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#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - स्याही सूखे न कभी - ೆಕ  (कविता ) ऐ! जिन्दगी क्या लिखूँ तुझ पर? गमगीन हृदय के भावों से॰ कर दूँ मन का हर कोना, पावन स्पर्श कर सकूं हर एक रूह को।। कुविचारों को तज कर सारे, चिंतन की कोई नई रीत दूँ। समर्पित होकर उकेर सकूं मैं, पीड़ा।। दुख ्तकलीफ़ जन की शब्दों में मायूसी कभी न भरना खोखले रिवाजों में न समेटना। अंतर्मन के सारे द्वंद निकलें चुनिंदा कुछ एहसास हमें देना।।  कोरी न रह जाएँ मेरी कल्पना, खुशियों के बेशुमार मोती देना।  व्याकुलता मिट जाए सारी, श्रृंगारित ऐसी कविता कर देना।। छंद, रस, अलंकार न जानूँ अर्थ को तुम अनर्थ न करना।  संयम की सीमा पार न करूँ शील, गुण, धर्म का मार्ग देना।।  खामोशी मेरी कहती है क्या, कागज पर सब बयां कर देना। भावनाओं को स्याही सूखे न कभी, प्रेम की गहराई अथाह भर देना।।  रुके न ये सृजन का सिलसिला,  सरोजनसी यूं ही सुशोभित रहूँ जीवन के शांत सरोवर में सदा शब्दकोश उर में निर्मित करू।। सरोज कंसारी, कवयित्री लेखिका शिक्षिका ব্রুা হাককি মসিনি अध्यक्ष गोबरा नवापारा राजिम। [रायपुर, छग. ] स्याही सूखे न कभी - ೆಕ  (कविता ) ऐ! जिन्दगी क्या लिखूँ तुझ पर? गमगीन हृदय के भावों से॰ कर दूँ मन का हर कोना, पावन स्पर्श कर सकूं हर एक रूह को।। कुविचारों को तज कर सारे, चिंतन की कोई नई रीत दूँ। समर्पित होकर उकेर सकूं मैं, पीड़ा।। दुख ्तकलीफ़ जन की शब्दों में मायूसी कभी न भरना खोखले रिवाजों में न समेटना। अंतर्मन के सारे द्वंद निकलें चुनिंदा कुछ एहसास हमें देना।।  कोरी न रह जाएँ मेरी कल्पना, खुशियों के बेशुमार मोती देना।  व्याकुलता मिट जाए सारी, श्रृंगारित ऐसी कविता कर देना।। छंद, रस, अलंकार न जानूँ अर्थ को तुम अनर्थ न करना।  संयम की सीमा पार न करूँ शील, गुण, धर्म का मार्ग देना।।  खामोशी मेरी कहती है क्या, कागज पर सब बयां कर देना। भावनाओं को स्याही सूखे न कभी, प्रेम की गहराई अथाह भर देना।।  रुके न ये सृजन का सिलसिला,  सरोजनसी यूं ही सुशोभित रहूँ जीवन के शांत सरोवर में सदा शब्दकोश उर में निर्मित करू।। सरोज कंसारी, कवयित्री लेखिका शिक्षिका ব্রুা হাককি মসিনি अध्यक्ष गोबरा नवापारा राजिम। [रायपुर, छग. ] - ShareChat
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📚कविता-कहानी संग्रह - अंतर्द्वद से अमन तक ! (कविता ) নিপাম से मिलता आत्मज्ञान आस्था व नेकी की राह पर बढ़ता हर इक कदम। मन में कुविचार का होता नहीं संचार, साहस, धैर्य, संयम रहते हरपल संग। प्रभु कृपा से सारे बिगड़े काम बनें मुश्किल से लडने की मिले शक्ति अपार। जीने का मिल जाता एक पक्का आधार, भगवान् भी रखते भक्त का सदा ध्यान। निराशा में भी खुलता आशाओं का द्वार, अंतर्मन में मिट जाते सारे द्वंद्व। अशांत मन भी हो जाता एकदम शांत, चेहरे पर आ जाती ग़जब की चमक। दूर हो जाती चिंता व प्रत्येक दुविधा, से जुड़ जाती लगन। एकाग्रता और ध्यान अंतर्मन को शांत कर, पाता है इंसान, जीवन का सच्चा सुख, सच्चा अमन। -सरोज कंसारी कवयित्री लेखिका शिक्षिका दुर्गा शक्ति समिति अध्यक्ष गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर, छ.