Harish Prajapati
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Harish Prajapati
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श्री शिवाय नमस्तुभ्यम्
#🌺 श्री गणेश #👌 अच्छी सोच👍 #🙏सुविचार📿 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #✍️ जीवन में बदलाव
🌺 श्री गणेश - सब सदाशिव" जीवन स्वयं जलहै और प्यास भी। जीवन स्वयं परीक्षा है परिक्षक भी। जीवन स्वयं वरदान है अभिषाप भी।बस मनुष्य की सोच और कर्म सकारात्मक होने चाहिए बाकी सब स्वतः ही सकारा्त्मक होने लगता है। हरीश प्रजापति, सब सदाशिव" जीवन स्वयं जलहै और प्यास भी। जीवन स्वयं परीक्षा है परिक्षक भी। जीवन स्वयं वरदान है अभिषाप भी।बस मनुष्य की सोच और कर्म सकारात्मक होने चाहिए बाकी सब स्वतः ही सकारा्त्मक होने लगता है। हरीश प्रजापति, - ShareChat
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🌺 श्री गणेश - "মুনে ম০াহিন" जहां ज्ञान होता है वहां स्वार्थ ईर्ष्या तृष्णा नही होती है और जहां मोह स्वार्थ. ईर्ष्या मोह होता है वहां ज्ञान नही ठहर सकता। हरीश प्रजापति "মুনে ম০াহিন" जहां ज्ञान होता है वहां स्वार्थ ईर्ष्या तृष्णा नही होती है और जहां मोह स्वार्थ. ईर्ष्या मोह होता है वहां ज्ञान नही ठहर सकता। हरीश प्रजापति - ShareChat
#🌺 श्री गणेश #👌 अच्छी सोच👍 #🙏सुविचार📿 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #✍️ जीवन में बदलाव
🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " मनुष्य जब अमरतत्व की प्राप्ति के लिए शास्त्रोक्त नियत विधि अपनाता है उसे यज्ञ कहते हैं। और इस यज्ञ को क्रियान्वित करने को कर्म कहते हैं। अर्थ यह हुआ मनुष्य अष्टांग योग प्राणायाम तथा अपने द्रव्य दान ज्ञान दान द्वारा जो कर्मों की आहूति देता है यज्ञ में वही ईश्वर की प्राप्ति की नियत विधि और साधन हैं। हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " मनुष्य जब अमरतत्व की प्राप्ति के लिए शास्त्रोक्त नियत विधि अपनाता है उसे यज्ञ कहते हैं। और इस यज्ञ को क्रियान्वित करने को कर्म कहते हैं। अर्थ यह हुआ मनुष्य अष्टांग योग प्राणायाम तथा अपने द्रव्य दान ज्ञान दान द्वारा जो कर्मों की आहूति देता है यज्ञ में वही ईश्वर की प्राप्ति की नियत विधि और साधन हैं। हरीश प्रजापति - ShareChat
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🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " आत्म दर्शन आत्म साक्षात्कार आत्म स्थिति चाहे कहो कि ईश्वर के दर्शन इन सबको पाना ही आध्यात्मिकता में इस प्रश्न का उत्तर है कि "मैं कौन हूं" तथा इन सब का मूल आधार है संस्कार निर्माण के प्रत्येक कारण का समाप्त हो जाना। हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " आत्म दर्शन आत्म साक्षात्कार आत्म स्थिति चाहे कहो कि ईश्वर के दर्शन इन सबको पाना ही आध्यात्मिकता में इस प्रश्न का उत्तर है कि "मैं कौन हूं" तथा इन सब का मूल आधार है संस्कार निर्माण के प्रत्येक कारण का समाप्त हो जाना। हरीश प्रजापति - ShareChat
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🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " मनुष्य देह मे स्थित आत्मा उतनी ही पवित्र होती है जितने कि स्वयं ईश्वर लेकिन यह मनसहित इन्द्रियों के व्यापार को लेकर एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करती रहती है। और मनरूपी अधिष्ठा्ता तथा ज्ञानेंद्रियों द्वारा विषयों में प्रवृत्त हो जाता है। जिसके कारण इस आत्मा का उद्धार और शांति की प्राप्ति नहीं हो पाती। जब तक प्रवृत्ति न छूटेगी तब तक संस्कार निर्माण नहीं रुकेगा और जब तक संस्कार निर्माण के कारण  पुनर्निर्माण की प्रक्रिया नहीं समाप्त नहीं होंगे तब तक शरीरों के