एस्ट्रो मनोज कौशिक बहल यंत्र मंत्र तंत्र विशेषज्ञ
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एस्ट्रो मनोज कौशिक बहल यंत्र मंत्र तंत्र विशेषज्ञ
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#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯कुंडली दोष #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 *💥कुंडली में अष्टम भाव का परिचय💥* *अष्टम भाव से व्यक्ति की आयु व मृत्यु के स्वरुप का विचार किया जाता है| इस दृष्टि से अष्टम भाव का महत्व किसी भी प्रकार से कम नही है| क्योंकि यदि मनुष्य दीर्घजीवी ही नही तो वह जीवन के समस्त विषयों का आनंद कैसे उठा सकता है? अष्टम भाव त्रिक(6, 8, 12) भावों में सर्वाधिक अशुभ स्थान माना गया है| वैसे भी षष्ठ भाव(रोग, शत्रु, ऋण का भाव) से तृतीय(भ्राता) होने के कारण इसे अशुभता में षष्ठ भाव का भ्राता(भाई) ही समझिये| अष्टम भाव तो अशुभ है ही, कोई भी ग्रह इसका स्वामी होने पर अशुभ भावेश हो जाता है| नवम भाव(भाग्य, धर्म व यश) से द्वादश(हानि) होने के कारण अष्टम भाव मृत्यु या निधन भाव माना गया है| क्योंकि भाग्य, धर्म व प्रतिष्ठा का पतन हो जाने से मनुष्य का नाश हो जाता है| फारसी में अष्टम भाव को मौतखाने, उमरखाने व हस्तमखाने कहते हैं| अष्टम भाव से आयु की अंतिम सीमा, मृत्यु का स्वरूप, मृत्युतुल्य कष्ट, आदि का विचार किया जाता है| इसके अतिरिक्त यह भाव वसीयत से लाभ, पुरातत्व, अपयश, गंभीर व दीर्घकालीन रोग, चिंता, संकट, दुर्गति, अविष्कार, स्त्री का मांगल्य(सौभाग्य), स्त्री का धन व दहेज़, गुप्त विज्ञान व पारलौकिक ज्ञान, ख़ोज, किसी विषय में अनुसंधान, समुद्री यात्राएं, गूढ़ विज्ञान, तंत्र-मंत्र-ज्योतिष व कुण्डलिनी जागरण आदि विषयों से भी जुड़ा हुआ है| भावत भावम सिद्धांत के अनुसार किसी भी भाव का स्वामी यदि अपने भाव से अष्टम स्थान में हो या किसी भाव में उस भाव से अष्टम स्थान का स्वामी आकर बैठ जाए अथवा कोई भी भावेश अष्टम स्थान में स्थित हो तो उस भाव के फल का नाश हो जाता है| मनुष्य को जीवन में पीड़ित करने वाले स्थाई प्रकृति के घातक रोग भी अष्टम भाव से देखे जाते हैं| आकस्मिक घटने वाली गंभीर दुर्घटनाओं का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है|* *अष्टम भाव तथा अष्टमेश की कल्पना ही मनुष्य के मन में अशुभता का भाव उत्पन्न कर देती है| परंतु ऐसी बात नहीं है अष्टम भाव के कुछ विशिष्ट लाभ भी हैं| किसी भी स्त्री की कुंडली में अष्टम भाव का सर्वाधिक महत्व होता है| क्योंकि यह भाव उस नारी को विवाहोपरांत प्राप्त होने वाले सुखों का सूचक है| इस भाव से एक विवाहित स्त्री के मांगल्य(सौभाग्य) अर्थात उसके पति की आयु कितनी होगी तथा वैवाहिक जीवन की अवधि कितनी लंबी होगी, इसका विचार किया जाता है| यही कारण है कि इस भाव को मांगल्य स्थान भी कहा जाता है| इसके अलावा अध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों के लिए भी अष्टम भाव एक वरदान से कम नहीं है| क्योंकि यह भाव गूढ़ व परालौकिक विज्ञान, तंत्र-मंत्र-योग आदि विद्याओं से भी संबंधित है इसलिए बलवान अष्टम भाव व अष्टमेश की कृपा बिना कोई भी व्यक्ति इन क्षेत्रों में महारत हासिल नहीं कर सकता| यही कारण है कि जो लोग सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक व संत प्रवृति के हैं उनकी पत्रिका में अष्टम भाव, अष्टमेश तथा शनि काफी बली स्थिति में होते हैं| इस भाव का कारक ग्रह शनि है जो कि वास्तविक रूप में एक सच्चा सन्यासी व तपस्वी ग्रह है| रहस्य, सन्यास, त्याग, तपस्या, धैर्य, योग-ध्यान व मानव सेवा आदि विषय बिना शनिदेव की कृपा के मनुष्य को प्राप्त हो ही नहीं सकते| इसके अतिरिक्त जो लोग ख़ोज व अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए भी अष्टम भाव एक निधि(ख़ज़ाने) से कम नहीं है| इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ज्योतिष में कोई भी भाव व ग्रह बुरा नही होता बल्कि हरेक भाव व ग्रह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं| कोई भी भाव व ग्रह मनुष्य के पूर्व कर्मों के अनुसार ही उसे अच्छा या बुरा फल देने के लिए बाध्य होता है|* *अष्टम भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-* *आयुष्य का निर्णय- अष्टम भाव का मनुष्य की आयु से घनिष्ठ संबंध है| आयु का निर्णय प्रधान रूप से अष्टम भाव व अष्टमेश से किया जाता है| इसके अतिरिक्त लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, चन्द्र व शनि जैसे ग्रह आदि भी आयुनिर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| किसी भी व्यक्ति की आयु उसके पूर्व व इस जन्म के कर्मों से प्रभावित होती है अर्थात मनुष्य जैसा कर्म करके आता है और इस जन्म में जैसा कर्म कर रहा होता है उसका प्रभाव मनुष्य की आयु पर निश्चित रूप से पड़ता है| इसलिए आयु का निर्णय करना एक जटिल विषय है| फिर भी मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यदि किसी भी पत्रिका में लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, अष्टम भाव, अष्टमेश तथा चन्द्र व शनि ग्रह बली अवस्था में हो तो व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है| इसके विपरीत इन घटकों के कमजोर अवस्था में होने से व्यक्ति अल्पायु होता है|* *अष्टम भाव तथा विपरीत राजयोग- अष्टम भाव एक सर्वाधिक अशुभ भाव है| इसके साथ साथ छठा, बारहवां भाव भी अशुभ माने गए हैं| यदि अष्टम भाव का स्वामी छठे अथवा बाहरवें भाव में बैठा हो और केवल पाप ग्रहों से