एस्ट्रो मनोज कौशिक बहल यंत्र मंत्र तंत्र विशेषज्ञ
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#🔯ज्योतिष #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅ #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨कौन और कैसा होगा आपका जीवन साथी l प्रेम व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से जागृत होता है। प्रेम ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अजनबी एक दुसरे के प्रति समर्पण को जान पाते हैं। दो व्यक्तियों के बीच पनपने वाले इस भाव का लक्ष्य शादी पर संपन्न हो जाए तो प्रेम को पूर्णता मिल जाती है। प्रेम करने वाले युवक युवतियों से हर रोज मेरी बात होती है। प्रेम के विषय पर लोगों से मेरी चर्चा जब भी होती है कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है। यही मेरे ज्ञान का स्त्रोत है। कुछ सालों से मैंने लोगों से जितना सीखा है। उतना ज्ञान किताबों से मिलना मुमकिन नहीं है। मामला चाहे प्रेम विवाह का हो या बेमेल विवाह का हमारे समाज में बेमेल विवाह एक मामूली सी बात है। इसमें पति और पत्नी में भारी अंतर होता है। अधिकतर मामलों में पति की उम्र विवाह के समय पत्नी से दुगनी होती है। महिलाएं इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं। इन बेमेल या प्रेम विवाहों का मुख्य कारण आर्थिक, सामाजिक या मज़बूरी भी हो सकता हैं। प्रेम विवाह और जन्मकुंडली- जैसा कि हमेशा वास्तविक जीवन में होता है। अनायास ही दोनों की मुलाकात होती है और कोई अजनबी अपना लगने लगता है। जन्मकुंडली में भी कुछ ग्रह ऐसे होते हैं जो अनायास होने वाली घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं। हर अजनबी पर राहू की सत्ता है क्योंकि आप उसके विषय में कुछ नहीं जानते। राहू रहस्य के लिए जाना जाता है। इसलिए प्रेम को समझने के लिए राहू को समझना अत्यंत आवश्यक है। मैंने देखा है जिस स्थान से राहू का सम्बन्ध हो उस स्थान से सम्बंधित काम अचानक ही होते हैं। प्रेम का भाव शुक्र से पनपता है। यदि आपका शुक्र अच्छा है तो आप प्रेम कर पायेंगे। प्रेम को समझने की आपमें शक्ति होती। प्रेम की अनुभूति आपके लिए नयी चीज नहीं होगी। इस बात को थोड़ी और गहराई से समझते हैं। इस दुनिया में जितनी चमकदार चीजें हैं जिन्हें देखकर मन मोहित हो जाता है उन पर शुक्र का आधिपत्य है। मन को बहलाने के लिए या खुश होने के लिए या जिन कार्यों से खुशी प्राप्त होती है उन सभी पर शुक्र का साम्राज्य है। कुछ असाधारण बातें, राहु से प्रभावित जातक की -यदि आपका राहू अच्छा है तो अजनबी लोगों के दिल का हाल जानने की क्षमता आपमें होगी। आपका लगाया गया अनुमान गलत साबित नहीं होगा परन्तु यदि कुंडली में राहू खराब है तो आप किसी व्यक्ति को तब तक नहीं समझ पायेंगे जब तक काफी देर न हो चुकी हो। शुक्र और राहू यदि दोनों अच्छे हैं तो प्रेम भी होगा और प्रेम विवाह भी होगा। आप अपने जीवन साथी विषय में अनुमान लगा पायेंगे कि वह इस समय सुख में है या दुःख में है। यही प्रेम है और यही प्रेम की पूर्णता है। इस तरह शुक्र और राहू बहुत कुछ कहते हैं जिन्हें समझ पाने के लिए ज्ञान और अनुभव दोनों की आवश्यकता होगी। -यदि पुरुष की कुंडली में शुक्र नीच का हो और सप्तमेश शुक्र का शत्रु हो जैसे कि सूर्य, मंगल या चन्द्र तो विवाह अनमेल होगा। ऐसे योग में आपकी पत्नी में और आपमें बहुत अधिक अंतर होगा। -यदि किसी भी प्रकार से मंगल की दृष्टि शुक्र और सप्तम स्थान दोनों पर पड़ती हो तो विवाह अनमेल होगा। पति या पत्नी में से कोई एक अपंग होगा । - यदि शुक्र या गुरु को मंगल और शनि देख रहे हों और सप्तम स्थान पर कोई शुभ ग्रह न हो तो भी विवाह अनमेल होगा। इस योग में विवाह के बाद दोनों में से कोई एक मोटापे की और अग्रसर हो जाता है। -- यदि गुरु लग्न में वृषभ, मिथुन, कन्या राशी में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो व्यक्ति का शरीर विवाह के बाद बहुत बेडोल हो जाता है इसके विपरीत यदि शुक्र स्वराशी में या अच्छी स्थिति में हो तो पति पत्नी में जमीन आसमान का फर्क नज़र आता है। यदि शनि लग्न में हो और गुरु सप्तम में हो तो पति पत्नी की उम्र में काफी अंतर होता है। राहू केतु लग्न और सप्तम में हों और लग्न या सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो देखने में पति पत्नी की सुन्दरता में भारी अंतर होता है यानि एक बेहद खूबसूरत और दूसरा इसके विपरीत। जानिए की क्या कारण हैं इस मेल विवाह का ? किसी भी जातक की जन्मकुंडली में लग्न उसका अपना शरीर है और सातवाँ घर आपके पति या पत्नी का परिचायक है। यदि खूबसूरती का प्रश्न हो तो सब जानते हैं कि राहू और शनि खूबसूरती में दोष उत्पन्न करते हैं। गुरु मोटापा बढाता है, यहाँ वक्री और कमजोर अंशों का गुरु का भी ध्यान रखें। शुक्र के कमजोर होने से शरीर में खूबसूरती और आकर्षण का अभाव रहता है। मंगल शरीर के किसी अंग में कमी ला सकता है और राहू सच को छिपा कर आपको वो दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं। इसी कारण ऐसा होता है और यदि आपको ये वहम हो जाए कि आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है या हो सकता है तो आपके विचार और प्रश्न आमंत्रित हैं। यदि मैं माध्यम बनकर आपके बेमेल विवाह में बाधक बन सकूं तो हो सकता है कि यह भी