रुकेगी। हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " मनुष्य देह मे स्थित आत्मा उतनी ही पवित्र होती है जितने कि स्वयं ईश्वर लेकिन यह मनसहित इन्द्रियों के व्यापार को लेकर एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करती रहती है। और मनरूपी अधिष्ठा्ता तथा ज्ञानेंद्रियों द्वारा विषयों में प्रवृत्त हो जाता है। जिसके कारण इस आत्मा का उद्धार और शांति की प्राप्ति नहीं हो पाती। जब तक प्रवृत्ति न छूटेगी तब तक संस्कार निर्माण नहीं रुकेगा और जब तक संस्कार निर्माण के कारण  पुनर्निर्माण की प्रक्रिया नहीं समाप्त नहीं होंगे तब तक शरीरों के रुकेगी। हरीश प्रजापति - ShareChat
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🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " स्त्री स्वयं पृथ्वी होती है जिसमें सहनशीलता सृजनात्मकता होती है। यह चेतना प्रेरणा उत्साह की पर्याय होती है। पत्नी रूप में यह ग्रहस्थ आश्रम की आत्मा होती है। और वंशवृद्धि में नवीन सृजन का आधार बनकर स्वयं नवीन सृजन को सींचती है अपने रक्त से। इसलिए नारी का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। नारी की रक्षा सुरक्षा करना पुरुष का धर्म होता है। जहां नारी को सम्मान और प्रेम दिया जाता है वहां देवता उत्साह मनाते हैं और उत्साह में ही रहते हैं। हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " स्त्री स्वयं पृथ्वी होती है जिसमें सहनशीलता सृजनात्मकता होती है। यह चेतना प्रेरणा उत्साह की पर्याय होती है। पत्नी रूप में यह ग्रहस्थ आश्रम की आत्मा होती है। और वंशवृद्धि में नवीन सृजन का आधार बनकर स्वयं नवीन सृजन को सींचती है अपने रक्त से। इसलिए नारी का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। नारी की रक्षा सुरक्षा करना पुरुष का धर्म होता है। जहां नारी को सम्मान और प्रेम दिया जाता है वहां देवता उत्साह मनाते हैं और उत्साह में ही रहते हैं। हरीश प्रजापति - ShareChat
#🌺 श्री गणेश #👌 अच्छी सोच👍 #🙏सुविचार📿 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #✍️ जीवन में बदलाव
🌺 श्री गणेश - "aaaRa" मनुष्य के ऊपर मुख्य रूप से तीन ऋण होते हैं। पहला देव ऋण दूसरा ऋषि ऋण तीसरा पितृ ऋण। देव ऋण भगवान विष्णु का होता है ऋषि ऋण भगवान शंकर जी का होता है और पितृ ऋण स्वयं geastaaaaaaaaataguaa aaaaaa बच सकता है। ऋण चुकाने की शास्त्रानुसार विधी है - देव ऋण को दान करके चुकाते हैं ऋषि ऋण को ज्ञान प्राप्ति और ज्ञान को बांटकर चुकाया जाता है तथा पितृ ऋण को सन्तान की उत्पत्ति के द्वारा चुकाया जाता है। इन ऋणों को बिना चुकाये जो मनुष्य संसार से चला जाता है उसका जीवन अपमानित माना जाता है। हरीश प्रजापति "aaaRa" मनुष्य के ऊपर मुख्य रूप से तीन ऋण होते हैं। पहला देव ऋण दूसरा ऋषि ऋण तीसरा पितृ ऋण। देव ऋण भगवान विष्णु का होता है ऋषि ऋण भगवान शंकर जी का होता है और पितृ ऋण स्वयं geastaaaaaaaaataguaa aaaaaa बच सकता है। ऋण चुकाने की शास्त्रानुसार विधी है - देव ऋण को दान करके चुकाते हैं ऋषि ऋण को ज्ञान प्राप्ति और ज्ञान को बांटकर चुकाया जाता है तथा पितृ ऋण को सन्तान की उत्पत्ति के द्वारा चुकाया जाता है। इन ऋणों को बिना चुकाये जो मनुष्य संसार से चला जाता है उसका जीवन अपमानित माना जाता है। हरीश प्रजापति - ShareChat
#🌺 श्री गणेश #👌 अच्छी सोच👍 #✍️ जीवन में बदलाव #👉 लोगों के लिए सीख👈 #🙏सुविचार📿
🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " जीवन स्वयं में परिभाषा है। जीवन सत्य और असत्य दो किनारों के मध्य नदी की तरह है। जिसमें सत्य और असत्य दोनों का योग होता है लेकिन मनुष्य को चाहिए कि वह असत्य की एक भी बूंद अपने वस्त्र पर न पड़ने दे। सत्य और असत्य के योग में से ज्ञान  संघर्ष कर्म भक्तिद्वारा सत्यको छान ले। जब मनुष्य के हाथ सत्य लग जाए तो उसे पता चलता है कि हमने इस संसार से कितना और क्या लिया है हमने इस जीवन में संसार को दिया क्या ? हमारे ऊपर प्रकृति देव समाज परिवार के कितने ऋण है और इन ऋणों को उतारे कैसे ? हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " जीवन स्वयं में परिभाषा है। जीवन सत्य और असत्य दो किनारों के मध्य नदी की तरह है। जिसमें सत्य और असत्य दोनों का योग होता है लेकिन मनुष्य को चाहिए कि वह असत्य की एक भी बूंद अपने वस्त्र पर न पड़ने दे। सत्य और असत्य के योग में से ज्ञान  संघर्ष कर्म भक्तिद्वारा सत्यको छान ले। जब मनुष्य के हाथ सत्य लग जाए तो उसे पता चलता है कि हमने इस संसार से कितना और क्या लिया है हमने इस जीवन में संसार को दिया क्या ? हमारे ऊपर प्रकृति देव समाज परिवार के कितने ऋण है और इन ऋणों को उतारे कैसे ? हरीश प्रजापति - ShareChat
#🌺 श्री गणेश #👌 अच्छी सोच👍 #🙏सुविचार📿 #👉 लोगों के लिए सीख👈 #✍️ जीवन में बदलाव
🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " मनुष्य को अपने जीवन में आवश्यकता से अधिक सीधा और सरल रहना स्वयं के लिए के लिए कष्टकारी बन सकता है यह बात सत्य है। लेकिन अपनी बाहृय प्रतिष्ठा के लिए आत्म प्रतिष्ठा का त्याग नहीं करना चाहिए। परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो सच्चाई और ईमानदारी का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की बाहृय प्रतिष्ठा कितनी भी छोटी क्यों न हो लेकिन आत्म प्रतिष्ठा हमेशा - हमेशा ही बड़ी और पवित्र रहनी चाहिए। क्योंकि परमात्मा मनुष्य की बाह्य प्रतिष्ठा नहीं देखते वो मनुष्य की आत्म प्रतिष्ठा और पवित्रता को देखते है। हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " मनुष्य को अपने जीवन में आवश्यकता से अधिक सीधा और सरल रहना स्वयं के लिए के लिए कष्टकारी बन सकता है यह बात सत्य है। लेकिन अपनी बाहृय प्रतिष्ठा के लिए आत्म प्रतिष्ठा का त्याग नहीं करना चाहिए। परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो सच्चाई और ईमानदारी का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की बाहृय प्रतिष्ठा कितनी भी छोटी क्यों न हो लेकिन आत्म प्रतिष्ठा हमेशा - हमेशा ही बड़ी और पवित्र रहनी चाहिए। क्योंकि परमात्मा मनुष्य की बाह्य प्रतिष्ठा नहीं देखते वो मनुष्य की आत्म प्रतिष्ठा और पवित्रता को देखते है। हरीश प्रजापति - ShareChat
#🌺 श्री गणेश #👌 अच्छी सोच👍 #✍️ जीवन में बदलाव #👉 लोगों के लिए सीख👈 #🙏सुविचार📿
🌺 श्री गणेश - "सांब सदाशिव " ईश्वर ने मनुष्य को यह दुर्लभ शरीर धर्म करने तथा परमात्मा की भक्तिके लिए दिया है जिससे यह मनुष्य अपने को परमशान्ति में में सुख स्थापित कर ले। तो मनुष्य को चाहिए कि वह वस्तुओं * और शांति ढूंढने का प्रयत्न न करें प्रयत्न करे तो वह अपने धर्म कर्म को निभाने में करे। जब मनुष्य अपने धर्म को पूर्ण तरीके से निर्वाह करता है तो स्वतः ही उसे शांति का आभाष होने लगेगा। क्योंकि अशांति और दुखो का एक कारण यह भी है कि वह अपने धर्म कर्म को उचित रूप से निर्वाह नहीं करता हैं। हरीश प्रजापति "सांब सदाशिव " ईश्वर ने मनुष्य को यह दुर्लभ शरीर धर्म करने तथा परमात्मा की भक्तिके लिए दिया है जिससे यह मनुष्य अपने को परमशान्ति में में सुख स्थापित कर ले। तो मनुष्य को चाहिए कि वह वस्तुओं * और शांति ढूंढने का प्रयत्न न करें प्रयत्न करे तो वह अपने धर्म कर्म को निभाने में करे। जब मनुष्य अपने धर्म को पूर्ण तरीके से निर्वाह करता है तो स्वतः ही उसे शांति का आभाष होने लगेगा। क्योंकि अशांति और दुखो का एक कारण यह भी है कि वह अपने धर्म कर्म को उचित रूप से निर्वाह नहीं करता हैं। हरीश प्रजापति - ShareChat