Arvind Bhardwaj
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संतोषं परमं सुखं 〰️〰️🌼〰️〰️ एक गांव में एक गरीब आदमी रहता था। वह बहुत मेहनत करता, किंतु फिर भी वह धन न कमा पाता। इस प्रकार उसके दिन बड़ी मुश्किल से बीत रहे थे। कई बार तो ऐसा हो जाता कि उसे कई कई दिनों तक सिर्फ एक वक्त का खाना खाकर ही गुजारा करना पड़ता। इस मुसीबत से छुटकारा पाने का कोई उपाय उसे न सूझता। एक दिन उसे एक महात्मा जी मिल गए। उसने उन महात्मा जी की खूब सेवा की। महात्मा जी उसकी सेवा से प्रसन्न हो गए। और उसे भगवान की आराधना का एक मंत्र दिया। मंत्र से कैसे प्रभु का स्मरण किया जाए, उसकी पूरी विधि भी महात्मा जी ने उसे बता दी। वह व्यक्ति उस मंत्र से भगवान का स्मरण करने लगा। कुछ दिन मंत्राराधना करने पर देवी उसके सामने प्रकट हुई। देवी ने उससे कहा, ”मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूं। बोलो क्या चाहेते हो? निर्भय होकर मांगो।“ देवी को इस प्रकार सामने प्रकट हुआ देख वह व्यक्ति एकाएक घबरा गया। क्या मांगा जाए, यह वह तुरंत तय ही न कर सका, इसलिए हड़बड़ाहट में बोला, ”देवी जी, इस समय तो नहीं, हां मैं कल आपसे मांग लूंगा।“ देवी जी कल प्रातः आने के लिए कहकर अंतर्धान हो गई। घर जाकर वह व्यक्ति सोच में पड़ गया कि देवी से क्या मांगा जाए? उसके मन में आया कि रहने के लिए घर नहीं है, इसलिए वही मांगा जाए। घर भी कैसा मांगा जाए, वह उस पर विचार करने लगा। ये जमींदार लोग गांव के सब लोगों पर रोब गांठते हैं, इसलिए देवी से वर मांगकर मैं जमींदार हो जाऊं, तो अच्छा रहे। यह विचार कर उसने जमींदारी मांगने का निर्णय कर लिया। इस विचार के आने के बाद वह सोचने लगा कि जब लगान भरने का समय आता है, तब ये जमींदार भी तो तहसीलदार साहब की आरजू मिन्नतें करते हैं। इस प्रकार इन जमींदारों से बड़ा तो तहसीलदार ही है, इसलिए जब बनना ही है तो बड़ा तहसीलदार क्यों न बन जाऊं? इस प्रकार विचार कर वह तहसीलदार बनने की इच्छा करने लगा। अब वह इस निर्णय से खुश था। लेकिन, उसके मन में विचार समाप्त नहीं हुए और कुछ देर बाद उसे जिलाधीश का ध्यान हो आया। वह जानता था कि जिलाधीश साहब के सामने तहसीलदार भी कुछ नहीं है। तहसीलदार तो भीगी बिल्ली सा बना रहता है, जिलाधीश के सामने। इस तरह उसे अब तहसीलदार का पद भी फीका लगने लगा था। अतः इच्छाएं बढ़ती चली गईं। वह सोचने विचारने में ही इतना फंस गया कि कुछ तय नहीं कर पाया कि क्या मांगा जाए। इस तरह तो दिन बीता ही, रात भी बीत गई। दूसरे दिन सवेरा हुआ। वह अभी भी कुछ निर्णय नहीं कर पाया था। ज्यों ही सूरज की पहली किरण पृथ्वी पर पड़ी त्यों ही देवी उसके सामने प्रकट हो गईं। उन्होंने पूछा, ”बोलो, अब क्या चाहते हो? अब तो तुमने सोच विचार कर निश्चय कर लिया होगा कि क्या मांगना है?“ उसने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, ”देवी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो सिर्फ भगवान की भक्ति और आत्म संतोष का गुण दीजिए। यही मेरे लिए पर्याप्त है।“ देवी ने पूछा, ”क्यों भई, तुमने धन दौलत क्यों नहीं मांगी?“ वह विनम्रता से बोला, ”देवी, मेरे पास दौलत नहीं आई। बस आने की आशा मात्र हुई तो मुझे उसकी चिंता से रात भर नींद नहीं आई। यदि वास्तव में मुझे दौलत मिल जाएगी, तो फिर नींद तो एकदम विदा ही हो जाएगी। इसलिए मैं जैसा हूं, वैसा ही रहना चाहता हूं। आत्म संतोष का गुण ही सबसे बड़ी दौलत होती है। आप मुझे यही दीजिए। साथ ही यह संसार सागर पार करने के लिए भगवान नाम के स्मरण का गुण दीजिए।“ देवी ने उसे आर्शीवाद दे दिया। वह व्यक्ति पहले की तरह प्रसन्नता से अपना जीवन बिताने लगा। जीवन में संतुष्टि से बड़ा कोई धन नहीं है और न ही इससे बड़ा कोई सुख है। जय जय श्री राधे 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #🖊 एक रचना रोज़ ✍
