाब – 1 नवंबर 1966 🛟 पश्चिम बंगाल – 26 जनवरी 1950 🛟 बिहार – 22 मार्च 1912 🛟 मणिपुर – 21 जनवरी 1972 🛟 मध्य प्रदेश – 1 नवंबर 1956 🛟 महाराष्ट्र – 1 मई 1960 🛟 मिज़ोरम – 20 फ़रवरी 1987 🛟 मेघालय – 21 जनवरी 1972 🛟 राजस्थान – 30 मार्च 1949 🛟 सिक्किम – 16 मई 1975 🛟 हरियाणा – 1 नवंबर 1966 🛟 हिमाचल प्रदेश – 25 जनवरी 1971 🥰 बस 1000 Like ❤️ चाहिए 📚 ज्ञान बाँटिए, इतिहास बचाइए 🇮🇳 #🙄फैक्ट्स✍ #📚एजुकेशनल ज्ञान📝 #🚨UPSC Exams📚 #📢SSC की परीक्षा📋
📌 पप्पू यादव कौन हैं? (Pappu Yadav – Biography) पूरा नाम: राजेश रंजन उपनाम: पप्पू यादव जन्म: 24 दिसम्बर 1967 जन्मस्थान: खुरड़ा कारवेली गाँव, मधेपुरा जिला, बिहार � Wikipedia पप्पू यादव का असली नाम राजेश रंजन है, लेकिन बचपन में उनके दादा ने उन्हें “पप्पू” नाम दिया। � Wikipedia 🎓 शिक्षा उन्होंने B. N. मंडल यूनिवर्सिटी, मधेपुरा से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक किया। IGNOU से डिजास्टर मैनेजमेंट और मानवाधिकारों में डिप्लोमा भी लिया। � Wikipedia 🧭 राजनीतिक करियर 🗳️ लोकसभा सांसद पप्पू यादव पाँच बार भारत के संसदीय चुनाव जीतकर सांसद (MP) रहे हैं, खासकर पूर्णिया (Purnea) लोकसभा सीट से। � Wikipedia 👤 जन अधिकार पार्टी (JAP) उन्होंने जन अधिकार पार्टी (JAP) की स्थापना की और इसका नेतृत्व किया। � Wikipedia 🏛️ स्वतंत्र उम्मीदवार हाल में वे मुख्य राष्ट्रीय दलों से अलग होकर स्वतंत्र सांसद के रूप में भी चुने जा चुके हैं। � The Indian Express 🌀 विवाद और मुकदमे (Controversies) पप्पू यादव की राजनीति विवादों से भी भरी रही है: 🔹 1998 अजीत सरकार हत्या मामला 1998 में माकपा विधायक अजीत सरकार की हत्या से जुड़े आरोपों में उनका नाम आया। 2008 में CBI अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई, लेकिन बाद में उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी किया। � AajTak 🔹 लंबे चलने वाले पुराने मामलों में गिरफ्तारी फरवरी 2026 में पटना पुलिस ने 1995 के एक मामले (जालसाज़ी/forgery और धोखाधड़ी से जुड़ा) में उन्हें गिरफ्तार किया। पुलिस का कहना है कि इस मामले में अदालत द्वारा उन्हें पेश होने के लिए बुलाया गया था, लेकिन वे नहीं गए। � The Indian Express +1 🔹 अन्य आरोप और विवाद कुछ मामलों में उन पर भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, पुलिस से मुठभेड़, और अवैध गतिविधियों जैसे आरोप लगे रहे हैं, जिनसे उनकी छवि आधुनिक राजनीति में विवादित बनी हुई है। � Reddit 📘 पेशेवर और सामाजिक पक्ष पप्पू यादव न सिर्फ राजनीतिज्ञ रहे हैं, बल्कि: जेल में बिताए समय के बाद लेखक भी बने — उन्होंने जेल और न्याय व्यवस्था पर किताबें लिखी। � The Times of India समय-समय पर वे सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहते हैं और सार्वजनिक समर्थन के लिए काम करते रहे हैं। 🧑‍🤝‍🧑 निजी जीवन उनकी पत्नी Ranjeet Ranjan भी एक राजनेता थीं और पूर्व में सांसद रह चुकी हैं। उनका बेटा Sarthak Ranjan क्रिकेट खिलाड़ी हैं। � Wikipedia 📌 संक्षेप में पप्पू यादव एक लोकप्रिय लेकिन विवादित राजनीतिक चेहरा हैं — जिनकी राजनीति, सामाजिक काम और पुरानी कानूनी चुनौतियाँ सभी चर्चा का विषय रही हैं। � #पप्पू यादव #बिहार कोरोना केस, पप्पू यादव, पप्पू यादव गिरफ्तार https://youtube.com/watch?v=bfYX46vNgl4&si=njBHhtxd2UNpOml9