परमपिता परमात्मा की ही इच्छा हो। हमारे समाज में बेमेल विवाह एक मामूली सी बात है। इसमें पति और पत्नी में भारी अंतर होता है। अधिकतर मामलों में पति की उम्र विवाह के समय पत्नी से दुगनी होती है। महिलाएं इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं। जैसा कि देखने में आता है कि पति पत्नी में काफी अंतर दिखाई देता है। सामान्य न लगने वाला यह संजोग बेमेल विवाह कहलाता है। हाल भी में उत्तर प्रदेश के कटिहार से एक ईमेल के जरिये एक नवविवाहिता ने अपने बारे में पूछा कि ऐसे क्यों हुआ। क्यों उसकी शादी उससे कम पढ़े लिखे युवक से कर दी गई। उस महिला ने बताया कि स्नातकोत्तर की डिग्री होते हुए भी एक ड्राइवर से उसकी शादी हो गई जो कि मैट्रिक भी पास नहीं है। जानिए की शिक्षा की दृष्टि से देखें या केरियर की दृष्टि से ? उम्र के लिहाज से या शरीर के किसी नुख्स के नजरिये से, हर कोई बेमेल विवाह से दुखी हो सकता है। विशेषकर तब जबकि व्यक्ति विशेष को इस बात का पहले से पता न हो कि उसके साथ क्या होने जा रहा है। जानिए किस से होगी शादी आपकी ? यदि आपके माता पिता आपके लिए वर वधु की तलाश कर रहे हैं और आपका मन कहीं और अटका है तो यह सवाल आपके मन में अवश्य आएगा किन्ही दो जातकों की जन्म कुंडली देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह दोनों पति पत्नी बनेंगे या नहीं इस सम्बन्ध में सटीक भविष्यवाणी करने के पीछे मेरे पास कुछ सिद्धांत हैं जिन्हें पढ़कर और समझकर आप भी शत प्रतिशत अनुमान लगा सकते हैं कि आपकी शादी किस से होने वाली है और किस से नहीं। -यदि दो कुंडलियों में समान लग्न, समान राशि, समान नवांश लग्न और समान नवमांश मिले तो चालीस प्रतिशत एक और लिख लें। -आपकी कुंडली के सातवें घर का स्वामी यदि आपके साथी की कुंडली में यदि नवांश लग्न में है या नवांश से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखता है तो पचास प्रतिशत एक ओर लिख लें। आपका शुक्र और आपके साथी का शुक्रकिसी एक ही ग्रह की राशि में हैं तो पचास प्रतिशत एक ओर लिख लें। -यदि आपकी कुंडली का सप्तमेश और आपके जीवन साथी की कुंडली का सप्तमेश, शुक्र और आपके जीवन साथी का शुक्र, नवांश लग्नेश और जीवन साथी का नवांश लग्नेश, लड़के का गुरु और लड़की का शुक्र, यदि एक ही राशि में बैठे हों, एक दुसरे को देख रहे हों या एक ही ग्रह की राशि में हों तो यह संभावना साथ प्रतिशत बढ़ जाती है कि आपमें मेल होगा। - यदि आपकी कुंडली में सातवें घर में कोई वक्री ग्रह है और आपके साथी की कुंडली में भी कोई वक्री ग्रह सातवें घर में है तो आप दोनों के बीच शादी की संभावना सत्तर प्रतिशत होगी । यदि लड़का और लड़की दोनों के सप्तमेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों। -यदि लड़का और लड़की दोनों के लग्नेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों। - आपकी कुंडली का नवमांश इस बात की पूरी जानकारी देता है कि आपका जीवनसाथी कैसा होगा। आपकी पसंद का होगा या आप उसे नापसंद करेंगे। आपका जीवन साथी समझदार होगा या लापरवाह। वह आपसे प्यार करेगा या आपसे दूर भागेगा क्या वह एक आदर्श जीवन साथी होगा । उपरोक्त के अलावा भी अनेक बातों का ध्यान विवाह के समय रखना जरुरी होता हैं। जेसे नाडी दोष, मंगलदोष, षडाष्टक और वेधव्य योग आदि। यह लेख या विचार लिखने का उद्देश्य मात्र यह हैं की विवाह यथा संभव सोच समझकर और भलीभांति किसी योग्य और अनुभवी विद्वान् ब्राह्मण आचार्य से विचार विमर्श करके करना चाहिए। और जादा जानकारी और समाधान और उपाय प्राप्त के लिए संपर्क करे और समाधान प्राप्त करे । समाधान शुल्क 351 मात्र । #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 कौन और कैसा होगा आपका जीवन साथी l प्रेम व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से जागृत होता है। प्रेम ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अजनबी एक दुसरे के प्रति समर्पण को जान पाते हैं। दो व्यक्तियों के बीच पनपने वाले इस भाव का लक्ष्य शादी पर संपन्न हो जाए तो प्रेम को पूर्णता मिल जाती है। प्रेम करने वाले युवक युवतियों से हर रोज मेरी बात होती है। प्रेम के विषय पर लोगों से मेरी चर्चा जब भी होती है कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है। यही मेरे ज्ञान का स्त्रोत है। कुछ सालों से मैंने लोगों से जितना सीखा है। उतना ज्ञान किताबों से मिलना मुमकिन नहीं है। मामला चाहे प्रेम विवाह का हो या बेमेल विवाह का हमारे समाज में बेमेल विवाह एक मामूली सी बात है। इसमें पति और पत्नी में भारी अंतर होता है। अधिकतर मामलों में पति की उम्र विवाह के समय पत्नी से दुगनी होती है। महिलाएं इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं। इन बेमेल या प्रेम विवाहों का मुख्य कारण आर्थिक, सामाजिक या मज़बूरी भी हो सकता हैं। प्रेम विवाह और जन्मकुंडली- जैसा कि हमेशा वास्तविक जीवन में होता है। अनायास ही दोनों की मुलाकात होती है और कोई अजनबी अपना लगने लगता है। जन्मकुंडली में भी कुछ ग्रह ऐसे होते हैं जो अनायास होने वाली घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं। हर अजनबी पर राहू की सत्ता है क्योंकि आप उसके विषय में कुछ नहीं जानते। राहू रहस्य के लिए जाना जाता है। इसलिए प्रेम को समझने के लिए राहू को समझना अत्यंत