प्रभावित हो तो विपरीत राजयोग का निर्माण करता है| जिसके फलस्वरूप मनुष्य को अत्यंत धन-संपति की प्राप्ति होती है| इसके पीछे गणित का यह तर्क है कि जब दो नकारात्मक चीजें मिलती हैं तो वह शुभ फलदायी हो जाती हैं|* *विदेश यात्रा- अष्टम स्थान “समुद्र” का है| समुद्र पार की यात्रा विदेश यात्रा मानी जाती है| जब अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तब समुद्र पार विदेश यात्रा करने का योग बनता है|* *गूढ़ ख़ोज, शोध व अनुसंधान- अष्टम भाव गूढ़ रहस्य, ख़ोज व अनुसंधान से संबंधित भाव है| तृतीय भाव अष्टम भाव से अष्टम है अतः यह भी गूढ़ ख़ोज तथा अनुसंधान से जुड़ा भाव है| पंचम भाव व्यक्ति की बुद्धि को दर्शाता है| इसलिए जब भी तृतीयेश तथा अष्टमेश का पंचम भाव तथा पंचमेश से संबंध बनता है तो व्यक्ति महान अविष्कारक, गूढ़ ख़ोज करने वाला, उच्च कोटि का अनुसंधानकर्ता होता है| यह अनुसंधान ग्रहों की प्रकृति के अनुरूप भौतिक या अध्यात्मिक जगत के किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो सकता है|* *अष्टम भाव तथा असाध्य रोग- अष्टम भाव का गंभीर व असाध्य रोगों से भी संबंध है| जो रोग असाध्य तथा दीर्घकालीन होते हैं उनका विचार अष्टम भाव से ही किया जाता है| यदि अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को नेत्र, हृदय तथा हड्डियों से संबंधित रोग होता है| यदि चन्द्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को रक्त विकार, टी. बी., मनोरोग आदि होता है| मंगल अष्टम भाव में हो तो बवासीर, पट्ठे का रोग(atrophy of muscles), गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा आदि होती है| यदि बुध अष्टम भाव में हो दमा, श्वास,वाणी, त्वचा, मस्तिष्क संबंधी विकार होते हैं| गुरु यदि अष्टम भाव में हो तो जिगर(लीवर), तिल्ली(Spleen) आदि से संबंधित रोग होते हैं| यदि शुक्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को वीर्य व काम शक्ति संबंधित रोग होते हैं| शनि अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को दीर्घायु प्रदान करता है, परंतु उसे स्नायु तथा वायु संबंधित रोग होते हैं| यदि राहु-केतु अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा, मुख के रोग तथा कैंसर आदि असाध्य रोग होते हैं|* *अष्टम भाव तथा नाश- अष्टम भाव एक नाश स्थान है इसलिए इसे निधन भाव भी कहते हैं| जिस भाव का स्वामी इस भाव में आ जाता है, उस भाव संबंधित विषयों को हानि पहुँचती है| जैसे पंचम भाव(संतान) का स्वामी यदि अष्टम भाव में आ जाए तो व्यक्ति को संतान संबंधित कष्ट होता है| इसी प्रकार यदि एकादशेश(ज्येष्ठ भ्राता व भगिनी) अष्टम भाव में बैठ जाए तो बड़े भाई-बहन की मृत्यु होती है|* *अष्टम स्थान तथा दाम्पत्य सुख- अष्टम स्थान सप्तम स्थान(विवाह) से द्वितीय(घर तथा कुटुंब सुख) है| अतः इसका संबंध विवाहोपरांत मिलने वाले सुखों से भी है| स्त्री के लिए यह उसके पति की आयु तथा उसके कुटुंब(ससुराल) से प्राप्त होने वाले सुखों को दर्शाता है| अतः यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो स्त्री का पति दीर्घायु होता है तथा ससुराल पक्ष से भी उस स्त्री को पूर्ण सुख मिलता है|* *दुर्घटना तथा आकस्मिक आघात- अष्टम भाव दुर्घटनाओं के अलावा आकस्मिक आघात का भी है| व्यक्ति के साथ होने वाली गंभीर दुर्घटना अथवा आकस्मिक शारीरिक आघात इसी भाव से देखे जाते हैं|* *उत्तराधिकार व अनार्जित धन- वसीयत या पैत्रिक संपति का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है| एकादश भाव लाभ का सूचक होता है जबकि द्वितीय तथा चतुर्थ भाव पैत्रिक धन-संपति तथा जायदाद के सूचक होते हैं| जब भी एकादशेश, द्वितीयेश तथा चतुर्थेश का संबंध अष्टम भाव व अष्टमेश से बनता है तब मनुष्य को अपने पूर्वजों की विरासत, पैत्रिक धन संपति व जायदाद प्राप्त होती है| सप्तम भाव(पत्नी) से द्वितीय स्थान(धन) होने के कारण अष्टम भाव स्त्री के धन तथा ससुराल पक्ष से मिलने वाले धन(दहेज़) का प्रतीक भी है क्योंकि आखिरकार दहेज़ अनार्जित धन का ही तो रूप है|* *असामाजिक संबंध- अष्टम भाव एक छुपा हुआ भाव है अर्थात इसका संबंध रहस्यों से है| इसलिए कोई भी ऐसा कार्य अथवा संबंध जो असामाजिक हो इसी भाव से देखा जाता है| यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने, तस्करी या चोरी करने अथवा असामाजिक तत्वों के साथ लिप्त रहने जैसा कार्य कर सकता है| दशम भाव(कर्म) के स्वामी का अष्टम भाव(असामाजिक कार्य या संबंध) से संबंधित होकर पाप प्रभाव द्वारा पीड़ित होना व्यक्ति को चोर, डाकू, लुटेरा यहाँ तक कि हत्यारा तक बना सकता
#📕लाल किताब उपाय🔯 #✡️सितारों की चाल🌠 #🐍कालसर्प दोष परिहार #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी *💥कुंडली में अष्टम भाव का परिचय💥* *अष्टम भाव से व्यक्ति की आयु व मृत्यु के स्वरुप का विचार किया जाता है| इस दृष्टि से अष्टम भाव का महत्व किसी भी प्रकार से कम नही है| क्योंकि यदि मनुष्य दीर्घजीवी ही नही तो वह जीवन के समस्त विषयों का आनंद कैसे उठा सकता है? अष्टम भाव त्रिक(6, 8, 12) भावों में सर्वाधिक अशुभ स्थान माना गया है| वैसे भी षष्ठ भाव(रोग, शत्रु, ऋण का भाव) से तृतीय(भ्राता) होने के कारण इसे अशुभता में षष्ठ भाव का भ्राता(भाई) ही समझिये| अष्टम भाव तो अशुभ है ही, कोई भी ग्रह इसका स्वामी होने पर अशुभ भावेश हो जाता है| नवम भाव(भाग्य, धर्म व यश) से द्वादश(हानि) होने के कारण अष्टम भाव मृत्यु या निधन भाव माना गया है| क्योंकि भाग्य, धर्म