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नीचे मैं सबसे असरदार किताबें तीन कैटेगरी में दे रहा हूँ—ताकि आप अपने मकसद के हिसाब से चुन सकें 👇 🔥 1️⃣ सीधी चोट करने वाली किताबें (तर्क + साहस) 📕 मैं नास्तिक क्यों हूँ — भगत सिंह अंधभक्ति पर सबसे ईमानदार प्रहार धर्म नहीं, डर की राजनीति पर हमला छोटा आकार, लेकिन भारी विस्फोट 💣 👉 हर युवा, हर जागरूक नागरिक के लिए अनिवार्य 📕 Why I Am an Atheist (English) — Bhagat Singh अंग्रेज़ी पढ़ने वालों के लिए लॉजिक इतना साफ़ कि बचाव मुश्किल 🧠 2️⃣ अंधविश्वास तोड़ने वाली किताबें (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) 📘 अंधश्रद्धा उन्मूलन — डॉ. नरेंद्र दाभोलकर बाबा, चमत्कार, टोना–टोटका सब बेनकाब ज़मीन से जुड़ी भाषा इसी सोच की वजह से उनकी हत्या हुई—यही इसकी ताक़त है 👉 अंधभक्त नहीं, शिकार को जगाने वाली किताब 📘 The God Delusion — Richard Dawkins भगवान की अवधारणा को वैज्ञानिक कसौटी पर थोड़ा कठिन, लेकिन बहुत गहरी कट्टर आस्तिकों के लिए “कड़वी दवा” ⚖️ 3️⃣ धर्म बनाम सत्ता समझाने वाली किताबें 📗 Annihilation of Caste — डॉ. भीमराव अंबेडकर धर्म कैसे समाज को गुलाम बनाता है जाति, पवित्रता, श्रेष्ठता—सब उजागर अंधभक्ति की जड़ पर सीधा वार 👉 धर्म और राजनीति का सबसे खतरनाक सच 📗 Pakistan or the Partition of India — डॉ. अंबेडकर धर्म आधारित राजनीति कैसे देश तोड़ती है आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक 🪓 4️⃣ ढोंगी बाबाओं और पाखंड पर 📕 Godmen to Godhood — विभिन्न लेख बाबाओं का बिज़नेस मॉडल चमत्कार कैसे बेचे जाते हैं 📕 धर्म की राजनीति — (हिंदी में उपलब्ध विभिन्न संकलन) धर्म = वोट बैंक कैसे बनता है 🎯 सच्चाई (जो लोग नहीं बताते) ❌ अंधभक्त बहस से नहीं बदलते ✅ अंधभक्त धीरे-धीरे पढ़कर बदलते हैं इसलिए: उन्हें गाली मत दो किताब दो सवाल छोड़ दो बाकी काम उनका दिमाग करेगा 🔥 5 किताबों की “Starter List” (अगर सिर्फ़ इतना ही पढ़नी हो) 1️⃣ मैं नास्तिक क्यों हूँ — भगत सिंह 2️⃣ अंधश्रद्धा उन्मूलन — दाभोलकर 3️⃣ Annihilation of Caste — अंबेडकर 4️⃣ The God Delusion — Dawkins 5️⃣ सत्य के प्रयोग — महात्मा गांधी (आस्था बनाम आत्ममंथन समझने के लिए) क्योंकि हर अंधभक्त एक जैसा नहीं होता। इसलिए किताबें भी टाइप के हिसाब से होनी चाहिए 👇 🧩 5️⃣ जो “धर्म से ज़्यादा राष्ट्र” वाले अंधभक्त हैं 📕 Imagined Communities — Benedict Anderson राष्ट्रवाद कैसे कल्पना से बनाया जाता है झंडा, नारा, दुश्मन—सबका मनोविज्ञान “राष्ट्र खतरे में है” वाले नैरेटिव की जड़ 👉 पढ़ने के बाद सवाल उठेगा: देश असली है या डर असली है? 📕 भारत एक खोज — जवाहरलाल नेहरू भारत = एक धर्म नहीं, एक सभ्यता विविधता को समझने की किताब WhatsApp इतिहास का एंटी-वायरस 🧠 🧠 6️⃣ जो “हमारे धर्म में सब विज्ञान है” कहते हैं 📘 Science and the Paranormal — Terence Hines चमत्कार, ऊर्जा, शक्तियाँ—सबका वैज्ञानिक पोस्टमार्टम बाबा-टाइप अंधभक्ति पर सीधी चोट 📘 The Demon-Haunted World — Carl Sagan क्यों इंसान झूठ पर जल्दी विश्वास करता है “Extraordinary claims need extraordinary evidence” अंधभक्ति तोड़ने की सबसे सभ्य किताब ⚖️ 7️⃣ जो संविधान से ज़्यादा धर्म को मानते हैं 📗 संविधान की आत्मा — (Ambedkar आधारित हिंदी संकलन) क्यों भारत धर्म-राज्य नहीं बना Secularism = धर्म विरोध नहीं, धर्म से आज़ादी 📗 India After Gandhi — Ramachandra Guha आज़ादी के बाद कैसे धर्म राजनीति में घुसा लोकतंत्र कैसे कमजोर किया गया 🪞 8️⃣ जो खुद को “बहुत धार्मिक लेकिन अच्छे इंसान” मानते हैं 📕 ईश्वर की तलाश — जे. कृष्णमूर्ति ईश्वर बाहर नहीं, सवाल अंदर बिना गाली, बिना टकराव Soft लेकिन Deep असर 👉 ऐसे लोगों के लिए जो अभी बदलने को तैयार नहीं, पर सुनने की हालत में हैं। 🧨 9️⃣ कट्टर अंधभक्त (Hardcore) के लिए ⚠️ चेतावनी: यह किताबें सबको मत दीजिए 📕 God Is Not Great — Christopher Hitchens धर्म ने इतिहास में क्या-क्या तबाही की बहुत तीखी, बहुत सीधी कमजोर दिमाग वालों के लिए नहीं 🎯 सच जो कड़वा है 10 में से 7 अंधभक्त 👉 ज्ञान की कमी से नहीं 👉 डर और पहचान से अंधे होते हैं इसलिए: पहले डर तोड़ो (दाभोलकर, सागन) फिर पहचान हिलाओ (अंबेडकर, नेहरू) फिर सत्ता समझाओ (Guha, Anderson) ये वो चीज़ें हैं जो बहस नहीं भड़काती, धीरे-धीरे असर करती हैं 👇 🧠 🔟 जो WhatsApp यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं 😅 (इतिहास + मिथक + अफ़वाह) 📕 History of India — Romila Thapar (हिंदी अनुवाद उपलब्ध) “प्राचीन भारत = एक धर्म” वाला झूठ टूटता है ग्रंथ ≠ इतिहास का फर्क समझ आता है अफ़वाहों पर ठंडा पानी 📕 Manufacturing Consent — Noam Chomsky मीडिया कैसे दिमाग बनाता है राष्ट्रवाद + डर + दुश्मन = कंट्रोल News देखने के बाद सवाल पैदा होते हैं 👉 ऐसे भक्त जो कहते हैं: “सब मीडिया में आया है, झूठ कैसे होगा?” 