Ranjan Chhibber
ShareChat
click to see wallet page
@4277591718
4277591718
Ranjan Chhibber
@4277591718
मुझे ShareChat पर फॉलो करें!
#😂फनी जोक्स🤣
😂फनी जोक्स🤣 - हग डे है. 3 दुनिया गले मिलने में लगी है, और मैं बाथरूम में बैठा प्रकृति से गले मिल रहा हूँ। बाहर लोग कह रहे - "Come, give me a warm hug!" इधर पेट कह रहा ~ " पहले मुझे relief दे, फिर दुनिया को hug देना।" मोबाइल पर मैसेज आया हग डे स्पेशल . किसे गले लगा रहे हो?" मैंँने जवान दिया "अभी तो सिस्टम को रोस्वर्ई कर रहा हूँ॰ थोड़ी देर बाद ही मानवता को गले लपाऊँगा । " डे वही, असल सच्चा हग जब पेट और शांति दोनों एक दूसरे से गले मिल लें। हग डे है. 3 दुनिया गले मिलने में लगी है, और मैं बाथरूम में बैठा प्रकृति से गले मिल रहा हूँ। बाहर लोग कह रहे - "Come, give me a warm hug!" इधर पेट कह रहा ~ " पहले मुझे relief दे, फिर दुनिया को hug देना।" मोबाइल पर मैसेज आया हग डे स्पेशल . किसे गले लगा रहे हो?" मैंँने जवान दिया "अभी तो सिस्टम को रोस्वर्ई कर रहा हूँ॰ थोड़ी देर बाद ही मानवता को गले लपाऊँगा । " डे वही, असल सच्चा हग जब पेट और शांति दोनों एक दूसरे से गले मिल लें। - ShareChat
#😂फनी जोक्स🤣 एक आदमी एक बाबा के पास पहुँचा। बाबा ने गहरी आवाज़ में पूछा — “आओ बच्चा, क्या समस्या है?” आदमी बोला — “समस्या तो अभी शुरू हुई है बाबा। मैं दाढ़ी में सफेदी लेकर आया हूँ, फिर भी आप मुझे बच्चा बोल रहे हैं!” बाबा बोले — “हमारे दरबार में आते ही सब बच्चा हो जाते हैं — दान देते ही जवान, और चरण छूते ही समझदार घोषित कर दिए जाते हैं।” आदमी बोला — “पर बाबा, इतनी कम उम्र में आप पिता कैसे बन गए और मैं बच्चा कैसे?” बाबा ने खाँसकर कहा — “ज्ञान की दुनिया में बेटा, जो गद्दी पर बैठ गया वो बाप, जो नीचे बैठ गया वो बच्चा। उम्र-वुम्र तो आधार कार्ड में देखी जाती है, आश्रम में नहीं।” आदमी बोला — “मतलब कुर्सी बड़ी, तो आदमी बड़ा?” बाबा बोले — “बिल्कुल। कुर्सी, चेला और चढ़ावा — ये तीनों मिल जाएँ तो ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाता है।” आदमी ने पूछा — “और सच?” बाबा मुस्कुराए — “सच पूछने वाले कम हैं बेटा, आशीर्वाद लेने वाले ज्यादा। इसलिए सच स्टोररूम में रखा है — धूल खा रहा है।” आदमी बोला — “बाबा, मैं क्या करूँ?” बाबा बोले — “या तो सवाल पूछना छोड़ दे, या खुद बाबा बन जा। यहाँ सोचने वालों की नहीं, बोलने वालों की चलती है।”
#📒 मेरी डायरी #☝ मेरे विचार अक्सर यह सवाल उठता है कि जब कई प्राचीन कथाओं में कुछ देवताओं या राजाओं के एक से अधिक विवाह के उल्लेख मिलते हैं, तो फिर आज एक पत्नी का नियम कैसे स्थापित हुआ? और क्यों विवाह ऐसा बंधन बन गया कि साथ रहे या न रहे, कानूनी और सामाजिक रूप से जीवनभर जुड़ा रहता है? इस विषय को भावनाओं से नहीं, समझ से देखना जरूरी है। पहली बात — धर्मग्रंथों की कथाएँ प्रतीकात्मक भी होती हैं, शाब्दिक नहीं। कई विवाहों का उल्लेख कई बार शक्ति, दायित्व, या विभिन्न गुणों के रूपक के रूप में भी किया गया है। साथ ही, उस समय का समाज राजतंत्र आधारित था — जहां विवाह केवल प्रेम नहीं, बल्कि राजनीतिक गठजोड़, वंश और सुरक्षा का माध्यम भी था। इसलिए राजाओं और कुछ पात्रों के अनेक विवाह सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा