राकेश कुमार ॐ भूर्भुवः स्वः।
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राकेश कुमार ॐ भूर्भुवः स्वः।
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ओ३म् भूर्भुवः स्वः।
#🙏गीता ज्ञान🛕 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱
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🙏गीता ज्ञान🛕 - 9[8: श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक १२ 4444 अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि - इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् Il अनुवाद परन्तु हे अर्जुन ! केवल दम्भाचरण ৯ লিত অথনা ক্রল ক্রষী ঞী মৃষ্টি ম रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान। 9[8: श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक १२ 4444 अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि - इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् Il अनुवाद परन्तु हे अर्जुन ! केवल दम्भाचरण ৯ লিত অথনা ক্রল ক্রষী ঞী মৃষ্টি ম रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान। - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - (31439/ श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक ११ अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते [ यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः Il अनुवाद তী থামস বিখি মী নিমন, यज्ञ करना ही कर्तव्य है इस प्रकार मन को समाधान বাল करके, फल न चाहने पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है। (31439/ श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक ११ अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते [ यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः Il अनुवाद তী থামস বিখি মী নিমন, यज्ञ करना ही कर्तव्य है इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है। - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - (31439/ श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक 9 कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः II अनुवाद कड़वे , खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, 4 तीखे, रूखे, दाहकारक और चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न qTస आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं। (31439/ श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक 9 कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः II अनुवाद कड़वे , खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, 4 तीखे, रूखे, दाहकारक और चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न qTస आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं। - ShareChat
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🙏गीता ज्ञान🛕 - (31439/ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक 8 श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः I रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः II अनुवाद आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को वाले, रसयुक्त, बढ़ाने चिकने और स्थिर বাল (তিম रहने भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव से ही 3থনি मन को प्रिय- ऐसे आहार भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं। (31439/ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक 8 श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः I रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः II अनुवाद आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को वाले, रसयुक्त, बढ़ाने चिकने और स्थिर বাল (তিম रहने भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव से ही 3থনি मन को प्रिय- ऐसे आहार भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं। - ShareChat
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#🙏गीता ज्ञान🛕 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩
🙏गीता ज्ञान🛕 - 9[8: श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक 7 आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ೆ1 यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु II अनुवाद भोजन भी सबको अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ , तप और दान भी तीनन्तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक् पृथक् भेद को तू मुझ से सुन। 9[8: श्रीमद्भगवद्नीता अध्याय १७ श्रद्धात्रयविभागयोग श्लोक 7 आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ೆ1 यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु II अनुवाद भोजन भी सबको अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ , तप और दान भी तीनन्तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक् पृथक् भेद को तू मुझ से सुन। - ShareChat