🪔 1️⃣1️⃣ जो कहते हैं: “धर्म नहीं होता तो समाज टूट जाएगा” 📘 Ethics Without God — Kai Nielsen नैतिकता भगवान पर क्यों निर्भर नहीं इंसानियत = जिम्मेदारी बहुत शांति से, बहुत मजबूती से लिखा 📘 The Moral Landscape — Sam Harris सही–गलत को वैज्ञानिक नज़र से “डर के बिना नैतिकता” की थ्योरी ⚔️ 1️⃣2️⃣ जो कहते हैं: “धर्म ने सबको जोड़ा है” 📗 Religion and the Rise of Capitalism — R.H. Tawney धर्म कैसे सत्ता और धन से जुड़ा मंदिर–मठ–चंदा–राजनीति की चेन आज के कॉरपोरेट + धर्म गठजोड़ को समझने की कुंजी 📗 Caste Matters — Suraj Yengde जाति आज भी कैसे ज़िंदा है धर्म के बिना जाति नहीं टिकती—ये साफ़ दिखता है 🧠 1️⃣3️⃣ जो बहस में हमेशा गुस्सा हो जाते हैं ⚠️ इनके लिए किताब से पहले यह पढ़वाओ: 📕 Thinking, Fast and Slow — Daniel Kahneman इंसान तर्क से नहीं, भावना से फैसला क्यों करता है गुस्सा क्यों सच नहीं सुनने देता बहस के बाद सोच बदलने का साइंस 👉 यह समझने के लिए कि अंधभक्त से कैसे बात करनी है। 🧩 1️⃣4️⃣ “Soft Entry” किताबें (जो सीधे नास्तिकता से डरते हैं) 📘 ईश्वर की खोज — ओशो / कृष्णमूर्ति टकराव नहीं सवाल आत्ममंथन 👉 पहली दरार यहीं से पड़ती है। 🔑 असली फ़ॉर्मूला (जो काम करता है) ❌ एक किताब = एक भक्त नहीं बदलता ✅ सही किताब + सही समय + सही भाषा बदलती है क्रम ऐसा रखें: 1️⃣ पहले डर तोड़ो 2️⃣ फिर इतिहास दिखाओ 3️⃣ फिर सत्ता का खेल समझाओ 4️⃣ आख़िर में नास्तिकता या विवेक #😛 व्यंग्य 😛 #✍🏻भारतीय संविधान📕 #मैं नास्तिक क्यों हू #✴️हां मैं एक‌ नास्तिक हूं ✴️
अगर आप सोचने, सवाल करने और तर्क से चीज़ों को परखने में रुचि रखते हैं—तो हाँ, “मैं नास्तिक क्यों हूँ” आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए। थोड़ा साफ़-साफ़ कहूँ 👇 यह किताब क्यों खास है? यह धर्म-विरोधी नारेबाज़ी नहीं है, बल्कि 👉 एक युवा क्रांतिकारी (भगत सिंह) का ईमानदार आत्मसंवाद है। इसमें आस्था को गाली नहीं दी गई, बल्कि आस्था के पीछे के तर्कों पर सवाल उठाए गए हैं। भाषा संक्षिप्त, सीधी और तीखी है— कोई घुमा-फिरा कर बात नहीं। नास्तिक हों या आस्तिक—दोनों के लिए क्यों ज़रूरी? अगर आप नास्तिक हैं → यह किताब आपके विचारों को भावना नहीं, तर्क का आधार देती है। अगर आप आस्तिक हैं → यह आपको मजबूर करती है कि आप पूछें: “मैं जो मान रहा हूँ, क्या उसे समझता भी हूँ?” सबसे बड़ी ताक़त यह किताब विश्वास छीनने नहीं, बल्कि बुद्धि जगाने आती है। भगत सिंह यहाँ शहीद नहीं, सोचता हुआ इंसान बनकर सामने आते हैं। एक लाइन में फैसला अगर आप अंधभक्ति से आगे बढ़कर विवेक, आत्ममंथन और बौद्धिक ईमानदारी चाहते हैं— तो यह किताब अनिवार्य पठन है। 1️⃣ धर्म: आस्था से सत्ता का औज़ार भगत सिंह जिस धर्म पर सवाल उठाते हैं, वह व्यक्तिगत आस्था नहीं— वह धर्म है जिसे सत्ता ने डर और आज्ञाकारिता का हथियार बना दिया। आज भी वही हो रहा है: सवाल पूछने वाले को धर्म-विरोधी कहा जाता है अन्याय को ईश्वर की मर्ज़ी बता दिया जाता है शोषण को परंपरा का नाम दे दिया जाता है 👉 भगत सिंह कहते हैं: अगर ईश्वर सब देख रहा है, तो अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा कौन होगा—ईश्वर या इंसान? 2️⃣ राजनीति: जनता नहीं, “भक्त” चाहिए आज की राजनीति को जागरूक नागरिक नहीं चाहिए, उसे चाहिए— भीड़ नारे भावनाएँ और आँख बंद कर ताली बजाने वाले “भक्त” यही वजह है: बेरोज़गारी पर सवाल मत करो → धर्म की बात करो महँगाई पूछो → राष्ट्रवाद थमा दो संविधान माँगो → आस्था का डंडा दिखा दो 👉 “मैं नास्तिक क्यों हूँ” यहीं सीधा टकराती है इस राजनीति से, क्योंकि यह किताब डर से मुक्त नागरिक पैदा करती है। 