ग. अंतर्द्वद से अमन तक ! (कविता ) নিপাম से मिलता आत्मज्ञान आस्था व नेकी की राह पर बढ़ता हर इक कदम। मन में कुविचार का होता नहीं संचार, साहस, धैर्य, संयम रहते हरपल संग। प्रभु कृपा से सारे बिगड़े काम बनें मुश्किल से लडने की मिले शक्ति अपार। जीने का मिल जाता एक पक्का आधार, भगवान् भी रखते भक्त का सदा ध्यान। निराशा में भी खुलता आशाओं का द्वार, अंतर्मन में मिट जाते सारे द्वंद्व। अशांत मन भी हो जाता एकदम शांत, चेहरे पर आ जाती ग़जब की चमक। दूर हो जाती चिंता व प्रत्येक दुविधा, से जुड़ जाती लगन। एकाग्रता और ध्यान अंतर्मन को शांत कर, पाता है इंसान, जीवन का सच्चा सुख, सच्चा अमन। -सरोज कंसारी कवयित्री लेखिका शिक्षिका दुर्गा शक्ति समिति अध्यक्ष गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर, छ.ग. - ShareChat
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📚कविता-कहानी संग्रह - qq 31R g: கசிச yffq! सरोज कंसारी सुश्री 1u- ಬ  "- qq 31R g: கசிச yffq! सरोज कंसारी सुश्री 1u- ಬ  "- - ShareChat
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📚कविता-कहानी संग्रह - कविता) मैं बेटी हूँ इस सुंदर जहान की किसी हरे-्भरे खलिहान की मुस्कान की। मैं ही उड़ान हूँ खुले आसमान की अथाह गहराई हूँ सागर के अरमान की। मैं अटल हिमगिरि सी चट्टान हूँ हूँ हर बागबान की मेहनत की पहचान हूँ हर घर आँगन की मधुर जरूरत निर्मल नदिया की कल कल धार मैं ही श्रृंगार हूँ सारी सृष्टि का अपने परिवार का मान उसकी तुष्टिका। चहकती हूँ मैँ स्वछंद पंछियों- सी पर वक्त पडे़ तो दहकूँ अंगारा. `-#/ आत्मसम्मान की परवाह मुझे भी है रंग- बिरंगी तितली- सी उड़ान मुझे 1 ೯| संस्कारों की सजीव मूरत हूँ मुझमें असीम धैर्य है इस धरा सा आँखों में रखती हूँ आँसुओं का सैलाब भी॰ सबके होठों की मैं ही मुस्कान भी। माता-पिता का मैं गर्व अभिमान भी॰ की मैं ही धुरी॰ कमान भी। सारे रिश्तों 1 खुशियों का एहसास हूँ॰ प्रीत पराई লাত নিমালী; সমাৎ की कुलों दा हूँ दिल में कर देती चाहत दफन पर जखघ्म अपना दिखाती कभी हर दर्द की मैं ही मरहम बन जाती & साँझ की लाली सी ढल भी जाती { सुबह की उम्मीद की पहली किरण घर के पकवानों में ममता की शरण घर की साज सजावट रौनक मैं ही गृहलक्ष्मी मैं ही। 46-46 த जरूरत ٦ ٤، भारत माँ की शान बढ़ाती दरिंदगी का शिकार मैं ही? पर फिर भी॰ पूभलौँ सुरक्षंद गीहीकू मैँ शिकजर भी? क्या आज सुश्री सरोज कसारी कवयित्री लेखिका शिक्षिका হাকি মসিনি f अध्यक्ष गोबरा नवापारा - राजिम रायपुर छग कविता) मैं बेटी हूँ इस सुंदर जहान की किसी हरे-्भरे खलिहान की मुस्कान की। मैं ही उड़ान हूँ खुले आसमान की अथाह गहराई हूँ सागर के अरमान की। मैं अटल हिमगिरि सी चट्टान हूँ हूँ हर बागबान की मेहनत की पहचान हूँ हर घर आँगन की मधुर जरूरत निर्मल नदिया की कल कल धार मैं ही श्रृंगार हूँ सारी सृष्टि का अपने परिवार का मान उसकी तुष्टिका। चहकती हूँ मैँ स्वछंद पंछियों- सी पर वक्त पडे़ तो दहकूँ अंगारा. `-#/ आत्मसम्मान की परवाह मुझे भी है रंग- बिरंगी तितली- सी उड़ान मुझे 1 ೯| संस्कारों की सजीव मूरत हूँ मुझमें असीम धैर्य है इस धरा सा आँखों में रखती हूँ आँसुओं का सैलाब भी॰ सबके होठों की मैं ही मुस्कान भी। माता-पिता का मैं गर्व अभिमान भी॰ की मैं ही धुरी॰ कमान भी। सारे रिश्तों 1 खुशियों का एहसास हूँ॰ प्रीत पराई লাত নিমালী; সমাৎ की कुलों दा हूँ दिल में कर देती चाहत दफन पर जखघ्म अपना दिखाती कभी हर दर्द की मैं ही मरहम बन जाती & साँझ की लाली सी ढल भी जाती { सुबह की उम्मीद की पहली किरण घर के पकवानों में ममता की शरण घर की साज सजावट रौनक मैं ही गृहलक्ष्मी मैं ही। 46-46 த जरूरत ٦ ٤، भारत माँ की शान बढ़ाती दरिंदगी का शिकार मैं ही? पर फिर भी॰ पूभलौँ सुरक्षंद गीहीकू मैँ शिकजर भी? क्या आज सुश्री सरोज कसारी कवयित्री लेखिका शिक्षिका হাকি মসিনি f अध्यक्ष गोबरा नवापारा - राजिम रायपुर छग - ShareChat
