जो मानव शरीर की नश्वरता और दिखावे के प्रति कड़ा कटाक्ष करता है।
अर्थ:
लोग सुंदर शरीर (चाम/त्वचा) को देखकर ही प्रेम (अनुराग) करते हैं और आकर्षित होते हैं। कबीरदास जी कहते हैं कि यदि इस शरीर पर चाम (खाल) का आवरण न हो, तो यह अत्यंत भयानक दिखेगा और कौवे इसे जीवित रहते ही खा जाएंगे।
मूल भाव:
दिखावे का अंत: सुंदरता केवल ऊपरी खाल (त्वचा) का खेल है।
शरीर की नश्वरता: शरीर की असलियत मांस और हड्डियों का ढांचा है, इस पर अहंकार नहीं करना चाहिए।
आध्यात्मिक संदेश: मनुष्य को नश्वर देह के बजाय नित्य परमात्मा से प्रेम करना चाहिए।
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