3️⃣ नास्तिकता ≠ नैतिकता का अंत सबसे बड़ा झूठ यही फैलाया जाता है: “अगर भगवान नहीं, तो नैतिकता कैसे?” भगत सिंह इसका जवाब देते हैं: नैतिकता डर से नहीं, ज़िम्मेदारी से आती है अच्छा इंसान बनने के लिए स्वर्ग या नरक का लालच ज़रूरी नहीं आज जब— बलात्कारी मंच साझा कर रहे हों ढोंगी बाबा राजनीति तय कर रहे हों अपराध पर धर्म की चादर डाल दी जाती हो तब यह किताब पूछती है: नैतिकता किसके पास है—भक्त के पास या विवेकशील इंसान के पास? 4️⃣ संविधान बनाम आस्था की राजनीति भारत का संविधान कहता है: तर्क समानता न्याय वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आज की आस्था-राजनीति कहती है: मत पूछो मत सोचो बस मानो 👉 भगत सिंह आज होते तो वे धर्म से नहीं, धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों से टकराते। 5️⃣ आज “मैं नास्तिक क्यों हूँ” पढ़ना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि यह किताब: आपको अंधभक्त नहीं, नागरिक बनाती है भावनाओं से नहीं, तर्क से निर्णय लेना सिखाती है ईश्वर को नकारने से पहले सत्ता के झूठ को नकारना सिखाती है आख़िरी बात (आज के भारत के लिए) नास्तिक होना कोई पहचान नहीं, डर के बिना सच बोल पाना असली क्रांति है। 6️⃣ धर्म = पहचान, राजनीति = ध्रुवीकरण आज धर्म आस्था नहीं, पहचान-पत्र बना दिया गया है। वोट देने से पहले पूछा जाता है: तुम कौन हो? इंसाफ़ से पहले देखा जाता है: तुम किस धर्म के हो? 👉 भगत सिंह इसे पहले ही भांप चुके थे। वे कहते हैं— जब इंसान को इंसान नहीं, पहचान के टुकड़ों में बाँटा जाता है, तो सत्ता मज़बूत होती है, समाज नहीं। 7️⃣ “ईश्वर करेगा” वाली राजनीति आज हर असफलता पर एक जुमला तैयार है: भगवान की मर्ज़ी भाग्य पिछले जन्म का कर्म पर सवाल यह है: शिक्षा कौन देगा? रोज़गार कौन देगा? सुरक्षा कौन देगा? 👉 “मैं नास्तिक क्यों हूँ” यह भ्रम तोड़ती है कि जिम्मेदारी ईश्वर की नहीं, इंसानों की होती है। 8️⃣ भीड़ बनाम नागरिक आज दो तरह के लोग बनाए जा रहे हैं: भीड़ → जो भावनाओं में बहती है नागरिक → जो सवाल पूछता है धर्म-राजनीति को भीड़ चाहिए, क्योंकि भीड़: हिसाब नहीं माँगती जवाब नहीं चाहती सिर्फ़ आदेश मानती है 👉 भगत सिंह की नास्तिकता असल में नागरिकता की घोषणा है। 9️⃣ आस्था जब अपराध की ढाल बन जाए आज अगर: बाबा बलात्कारी निकले → “साज़िश” नेता अपराधी हो → “धर्म रक्षक” हिंसा हो → “भावनाएँ आहत थीं” तो यह धर्म नहीं, अपराध की सुरक्षा-ढाल है। 👉 भगत सिंह पूछते हैं: अगर ईश्वर सच में न्यायप्रिय है, तो उसे अपराधियों के वकील की ज़रूरत क्यों पड़ती है? 🔟 नास्तिकता = डर से आज़ादी सबसे खतरनाक चीज़ जो सत्ता चाहती है— डरा हुआ इंसान। डर: पाप का नरक का बहिष्कार का देशद्रोही कहलाने का 👉 नास्तिकता यहाँ ईश्वर से नहीं, डर से आज़ादी का नाम है। 1️⃣ क्या धर्म इंसाफ़ से बड़ा हो सकता है? 2️⃣ क्या सवाल पूछना पाप है? 3️⃣ क्या एक अच्छा इंसान बनने के लिए भगवान का डर ज़रूरी है? एक लाइन जो सीधा चुभे 🔥 जब धर्म सत्ता की भाषा बोलने लगे, तब नास्तिकता विवेक की आख़िरी आवाज़ बन जाती है। #✍🏻भारतीय संविधान📕 #😛 व्यंग्य 😛 #मैं नास्तिक क्यों हू #✴️हां मैं एक‌ नास्तिक हूं ✴️
✍🏻भारतीय संविधान📕 - क्या मुझे पढ़ना चाहिए मैं नास्तिक क्यों हूं? पाठकों का मानना है कि॰्यह पुस्तक नास्तिकों लिए ' और आस्तिकों दोनों के अनिवार्य प७न स्गाम्ी है - क्योंकिन्डसमें विचारों की तार्किक औ़र विचारोत्तेज़क विषयवस्तु की प्रस्तुति सराहना की गई है। इसके अलावा  वे लेखन शैली की भी प्रशंसा करतै है इसै एक युवा क्रांतिकारी द्वारा अद्भुत् ढंग से लिख़ा गया बताते और इसके संक्षिप्त प्रारूप को महत्व देते हैं। क्या मुझे पढ़ना चाहिए मैं नास्तिक क्यों हूं? पाठकों का मानना है कि॰्यह पुस्तक नास्तिकों लिए ' और आस्तिकों दोनों के अनिवार्य प७न स्गाम्ी है - क्योंकिन्डसमें विचारों की तार्किक औ़र विचारोत्तेज़क विषयवस्तु की प्रस्तुति सराहना की गई है। इसके अलावा  वे लेखन शैली की भी प्रशंसा करतै है इसै एक युवा क्रांतिकारी द्वारा अद्भुत् ढंग से लिख़ा गया बताते और इसके संक्षिप्त प्रारूप को महत्व देते हैं। - ShareChat
