#📒 मेरी डायरी #☝ मेरे विचार अक्सर यह सवाल उठता है कि जब कई प्राचीन कथाओं में कुछ देवताओं या राजाओं के एक से अधिक विवाह के उल्लेख मिलते हैं, तो फिर आज एक पत्नी का नियम कैसे स्थापित हुआ? और क्यों विवाह ऐसा बंधन बन गया कि साथ रहे या न रहे, कानूनी और सामाजिक रूप से जीवनभर जुड़ा रहता है? इस विषय को भावनाओं से नहीं, समझ से देखना जरूरी है।
पहली बात — धर्मग्रंथों की कथाएँ प्रतीकात्मक भी होती हैं, शाब्दिक नहीं। कई विवाहों का उल्लेख कई बार शक्ति, दायित्व, या विभिन्न गुणों के रूपक के रूप में भी किया गया है। साथ ही, उस समय का समाज राजतंत्र आधारित था — जहां विवाह केवल प्रेम नहीं, बल्कि राजनीतिक गठजोड़, वंश और सुरक्षा का माध्यम भी था। इसलिए राजाओं और कुछ पात्रों के अनेक विवाह सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा थे, आदर्श नहीं।
समय बदला, समाज बदला, और परिवार की संरचना भी बदली। जैसे-जैसे समानता, स्त्री अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सोच आई, एक-पत्नी/एक-पति प्रथा मजबूत हुई। क्योंकि रिश्ते संख्या से नहीं, स्थिरता और सम्मान से चलते हैं। एक से अधिक विवाह का मॉडल आम जीवन में अक्सर अन्याय, असंतुलन और संघर्ष पैदा करता था — खासकर महिलाओं के लिए।
अब आते हैं विवाह के “जीवन भर चिपक जाने” वाले सवाल पर। दरअसल, विवाह को केवल साथ रहने का समझौता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का अनुबंध माना गया। इसमें भावनात्मक, सामाजिक और कानूनी तीनों स्तर जुड़ते हैं। इसलिए अलग होने की प्रक्रिया भी आसान नहीं रखी गई — ताकि लोग रिश्ते को खिलौना न समझें। हाँ, आज कानून ने तलाक और अलग रहने के रास्ते दिए हैं, क्योंकि मजबूरी का रिश्ता भी अन्याय ही है।
तीखी सच्चाई यह है —
हम इतिहास की सुविधाजनक बातें चुन लेते हैं, लेकिन उनके पीछे का संदर्भ भूल जाते हैं। देवताओं के उदाहरण देकर अपने व्यवहार को सही ठहराना आसान है, पर उनके त्याग, मर्यादा और कर्तव्य को अपनाना कठिन लगता है।
रिश्ता एक हो या अनेक — अगर उसमें सम्मान, सहमति और जिम्मेदारी नहीं, तो वह केवल बोझ है। और एक ही रिश्ता हो — पर बराबरी और समझ के साथ — तो वही सबसे बड़ा धर्म है।