आवश्यक है। मैंने देखा है जिस स्थान से राहू का सम्बन्ध हो उस स्थान से सम्बंधित काम अचानक ही होते हैं। प्रेम का भाव शुक्र से पनपता है। यदि आपका शुक्र अच्छा है तो आप प्रेम कर पायेंगे। प्रेम को समझने की आपमें शक्ति होती। प्रेम की अनुभूति आपके लिए नयी चीज नहीं होगी। इस बात को थोड़ी और गहराई से समझते हैं। इस दुनिया में जितनी चमकदार चीजें हैं जिन्हें देखकर मन मोहित हो जाता है उन पर शुक्र का आधिपत्य है। मन को बहलाने के लिए या खुश होने के लिए या जिन कार्यों से खुशी प्राप्त होती है उन सभी पर शुक्र का साम्राज्य है। कुछ असाधारण बातें, राहु से प्रभावित जातक की -यदि आपका राहू अच्छा है तो अजनबी लोगों के दिल का हाल जानने की क्षमता आपमें होगी। आपका लगाया गया अनुमान गलत साबित नहीं होगा परन्तु यदि कुंडली में राहू खराब है तो आप किसी व्यक्ति को तब तक नहीं समझ पायेंगे जब तक काफी देर न हो चुकी हो। शुक्र और राहू यदि दोनों अच्छे हैं तो प्रेम भी होगा और प्रेम विवाह भी होगा। आप अपने जीवन साथी विषय में अनुमान लगा पायेंगे कि वह इस समय सुख में है या दुःख में है। यही प्रेम है और यही प्रेम की पूर्णता है। इस तरह शुक्र और राहू बहुत कुछ कहते हैं जिन्हें समझ पाने के लिए ज्ञान और अनुभव दोनों की आवश्यकता होगी। -यदि पुरुष की कुंडली में शुक्र नीच का हो और सप्तमेश शुक्र का शत्रु हो जैसे कि सूर्य, मंगल या चन्द्र तो विवाह अनमेल होगा। ऐसे योग में आपकी पत्नी में और आपमें बहुत अधिक अंतर होगा। -यदि किसी भी प्रकार से मंगल की दृष्टि शुक्र और सप्तम स्थान दोनों पर पड़ती हो तो विवाह अनमेल होगा। पति या पत्नी में से कोई एक अपंग होगा । - यदि शुक्र या गुरु को मंगल और शनि देख रहे हों और सप्तम स्थान पर कोई शुभ ग्रह न हो तो भी विवाह अनमेल होगा। इस योग में विवाह के बाद दोनों में से कोई एक मोटापे की और अग्रसर हो जाता है। -- यदि गुरु लग्न में वृषभ, मिथुन, कन्या राशी में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो व्यक्ति का शरीर विवाह के बाद बहुत बेडोल हो जाता है इसके विपरीत यदि शुक्र स्वराशी में या अच्छी स्थिति में हो तो पति पत्नी में जमीन आसमान का फर्क नज़र आता है। यदि शनि लग्न में हो और गुरु सप्तम में हो तो पति पत्नी की उम्र में काफी अंतर होता है। राहू केतु लग्न और सप्तम में हों और लग्न या सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो देखने में पति पत्नी की सुन्दरता में भारी अंतर होता है यानि एक बेहद खूबसूरत और दूसरा इसके विपरीत। जानिए की क्या कारण हैं इस मेल विवाह का ? किसी भी जातक की जन्मकुंडली में लग्न उसका अपना शरीर है और सातवाँ घर आपके पति या पत्नी का परिचायक है। यदि खूबसूरती का प्रश्न हो तो सब जानते हैं कि राहू और शनि खूबसूरती में दोष उत्पन्न करते हैं। गुरु मोटापा बढाता है, यहाँ वक्री और कमजोर अंशों का गुरु का भी ध्यान रखें। शुक्र के कमजोर होने से शरीर में खूबसूरती और आकर्षण का अभाव रहता है। मंगल शरीर के किसी अंग में कमी ला सकता है और राहू सच को छिपा कर आपको वो दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं। इसी कारण ऐसा होता है और यदि आपको ये वहम हो जाए कि आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है या हो सकता है तो आपके विचार और प्रश्न आमंत्रित हैं। यदि मैं माध्यम बनकर आपके बेमेल विवाह में बाधक बन सकूं तो हो सकता है कि यह भी परमपिता परमात्मा की ही इच्छा हो। हमारे समाज में बेमेल विवाह एक मामूली सी बात है। इसमें पति और पत्नी में भारी अंतर होता है। अधिकतर मामलों में पति की उम्र विवाह के समय पत्नी से दुगनी होती है। महिलाएं इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं। जैसा कि देखने में आता है कि पति पत्नी में काफी अंतर दिखाई देता है। सामान्य न लगने वाला यह संजोग बेमेल विवाह कहलाता है। हाल भी में उत्तर प्रदेश के कटिहार से एक ईमेल के जरिये एक नवविवाहिता ने अपने बारे में पूछा कि ऐसे क्यों हुआ। क्यों उसकी शादी उससे कम पढ़े लिखे युवक से कर दी गई। उस महिला ने बताया कि स्नातकोत्तर की डिग्री होते हुए भी एक ड्राइवर से उसकी शादी हो गई जो कि मैट्रिक भी पास नहीं है। जानिए की शिक्षा की दृष्टि से देखें या केरियर की दृष्टि से ? उम्र के लिहाज से या शरीर के किसी नुख्स के नजरिये से, हर कोई बेमेल विवाह से दुखी हो सकता है। विशेषकर तब जबकि व्यक्ति विशेष को इस बात का पहले से पता न हो कि उसके साथ क्या होने जा रहा है। जानिए किस से होगी शादी आपकी ? यदि आपके माता पिता आपके लिए वर वधु की तलाश कर रहे हैं और आपका मन कहीं और अटका है तो यह सवाल आपके मन में अवश्य आएगा किन्ही दो जातकों की जन्म कुंडली देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह दोनों पति पत्नी बनेंगे या नहीं इस सम्बन्ध में सटीक भविष्यवाणी करने के पीछे मेरे पास कुछ सिद्धांत हैं जिन्हें पढ़कर और समझकर आप भी शत प्रतिशत अनुमान लगा सकते हैं कि आपकी शादी किस से होने वाली है और किस से नहीं। -यदि दो कुंडलियों में समान लग्न, समान राशि, समान नवांश लग्न और समान नवमांश मिले तो चालीस प्रतिशत एक और लिख लें। -आपकी कुंडली के सातवें घर का स्वामी यदि आपके साथी की कुंडली में यदि नवांश लग्न में है या नवांश से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखता है तो पचास प्रतिशत एक ओर लिख लें। आपका शुक्र और आपके साथी का शुक्रकिसी एक ही ग्रह की राशि में हैं तो पचास प्रतिशत एक ओर लिख लें। -यदि आपकी कुंडली का सप्तमेश और आपके जीवन साथी की कुंडली का सप्तमेश, शुक्र और आपके जीवन साथी का शुक्र, नवांश लग्नेश और जीवन साथी का नवांश लग्नेश, लड़के का गुरु और लड़की का शुक्र, यदि एक ही राशि में बैठे हों, एक दुसरे को देख रहे हों या एक ही ग्रह की राशि में हों तो यह संभावना साथ प्रतिशत बढ़ जाती है कि आपमें मेल होगा। - यदि आपकी कुंडली में सातवें घर में कोई वक्री ग्रह है और आपके साथी की कुंडली में भी कोई वक्री ग्रह सातवें घर में है तो आप दोनों के बीच शादी की संभावना सत्तर प्रतिशत होगी । यदि लड़का और लड़की दोनों के सप्तमेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों। -यदि लड़का और लड़की दोनों के लग्नेश एक ही ग्रह के नक्षत्र में हों। - आपकी कुंडली का नवमांश इस बात की पूरी जानकारी देता है कि आपका जीवनसाथी कैसा होगा। आपकी पसंद का होगा या आप उसे नापसंद करेंगे। आपका जीवन साथी समझदार होगा या लापरवाह। वह आपसे प्यार करेगा या आपसे दूर भागेगा क्या वह एक आदर्श जीवन साथी होगा । उपरोक्त के अलावा भी अनेक बातों का ध्यान विवाह के समय रखना जरुरी होता हैं। जेसे नाडी दोष, मंगलदोष, षडाष्टक और वेधव्य योग आदि। यह लेख या विचार लिखने का उद्देश्य मात्र यह हैं की विवाह यथा संभव सोच समझकर और भलीभांति किसी योग्य और अनुभवी विद्वान् ब्राह्मण आचार्य से विचार विमर्श करके करना चाहिए। और जादा जानकारी और समाधान और उपाय प्राप्त के लिए संपर्क करे और समाधान प्राप्त करे । समाधान शुल्क 351 मात्र ।
#🔯ज्योतिष #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅ #🔯वास्तु दोष उपायभवन निर्माण संबन्धी (वास्तु पद्धति/ वास्तु सूत्र से भवन निर्माण )वास्तु सूत्र—– वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम –समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश वास्तुशास्त्र—अर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल दे, उसे पुत्र-पौत्रादि, सुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो. इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थय, खुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है. एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता है, परन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता. लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है. आदि काल में मानव का निवास स्थल वृक्षों की शाखाओं पर हुआ करता था | कालांतर में उसमें जैसे-जैसे बुद्धि का विकास होता गया वैसे-वैसे उसने परिस्थिति के अनुसार उपलब्ध सामग्री यथा बांस, खर पतवार, फूस, व मिट्टी आदि का उपयोग करके कुटियानुमा संरचना का अविष्कार किया तथा उसे निवास योग्य बनाकर उसमें निवास करने लगा, यह भवन का मात्र प्रारंभिक स्वरुप था वैदिक काल में भवन बनाने का विज्ञान चरम सीमा तक जा पहुंचा, हमारे धर्मग्रंथों में भी देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख आता है जिन्होंनें रामायण काल से पूर्व लंका नगरी तथा महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से दैत्य शिल्पी मय दानव के साथ मिलकर इन्द्रप्रस्थ नगरी का निर्माण किया था जहाँ पर जल के स्थान पर स्थल तथा स्थल के स्थान पर जल के होने का आभास होता था महाभारत ग्रन्थ के अनुसार इसी कौतुक के कारण दुर्योधन को अपमानित होना पड़ा जो कि बाद में महाभारत जैसे महासंग्राम का एक कारण भी बना | उस समय के भवन निर्माण के दुर्लभ व उन्नत ज्ञान को धर्मग्रंथों में संग्रहीत कर लिया गया जिसे आज सम्पूर्ण विश्व में वास्तु विज्ञान या वास्तु शास्त्र नाम से जाना जाता है | विश्वकर्माप्रकाशः भी एक ऐसा ही ग्रन्थ है जो कि वास्तु सम्बन्धी ज्ञान को अपने अन्दर समाहित किये हुए है | वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं। वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम। सनातन भारतीय शिल्प विज्ञानं के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञानं का उद्देश्य है। मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिए ऐसा घर बनते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है जबकि अन्य प्राणी घर या तो बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं। मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं। प्रायः हमनें देखा है कि पुराने भवनों की दीवारें काफी मोटी- मोटी हुआ करती थी जो कि आज के परिवेश में घटकर ९ इंच से लेकर ४.