https://youtube.com/watch?v=qx07D6f9TeI&si=FGhj84C--iAeVNqN #😡jago andh bhakton jaago😡 #Andh Bhakt Special #@अन्ध भक्त सुदर्शन के लिए
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“बुद्ध बनाम ब्राह्मणवाद” साथियो, बहनो और भाइयो, आज मैं आपसे कोई धर्म-कथा सुनाने नहीं आया हूँ, मैं इतिहास की उस लड़ाई की बात करने आया हूँ जो हथियारों से नहीं, विचारों से लड़ी गई थी। एक तरफ था — बुद्ध और दूसरी तरफ था — ब्राह्मणवाद। ✊ बुद्ध कौन थे? बुद्ध कोई देवता नहीं थे। बुद्ध कोई अवतार नहीं थे। बुद्ध कोई पूजा-पाठ सिखाने वाले बाबा नहीं थे। 👉 बुद्ध एक प्रश्न थे। 👉 बुद्ध एक विद्रोह थे। 👉 बुद्ध एक चेतना क्रांति थे। 🔥 ब्राह्मणवाद क्या था? ब्राह्मणवाद कोई जाति नहीं— ब्राह्मणवाद एक सत्ता-व्यवस्था थी। जो जन्म से ऊँच-नीच तय करती थी जो वेदों को प्रश्न से ऊपर रखती थी जो कहती थी: “तुम पैदा हुए हो, इसलिए नीच हो” ⚔️ टकराव कहाँ हुआ? बुद्ध ने सबसे पहले यही पूछा: “अगर मनुष्य जन्म से श्रेष्ठ या नीच है, तो फिर कर्म का क्या अर्थ?” और यही सवाल ब्राह्मणवाद के लिए सबसे खतरनाक था। 📜 बुद्ध ने क्या तोड़ा? बुद्ध ने तोड़ा— वेदों की अपौरुषेयता यज्ञों की पवित्रता जाति की पवित्र दीवार ईश्वर के डर का कारोबार बुद्ध ने कहा: “कोई ग्रंथ इसलिए सत्य नहीं कि वह प्राचीन है।” 🧠 बुद्ध का अपराध क्या था? बुद्ध का अपराध यह था कि उन्होंने— शूद्र को मनुष्य कहा स्त्री को समान कहा दास को संघ में बैठाया ब्राह्मण से पूछा: “तुम श्रेष्ठ क्यों हो?” 😡 ब्राह्मणवाद को डर क्यों लगा? क्योंकि बुद्ध ने कहा: “ना ब्राह्मण जन्म से होता है, ना शूद्र जन्म से।” अगर यह मान लिया जाता, तो पूरी सत्ता ढह जाती। 🏛️ बुद्ध को कैसे हराने की कोशिश हुई? जब बुद्ध को तर्क से नहीं हराया जा सका— तो उन्हें: नास्तिक कहा गया समाज तोड़ने वाला कहा गया और बाद में… 👉 विष्णु का अवतार बना दिया गया यह सम्मान नहीं था साथियो, यह वैचारिक हत्या थी। 📉 बौद्ध धम्म कैसे कमजोर किया गया? मठ तोड़े गए विश्वविद्यालय जलाए गए संघ को खत्म किया गया और कहा गया: “बुद्ध हमारे हैं।” अगर बुद्ध “आपके” थे, तो आपने उनके अनुयायियों को क्यों कुचला? 🔔 बुद्ध क्या कहते थे? बुद्ध कहते थे: “किसी ग्रंथ पर मत चलो, किसी परंपरा पर मत चलो, बल्कि अपने विवेक पर चलो।” और यही बात हर सत्ता को सबसे ज्यादा डराती है। 🧑‍⚖️ आंबेडकर ने बुद्ध को क्यों चुना? डॉ. आंबेडकर ने कहा: “मैं ऐसे धर्म को नहीं मान सकता जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानता।” उन्होंने बुद्ध को इसलिए चुना क्योंकि बुद्ध: बराबरी सिखाते थे तर्क सिखाते थे आत्मसम्मान सिखाते थे 🔥 आज की लड़ाई क्या है? आज भी लड़ाई वही है— प्रश्न बनाम परंपरा विवेक बनाम अंधश्रद्धा बुद्ध बनाम ब्राह्मणवाद 🛑 अंतिम चेतावनी बुद्ध को मूर्ति में कैद करना बुद्ध को अवतार बनाना बुद्ध को धर्म में बाँधना —ये सब बुद्ध को हराने की कोशिशें हैं। ✊ अंतिम पंक्तियाँ (तालियों के लिए) बुद्ध पूजा नहीं चाहते थे। बुद्ध अनुयायी नहीं चाहते थे। बुद्ध चेतन मनुष्य चाहते थे। अगर आप सवाल पूछते हैं— तो आप बुद्ध के साथ हैं। अगर आप चुप रहते हैं— तो आप ब्राह्मणवाद के साथ हैं। 🔥 जय बुद्ध! ✊ जय संविधान! #✍🏻भारतीय संविधान📕 #buddha