व प्रतिष्ठा का पतन हो जाने से मनुष्य का नाश हो जाता है| फारसी में अष्टम भाव को मौतखाने, उमरखाने व हस्तमखाने कहते हैं| अष्टम भाव से आयु की अंतिम सीमा, मृत्यु का स्वरूप, मृत्युतुल्य कष्ट, आदि का विचार किया जाता है| इसके अतिरिक्त यह भाव वसीयत से लाभ, पुरातत्व, अपयश, गंभीर व दीर्घकालीन रोग, चिंता, संकट, दुर्गति, अविष्कार, स्त्री का मांगल्य(सौभाग्य), स्त्री का धन व दहेज़, गुप्त विज्ञान व पारलौकिक ज्ञान, ख़ोज, किसी विषय में अनुसंधान, समुद्री यात्राएं, गूढ़ विज्ञान, तंत्र-मंत्र-ज्योतिष व कुण्डलिनी जागरण आदि विषयों से भी जुड़ा हुआ है| भावत भावम सिद्धांत के अनुसार किसी भी भाव का स्वामी यदि अपने भाव से अष्टम स्थान में हो या किसी भाव में उस भाव से अष्टम स्थान का स्वामी आकर बैठ जाए अथवा कोई भी भावेश अष्टम स्थान में स्थित हो तो उस भाव के फल का नाश हो जाता है| मनुष्य को जीवन में पीड़ित करने वाले स्थाई प्रकृति के घातक रोग भी अष्टम भाव से देखे जाते हैं| आकस्मिक घटने वाली गंभीर दुर्घटनाओं का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है|* *अष्टम भाव तथा अष्टमेश की कल्पना ही मनुष्य के मन में अशुभता का भाव उत्पन्न कर देती है| परंतु ऐसी बात नहीं है अष्टम भाव के कुछ विशिष्ट लाभ भी हैं| किसी भी स्त्री की कुंडली में अष्टम भाव का सर्वाधिक महत्व होता है| क्योंकि यह भाव उस नारी को विवाहोपरांत प्राप्त होने वाले सुखों का सूचक है| इस भाव से एक विवाहित स्त्री के मांगल्य(सौभाग्य) अर्थात उसके पति की आयु कितनी होगी तथा वैवाहिक जीवन की अवधि कितनी लंबी होगी, इसका विचार किया जाता है| यही कारण है कि इस भाव को मांगल्य स्थान भी कहा जाता है| इसके अलावा अध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों के लिए भी अष्टम भाव एक वरदान से कम नहीं है| क्योंकि यह भाव गूढ़ व परालौकिक विज्ञान, तंत्र-मंत्र-योग आदि विद्याओं से भी संबंधित है इसलिए बलवान अष्टम भाव व अष्टमेश की कृपा बिना कोई भी व्यक्ति इन क्षेत्रों में महारत हासिल नहीं कर सकता| यही कारण है कि जो लोग सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक व संत प्रवृति के हैं उनकी पत्रिका में अष्टम भाव, अष्टमेश तथा शनि काफी बली स्थिति में होते हैं| इस भाव का कारक ग्रह शनि है जो कि वास्तविक रूप में एक सच्चा सन्यासी व तपस्वी ग्रह है| रहस्य, सन्यास, त्याग, तपस्या, धैर्य, योग-ध्यान व मानव सेवा आदि विषय बिना शनिदेव की कृपा के मनुष्य को प्राप्त हो ही नहीं सकते| इसके अतिरिक्त जो लोग ख़ोज व अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए भी अष्टम भाव एक निधि(ख़ज़ाने) से कम नहीं है| इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ज्योतिष में कोई भी भाव व ग्रह बुरा नही होता बल्कि हरेक भाव व ग्रह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं| कोई भी भाव व ग्रह मनुष्य के पूर्व कर्मों के अनुसार ही उसे अच्छा या बुरा फल देने के लिए बाध्य होता है|* *अष्टम भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-* *आयुष्य का निर्णय- अष्टम भाव का मनुष्य की आयु से घनिष्ठ संबंध है| आयु का निर्णय प्रधान रूप से अष्टम भाव व अष्टमेश से किया जाता है| इसके अतिरिक्त लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, चन्द्र व शनि जैसे ग्रह आदि भी आयुनिर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| किसी भी व्यक्ति की आयु उसके पूर्व व इस जन्म के कर्मों से प्रभावित होती है अर्थात मनुष्य जैसा कर्म करके आता है और इस जन्म में जैसा कर्म कर रहा होता है उसका प्रभाव मनुष्य की आयु पर निश्चित रूप से पड़ता है| इसलिए आयु का निर्णय करना एक जटिल विषय है| फिर भी मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यदि किसी भी पत्रिका में लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, अष्टम भाव, अष्टमेश तथा चन्द्र व शनि ग्रह बली अवस्था में हो तो व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है| इसके विपरीत इन घटकों के कमजोर अवस्था में होने से व्यक्ति अल्पायु होता है|* *अष्टम भाव तथा विपरीत राजयोग- अष्टम भाव एक सर्वाधिक अशुभ भाव है| इसके साथ साथ छठा, बारहवां भाव भी अशुभ माने गए हैं| यदि अष्टम भाव का स्वामी छठे अथवा बाहरवें भाव में बैठा हो और केवल पाप ग्रहों से प्रभावित हो तो विपरीत राजयोग का निर्माण करता है| जिसके फलस्वरूप मनुष्य को अत्यंत धन-संपति की प्राप्ति होती है| इसके पीछे गणित का यह तर्क है कि जब दो नकारात्मक चीजें मिलती हैं तो वह शुभ फलदायी हो जाती हैं|* *विदेश यात्रा- अष्टम स्थान “समुद्र” का है| समुद्र पार की यात्रा विदेश यात्रा मानी जाती है| जब अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तब समुद्र पार विदेश यात्रा करने का योग बनता है|* *गूढ़ ख़ोज, शोध व अनुसंधान- अष्टम भाव गूढ़ रहस्य, ख़ोज व अनुसंधान से संबंधित भाव है| तृतीय भाव अष्टम भाव से अष्टम है अतः यह भी गूढ़ ख़ोज तथा अनुसंधान से जुड़ा भाव है| पंचम भाव व्यक्ति की बुद्धि को दर्शाता है| इसलिए जब भी तृतीयेश तथा अष्टमेश का पंचम भाव तथा पंचमेश से संबंध बनता है तो व्यक्ति महान अविष्कारक, गूढ़ ख़ोज करने वाला, उच्च कोटि का अनुसंधानकर्ता होता है| यह अनुसंधान ग्रहों की प्रकृति के अनुरूप भौतिक या अध्यात्मिक जगत के किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो सकता है|* *अष्टम भाव तथा असाध्य रोग- अष्टम भाव का गंभीर व असाध्य रोगों से