५ इंच तक की रह गयीं हैं | आज हममें से काफी व्यक्ति यह समझते हैं कि मोटी दीवारें बनाने से भूखंड में जगह की बर्बादी होती है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि मोटी दीवारों की दृढ़ता अधिक होने से भूकंप के समय उनका व्यवहार काफी अच्छा पाया गया है अतः भारवाही दीवार की मोटाई नो (09 ) इंच से कम तो कतई होनी ही नहीं चाहिए | एक भवन को डिजाइन कराते समय एक अच्छे वास्तुविद, अभियंता या आर्कीटेक्ट के चयन के साथ साथ अच्छे ठेकेदार, राजमिस्त्री, प्लंबर ,बढई , इलेक्ट्रीशियन व लोहार आदि का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इनका भवन निर्माण में रोल ठीक उसी तरह से होता है जैसे कि एक अच्छे भोज में हलवाई का, क्योंकि इन सभी कार्यों में कच्ची सामग्री लगभग एक जैसी ही लगती है बस फर्क पड़ता है तो केवल कारीगरी का ही, इसलिये सस्ते के चक्कर में आना ठीक नहीं होता क्योंकि किसी ने कहा है कि सस्ता रोवे बार बार . एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर करता है। यथा : भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई, ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिए अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किए जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है। * भवन में प्रवेश हेतु पूर्वोत्तर (ईशान) श्रेष्ठ है। उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) तथा पश्चिम-वायव्य दिशा भी अच्छी है किंतु दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), पूर्व-आग्नेय, उत्तर-वायव्य तथा दक्षिण दिशा से प्रवेश यथासम्भव नहीं करना चाहिए। यदि वर्जित दिशा से प्रवेश अनिवार्य हो तो किसी वास्तुविद से सलाह लेकर उपचार करना आवश्यक है। * भवन के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थाई अवरोध खम्बा, कुआँ, बड़ा वृक्ष, मोची मद्य मांस आदि की दूकान, गैर कानूनी व्यवसाय आदि नहीं हो। * मुखिया का कक्ष नैऋत्य दिशा में होना शुभ है। * शयन कक्ष में मन्दिर न हो। * वायव्य दिशा में कुंवारी कन्याओं का कक्ष, अतिथि कक्ष आदि हो। इस दिशा में वास करनेवाला अस्थिर होता है, उसका स्थान परिवर्तन होने की अधिक सम्भावना होती है। * शयन कक्ष में दक्षिण की और पैर कर नहीं सोना चाहिए। मानव शरीर एक चुम्बक की तरह कार्य करता है जिसका उत्तर ध्रुव सिर होता है। मनुष्य तथा पृथ्वी का उत्तर ध्रुव एक दिशा में ऐसा तो उनसे निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाएं आपस में टकराने के कारण प्रगाढ़ निद्रा नहीं आयेगी। फलतः अनिद्रा के कारण रक्तचाप आदि रोग ऐसा सकते हैं। सोते समय पूर्व दिशा में सिर होने से उगते हुए सूर्य से निकलनेवाली किरणों के सकारात्मक प्रभाव से बुद्धि के विकास का अनुमान किया जाता है। पश्चिम दिशा में डूबते हुए सूर्य से निकलनेवाली नकारात्मक किरणों के दुष्प्रभाव के कारण सोते समय पश्चिम में सिर रखना मना है। * भारी बीम या गर्डर के बिल्कुल नीचे सोना भी हानिकारक है। * शयन तथा भंडार कक्ष सेट हुए न हों। * शयन कक्ष में आइना रखें तो ईशान दिशा में ही रखें अन्यत्र नहीं। * पूजा का स्थान पूर्व या ईशान दिशा में इस तरह ऐसा की पूजा करनेवाले का मुंह पूर्व दिशा की ओर तथा देवताओं का मुख पश्चिम की ओर रहे। बहुमंजिला भवनों में पूजा का स्थान भूतल पर होना आवश्यक है। पूजास्थल पर हवन कुण्ड या अग्नि कुण्ड आग्नेय दिशा में रखें। * रसोई घर का द्वार मध्य भाग में इस तरह हो कि हर आनेवाले को चूल्हा न दिखे। चूल्हा आग्नेय दिशा में पूर्व या दक्षिण से लगभग ४” स्थान छोड़कर रखें। रसोई, शौचालय एवं पूजा एक दूसरे से सटे न हों। रसोई में अलमारियां दक्षिण-पश्चिम दीवार तथा पानी ईशान में रखें। * बैठक का द्वार उत्तर या पूर्व में हो। deevaron का रंग सफेद, पीला, हरा, नीला या गुलाबी हो पर लाल या काला न हो। युद्ध, हिंसक जानवरों, शोइकर, दुर्घटना या एनी भयानक दृश्यों के चित्र न हों। अधिकांश फर्नीचर आयताकार या वर्गाकार तथा दक्षिण एवं पश्चिम में हों। * सीढियां दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य में हो सकती हैं पर ईशान में न हों। सीढियों के नीचे शयन कक्ष, पूजा या तिजोरी न हो। सीढियों की संख्या विषम हो। * कुआँ, पानी का बोर, हैण्ड पाइप, टंकी आदि ईशान में शुभ होता है, दक्षिण या नैऋत्य में अशुभ व नुकसानदायक है। * स्नान गृह पूर्व में, धोने के लिए कपडे वायव्य में, आइना पूर्व या उत्तर में गीजर तथा स्विच बोर्ड आग्नेय में हों। * शौचालय वायव्य या नैऋत्य में, नल ईशान पूव्र या उत्तर में, सेप्टिक tenk उत्तर या पूर्व में हो। * मकान के केन्द्र (ब्रम्ह्स्थान) में गड्ढा, खम्बा, बीम आदि न हो। yh स्थान खुला, प्रकाशित व् सुगन्धित हो। * घर के पश्चिम में ऊंची जमीन, वृक्ष या भवन शुभ होता है। * घर में पूर्व व् उत्तर की दीवारें कम मोटी तथा दक्षिण व् पश्चिम कि दीवारें अधिक मोटी हों। तहखाना ईशान, या पूर्व में तथा १/४ हिस्सा जमीन के ऊपर हो। सूर्य किरंनें तहखाने तक पहुंचना चाहिए। * मुख्य द्वार के सामने अन्य मकान का मुख्य द्वार, खम्बा, शिलाखंड, कचराघर आदि न हो। * घर के उत्तर व पूर्व में अधिक खुली जगह यश, प्रसिद्धि एवं समृद्धि प्रदान करती है। वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य ‘इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है। नारद संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार- अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह। अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन – धन्यादी का लाभ प्राप्त करता है। #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨ #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔
#📕लाल किताब उपाय🔯 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 भवन निर्माण संबन्धी (वास्तु पद्धति/ वास्तु सूत्र से भवन निर्माण )वास्तु सूत्र—– वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम –समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश वास्तुशास्त्र—अर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल दे, उसे पुत्र-पौत्रादि, सुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो. इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थय, खुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है. एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता है, परन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता. लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है. आदि काल में मानव का निवास स्थल वृक्षों की शाखाओं पर हुआ करता था | कालांतर में उसमें जैसे-जैसे बुद्धि का विकास होता गया वैसे-वैसे उसने परिस्थिति के अनुसार उपलब्ध सामग्री यथा बांस, खर पतवार, फूस, व मिट्टी आदि का उपयोग करके कुटियानुमा संरचना का अविष्कार किया तथा उसे निवास योग्य बनाकर उसमें निवास करने लगा, यह भवन का मात्र प्रारंभिक स्वरुप था वैदिक काल में भवन बनाने का विज्ञान चरम सीमा तक जा पहुंचा, हमारे धर्मग्रंथों में भी देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख आता है जिन्होंनें रामायण काल से पूर्व लंका नगरी तथा महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से दैत्य शिल्पी मय दानव के साथ मिलकर इन्द्रप्रस्थ नगरी का निर्माण किया था जहाँ पर जल के स्थान पर स्थल तथा स्थल के स्थान पर जल के होने का आभास होता था महाभारत ग्रन्थ के अनुसार इसी कौतुक के कारण दुर्योधन को अपमानित होना पड़ा जो कि बाद में महाभारत जैसे महासंग्राम का एक कारण भी बना | उस समय के भवन निर्माण के दुर्लभ व उन्नत ज्ञान को धर्मग्रंथों में संग्रहीत कर लिया गया जिसे आज सम्पूर्ण विश्व में वास्तु विज्ञान या वास्तु शास्त्र नाम से जाना जाता है | विश्वकर्माप्रकाशः भी एक ऐसा ही ग्रन्थ है जो कि वास्तु सम्बन्धी ज्ञान को अपने अन्दर समाहित किये हुए है | वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं। वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम। सनातन भारतीय शिल्प विज्ञानं के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञानं का उद्देश्य है। मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिए ऐसा घर बनते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है जबकि अन्य प्राणी घर या तो बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं। मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं। प्रायः हमनें देखा है कि पुराने भवनों की दीवारें काफी मोटी- मोटी हुआ करती थी जो कि आज के परिवेश में घटकर ९ इंच से लेकर ४.५ इंच तक की रह गयीं हैं | आज हममें से काफी व्यक्ति यह समझते हैं कि मोटी दीवारें बनाने से भूखंड में जगह की बर्बादी होती है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि मोटी दीवारों की दृढ़ता अधिक होने से भूकंप के समय उनका व्यवहार काफी अच्छा पाया गया है अतः भारवाही दीवार की मोटाई नो (09 ) इंच से कम तो कतई होनी ही नहीं चाहिए | एक भवन को डिजाइन कराते समय एक अच्छे वास्तुविद, अभियंता या आर्कीटेक्ट के चयन के साथ साथ अच्छे ठेकेदार, राजमिस्त्री, प्लंबर ,बढई , इलेक्ट्रीशियन व लोहार आदि का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इनका भवन निर्माण में रोल ठीक उसी तरह से होता है जैसे कि एक अच्छे भोज में हलवाई का, क्योंकि इन सभी कार्यों में कच्ची सामग्री लगभग एक जैसी ही लगती है बस फर्क पड़ता है तो केवल कारीगरी का ही, इसलिये सस्ते के चक्कर में आना ठीक नहीं होता क्योंकि किसी ने कहा है कि सस्ता रोवे बार बार . एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर करता है। यथा : भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई, ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिए अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किए जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है। * भवन में प्रवेश हेतु पूर्वोत्तर (ईशान) श्रेष्ठ है। उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) तथा पश्चिम-वायव्य दिशा भी अच्छी है किंतु दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), पूर्व-आग्नेय, उत्तर-वायव्य तथा दक्षिण दिशा से प्रवेश यथासम्भव नहीं करना चाहिए। यदि वर्जित दिशा से प्रवेश अनिवार्य हो तो किसी वास्तुविद से सलाह लेकर उपचार करना आवश्यक है। * भवन के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थाई अवरोध खम्बा, कुआँ, बड़ा वृक्ष, मोची मद्य मांस आदि की दूकान, गैर कानूनी व्यवसाय आदि नहीं हो। * मुखिया का कक्ष नैऋत्य दिशा में होना शुभ है। * शयन कक्ष में मन्दिर न हो। * वायव्य दिशा में कुंवारी कन्याओं का कक्ष, अतिथि कक्ष आदि हो। इस दिशा में वास करनेवाला अस्थिर होता है, उसका स्थान परिवर्तन होने की अधिक सम्भावना होती है। * शयन कक्ष में दक्षिण की और पैर कर नहीं सोना चाहिए। मानव शरीर एक चुम्बक की तरह कार्य करता है जिसका उत्तर ध्रुव सिर होता है। मनुष्य तथा पृथ्वी का उत्तर ध्रुव एक दिशा में ऐसा तो उनसे निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाएं आपस में टकराने के कारण प्रगाढ़ निद्रा नहीं आयेगी। फलतः