थे, आदर्श नहीं। समय बदला, समाज बदला, और परिवार की संरचना भी बदली। जैसे-जैसे समानता, स्त्री अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सोच आई, एक-पत्नी/एक-पति प्रथा मजबूत हुई। क्योंकि रिश्ते संख्या से नहीं, स्थिरता और सम्मान से चलते हैं। एक से अधिक विवाह का मॉडल आम जीवन में अक्सर अन्याय, असंतुलन और संघर्ष पैदा करता था — खासकर महिलाओं के लिए। अब आते हैं विवाह के “जीवन भर चिपक जाने” वाले सवाल पर। दरअसल, विवाह को केवल साथ रहने का समझौता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का अनुबंध माना गया। इसमें भावनात्मक, सामाजिक और कानूनी तीनों स्तर जुड़ते हैं। इसलिए अलग होने की प्रक्रिया भी आसान नहीं रखी गई — ताकि लोग रिश्ते को खिलौना न समझें। हाँ, आज कानून ने तलाक और अलग रहने के रास्ते दिए हैं, क्योंकि मजबूरी का रिश्ता भी अन्याय ही है। तीखी सच्चाई यह है — हम इतिहास की सुविधाजनक बातें चुन लेते हैं, लेकिन उनके पीछे का संदर्भ भूल जाते हैं। देवताओं के उदाहरण देकर अपने व्यवहार को सही ठहराना आसान है, पर उनके त्याग, मर्यादा और कर्तव्य को अपनाना कठिन लगता है। रिश्ता एक हो या अनेक — अगर उसमें सम्मान, सहमति और जिम्मेदारी नहीं, तो वह केवल बोझ है। और एक ही रिश्ता हो — पर बराबरी और समझ के साथ — तो वही सबसे बड़ा धर्म है।
#😂फनी जोक्स🤣
😂फनी जोक्स🤣 - पतिः अरे ये फोटो लेते समय टेढ़ी क्यों हो रही हो? पत्नीः आज टेढ़ी डे है, सीधी कैसे हो जाऊँ पतिः अच्छा. तो कल क्या करोगी? पत्नीः कल प्रॉमिस डे है तब सीधी खडी होकर तुमसे नए वादे करवाऊँगी ! G000 EVENING नमस्ते जो पतिः अरे ये फोटो लेते समय टेढ़ी क्यों हो रही हो? पत्नीः आज टेढ़ी डे है, सीधी कैसे हो जाऊँ पतिः अच्छा. तो कल क्या करोगी? पत्नीः कल प्रॉमिस डे है तब सीधी खडी होकर तुमसे नए वादे करवाऊँगी ! G000 EVENING नमस्ते जो - ShareChat
#😂फनी जोक्स🤣
😂फनी जोक्स🤣 - BINGol | 73973 MEYE MASALA TADKA day Happy tedhe medhe AMKEEN BINGol | 73973 MEYE MASALA TADKA day Happy tedhe medhe AMKEEN - ShareChat
#😂फनी जोक्स🤣 #😆 कॉमेडी एक्टिंग
😂फनी जोक्स🤣 - वैलेंटाइन का मौसम आते ही मेरा दिल सरकारी नौकरी की तरह हो जाता है = फार्म भरा पड़ा है, पर सीट खाली है। दोस्त हैं = "किसे प्रपोज करेगा?" पूछते  मैं कहता हूं - " पहले उम्मीदवार तो घोषित हो!" मोबाइल में कॉन्टैक्ट लिस्ट खोली = ٦٦٢ पापा रिचार्ज वाला भैया ٤٤ ٩١٢ और एक "डू नॉट पिक" - जो बैंक का लोन ऑफर है। इनमें से किसे गुलाब दूं? पार्क में गया = सब जोडे बैठे थे। मैं अकेला बेंच पर - ऐसे जैसे परीक्षा हॉल में बिना एडमिट  कार्ड पहुंचा छात्र।  सोचा ऑनलाइन खोजें - Suitable girlfriend near me" गूगत बोला Did you mean: Suitable job near me? दोनों ने एक साथ चोट खाई। दिलढर करियर = दोस्त ने कत "हिम्मत रख किसी को भी प्रपोज कर दे।" ঈন "भाईये Amazon नहीं है कि Add to Cart 461 दबाया और हो गया। ' फिलहाल निर्णय लिया है खुद को ही प्रपोज करूंगा " इस साल कम से वन रिजेक्शन का डर तो नहीं रहेगा , हाँ, जवाब फिर भी " सोचकर बताऊंगा" ही आएगा।  