भी संबंध है| जो रोग असाध्य तथा दीर्घकालीन होते हैं उनका विचार अष्टम भाव से ही किया जाता है| यदि अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को नेत्र, हृदय तथा हड्डियों से संबंधित रोग होता है| यदि चन्द्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को रक्त विकार, टी. बी., मनोरोग आदि होता है| मंगल अष्टम भाव में हो तो बवासीर, पट्ठे का रोग(atrophy of muscles), गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा आदि होती है| यदि बुध अष्टम भाव में हो दमा, श्वास,वाणी, त्वचा, मस्तिष्क संबंधी विकार होते हैं| गुरु यदि अष्टम भाव में हो तो जिगर(लीवर), तिल्ली(Spleen) आदि से संबंधित रोग होते हैं| यदि शुक्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को वीर्य व काम शक्ति संबंधित रोग होते हैं| शनि अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को दीर्घायु प्रदान करता है, परंतु उसे स्नायु तथा वायु संबंधित रोग होते हैं| यदि राहु-केतु अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा, मुख के रोग तथा कैंसर आदि असाध्य रोग होते हैं|* *अष्टम भाव तथा नाश- अष्टम भाव एक नाश स्थान है इसलिए इसे निधन भाव भी कहते हैं| जिस भाव का स्वामी इस भाव में आ जाता है, उस भाव संबंधित विषयों को हानि पहुँचती है| जैसे पंचम भाव(संतान) का स्वामी यदि अष्टम भाव में आ जाए तो व्यक्ति को संतान संबंधित कष्ट होता है| इसी प्रकार यदि एकादशेश(ज्येष्ठ भ्राता व भगिनी) अष्टम भाव में बैठ जाए तो बड़े भाई-बहन की मृत्यु होती है|* *अष्टम स्थान तथा दाम्पत्य सुख- अष्टम स्थान सप्तम स्थान(विवाह) से द्वितीय(घर तथा कुटुंब सुख) है| अतः इसका संबंध विवाहोपरांत मिलने वाले सुखों से भी है| स्त्री के लिए यह उसके पति की आयु तथा उसके कुटुंब(ससुराल) से प्राप्त होने वाले सुखों को दर्शाता है| अतः यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो स्त्री का पति दीर्घायु होता है तथा ससुराल पक्ष से भी उस स्त्री को पूर्ण सुख मिलता है|* *दुर्घटना तथा आकस्मिक आघात- अष्टम भाव दुर्घटनाओं के अलावा आकस्मिक आघात का भी है| व्यक्ति के साथ होने वाली गंभीर दुर्घटना अथवा आकस्मिक शारीरिक आघात इसी भाव से देखे जाते हैं|* *उत्तराधिकार व अनार्जित धन- वसीयत या पैत्रिक संपति का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है| एकादश भाव लाभ का सूचक होता है जबकि द्वितीय तथा चतुर्थ भाव पैत्रिक धन-संपति तथा जायदाद के सूचक होते हैं| जब भी एकादशेश, द्वितीयेश तथा चतुर्थेश का संबंध अष्टम भाव व अष्टमेश से बनता है तब मनुष्य को अपने पूर्वजों की विरासत, पैत्रिक धन संपति व जायदाद प्राप्त होती है| सप्तम भाव(पत्नी) से द्वितीय स्थान(धन) होने के कारण अष्टम भाव स्त्री के धन तथा ससुराल पक्ष से मिलने वाले धन(दहेज़) का प्रतीक भी है क्योंकि आखिरकार दहेज़ अनार्जित धन का ही तो रूप है|* *असामाजिक संबंध- अष्टम भाव एक छुपा हुआ भाव है अर्थात इसका संबंध रहस्यों से है| इसलिए कोई भी ऐसा कार्य अथवा संबंध जो असामाजिक हो इसी भाव से देखा जाता है| यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने, तस्करी या चोरी करने अथवा असामाजिक तत्वों के साथ लिप्त रहने जैसा कार्य कर सकता है| दशम भाव(कर्म) के स्वामी का अष्टम भाव(असामाजिक कार्य या संबंध) से संबंधित होकर पाप प्रभाव द्वारा पीड़ित होना व्यक्ति को चोर, डाकू, लुटेरा यहाँ तक कि हत्यारा तक बना सकता
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯कुंडली दोष #🔯वास्तु दोष उपाय #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 वैदिक ज्योतिष और रोजगार के सूत्र व्यक्ति को जीवन में रोजगार, व्यवसाय, पद प्राप्ति, नौकरी आदि के कौन से अवसर प्राप्त होंगे अथवा जातक की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी, के संबंध में विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान की जा रही है. यहां कुछ मूल सिद्धांतो, ग्रहों के सांमंजस्य से बनते रोजगार एवं व्यवसायों, पद प्राप्ति व नौकरी प्राप्ति से संबंधित समस्याओं पर प्रकाश डाला जा रहा है. १. व्यक्ति को सरकारी सेवा/ नौकरी/ रोजगार/व्यापार अथवा कोई पद प्राप्त होगा, जन्मकुंडली के प्रथम, द्वितीय, दशम एवं एकादश भावों में ग्रहों की स्थिति एवं इन भावों के स्वामी ग्रहों की स्थिति एवं इन सब पर पडते अन्य ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करती है. यदि दसवें भाव का स्वामी ग्रह किसी प्रकार भी पहले, दूसरे, छठें एवं ग्यारहवें भावों से संबंध रखता है तो व्यक्ति को हर हालत में अच्छे रोजगार की प्राप्ति होती है. तथा वो पूर्णतया लाभदायक सिद्ध होता है. २. जन्मकुंडली में अधिकांश ग्रह जिन राशियों में हो उस राशि के तत्व गुण, स्वभाव एवं जिस जिस रोजगार को वह राशि सूचित करती है, व्यक्ति का स्वाभाविक झुकाव उन्हीं कार्यों की तरफ़ होता है. ३. दो या दो से अधिक क्रूर ग्रहों के साथ केतु जब मेष, वृश्चिक, मकर या कुंभ में से किसी राशि में हो तो व्यक्ति को निराशा, असफ़लता, हार तथा बार बार नौकरी छूटने का कष्ट सहन करना पडता है. ४. दसवें भाव का स्वामी ग्रह शुभ स्थिति में नौवें या बारहवें भाव में बृहस्पति के साथ स्थित हो तो व्यक्ति विदेश में सफ़लता प्राप्त करता है. ५. जब जन्मकुंडली में शनि से आगे राहु ( जैसे जन्मकुंडली में शनि पांचवें भाव में और राहु सातवें भाव में हो) होता है और इन दोनों के मध्य अन्य कोई ग्रह ना हो तो व्यक्ति को पहले ३५ वर्ष तक की आयु में रोजगार संबंधी कष्टों और परेशानियों का सामना करना पडता है. किसी भी काम में उसके पूरी तरह से पैर नही जम पाते. ६. जन्मकुंडली मे बुध ग्रह कहीं भी अकेला एवं अशुभ प्रभाव से दूर हो तो व्यापार में जातक अत्यधिक उन्नति प्राप्त करता है. ७. यदि अधिकांश ग्रह जनमकुंडली में तीसरे, दसवें, ग्यारहवें एवं बारहवें अथवा ७, ८, ९, १०. ११ एवं १२ वें भाव में बैठे हों और उन्हीं में सूर्य ग्रह भी सम्मिलित हो तो जातक के लिये नौकरी करना अथवा जनहित विभागों में कार्य करना ही लाभ प्रद रहता है. ऐसे व्यक्ति जीवन में कभी भी स्वयं के निजि व्यापार में प्रगति नही कर सकते. 