गोवर्धन पर्वत धारण करने पर नीचे की भूमि जलमग्न क्यों नहीं हुई..? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एक समय शिवजी ने पार्वती जी के सामने सन्तों की बड़ी महिमा गाई। सन्तों की महिमा सुनकर पार्वती जी की श्रद्धा उमड़ी और उसी दिन उन्होंने श्री अगस्त्य मुनि को भोजन का निमन्त्रण दे डाला तथा शिवजी को बाद में इस बाबत बतलाया तो सुनकर शिवजी हंसे और कहा “आज ही तो सन्तों में श्रद्धा हुई और आज ही ऐसे सन्त को न्यौता दे दिया। अगर किसी को भोजन कराना ही था, तो किसी कम भोजन करने वाले मुनि को ही न्यौता दे देती। तुम अगस्त्य को नहीं जानती तीन चुल्लू में समुद्र सोख गए थे। भला इनका पेट भरना कोई हंसी खेल है। यदि भुखे रह गए तो लोक में बड़ी निन्दा होगी। जीवन में एक बार शिव के यहाँ गए और भूखे ही लौटे। भद्रे! कार्य विचार कर नहीं किया।” पार्वती जी बोलीं-“अब तो न्यौता दे ही दिया उसमें उलट-फेर होने की नहीं, चाहे जो भी हो।” शिवजी बोले-“तो तुम जानो तुम्हारा काम जाने, मैं तो चुपचाप राम-राम जपूँगा।” पार्वती जी तो साक्षात् अन्नपूर्णा ठहरी उन्होनें सोचा जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पूर्ण भोजन करा देती हूँ, तो एक ऋषि का पेट नहीं भर सकती। अवश्य तृप्त ही नहीं महातृप्त करके भेजूँगी। फिर क्या था, बड़े जोर-शोर से तैयारी हुई। खाद्यान्नों के पहाड़ लग गए। आखिर कितना खायेंगे ऋषि। जब अगस्त्य जी खाने को बैठे तो भोजन का कोई हिसाब ही नही। आखिर परोसने वाली साक्षात् अन्नपूर्णा, इतना मधुर और इतना स्वादिष्ट भोजन। पार्वती जी अपनी समस्त सखियों-सहेलियों सहित दौड़-दौड़कर परोसती रहीं कि भोजन का तारतम्य न टूटे। टोकरी की टोकरी थाल में पलट दी जाती थी, किन्तु इधर यह भी खूब रही कि क्षणभर में थाली साफ। खाते-खाते जब अगस्त्य जी की जठराग्नि धधकी तो उन्हें भोजन को हाथ से उठा-उठाकर ग्रास-ग्रास खाने की जरुरत ही नहीं रही। भोजन स्वयं खिंचकर उनके मुँह मे जाने लगा। परोसने वाली सखियां घबरायी कि कहीं भोजन के साथ हम सब भी न खिंची चली जायें। ऋषि जी का ढ़ंग देखकर माता अन्नपूर्णा भी अचम्भे में पड़ गई। सोचने लगी अब तो भगवान् ही मर्यादा रखेंगे। ठीक कहा था शम्भूजी ने, किन्तु साथ ही पार्वती को शिव पर झुंझलाहट भी हो रही थी कि देखो तो, मैं तो हैरान हूँ। ऐसे समय पर मेरी सहायता के बजाय मुँह फेरे बैठे हैं। निरुपाय अन्नपूर्णा ने भगवान का द्वार खटखटाया। ठीक भी है ‘हारे को हरिनाम’ प्रसिद्ध ही है। भगवान तुरन्त ही बाल ब्रह्मचारी का रुप धारणकर आ पहुँचे और बोले-“भगवती भिक्षां देही।” पार्वती जी घबरायी “मैं तो एक ही को पूर्ण करने में परेशान हूँ। ये दूसरे समाज सेवक भी आ धमके, सो भी भूखे ही।” परन्तु धर्म से विवश होकर ब्रह्मचारी जी के लिए भी ऋषि के समीप ही आसन लगाया जाने लगा। अगस्त्य जी अपने समीप आसन नहीं लगाने देते थे, किन्तु ब्रह्मचारी भी पूरे जिद्दी थे। अड़ गये कि बैठूंगा तो यहीं। हारकर अगस्त्य जी चुप हो गए। बाल ब्रह्मचारी जी ने थोड़ा सा भोजन पाकर ही आचमन कर लिया। माता पार्वती ने पूछा-“प्रभो! इतनी जल्दी खाना क्यों बन्द कर दिया?” वे बोले-“हम ब्रह्मचारी हैं अधिक खाने से आलस्य प्रमाद आता है, जिससे भजन में बाधा होती है और क्या हम इनकी तरह भूखे थोड़े ही हैं, कि पूर्ण ही न हों।” उधर अगस्त्य जी ने भी संकोच के कारण खाना बन्द कर दिया, कि पंगत में एक खाता रहे और दूसरा आचमन कर ले। दूसरी बात यह कि जो बाद में आया वह पहले खा चुका। खाना तो बन्द कर दिया, किन्तु अगस्त्य जी ने जल नहीं पिया था। वह ब्रह्मचारी पर बिगड़े-“तुमने मुझे जल नहीं पीने दिया।” भगवान ने कृपा करके अपने स्वरुप के दर्शन कराए और कहा-“आप धैर्य धरें। आपको जल मैं द्वापर में पिलाऊँगा। निमन्त्रण मैं आज ही देता हूँ।” जब इन्द्र ने अपने लिए होने वाले यज्ञ के बन्द होने पर ब्रज डुबोने के लिए अतिवृष्टि की थी तब भगवान ने उस जल का शोषण करने कि लिए अगस्त्य ऋषि को नियुक्त किया था। इस कारण नीचे की जमीन जलमग्न नहीं होने पायी। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ *🌹🙏श्री राधे राधे🌹🙏* #🖊 एक रचना रोज़ ✍
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