#🙏गीता ज्ञान🛕 #GodMorningMonday
संस्कार
छूत के रोग की तरह फैलते हैं
अच्छे तथा बुरे संस्कार संक्रमण रोग की तरह फैलते हैं जैसे भक्त के हाथ से बोये गए बीज में भी भक्ति संस्कार प्रवेश होते हैं।जो उस अन्न को खाता है,उसमें भी भक्ति की प्रेरणा होती है
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निन्दक एकहु मति मिलै, पापी मिलै हजार।
इक निंदक के सीस पर, लाख पाप का भार।।
निन्दा करने वाला एक भी न मिले चाहे पापी हजारों मिले कोई हर्ज नहीं। क्योंकि एक निन्दक के सिर पर लाखों पाप का बोझ रहता है।
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तन-मन-धन सब तेरा
तन मन धन सब अरपिये, भक्ति मुक्ति के काज।
जिनके ऊर (दिल) में भक्ति तो क्या इन्द्र का राज।।
काल के जाल से निकलने के लिए सर्वस्व
परमात्मा कबीर जी के लिए समर्पित कर दीजिए। तन मन धन सब परमेश्वर का जानें।
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गरीब, पतिब्रता परहेज है,
आंन उपास अनीत ।
अपने पीव के चरण की,
छाडत ना परतीत ।।
भक्त पतिव्रता की तरह अन्य उपासना से परहेज करता है। अपने पीव यानि पति परमेश्वर के चरणों की परतीत यानि विश्वास नहीं छोड़ता।
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दो अक्षर का सच्चा नाम
संत-भक्त किसी भी स्तर की भक्ति कर रहा है, वह आदरणीय है परंतु जब तक पूर्ण सतगुरू से दो अक्षर का सच्चा नाम दीक्षा में नहीं मिलेगा, तब तक न तो उस गुरूकी मुक्ति है और न शिष्य की।
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गरीब, बनजारे के बैल ज्यों,
फिरे देश प्रदेश।
जिन के संग न साथ हूं,
जगत दिखावे भेष।।
परमात्मा ने कहा है मेरा सिद्धांत है कि जो हरयाई गाय की तरह इधर-उधर दुनिया को ठगते फिरते हैं। मैं उनके साथ नहीं है। वे जगत में साधु वेश बनाकर प्रभावित करके काल जाल में डालते हैं।
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कबीर,
सर्व सोने की लंका थी, वो रावण से रणधीरं।
एक पलक मे राज विराजै, जम के पड़ै जंजीरं।।
पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी बताते हैं रावण की पूरी लंका सोने से बनी थी। वह बहुत शक्तिशाली शासक था। परन्तु सतभक्ति के बिना लंकापति रावण भी क्षण में राख हो गया था।
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समर्पण
गुरू जी से उपदेश लेने के पश्चात् समर्पण कर देना चाहिए। मन में अभिमान नहीं रखना चाहिए। मन में अभिमान नहीं रखना चाहिए। मन में अभिमान रखकर भक्ति करने वाले अनेकों मूर्ख अपना मानव जीवन नष्ट कर गए।
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गरीब, पारस तुम्हरा नाम है, लोहा हमरी जात।
जड़ सेती जड़ पलटियां, तुमकौ केतिक बात ।।
हे परमेश्वर ! आपका नाम तो पारस है। हम जीव जाति वाले लोहा समान हैं। जब एक जड़ (पारस पत्थर) के छूने मात्र से जड़ (लोहा सोना बन गया) बदल गया।
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गरीब,
करता आप कबीर है, अबिनाशी बड़ अल्लाह ।
राम रहीम करीम है, कीजो सुरति निगाह ।कबीर जी स्यवं ही सृष्टि के रचयिता हैं। अविनाशी (बड़) बड़ा (अल्लाह) परमात्मा हैं। राम कहो, रहीम कहो। (करीम) दयालु हैं। (कीजो सुरति निगाह) ध्यान से देखो।