अनिद्रा के कारण रक्तचाप आदि रोग ऐसा सकते हैं। सोते समय पूर्व दिशा में सिर होने से उगते हुए सूर्य से निकलनेवाली किरणों के सकारात्मक प्रभाव से बुद्धि के विकास का अनुमान किया जाता है। पश्चिम दिशा में डूबते हुए सूर्य से निकलनेवाली नकारात्मक किरणों के दुष्प्रभाव के कारण सोते समय पश्चिम में सिर रखना मना है। * भारी बीम या गर्डर के बिल्कुल नीचे सोना भी हानिकारक है। * शयन तथा भंडार कक्ष सेट हुए न हों। * शयन कक्ष में आइना रखें तो ईशान दिशा में ही रखें अन्यत्र नहीं। * पूजा का स्थान पूर्व या ईशान दिशा में इस तरह ऐसा की पूजा करनेवाले का मुंह पूर्व दिशा की ओर तथा देवताओं का मुख पश्चिम की ओर रहे। बहुमंजिला भवनों में पूजा का स्थान भूतल पर होना आवश्यक है। पूजास्थल पर हवन कुण्ड या अग्नि कुण्ड आग्नेय दिशा में रखें। * रसोई घर का द्वार मध्य भाग में इस तरह हो कि हर आनेवाले को चूल्हा न दिखे। चूल्हा आग्नेय दिशा में पूर्व या दक्षिण से लगभग ४” स्थान छोड़कर रखें। रसोई, शौचालय एवं पूजा एक दूसरे से सटे न हों। रसोई में अलमारियां दक्षिण-पश्चिम दीवार तथा पानी ईशान में रखें। * बैठक का द्वार उत्तर या पूर्व में हो। deevaron का रंग सफेद, पीला, हरा, नीला या गुलाबी हो पर लाल या काला न हो। युद्ध, हिंसक जानवरों, शोइकर, दुर्घटना या एनी भयानक दृश्यों के चित्र न हों। अधिकांश फर्नीचर आयताकार या वर्गाकार तथा दक्षिण एवं पश्चिम में हों। * सीढियां दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य में हो सकती हैं पर ईशान में न हों। सीढियों के नीचे शयन कक्ष, पूजा या तिजोरी न हो। सीढियों की संख्या विषम हो। * कुआँ, पानी का बोर, हैण्ड पाइप, टंकी आदि ईशान में शुभ होता है, दक्षिण या नैऋत्य में अशुभ व नुकसानदायक है। * स्नान गृह पूर्व में, धोने के लिए कपडे वायव्य में, आइना पूर्व या उत्तर में गीजर तथा स्विच बोर्ड आग्नेय में हों। * शौचालय वायव्य या नैऋत्य में, नल ईशान पूव्र या उत्तर में, सेप्टिक tenk उत्तर या पूर्व में हो। * मकान के केन्द्र (ब्रम्ह्स्थान) में गड्ढा, खम्बा, बीम आदि न हो। yh स्थान खुला, प्रकाशित व् सुगन्धित हो। * घर के पश्चिम में ऊंची जमीन, वृक्ष या भवन शुभ होता है। * घर में पूर्व व् उत्तर की दीवारें कम मोटी तथा दक्षिण व् पश्चिम कि दीवारें अधिक मोटी हों। तहखाना ईशान, या पूर्व में तथा १/४ हिस्सा जमीन के ऊपर हो। सूर्य किरंनें तहखाने तक पहुंचना चाहिए। * मुख्य द्वार के सामने अन्य मकान का मुख्य द्वार, खम्बा, शिलाखंड, कचराघर आदि न हो। * घर के उत्तर व पूर्व में अधिक खुली जगह यश, प्रसिद्धि एवं समृद्धि प्रदान करती है। वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य ‘इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है। नारद संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार- अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह। अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन – धन्यादी का लाभ प्राप्त करता है।
#🔯ज्योतिष #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅ #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨ जानिए, बहुत से जन्मों तक भुगतनी पड़ती है सांप को मारने की सजा :- सांप की महिमा का गुणगान किसी लेखनी में करना असंभव है क्योंकि सांप को तो स्वयं देवों के देव महादेव अभूषण रूप में अपने गले में धारण करते हैं। रावण संहिता शास्त्र के अनुसार व्यक्ति के वो पितृ जो देव योनी में आ जाते हैं वो सर्प बनकर अपने वंशजो के धन की रक्षा करते हैं। ज्योतिष शास्त्रों में राहु व केतु को सर्प माना जाता है। राहु को सर्प का सिर तथा केतु को पूंछ माना जाता है। धर्म शास्त्रों में वर्णित है कि सांप को मारना नहीं चाहिए। इससे बड़ा पाप लगता है और बहुत से जन्मों तक इसकी सजा भुगतनी पड़ती है। ज्योतिषशास्त्र में माना जाता है कि जो व्यक्ति सांप को मारता है या उसे किसी प्रकार से कष्ट देता है अगले जन्म में उनकी कुण्डली में कालसर्प नामक योग बनता है। इस योग के कारण व्यक्ति को जीवन में बार-बार कठिनाईयों और असफलताओं का सामना करना पड़ता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है जिस घर में सांप निवास करते हैं उस घर को तत्काल छोड़ देना चाहिए क्योंकि वह कभी भी आपके या आपके किसी अपने के लिए मृत्यु का कारण बन सकता है। * स्वप्न में काला सांप दिखने का अर्थ है भावी जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। * गर्भवती महिला को स्वप्न में सांप दिखे तो उसे पुत्र रत्न प्राप्त होता है। * स्वप्न में सफेद सांप नजर आए तो घर की आर्थिक स्थिति सशक्त होती है। * घर में दो मुंह वाला सांप आ जाए तो शुभता का संचार होता है।