वैलेंटाइन का मौसम आते ही मेरा दिल सरकारी नौकरी की तरह हो जाता है = फार्म भरा पड़ा है, पर सीट खाली है। दोस्त हैं = "किसे प्रपोज करेगा?" पूछते  मैं कहता हूं - " पहले उम्मीदवार तो घोषित हो!" मोबाइल में कॉन्टैक्ट लिस्ट खोली = ٦٦٢ पापा रिचार्ज वाला भैया ٤٤ ٩١٢ और एक "डू नॉट पिक" - जो बैंक का लोन ऑफर है। इनमें से किसे गुलाब दूं? पार्क में गया = सब जोडे बैठे थे। मैं अकेला बेंच पर - ऐसे जैसे परीक्षा हॉल में बिना एडमिट  कार्ड पहुंचा छात्र।  सोचा ऑनलाइन खोजें - Suitable girlfriend near me" गूगत बोला Did you mean: Suitable job near me? दोनों ने एक साथ चोट खाई। दिलढर करियर = दोस्त ने कत "हिम्मत रख किसी को भी प्रपोज कर दे।" ঈন "भाईये Amazon नहीं है कि Add to Cart 461 दबाया और हो गया। ' फिलहाल निर्णय लिया है खुद को ही प्रपोज करूंगा " इस साल कम से वन रिजेक्शन का डर तो नहीं रहेगा , हाँ, जवाब फिर भी " सोचकर बताऊंगा" ही आएगा। - ShareChat
#☝ मेरे विचार #📒 मेरी डायरी
☝ मेरे विचार - लोकतंत्र बड़ा दिलचस्प जीव है। कभी यह वोट से चलता है, कभी नोट से, और कभी सीधे घेराव से। आजकल विरोध का पैमाना है ~ जो जितना जोर से घेर ले, वही उतना बड़ा नया मुद्दा क्या है, तथ्य क्या हैं - ये सब  योद्धा। " লীব্ূনাপ্সিক্ধ  बाद की बातें हैं, पहले कैमरा ऑन होना चाहिए।  हमारे देश में अब विरोध भी इवेंट मैनेजमेंट जैसा हो गया है। तख्त़ियाँ पहले छपती हैं, नारे बाद में तय होते हैं। और अगर सामने कोई बड़ा नेता हो - तो समझिए " लोकतांत्रिक उत्सव " 71 ಕ1 का बोनस संस्करण चल सोचिए आम आदमी बेचारा लाइन में खड़ा होकर फॉर्म भरता है शिकायत दर्ज कराता है, महीनों इंतज़ार करता है। और इधर कुछ लोग सीधे घेराव एक्सप्रेस से अपनी बात पहुँचाते हैं। लोकतंत्र भी शायद सोचता होगा ~ "मेरे नाम पर ये सब বরমা-নমা চী ২৪া ট!" व्यंग्य यह नहीं कि सवाल पूछे जा रहे हैं ~ सवाल पूछना तो लोकतंत्र की जान है। व्यंग्य यह है कि सवाल कमः तमाशा गया है। बहस कम, आरोप ज़्यादा  समाधान कम ज़्यादा शोर ज़्यादा आदमी की सुरक्षा  भी बड़ा मासूम है। उसे  ব্রূা সনাল अब आम कौन घेरेगा? उसके पास न तो मीडिया है॰ न माइक। उसे तो EMI, बिल और ट्रैफिक ही घेरे रहते हैं। उस पर आरोप  बस भी लगे तो घरवाले ही जज बन जाते हैं। शायद लोकतंत्र अब चुपचाप कोने में बैठकर यही सोच रहा है "मुझे चलाना था, तुमने मुझे चलाना ही बना दिया। " और जनता? भी उम्मीद में है कि कभी शोर से ज़्यादा समझ की वह आज সানাত মুনী  எரரிர் लोकतंत्र बड़ा दिलचस्प जीव है। कभी यह वोट से चलता है, कभी नोट से, और कभी सीधे घेराव से। आजकल विरोध का पैमाना है ~ जो जितना जोर से घेर ले, वही उतना बड़ा नया मुद्दा क्या है, तथ्य क्या हैं - ये सब  योद्धा। " লীব্ূনাপ্সিক্ধ  बाद की बातें हैं, पहले कैमरा ऑन होना चाहिए।  हमारे देश में अब विरोध भी इवेंट मैनेजमेंट जैसा हो गया है। तख्त़ियाँ पहले छपती हैं, नारे बाद में तय होते हैं। और अगर सामने कोई बड़ा नेता हो - तो समझिए " लोकतांत्रिक उत्सव " 71 ಕ1 का बोनस संस्करण चल सोचिए आम आदमी बेचारा लाइन में खड़ा होकर फॉर्म भरता है शिकायत दर्ज कराता है, महीनों इंतज़ार करता है। और इधर कुछ लोग सीधे घेराव एक्सप्रेस से अपनी बात पहुँचाते हैं। लोकतंत्र भी शायद सोचता होगा ~ "मेरे नाम पर ये सब বরমা-নমা চী ২৪া ট!" व्यंग्य यह नहीं कि सवाल पूछे जा रहे हैं ~ सवाल पूछना तो लोकतंत्र की जान है। व्यंग्य यह है