10 वें भाव में स्थित ग्रह अथवा 10 वें भाव का स्वामी ग्रह रोजगार/ व्यवसाय सूर्य बहुत आशाएं और उमंगे रखने वाला, जीवन में उच्च अधिकारी बनना चाहे, उच्च पद प्राप्ति, सरकारी सेवा, नौकरी में रहना कठिन, डाक्टर, लीडर या प्रबंधकीय कार्यों में सलंग्न. चंद्रमा व्यापार, प्रोविजन स्टोर, कृषि, जलीय पदार्थ, पैतृक व्यवसाय में सलंग्न, रोजगार में परिवर्तन हेतुबार बार विचार उठते रहें. मंगल जोखिम के कार्य, पुलिस सेना, मैकैनीकल, सर्जन, धातु का कार्य, केमिस्ट, फ़ायर ब्रिगेड, होटल, ढाबा, अग्नि से संबंधित कार्य, डाईवर, बीमा, मेकेनिक एवं इंजीनीयर आदि. बुध व्यापारी, ज्योतिषी, प्रिंटिंग कार्य, सेक्रेटरी, लेखक, अकाऊंटेंट, क्लर्क, आडीटर, एजेंट, पुस्तक विक्रेता, दलाल, अनुवादक, अध्यापक, सहायक, नर्सिंग, मुंशी, स्पीडपोस्ट, कोरियर इत्यादि का कार्य. गुरू शिक्षक, प्रकाशक, जज, न्यायाधीश, वकील, धार्मिक नेता, कथावाचक, पुरोहित, बैंक अधिकारी, मेनेजर, कपडा स्टोर, प्रोविजन स्टोर, सलाहकारिता आदि के कार्य शुक्र स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल, मेटरनिटी होम, सोसायटी, रेस्टोरेंट, रेडीमेड वस्त्र, मनियारी की दुकान, फ़ोटोग्राफ़ी, गिफ़्ट आयटम, आभूषण एवं स्त्री जाति से संबंधित विभाग/कार्यक्षेत्र शनि लेबर, लेबर विभाग, प्रबंधक या फ़िर अधिनस्थ सेवा में उच्चपद, अधिकारी, उद्योगपति, डाक्टर, रंग रसायन, पेट्रोकेमिकल इत्यादि. (सब्र संतोष, सुझबूझ रखे तो व्यवसाय ठीक चले, जल्दबाजी करे तो मुश्किले खडी हों और हानि हो, दुर्घटनाएं, निराशा एवं घाटे का मुंह देखना पडे.) राहु डाक्टर, कसाई, सफ़ाई कर्मचारी, जेल विभाग, विद्युत विभाग, लेखक उच्चाधिकारी एवम उच्च पद प्राप्ति. (यदि सूझबूझ रखे और दिमाग से काम ले तो उन्नति करे नही तो अपना काम स्वयं ही बिगाडे.) केतु गुप्त विद्या, तांत्रिक, ज्योतिषी, होम्योपैथी/ आयुर्वेद/नेचरोपैथी का डाक्टर, ट्रेवल एजेंट, फ़र्नीचर का काम, पशुओं का व्यापारी. (जितना घूमने फ़िरने वाला हो उतना ही लाभ प्राप्त करे.)
#🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️सितारों की चाल🌠 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #📕लाल किताब उपाय🔯 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी वैदिक ज्योतिष और रोजगार के सूत्र व्यक्ति को जीवन में रोजगार, व्यवसाय, पद प्राप्ति, नौकरी आदि के कौन से अवसर प्राप्त होंगे अथवा जातक की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी, के संबंध में विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान की जा रही है. यहां कुछ मूल सिद्धांतो, ग्रहों के सांमंजस्य से बनते रोजगार एवं व्यवसायों, पद प्राप्ति व नौकरी प्राप्ति से संबंधित समस्याओं पर प्रकाश डाला जा रहा है. १. व्यक्ति को सरकारी सेवा/ नौकरी/ रोजगार/व्यापार अथवा कोई पद प्राप्त होगा, जन्मकुंडली के प्रथम, द्वितीय, दशम एवं एकादश भावों में ग्रहों की स्थिति एवं इन भावों के स्वामी ग्रहों की स्थिति एवं इन सब पर पडते अन्य ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करती है. यदि दसवें भाव का स्वामी ग्रह किसी प्रकार भी पहले, दूसरे, छठें एवं ग्यारहवें भावों से संबंध रखता है तो व्यक्ति को हर हालत में अच्छे रोजगार की प्राप्ति होती है. तथा वो पूर्णतया लाभदायक सिद्ध होता है. २. जन्मकुंडली में अधिकांश ग्रह जिन राशियों में हो उस राशि के तत्व गुण, स्वभाव एवं जिस जिस रोजगार को वह राशि सूचित करती है, व्यक्ति का स्वाभाविक झुकाव उन्हीं कार्यों की तरफ़ होता है. ३. दो या दो से अधिक क्रूर ग्रहों के साथ केतु जब मेष, वृश्चिक, मकर या कुंभ में से किसी राशि में हो तो व्यक्ति को निराशा, असफ़लता, हार तथा बार बार नौकरी छूटने का कष्ट सहन करना पडता है. ४. दसवें भाव का स्वामी ग्रह शुभ स्थिति में नौवें या बारहवें भाव में बृहस्पति के साथ स्थित हो तो व्यक्ति विदेश में सफ़लता प्राप्त करता है. ५. जब जन्मकुंडली में शनि से आगे राहु ( जैसे जन्मकुंडली में शनि पांचवें भाव में और राहु सातवें भाव में हो) होता है और इन दोनों के मध्य अन्य कोई ग्रह ना हो तो व्यक्ति को पहले ३५ वर्ष तक की आयु में रोजगार संबंधी कष्टों और परेशानियों का सामना करना पडता है. किसी भी काम में उसके पूरी तरह से पैर नही जम पाते. ६. जन्मकुंडली मे बुध ग्रह कहीं भी अकेला एवं अशुभ प्रभाव से दूर हो तो व्यापार में जातक अत्यधिक उन्नति प्राप्त करता है. ७. यदि अधिकांश ग्रह जनमकुंडली में तीसरे, दसवें, ग्यारहवें एवं बारहवें अथवा ७, ८, ९, १०. ११ एवं १२ वें भाव में बैठे हों और उन्हीं में सूर्य ग्रह भी सम्मिलित हो तो जातक के लिये नौकरी करना अथवा जनहित विभागों में कार्य करना ही लाभ प्रद रहता है. ऐसे व्यक्ति जीवन में कभी भी स्वयं के निजि व्यापार में प्रगति नही कर सकते. 