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📚कविता-कहानी संग्रह - आधुनिकता नें शर्मसार मानवता वास्तविकता से कोसों दूर रहते हैं ज़िन्दगी हर पल सिखाती रही यह जो सिर्फ़ ख्वाबों खयाल होती है TాTT चाहत मुकम्मल कहाँ होती है बाहरी आडंबर से फ़ुरसत कहाँ ক্ধিমনী मिलती है? की के दामन में ग़म का अंबार ஸf் हर पल ही अंजान सफ़र है यहाँ है। मंज़िल का पता यूँ ही कहाँ मिलता  अधूरी ही रह जाती हैं दास्तानें यहाँ है हैं निगाहें न जाने किसे हर पल फौन ढूँढती  किसी का हमनवाँ हरदम होता  दिल जो चाहे वो आसानी से कब সিলা ৯? हादसों से भरे इन लम्हों में पल-पल सुकून न जाने कहाँ लापता होता है। भ्रम, झूठ और बस एक धोखा है सब यहा जिंदगी के इस अथाह समंदर में भी फिर भी सांसारिक मोह कहाँ छूटता  8 గౌ 'मेरे' -' तेरे' के बीच उलझे हैं झमेले हर एक शख्स प्यार का प्यासा होता HR ೯ मिलकर,  संगठित होकर कहाँ रह फिर क्यों नफ़रत का ज़हर घोलकर ## পান ৯1 निराशा के घोर अंधकार में भटकता है? स्वार्थ को अपनी दुनियां में बसर करते भरोसा नहीं इस पल का, और   पीडा़ दर्द कराह कौन सुनता है? क्या हो जाए ೯ನಾ ' भी कल के लिए है शर्मसार मानवता आधुनिकता की दौड़ में, रहता है रिश्तों की गहराई में उतरता कौन है? शील और मर्यादा अब कहाँ संयम,  ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और बैर में उलझा  बची है? सरोज कंसारी रहता है। सुश्री  कवयित्री लेखिका शिक्षिका स्वार्थ की जब चलती है हवा चहुँ दुर्गा शक्ति समिति 31బాబా गोबरा नवापारा/राजिम, ओर अपनेपन के रिश्तों में ही दरार होती লিলা  रायपुर 6 छग. ) आधुनिकता नें शर्मसार मानवता वास्तविकता से कोसों दूर रहते हैं ज़िन्दगी हर पल सिखाती रही यह जो सिर्फ़ ख्वाबों खयाल होती है TాTT चाहत मुकम्मल कहाँ होती है बाहरी आडंबर से फ़ुरसत कहाँ ক্ধিমনী मिलती है? की के दामन में ग़म का अंबार ஸf் हर पल ही अंजान सफ़र है यहाँ है। मंज़िल का पता यूँ ही कहाँ मिलता  अधूरी ही रह जाती हैं दास्तानें यहाँ है हैं निगाहें न जाने किसे हर पल फौन ढूँढती  किसी का हमनवाँ हरदम होता  दिल जो चाहे वो आसानी से कब সিলা ৯? हादसों से भरे इन लम्हों में पल-पल सुकून न जाने कहाँ लापता होता है। भ्रम, झूठ और बस एक धोखा है सब यहा जिंदगी के इस अथाह समंदर में भी फिर भी सांसारिक मोह कहाँ छूटता  8 గౌ 'मेरे' -' तेरे' के बीच उलझे हैं झमेले हर एक शख्स प्यार का प्यासा होता HR ೯ मिलकर,  संगठित होकर कहाँ रह फिर क्यों नफ़रत का ज़हर घोलकर ## পান ৯1 निराशा के घोर अंधकार में भटकता है? स्वार्थ को अपनी दुनियां में बसर करते भरोसा नहीं इस पल का, और   पीडा़ दर्द कराह कौन सुनता है? क्या हो जाए ೯ನಾ ' भी कल के लिए है शर्मसार मानवता आधुनिकता की दौड़ में, रहता है रिश्तों की गहराई में उतरता कौन है? शील और मर्यादा अब कहाँ संयम,  ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और बैर में उलझा  बची है? सरोज कंसारी रहता है। सुश्री  कवयित्री लेखिका शिक्षिका स्वार्थ की जब चलती है हवा चहुँ दुर्गा शक्ति समिति 31బాబా गोबरा नवापारा/राजिम, ओर अपनेपन के रिश्तों में ही दरार होती লিলা  रायपुर 6 छग. ) - ShareChat
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