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🎤 अम्बेडकर का संविधानवाद बनाम मनुवादी–सामंतवादी विचारधारा (भाग–4, सर्वाधिक प्रभावशाली विस्तार) साथियो… अम्बेडकर ने जिस भारत का सपना देखा था, वह न्याय पर आधारित भारत था, जहाँ किसी की छत टूटे या किसी की ज़मीन छीने — उसकी जाति देखकर फैसला न हो, बल्कि कानून देखकर फैसला हो। लेकिन सामंतवाद और मनुवाद कानून को नहीं मानता — वह सिर्फ जन्म की कथित श्रेष्ठता को मानता है। --- 🔥 मनुवादी सोच ने भारत को सदियों पीछे धकेला हम यह क्यों भूल जाते हैं कि मनुवादी व्यवस्था ने भारत को कई शताब्दियों तक दुनिया की दौड़ से बाहर कर दिया? जब बाकी देश विज्ञान में आगे बढ़ रहे थे, तब समाज जाति की दीवारों में उलझा था। जब दुनिया शिक्षा को हथियार मान रही थी, तब भारत में शिक्षा कुछ परिवारों की “जागीर” थी। जब अन्य देशों ने लोकतंत्र का बीज बोया, तब यहाँ मनुवाद ने समाज को ऊँचा-नीचा, छुआ-अछूत, और श्रमिक-शासक में बाँट दिया। इसीलिए बाबासाहेब ने कहा था— “भारत गरीब इसलिए नहीं है कि उसे ईश्वर ने गरीब बनाया, भारत गरीब है क्योंकि उसकी सामाजिक व्यवस्था अन्यायपूर्ण है।” --- 🛡️ संविधानवाद: समाज को जोड़ने की शक्ति संविधानवाद कहता है: हर बच्चा बराबर है हर इंसान बराबर है हर नागरिक बराबर है और इसी सोच के कारण— भारत आज लोकतंत्र है, ना कि किसी जाति, कुल या खानदान की “निजी संपत्ति।” संविधानवाद ने ही SC, ST, OBC, महिलाओं, अल्पसंख्यकों— हर कमजोर वर्ग को आवाज़ दी है। --- 📢 लेकिन मनुवादी ताकतों की परेशानी क्या है? साथियो… मनुवादी ताकतों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अम्बेडकरवाद ने सदियों से दबे लोगों को मैं भी इंसान हूँ यह एहसास दिला दिया है। और यही उनकी राजनीति के लिए खतरा है। क्योंकि— जब बहुजन जागता है, तब मनुवादी सत्ता हिलती है। जब बहुजन पढ़ता है, तब मनुवादी ढाँचा टूटता है। जब बहुजन राजनीतिक रूप से जागरूक होता है, तब मनुवादी वर्चस्व समाप्त होता है। इसीलिए आज भी अम्बेडकरवादी विचारों को कमजोर करने की कोशिश की जाती है। --- 🏛️ संविधानवाद आज के दौर में क्यों ज़रूरी है? क्योंकि आज भी: आरक्षण को निशाना बनाया जाता है SC-ST की नौकरियों को काटा जाता है OBC की गणना रोकने की कोशिश होती है सामाजिक न्याय की नीतियों को “तुष्टिकरण” कहा जाता है बहुजन युवाओं की आवाज़ को दबाया जाता है और गरीब, पिछड़े, दलित युवाओं के सपनों को “योग्यता की कमी” कहकर कुचला जाता है साथियो, यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। यह 21वीं सदी में भी जारी है। इसीलिए बाबासाहेब के विचारों का मूल्य आज और बढ़ गया है। --- 🧭 भारत किस दिशा में जाएगा? — यह इस लड़ाई पर निर्भर है अगर संविधानवाद मजबूत होगा — तो आरक्षण सुरक्षित रहेगा सामाजिक न्याय आगे बढ़ेगा प्रतिनिधित्व बढ़ेगा जाति-विरोधी सोच मजबूत होगी भारत वैज्ञानिक और आधुनिक देश बनेगा लेकिन अगर मनुवाद मजबूत हुआ — तो आरक्षण पहले कमजोर होगा फिर प्रतिनिधित्व खत्म होगा फिर बहुजन को सत्ता से बाहर किया जाएगा फिर शिक्षा और नौकरियाँ कुछ हाथों में सिमट जाएँगी यही मनुवादी राजनीति का एजेंडा रहा है। --- 📣 साथियो, अब अंतिम सवाल आपसे! आप कौन सा भारत चाहते हैं? ✔ वह भारत जहाँ अम्बेडकरवाद हो, जहाँ बराबरी हो, जहाँ सम्मान हो, जहाँ कानून सबके लिए बराबर हो? ✘ या वह भारत जहाँ मनुवाद हो, जहाँ जन्म तय करे कि इंसान कितना “ऊँचा” है, जहाँ मजदूर का बेटा मजदूर ही रहेगा, और शासक का बेटा शासक ही बनेगा? यह फैसला आपकी चेतना तय करेगी। आपकी एकता तय करेगी। आपकी समझ तय करेगी। --- 🔥 समाप्ति: एक क्रांतिकारी संदेश साथियो… अम्बेडकरवाद सिर्फ इतिहास नहीं— यह भारत का भविष्य है। और मनुवाद सिर्फ अतीत नहीं— यह वह खतरा है जिसे अगर पहचाना नहीं गया, तो भविष्य को जकड़ लेगा। याद रखिए— संविधान हमारा हथियार है। और अम्बेडकर हमारी रोशनी। #✍🏻भारतीय संविधान📕 #😛 व्यंग्य 😛 #❤️जीवन की सीख #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान
राम रहीम की “रासलीला” की बात कर रहे हैं—जिसे असल में उसकी यौन शोषण वाली करतूतों के लिए कहा जाता है, कोई धार्मिक या सांस्कृतिक “रासलीला” नहीं। संक्षेप में पूरा मामला समझिए: गुरमीत राम रहीम सिंह (डेरा सच्चा सौदा प्रमुख) पर अपनी ही महिला शिष्यों (साध्वियों) के साथ बलात्कार का आरोप लगा। ये साध्वियाँ डेरा के अंदर रहती थीं, जहाँ आस्था, डर और “गुरु आदेश” के नाम पर शोषण किया गया। 2002 में एक गुमनाम पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री को भेजा गया, जिसमें इन अपराधों का खुलासा था। लंबी जांच और ट्रायल के बाद 2017 में CBI कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया। उसे 20 साल की सजा हुई (दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में)। बाद में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या और अन्य मामलों में भी सजा मिली। “रासलीला” शब्द क्यों बोला जाता है? क्योंकि राम रहीम खुद को भगवान/अवतार बताता था और अपने अपराधों को धार्मिक चमत्कार या आध्यात्मिक क्रिया की तरह पेश करता था— जबकि असल में वह सत्ता, डर और अंधभक्ति के दम पर किया गया अपराध था। सबक क्या है? गुरु नहीं, संविधान और कानून सर्वोपरि है अंधभक्ति = अपराधियों की ढाल सवाल करना पाप नहीं, ज़रूरी है 🔥 राम रहीम की “रासलीला” के पीछे का पूरा खेल 1️⃣ गुरु नहीं, सत्ता का नशा राम रहीम ने खुद को “मसीहा” “परमात्मा का अवतार” बताया। भक्तों से कहा गया— “गुरु की आज्ञा भगवान की आज्ञा है” यहीं से विवेक खत्म और गुलामी शुरू हुई। 2️⃣ साध्वियाँ कैसे फँसाई गईं? छोटी उम्र की लड़कियाँ गरीब, पिछड़े या टूटे परिवार सेवा, मोक्ष और पुण्य का लालच डर: “गुरु का विरोध किया तो सर्वनाश” फिर 👉 कमरे में बुलाना 👉 ‘आध्यात्मिक क्रिया’ के नाम पर बलात्कार 👉 चुप रहने की धमकी 3️⃣ पत्र जिसने पर्दा उठाया 2002 का वो गुमनाम पत्र— प्रधानमंत्री को हाईकोर्ट को मीडिया को उस पत्र ने लिखा: “डेरा में बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूटी जा रही है” यही पत्र बना राम रहीम के पतन की शुरुआत। 4️⃣ सच लिखने की कीमत: हत्या 🖊️ रामचंद्र छत्रपति पत्रकार सच लिखा डेरा की पोल खोली 📌 नतीजा? 👉 गोलियों से हत्या 👉 बाद में साबित हुआ: साजिश में राम रहीम शामिल 5️⃣ 2017: जब भीड़ पागल हो गई फैसले के दिन— 30+ लोग मरे आगजनी दंगे सरकारें काँप गईं क्यों? 👉 क्योंकि अंधभक्ति को वोट बैंक बना दिया गया था ⚠️ सबसे बड़ा सवाल ❓ अगर वह दोषी था, तो VIP ट्रीटमेंट क्यों? पैरोल बार-बार क्यों? भक्त आज भी “बाबा जी” क्यों कहते हैं? ✊ सच्चा संदेश ❌ जो सवाल से डरे, वो गुरु नहीं ❌ जो शरीर छुए, वो संत नहीं ❌ जो डर फैलाए, वो भगवान नहीं ✔️ भगवान इंसान को आज़ाद करता है, गुलाम नहीं 🧠 6️⃣ अंधभक्ति कैसे अपराध में बदलती है? (Psychology) गुरु = सर्वज्ञ बना दिया जाता है शिष्य का आत्मसम्मान तोड़ा जाता है सवाल पूछना = पाप शक करना = ईश्वर का अपमान धीरे-धीरे इंसान अपनी बुद्धि गिरवी रख देता है। यहीं से शोषण को भी “सेवा” कहा जाने लगता है। 🏰 7️⃣ डेरा = समानांतर सत्ता डेरा सिर्फ आश्रम नहीं था: अपनी पुलिस जैसी व्यवस्था अपनी कोर्ट जैसी पंचायत अपनी जेल (कमरे/क्वार्टर) अपनी राजनीति और सौदे जब कोई संस्थान कानून से ऊपर बनने लगे— वहीं अपराध फलता है। ⚖️ 8️⃣ कानून ने क्या सिखाया? देर से सही, न्याय हुआ लेकिन देरी ने जानें लीं गवाह डरे पत्रकार मारा गया साध्वियाँ सालों तक चुप रहीं 👉 सबक: न्याय जितना देर से, उतना महँगा। 🗳️ 9️⃣ राजनीति की भूमिका (कड़वा सच) वोट बैंक के डर से 👉 कार्रवाई टली “भावनाएँ आहत होंगी” कहकर 👉 अपराध नजरअंदाज हुआ जब आस्था को वोट से तौला जाता है, तो पीड़िता की आवाज दबती है। 📣 🔥 जन-जागरण के लिए तीखी पंक्तियाँ आप चाहें तो सीधे इस्तेमाल करें: “जो गुरु सवाल से डरे, समझो वही अपराध करे” “आस्था के नाम पर देह का सौदा—ये धर्म नहीं, अपराध है” “भक्त नहीं बनो, जागरूक नागरिक बनो” “बाबा नहीं, संविधान बचाओ” “भगवान विवेक देता है, अंधापन नहीं” 🕯️ 1️⃣0️⃣ असली श्रद्धांजलि किसे? साध्वियों की हिम्मत को सच लिखने वाले पत्रकार को उन लोगों को जिन्होंने भीड़ के सामने भी सच का साथ दिया ✊ अंतिम बात (सीधे दिल पर) धर्म सवाल से नहीं डरता भगवान जांच से नहीं भागता और सच्चा संत कभी किसी की देह पर हक़ नहीं जताता #Gurmit Ram rahim hospitalized #Baba ram Rahim 420 #ram rahim #andhbhakt mukt bharat #andhbhakt https://youtube.com/watch?v=lVPAMwGdvwU&si=E5WZYqhZR6n1dswZ