10 वें भाव में स्थित ग्रह अथवा 10 वें भाव का स्वामी ग्रह रोजगार/ व्यवसाय सूर्य बहुत आशाएं और उमंगे रखने वाला, जीवन में उच्च अधिकारी बनना चाहे, उच्च पद प्राप्ति, सरकारी सेवा, नौकरी में रहना कठिन, डाक्टर, लीडर या प्रबंधकीय कार्यों में सलंग्न. चंद्रमा व्यापार, प्रोविजन स्टोर, कृषि, जलीय पदार्थ, पैतृक व्यवसाय में सलंग्न, रोजगार में परिवर्तन हेतुबार बार विचार उठते रहें. मंगल जोखिम के कार्य, पुलिस सेना, मैकैनीकल, सर्जन, धातु का कार्य, केमिस्ट, फ़ायर ब्रिगेड, होटल, ढाबा, अग्नि से संबंधित कार्य, डाईवर, बीमा, मेकेनिक एवं इंजीनीयर आदि. बुध व्यापारी, ज्योतिषी, प्रिंटिंग कार्य, सेक्रेटरी, लेखक, अकाऊंटेंट, क्लर्क, आडीटर, एजेंट, पुस्तक विक्रेता, दलाल, अनुवादक, अध्यापक, सहायक, नर्सिंग, मुंशी, स्पीडपोस्ट, कोरियर इत्यादि का कार्य. गुरू शिक्षक, प्रकाशक, जज, न्यायाधीश, वकील, धार्मिक नेता, कथावाचक, पुरोहित, बैंक अधिकारी, मेनेजर, कपडा स्टोर, प्रोविजन स्टोर, सलाहकारिता आदि के कार्य शुक्र स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल, मेटरनिटी होम, सोसायटी, रेस्टोरेंट, रेडीमेड वस्त्र, मनियारी की दुकान, फ़ोटोग्राफ़ी, गिफ़्ट आयटम, आभूषण एवं स्त्री जाति से संबंधित विभाग/कार्यक्षेत्र शनि लेबर, लेबर विभाग, प्रबंधक या फ़िर अधिनस्थ सेवा में उच्चपद, अधिकारी, उद्योगपति, डाक्टर, रंग रसायन, पेट्रोकेमिकल इत्यादि. (सब्र संतोष, सुझबूझ रखे तो व्यवसाय ठीक चले, जल्दबाजी करे तो मुश्किले खडी हों और हानि हो, दुर्घटनाएं, निराशा एवं घाटे का मुंह देखना पडे.) राहु डाक्टर, कसाई, सफ़ाई कर्मचारी, जेल विभाग, विद्युत विभाग, लेखक उच्चाधिकारी एवम उच्च पद प्राप्ति. (यदि सूझबूझ रखे और दिमाग से काम ले तो उन्नति करे नही तो अपना काम स्वयं ही बिगाडे.) केतु गुप्त विद्या, तांत्रिक, ज्योतिषी, होम्योपैथी/ आयुर्वेद/नेचरोपैथी का डाक्टर, ट्रेवल एजेंट, फ़र्नीचर का काम, पशुओं का व्यापारी. (जितना घूमने फ़िरने वाला हो उतना ही लाभ प्राप्त करे.)
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯कुंडली दोष #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 सूर्य राहू योग ग्रहण योग मित्रों ज्योतिष में राहू को सूर्य पर ग्रहण लगाने वाला माना गया है \ सूर्य रौशनी का कारक ग्रह है और राहू धुवें का | जैसे की आपको पता है की जब आसमान में धुवां छा जाता है तो सूर्य की रौशनी धरती पर आनी कुछ कम हो जाती है याने के राहू सूर्य के प्रभाव को मध्यम कर देता है \ सूर्य सरकार, समाज में हमारे में हमारे मान सम्मान का कारक ग्रह है तो राहू अपयश दोखा फरेब आदि का कारक ग्रह ऐसे में इन दोनों के साथ होने पर मान सम्मान में कमी , सरकार से लाभ में कमी आदि के योग बन जाते है \ किसी की कुंडली में ये योग हो और गोचर में भी जब ऐसा योग बन रहा हो तो जातक को पतन यानी की नोकरी मे निचे के पद आ जाना मान सम्मान में किसी कारण से कमी आ जाना , ऐसे कार्य के लिय जातक को दोषी बना देना जो उसने किया ही न हो , व्यापारी आदमी के कार्य में अचानक से कमी आ जाना , आमदनी कम हो जाना , फ़िज़ूल का खर्च बढ़ जाना , अपने ही दिमाक के कारण यानी गलत निर्यण लेने के कारण अपना नुक्सान कर लेना , ऐसी बिमारी हो जाना जिसके कारण जल्दी से समझ में न आये आदि के योग बन जाते है \ राहू को आग लग जाना , चोरी हो जाना, बुखार से पीड़ित हो जाना आदि का कारक भी माना गया है तो ऐसे में ऐसी घटना जातक के साथ घट जाने के योग बन जाते है |सरकार से झगड़ा यानी की कोई सराकरी लफडा हो जाना भी इनके योग का एक दुस्प्रभाव है | लेकिन एक ख़ास बात हमे हमेशा ध्यान रखनी होती है की राहू जब सूर्य को ग्रहण लगता है तो सूर्य के दुसरे सिरे पर ग्रहण नही लगा होता यानी की संसार में किसी अन्य जगह सूर्य पूर्ण रूप से उदय अवस्य हुआ होगा यानी की ऐसे जातक की किस्मत में एक जगह हार होगी तो किसी अन्य जगह उसे सहायता अवस्य मिल जायेगी जैसे की सूर्य ग्रहण खत्म होने के बाद सूर्य पूर्ण रूप से चमकता है उसी तरह जातक की किस्मत भी कई बार चमक जाती है \ अब बात आती है उपाय की जो की इस प्रकार है सूर्य ग्रहण वाले दिन जो को दूध से धोकर जल प्रवाह कर दें ध्यान रखे ऐसा ग्रहण के दोरान करे |यदि आपकी कुंडली में केतु भी आपको अच्छा फल नही दे रहा है तो जो को गाय के मूत्र से धोकर जल प्रवाह करे \ उस दिन दान अवस्य करे | किसी सफाई कर्मचारी को कुछ न कुछ अवस्य दे| इसके साथ ही सामान्य दिनों में जो को किसी लाल रंग के कपड़े में बांधकर उसे दूध से धोकर घर में किसी वजन के निचे दबाकर रख देना भी इसके लिय उत्तम फल देने वाला उपाय है | इसके साथ ही यदि सूर्य कुंडली का कारक ग्रह है तो उसके मन्त्रो का जप करके उसके रत्नको धारण करके उसे मजबूत करे और राहू की शांति करवा दें उस से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करे | ये इन दोनों की युति की आंशिक रूप से विवेचना है बाकी पूर्ण फल और उपाय पूरी कुंडली पर निर्भर करते है \ जय श्री राम
#🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️सितारों की चाल🌠 #📕लाल किताब उपाय🔯 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी सूर्य राहू योग ग्रहण योग मित्रों ज्योतिष में राहू को सूर्य पर ग्रहण लगाने वाला माना गया है \ सूर्य रौशनी का कारक ग्रह है और राहू धुवें का | जैसे की आपको पता है की जब आसमान में धुवां छा जाता है तो सूर्य की रौशनी धरती पर आनी कुछ कम हो जाती है याने के राहू सूर्य के प्रभाव को मध्यम कर देता है \ सूर्य सरकार, समाज में हमारे में हमारे मान सम्मान का कारक ग्रह है तो राहू अपयश दोखा फरेब आदि का कारक ग्रह ऐसे में इन दोनों के साथ होने पर मान सम्मान में कमी , सरकार से लाभ में कमी आदि के योग बन जाते है \ किसी की कुंडली में ये योग हो और गोचर में भी जब ऐसा योग बन रहा हो तो जातक को पतन यानी की नोकरी मे निचे के पद आ जाना मान सम्मान में किसी कारण से कमी आ जाना , ऐसे कार्य के लिय जातक को दोषी बना देना जो उसने किया ही न हो , व्यापारी आदमी के कार्य में अचानक से कमी आ जाना , आमदनी कम हो जाना , फ़िज़ूल का खर्च बढ़ जाना , अपने ही दिमाक के कारण यानी गलत निर्यण लेने के कारण अपना नुक्सान कर लेना , ऐसी बिमारी हो जाना जिसके कारण जल्दी से समझ में न आये आदि के योग बन जाते है \ राहू को आग लग जाना , चोरी हो जाना, बुखार से पीड़ित हो जाना आदि का कारक भी माना गया है तो ऐसे में ऐसी घटना जातक के साथ घट जाने के योग बन जाते है |सरकार से झगड़ा यानी की कोई सराकरी लफडा हो जाना भी इनके योग का एक दुस्प्रभाव है | लेकिन एक ख़ास बात हमे हमेशा ध्यान रखनी होती है की राहू जब सूर्य को ग्रहण लगता है तो सूर्य के दुसरे सिरे पर ग्रहण नही लगा होता यानी की संसार में किसी अन्य जगह सूर्य पूर्ण रूप से उदय अवस्य हुआ होगा यानी की ऐसे जातक की किस्मत में एक जगह हार होगी तो किसी अन्य जगह उसे सहायता अवस्य मिल जायेगी जैसे की सूर्य ग्रहण खत्म होने के बाद सूर्य पूर्ण रूप से चमकता है उसी तरह जातक की किस्मत भी कई बार चमक जाती है \ अब बात आती है उपाय की जो की इस प्रकार है सूर्य ग्रहण वाले दिन जो को दूध से धोकर जल प्रवाह कर दें ध्यान रखे ऐसा ग्रहण के दोरान करे |यदि आपकी कुंडली में केतु भी आपको अच्छा फल नही दे रहा है तो जो को गाय के मूत्र से धोकर जल प्रवाह करे \ उस दिन दान अवस्य करे | किसी सफाई कर्मचारी को कुछ न कुछ अवस्य दे| इसके साथ ही सामान्य दिनों में जो को किसी लाल रंग के कपड़े में बांधकर उसे दूध से धोकर घर में किसी वजन के निचे दबाकर रख देना भी इसके लिय उत्तम फल देने वाला उपाय है | इसके साथ ही यदि सूर्य कुंडली का कारक ग्रह है तो उसके मन्त्रो का जप करके उसके रत्नको धारण करके उसे मजबूत करे और राहू की शांति करवा दें उस से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करे | ये इन दोनों की युति की आंशिक रूप से विवेचना है बाकी पूर्ण फल और उपाय पूरी कुंडली पर निर्भर करते है \ जय श्री राम
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯कुंडली दोष #🔯वास्तु दोष उपाय #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 🚩🙏 ऊँ हनुमान चालीसा के 10 अचूक प्रयोग हनुमान चालीसा का प्रयोग हमारे जीवन में एक अचूक उपाय के रूप में भी कार्य करता है । इसके साइकोलॉजिकल और साइंटिफिक कारण है । 1. यदि आपके मन में भय या हमेशा डर की स्थिति बनी रहती है तो हनुमान चालीसा व बजरंग बाण का रोज पाठ करें। व मेहरून वस्त्र ही पहनें। कुछ ही दिनों में आपको निडर और निर्भयता प्राप्त होने लगेगी। 2. घर से बहार जाते समय विशेष रूप से वाहन चलाते समय अपने साथ एक छोटी हनुमान चालीसा व एक काला धागा अपने साथ हमेशा रखें । दुर्घटनाओं से रक्षा होगी। 3. जिन बच्चों को रात में सोते हुए अचानक डर जाने की समस्या होती है उनके सिराने पर सोते समय एक हनुमान चालीसा व चमेली के फूल रखें व हाथ मे एक काला धागा बांधे। उनकी यह समस्या दूर हो जाएगी। 4. यदि शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के कारण जीवन में संघर्ष बढ़ रहा हो तो रोज हनुमान चालीसा का पाठ करें स्थिति अनुकूल बनेगी। 5. इंटरव्यू पर जाने से पहले तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें । आप मे कॉन्फिडेंस बढ़ जायेगा। आपको घबराहट की समस्या नहीं होगी। 6. कुंडली में मंगल की दशा चल रही हो तो नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करें व पीपल में पानी दें।अच्छे परिणाम मिलेंगे। 7. कर्ज की समस्या अधिक हो तो सुबह शाम तीन तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें , साथ मे गायत्री जप भी करें। लाभ मिलेगा। 8. यदि आपकी कोई जमीन या प्रॉपर्टी बिक नहीं पा रही हो तो घर में मारुती यन्त्र स्थापित करके उसके सामने रोज हनुमान चालीसा का पाठ करें जल्दी अच्छे परिणाम मिलेंगे। 9. यदि आपको अकारण ही जेल जाने की स्थिति बन जाये तो हनुमान चालीसा के 100 पाठ का एक अनुष्ठान पूरा करें । व महामृत्युंजय का जप करें। चमत्कारिक परिणाम होंगे। 10. स्त्रियों को श्री हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए इसे उनका आत्मबल हमेशा मजबूत बना रहता है । और जीवन में हमेशा आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है।
#💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #📕लाल किताब उपाय🔯 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #✡️सितारों की चाल🌠 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी 🚩🙏 ऊँ हनुमान चालीसा के 10 अचूक प्रयोग हनुमान चालीसा का प्रयोग हमारे जीवन में एक अचूक उपाय के रूप में भी कार्य करता है । इसके साइकोलॉजिकल और साइंटिफिक कारण है । 1. यदि आपके मन में भय या हमेशा डर की स्थिति बनी रहती है तो हनुमान चालीसा व बजरंग बाण का रोज पाठ करें। व मेहरून वस्त्र ही पहनें। कुछ ही दिनों में आपको निडर और निर्भयता प्राप्त होने लगेगी। 2. घर से बहार जाते समय विशेष रूप से वाहन चलाते समय अपने साथ एक छोटी हनुमान चालीसा व एक काला धागा अपने साथ हमेशा रखें । दुर्घटनाओं से रक्षा होगी। 