कि सवाल कमः तमाशा गया है। बहस कम, आरोप ज़्यादा  समाधान कम ज़्यादा शोर ज़्यादा आदमी की सुरक्षा  भी बड़ा मासूम है। उसे  ব্রূা সনাল अब आम कौन घेरेगा? उसके पास न तो मीडिया है॰ न माइक। उसे तो EMI, बिल और ट्रैफिक ही घेरे रहते हैं। उस पर आरोप  बस भी लगे तो घरवाले ही जज बन जाते हैं। शायद लोकतंत्र अब चुपचाप कोने में बैठकर यही सोच रहा है "मुझे चलाना था, तुमने मुझे चलाना ही बना दिया। " और जनता? भी उम्मीद में है कि कभी शोर से ज़्यादा समझ की वह आज সানাত মুনী  எரரிர் - ShareChat
#🌞 Good Morning🌞 #🌷शुभ रविवार
🌞 Good Morning🌞 - आज की सीखः जो काम सही है, उसे करने के लिए भीड़ की ज़रूरत नहीं हिम्मत और नीयत की ज़रूरत होती है। धीरे चलो , पर सही दिशा में चलो छोटी छोटी अच्छी आदतें ही बड़े बदलाव लाती हैं। सम्मान मांगने से नहीं , व्यवहार से मिलता है। आज की सीखः जो काम सही है, उसे करने के लिए भीड़ की ज़रूरत नहीं हिम्मत और नीयत की ज़रूरत होती है। धीरे चलो , पर सही दिशा में चलो छोटी छोटी अच्छी आदतें ही बड़े बदलाव लाती हैं। सम्मान मांगने से नहीं , व्यवहार से मिलता है। - ShareChat
#🇮🇳 देशभक्ति #🎖️देश के जांबाज झलकारी बाई भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक महान वीरांगना थीं, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ अद्भुत साहस और बलिदान का परिचय दिया। वे सामान्य परिवार में जन्मी थीं, लेकिन उनके शौर्य और निष्ठा ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। जन्म और प्रारंभिक जीवन झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर 1830 के आसपास उत्तर प्रदेश के झांसी के निकट भोजला गांव में हुआ माना जाता है। उनके पिता का नाम सदोवर सिंह (या सदोबा) था। बचपन से ही वे निर्भीक और साहसी थीं। जंगलों में रहकर उन्होंने घुड़सवारी, हथियार चलाना और आत्मरक्षा के कौशल सीख लिए थे। कहा जाता है कि उन्होंने अकेले जंगली जानवर का सामना भी किया था। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल होना झलकारी बाई का विवाह पूरन सिंह से हुआ, जो झांसी की सेना में सैनिक थे। उनके माध्यम से झलकारी बाई का संपर्क रानी लक्ष्मीबाई से हुआ। उनकी बहादुरी और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर रानी ने उन्हें अपनी महिला सेना “दुर्गा दल” में शामिल कर लिया। झलकारी बाई का चेहरा और कद-काठी भी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलती-जुलती बताई जाती है। 1857 के संग्राम में भूमिका जब अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण किया, तब झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युद्ध के दौरान उन्होंने रानी के वेश में किले से बाहर निकलकर अंग्रेजों को भ्रमित किया, ताकि रानी सुरक्षित निकल सकें। इस साहसी कदम से अंग्रेजों की सेना कुछ समय के लिए उलझ गई और रानी को रणनीतिक लाभ मिला। बलिदान और स्मरण झलकारी बाई के अंतिम समय के बारे में अलग-अलग कथाएँ मिलती हैं — कुछ विवरणों में उन्हें युद्ध में वीरगति प्राप्त बताते हैं, जबकि कुछ में गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है। लेकिन यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना झांसी और रानी के लिए असाधारण साहस दिखाया। महत्व झलकारी बाई सामाजिक रूप से वंचित वर्ग से आई वीरांगना थीं, इसलिए उनका योगदान और भी प्रेरणादायक है। आज उन्हें साहस, निष्ठा और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। कई स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं और स्मारक स्थापित हैं, और उनके नाम पर योजनाएं व संस्थान भी चल रहे हैं।