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भाइयो और बहनो, नरेंद्र दाभोलकर कोई नेता नहीं थे, कोई सत्ता के भूखे इंसान नहीं थे— वो सिर्फ़ इतना कहते थे कि अंधविश्वास छोड़ो, विवेक अपनाओ। उन्होंने किसी धर्म को गाली नहीं दी, उन्होंने किसी भगवान का अपमान नहीं किया— उन्होंने बस ये सवाल उठाया कि कौन तुम्हें डराकर मूर्ख बना रहा है? और उसी सवाल की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। आज सोचिए— अगर अंधविश्वास उजागर करना गुनाह है, तो अपराधी कौन है? सवाल पूछने वाला या सवाल से डरने वाला? आज भारत में सबसे बड़ा संकट भूख या गरीबी नहीं— सोच की गुलामी है। 95 प्रतिशत लोग सत्ता के चक्कर में देश को बर्बाद करने पर तुले हैं— किसी को कुर्सी चाहिए, किसी को भीड़, किसी को धर्म का ठेका। और जनता? जनता को बस नारा पकड़ाया जाता है, डर पकड़ा दिया जाता है, और विवेक छीन लिया जाता है। आज हर कोई कह रहा है— “मेरे पीछे चलो” लेकिन कोई ये नहीं कह रहा— “सोचो, समझो, सवाल करो।” याद रखो— जो तुम्हें सवाल पूछने से रोके, वो तुम्हें आज़ाद नहीं, गुलाम बनाना चाहता है। दाभोलकर की हत्या सिर्फ़ एक इंसान की हत्या नहीं थी— वो विवेक पर हमला था। लेकिन सच ये है— इंसान को मारा जा सकता है, विचार को नहीं। अब फैसला जनता को करना है— कौन तुम्हें मूर्ख बना रहा है? कौन तुम्हें लड़वा रहा है? और कौन सच में तुम्हें मज़बूत बनाना चाहता है? देश धर्म से नहीं टूटता, देश टूटता है जब जनता सोचने की ताक़त किसी और के हाथ दे देती है। इसलिए आज संकल्प लो— बाबा नहीं, नेता नहीं, अपना विवेक सबसे बड़ा गुरु होगा। क्योंकि जिस दिन जनता ने सोचना शुरू कर दिया, उस दिन हर ढोंग, हर झूठ, हर सत्ता अपने आप बेनकाब हो जाएगी। ✊ जय विवेक। जय संविधान। #✍🏻भारतीय संविधान📕 #😛 व्यंग्य 😛 #❤️जीवन की सीख #🇮🇳 हम है हिंदुस्तानी #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान https://youtube.com/watch?v=CE8nP5omncY&si=WB_EyeuD-W7SBgtF
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भाइयो और बहनो, आज मैं ग़ुस्से में नहीं— दर्द में बोल रहा हूँ। हमने अपनी आस्था सौंपी, अपने घर की कमाई सौंपी, अपना भरोसा सौंपी— और बदले में क्या मिला? लूटी हुई संपत्ति, टूटी हुई इज़्ज़त, और उजड़ा हुआ बचपन। जिन्हें भगवान मानकर हमने माथा टेका, उन्हीं के आश्रमों में माँ-बहनों की आबरू नोची गई। जिन्हें गुरु कहा गया, वो असल में ऐयाश अपराधी निकले— और उनके अंधभक्त अपराध पर पर्दा डालने वाली भीड़ बन गए। सबसे ज़्यादा चोट वहाँ लगी जहाँ मासूम नाबालिग बच्चियाँ थीं— जिनका कोई कसूर नहीं था, लेकिन जिन्होंने अपना सबकुछ गँवा दिया। आज सवाल ये नहीं है कि एक बाबा दोषी था या नहीं— आज सवाल ये है कि हम कब तक अंधे बने रहेंगे? जब कोई कहे— “सवाल मत पूछो, श्रद्धा रखो” तो समझ लेना— वो तुम्हें सोच से दूर करना चाहता है। जब कोई कहे— “सब सह लो, फल मिलेगा” तो समझ लेना— वो तुम्हारी खामोशी खरीदना चाहता है। और जब अपराध साबित हो जाए फिर भी अगर कोई बोले— “ये साज़िश है” तो समझ लेना— वो अपराध का साझेदार है। भाइयो-बहनो, धर्म हमें इंसान बनाता है, अंधभक्ति हमें शिकार। भगवान कहीं जेल से नहीं डरता, भगवान किसी मासूम से नहीं छुपता, भगवान को भीड़ और वकीलों की ज़रूरत नहीं पड़ती। अब वक़्त आ गया है— चरण छूने का नहीं, चरित्र देखने का। प्रवचन सुनने का नहीं, प्रमाण माँगने का। और सबसे ज़रूरी— अपराधी के नहीं, पीड़ित के साथ खड़े होने का। आज एक ही आवाज़ होनी चाहिए— भक्ति ने तोड़ा, अब कानून ही जोड़ेगा। बाबा नहीं, संविधान हमारा रक्षक है। धन्यवाद। ✊🔥 #😛 व्यंग्य 😛 #✍🏻भारतीय संविधान📕 #🇮🇳 हम है हिंदुस्तानी #❤️जीवन की सीख #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान https://youtube.com/watch?v=l8rY241rAHg&si=k6AY64VecKkzEHtA
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