3. जिन बच्चों को रात में सोते हुए अचानक डर जाने की समस्या होती है उनके सिराने पर सोते समय एक हनुमान चालीसा व चमेली के फूल रखें व हाथ मे एक काला धागा बांधे। उनकी यह समस्या दूर हो जाएगी। 4. यदि शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के कारण जीवन में संघर्ष बढ़ रहा हो तो रोज हनुमान चालीसा का पाठ करें स्थिति अनुकूल बनेगी। 5. इंटरव्यू पर जाने से पहले तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें । आप मे कॉन्फिडेंस बढ़ जायेगा। आपको घबराहट की समस्या नहीं होगी। 6. कुंडली में मंगल की दशा चल रही हो तो नियमित हनुमान चालीसा का पाठ करें व पीपल में पानी दें।अच्छे परिणाम मिलेंगे। 7. कर्ज की समस्या अधिक हो तो सुबह शाम तीन तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें , साथ मे गायत्री जप भी करें। लाभ मिलेगा। 8. यदि आपकी कोई जमीन या प्रॉपर्टी बिक नहीं पा रही हो तो घर में मारुती यन्त्र स्थापित करके उसके सामने रोज हनुमान चालीसा का पाठ करें जल्दी अच्छे परिणाम मिलेंगे। 9. यदि आपको अकारण ही जेल जाने की स्थिति बन जाये तो हनुमान चालीसा के 100 पाठ का एक अनुष्ठान पूरा करें । व महामृत्युंजय का जप करें। चमत्कारिक परिणाम होंगे। 10. स्त्रियों को श्री हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए इसे उनका आत्मबल हमेशा मजबूत बना रहता है । और जीवन में हमेशा आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है।
#🐍कालसर्प दोष परिहार #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯कुंडली दोष #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 राहु और बुध ********' कबूतर को दाना डालना एक पुण्य का काम है | लेकिन इसमें कुछ सावधानी रखनी चाहिए अपने सुना होगा या नहीं सुना होगा की कभी भी घर की छत पे कबूतर को दाना न डाले | अपने आँगन में या balconi में या घर से बाहर डाले लेकिन घर की छत पर नहीं | आइये जानते है , इसका ज्योतिषीय कारण| जन्मकुंडली में बुध और rahu का खराब मेल बहुत बुरा होता है | यदि जन्मकुंडली में बुध और rahu का खराब मेल हो तों इन्सान को इनके खराब योग बनने से कुछ परेशानी भी हो सकती है ऐसे में हम अपनी हरकतों से भी बुध और rahu को एक कर दे या इनको और ख़राब कर दे तों बुरा नतीजा मिलता है |ज्योतिष में बुध से सम्बंधित वस्तुओं मे कबूतर को भी जाना जाता है अब कबूतर बुध और छत हो गयी rahu | अब ऐसे लोग जब छत पे दाना डालते है तों छत पर कबूतर आते है तों एक तरह से बुध और rahu का मेल हो गया. लेकिन कबूतर तों फिर भी दाना खा कर चले जायेगे , वो तों चिंता की बात नहीं लेकिन जब वहां कबूतर आयेगे तों अपने मल से छत को गन्दी कर देगे| छत यानि rahu ख़राब हो जायेगा और बुरा नतीजा मिलेगा | बाकि किसी पार्क या खुले मैदान मे भी दाना दाल सकते है इसी लिये केहते है की छत पर कोई कूड़ा कबाड़ खराब गीली लकड़ी रबर और जंग लगे लोहे का समान ना हो तों हो गया इसका कारण | इसीलिए छत पर दाना नहीं डालना चाइए | जिन लोगो के पास छत पर डालने के अलावा और कोई चारा नहीं है , वो ये पढ़ कर कबूतर को दाना डालना बंद न करे और उसका भी एक तरीका है | वो लोग कबूतर के जाने के तुरंत बाद छत को अच्छे से साफ कर दे | अब बुध और rahu की बात चली है तों २ बाते और | दूसरा की बुध व्यापार भी है और rahu ससुराल है | ऐसे लोग जिनका की कुंडली में बुध और rahu का खराब योग है , उनको ससुराल पक्ष ( rahu ) के साथ मिलकर व्यापार ( बुध ) नहीं करना चाइए |
#🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #📕लाल किताब उपाय🔯 #✡️सितारों की चाल🌠 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी राहु और बुध ********' कबूतर को दाना डालना एक पुण्य का काम है | लेकिन इसमें कुछ सावधानी रखनी चाहिए अपने सुना होगा या नहीं सुना होगा की कभी भी घर की छत पे कबूतर को दाना न डाले | अपने आँगन में या balconi में या घर से बाहर डाले लेकिन घर की छत पर नहीं | आइये जानते है , इसका ज्योतिषीय कारण| जन्मकुंडली में बुध और rahu का खराब मेल बहुत बुरा होता है | यदि जन्मकुंडली में बुध और rahu का खराब मेल हो तों इन्सान को इनके खराब योग बनने से कुछ परेशानी भी हो सकती है ऐसे में हम अपनी हरकतों से भी बुध और rahu को एक कर दे या इनको और ख़राब कर दे तों बुरा नतीजा मिलता है |ज्योतिष में बुध से सम्बंधित वस्तुओं मे कबूतर को भी जाना जाता है अब कबूतर बुध और छत हो गयी rahu | अब ऐसे लोग जब छत पे दाना डालते है तों छत पर कबूतर आते है तों एक तरह से बुध और rahu का मेल हो गया. लेकिन कबूतर तों फिर भी दाना खा कर चले जायेगे , वो तों चिंता की बात नहीं लेकिन जब वहां कबूतर आयेगे तों अपने मल से छत को गन्दी कर देगे| छत यानि rahu ख़राब हो जायेगा और बुरा नतीजा मिलेगा | बाकि किसी पार्क या खुले मैदान मे भी दाना दाल सकते है इसी लिये केहते है की छत पर कोई कूड़ा कबाड़ खराब गीली लकड़ी रबर और जंग लगे लोहे का समान ना हो तों हो गया इसका कारण | इसीलिए छत पर दाना नहीं डालना चाइए | जिन लोगो के पास छत पर डालने के अलावा और कोई चारा नहीं है , वो ये पढ़ कर कबूतर को दाना डालना बंद न करे और उसका भी एक तरीका है | वो लोग कबूतर के जाने के तुरंत बाद छत को अच्छे से साफ कर दे | अब बुध और rahu की बात चली है तों २ बाते और | दूसरा की बुध व्यापार भी है और rahu ससुराल है | ऐसे लोग जिनका की कुंडली में बुध और rahu का खराब योग है , उनको ससुराल पक्ष ( rahu ) के साथ मिलकर व्यापार ( बुध ) नहीं करना चाइए |