यह वाकया हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु के दौर का है, जो हमें सिखाता है कि एक मोमिन का किरदार कैसा होना चाहिए और कैसे "ईमान" और "जुबान की लाज" मौत के डर पर भारी पड़ जाती है।
हज़रत उमर (रजि.) की अदालत और अनजान नौजवान
एक दिन अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की अदालत में दो नौजवान एक तीसरे नौजवान को पकड़कर लाए। उन्होंने शिकायत की, "ऐ अमीर-उल-मोमिनीन! इस शख्स ने हमारे बूढ़े पिता का कत्ल किया है, हमें इसके बदले में 'किसास' (खून का बदला) चाहिए।"
हज़रत उमर ने उस तीसरे नौजवान से पूछा, "क्या तुमने कत्ल किया है?"
उसने बड़ी बहादुरी और सच्चाई से जवाब दिया, "हाँ! मेरा ऊंट उनके खेत में चला गया था, उन्होंने उसे पत्थर मारा जिससे ऊंट मर गया। मुझे गुस्सा आया और मैंने वही पत्थर उन्हें मार दिया, जिससे उनकी मौत हो गई।"
हज़रत उमर ने कानून के मुताबिक उसे मौत की सजा सुनाई। सजा सुनकर उस नौजवान ने एक दरख्वास्त की:
> "हुजूर! मुझे सजा मंजूर है, लेकिन मेरे पास मेरे छोटे भाई की अमानत (सोना) जमीन में दबी हुई है। अगर आप मुझे तीन दिन की मोहलत दें, तो मैं उसे भाई के हवाले कर आऊं। वरना कल कयामत के दिन अल्लाह मुझसे पूछेगा कि तुमने अमानत में खयानत क्यों की?"
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हज़रत उमर ने कहा, "मक्का से तुम्हारा गांव दूर है, तुम्हारी जमानत कौन देगा? अगर तुम नहीं लौटे, तो तुम्हारी जगह किसे फांसी दी जाए?"
वह नौजवान अजनबी था, उसे कोई नहीं जानता था। तभी वहां मौजूद महान सहाबी हज़रत अबू ज़र गफ्फारी रज़ियल्लाहु अन्हु खड़े हुए और कहा, "मैं इसकी जमानत देता हूँ।"
सब हैरान थे! हज़रत उमर ने पूछा, "अबू ज़र! अगर यह नहीं आया तो आपको अपनी जान देनी होगी।" उन्होंने कहा, "मुझे मंजूर है।"
तीन दिन बीत गए। तीसरे दिन शाम होने को आई, लेकिन नौजवान नहीं लौटा। लोग हज़रत अबू ज़र के लिए परेशान थे। जैसे ही सजा का वक्त करीब आया, वह नौजवान दूर से दौड़ता हुआ, धूल में लथपथ वहां आ पहुंचा।
हज़रत उमर ने हैरान होकर पूछा, "जब तुम आजाद थे और भाग सकते थे, तो तुम वापस क्यों आए?"
नौजवान ने जवाब दिया:
> "मैं इसलिए आया ताकि दुनिया यह न कहे कि 'मुसलमानों में अब वादे को पूरा करने वाले खत्म हो गए हैं'।"
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हज़रत उमर ने फिर हज़रत अबू ज़र से पूछा, "आपने इसे जानते भी नहीं थे, फिर जमानत क्यों दी?"
उन्होंने जवाब दिया:
> "मैंने इसलिए दी ताकि दुनिया यह न कहे कि 'मुसलमानों में अब मदद करने वाले खत्म हो गए हैं'।"
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यह सुनकर वह दोनों भाई (जिन्होंने कत्ल का दावा किया था) रोने लगे और बोले, "अमीर-उल-मोमिनीन! हम इसे माफ करते हैं, ताकि दुनिया यह न कहे कि 'मुसलमानों में अब माफ करने वाले खत्म हो गए हैं'।"
सबक:
यह वाकया हमें सिखाता है कि इस्लाम सिर्फ इबादत का नाम नहीं, बल्कि सच बोलने, वादा निभाने और दूसरों को माफ करने का नाम है। #🪴घटस्थापना😊 #नीला आसमान 🌌 #😉 और बताओ #💔 हार्ट ब्रेक स्टेटस #🎄हरे पेड़ @💖💖💖chandni💖💖💖 @💫farha khan..🌹 @Nisha 🌟 @☝️अल्लाह 🤲 कि बन्दी S.🌹 अल्हम्दुलिलल्लाह 🤲 😊
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