#💔दर्द भरी कहानियां
💔दर्द भरी  कहानियां - गाँव के किनारे एक छोटा सा घर था, जहाँ अर्जुन अपनी दादी  के साथ रहता था। घर पुराना था, दीवारों पर दरारें थीं, पर आँगन में तुलसी का पौधा रोज़ नया लगता था। अर्जुन रोज़  जैसे कोई त्योहार आने वाला हो। डाकिए का इंतज़ार करता उसके पिता शहर गए थे कमाने। जाते समय बोले थे, " जल्दी  बेटा, तुम्हारे लिए बड़ी घड़ी लाऊँगा। " तब अर्जुन छोटा लौटूंगा " घड़ी पहनने लायक हो गया, पर पिता नहीं लौटे।  থা| ঔন हर दिन वह सड़क तक जाता , धूल उड़ती देखता और सोचता " दूसरे घरों में चिट्ठियाँ  शायद आज आएँगे | डाकिया आता, बाँटता , अर्जुन की तरफ देखकर बस मुस्कुरा देता - " आज  भी नहीं। " दादी समझातीं , "बेटा, उम्मीद का दिया जलाए रखो।" अर्जुन पूछता, "दिया बुझ गया तो?" दादी कहतीं, "फिर सुबह का इंतज़ार करना। " दिन दादी भी चली गईं। घर और शांत हो गया। आँगन में  एक বুলবী সুত্রন লশী | সতুন ন পন্কলী  डाकिए से पूछा बार कभी ऐसी चिट्ठी भी आती है जो देर से नहीं , बहुत देर से = क्या आती हो? डाकिए ने उसके सिर पर हाथ रखा , पर जवाब नहीं दिया। हर दरवाज़े  सालों बाद अर्जुन खुद डाकिया बन गया अब वह ~ धीरे से, उम्मीद के साथ। उसे समझ आ पर दस्तक देता गया था - कुछ चिट्ठियाँ कागज़ पर नहीं आतीं, लोग बनकर  आती हैं .. और कुछ लोग कभी नहीं आते, पर इंतज़ार हमें बड़ा बना जाता है। आँगन में उसने फिर से तुलसी लगा दी। के लिए नहीं - याद के लिए।  इस बार इंतज़ार  गाँव के किनारे एक छोटा सा घर था, जहाँ अर्जुन अपनी दादी  के साथ रहता था। घर पुराना था, दीवारों पर दरारें थीं, पर आँगन में तुलसी का पौधा रोज़ नया लगता था। अर्जुन रोज़  जैसे कोई त्योहार आने वाला हो। डाकिए का इंतज़ार करता उसके पिता शहर गए थे कमाने। जाते समय बोले थे, " जल्दी  बेटा, तुम्हारे लिए बड़ी घड़ी लाऊँगा। " तब अर्जुन छोटा लौटूंगा " घड़ी पहनने लायक हो गया, पर पिता नहीं लौटे।  থা| ঔন हर दिन वह सड़क तक जाता , धूल उड़ती देखता और सोचता " दूसरे घरों में चिट्ठियाँ  शायद आज आएँगे | डाकिया आता, बाँटता , अर्जुन की तरफ देखकर बस मुस्कुरा देता - " आज  भी नहीं। " दादी समझातीं , "बेटा, उम्मीद का दिया जलाए रखो।" अर्जुन पूछता, "दिया बुझ गया तो?" दादी कहतीं, "फिर सुबह का इंतज़ार करना। " दिन दादी भी चली गईं। घर और शांत हो गया। आँगन में  एक বুলবী সুত্রন লশী | সতুন ন পন্কলী  डाकिए से पूछा बार कभी ऐसी चिट्ठी भी आती है जो देर से नहीं , बहुत देर से = क्या आती हो? डाकिए ने उसके सिर पर हाथ रखा , पर जवाब नहीं दिया। हर दरवाज़े  सालों बाद अर्जुन खुद डाकिया बन गया अब वह ~ धीरे से, उम्मीद के साथ। उसे समझ आ पर दस्तक देता गया था - कुछ चिट्ठियाँ कागज़ पर नहीं आतीं, लोग बनकर  आती हैं .. और कुछ लोग कभी नहीं आते, पर इंतज़ार हमें बड़ा बना जाता है। आँगन में उसने फिर से तुलसी लगा दी। के लिए नहीं - याद के लिए।  इस बार इंतज़ार - ShareChat