राकेश कुमार ॐ भूर्भुवः स्वः।
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राकेश कुमार ॐ भूर्भुवः स्वः।
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ओ३म् भूर्भुवः स्वः।
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌞 Good Morning🌞
🙏गीता ज्ञान🛕 - 31733 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २४ २५ सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः | मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः Il शनैरुपरमेद्धुद्ध्या धृतिगृहीतया शनैः आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किच्चिदपि चिन्तयेत् II अनुवाद संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर। क्रम॰क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त धैर्ययुक्त ` बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में हा तथा स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे। 31733 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २४ २५ सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः | मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः Il शनैरुपरमेद्धुद्ध्या धृतिगृहीतया शनैः आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किच्चिदपि चिन्तयेत् II अनुवाद संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर। क्रम॰क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त धैर्ययुक्त ` बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में हा तथा स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे। - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - 31733 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २३ तं विद्याद दुःखसंयोगवियोगं योगसब्जितम् | निश्चयेन योक्तव्यो योगोडनिर्विण्णचेतसा Il स अनुवाद जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। योग न उकताए हुए अर्थात् धैर्य और वह चित्त से निश्चयपूर्वक केरना कर्तव्य उत्साहयुक्त 81 31733 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २३ तं विद्याद दुःखसंयोगवियोगं योगसब्जितम् | निश्चयेन योक्तव्यो योगोडनिर्विण्णचेतसा Il स अनुवाद जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। योग न उकताए हुए अर्थात् धैर्य और वह चित्त से निश्चयपूर्वक केरना कर्तव्य उत्साहयुक्त 81 - ShareChat
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🌞 Good Morning🌞 - 31733 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २२ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः | यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते Il अनुवाद परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता। 31733 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २२ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः | यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते Il अनुवाद परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता। - ShareChat
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#😃 शानदार स्टेटस #🔱बम बम भोले🙏 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
😃 शानदार स्टेटस - आषसभीकौ ठहा शिवथत्रि 09 की हवर्दिक थुभकामनाऐ आषसभीकौ ठहा शिवथत्रि 09 की हवर्दिक थुभकामनाऐ - ShareChat
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🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - 31733 श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २१ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्वद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् 41 वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः Il अनुवाद इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं| 31733 श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय 6 आत्मसंयमयोगः श्लोक २१ सुखमात्यन्तिकं यत्तद्वद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् 41 वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः Il अनुवाद इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं| - ShareChat
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