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 जानिए, बहुत से जन्मों तक भुगतनी पड़ती है सांप को मारने की सजा :- सांप की महिमा का गुणगान किसी लेखनी में करना असंभव है क्योंकि सांप को तो स्वयं देवों के देव महादेव अभूषण रूप में अपने गले में धारण करते हैं। रावण संहिता शास्त्र के अनुसार व्यक्ति के वो पितृ जो देव योनी में आ जाते हैं वो सर्प बनकर अपने वंशजो के धन की रक्षा करते हैं। ज्योतिष शास्त्रों में राहु व केतु को सर्प माना जाता है। राहु को सर्प का सिर तथा केतु को पूंछ माना जाता है। धर्म शास्त्रों में वर्णित है कि सांप को मारना नहीं चाहिए। इससे बड़ा पाप लगता है और बहुत से जन्मों तक इसकी सजा भुगतनी पड़ती है। ज्योतिषशास्त्र में माना जाता है कि जो व्यक्ति सांप को मारता है या उसे किसी प्रकार से कष्ट देता है अगले जन्म में उनकी कुण्डली में कालसर्प नामक योग बनता है। इस योग के कारण व्यक्ति को जीवन में बार-बार कठिनाईयों और असफलताओं का सामना करना पड़ता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है जिस घर में सांप निवास करते हैं उस घर को तत्काल छोड़ देना चाहिए क्योंकि वह कभी भी आपके या आपके किसी अपने के लिए मृत्यु का कारण बन सकता है। * स्वप्न में काला सांप दिखने का अर्थ है भावी जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। * गर्भवती महिला को स्वप्न में सांप दिखे तो उसे पुत्र रत्न प्राप्त होता है। * स्वप्न में सफेद सांप नजर आए तो घर की आर्थिक स्थिति सशक्त होती है। * घर में दो मुंह वाला सांप आ जाए तो शुभता का संचार होता है।
#🔯ज्योतिष #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅ #🔯वास्तु दोष उपायनौकरी स्‍थिर नहीं है, दांपत्‍य गड़बड़ है, तो इस ग्रह का उपाय करें, वरना परेशान ही रहेंगे नौकरी स्‍थिर नहीं है, दांपत्‍य गड़बड़ है, तो इस ग्रह का उपाय करें, वरना परेशान ही रहेंगे..! दक्षिण भारतीय ज्‍योतिष विद्वानों के अनुसार, द्वितीय मंगल चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है दक्षिण भारतीय ज्‍योतिष विद्वानों के अनुसार, द्वितीय मंगल चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है। इन भावों में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है। जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों, मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार-चार गुणा मंगल का पाप प्रभाव अलग-अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है, जैसे, लग्न भाव में मंगललग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है। यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है। इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है। सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति-पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है। अष्टम भाव: यहां मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवन साथी के लिए संकट कारक होती है द्वितीय भाव में मंगल : भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है। यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है। यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है। परिवार में तनाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां लाता है। इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है। मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतानपक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है। भाग्य का फल मंदा होता है चतुर्थ भाव में मंगल मंगल : चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है। यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है, परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है। मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है। मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है। मंगली दोष के कारण पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है। यह मंगल जीवन साथी को संकट में नहीं डालता है सप्तम भाव में मंगल : सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है। इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है। इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव बना रहता है जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है। मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है। यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है। संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है। मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां बढ़ती हैं, जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए। अष्टम भाव में मंगल अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है। इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है। अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है। जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है। धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है। रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है। इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है, तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है। मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है द्वादश भाव : यहां स्‍थित मंगल कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है। इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है। इस दोष के कारण पति-पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती है। व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है। अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है। भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨
#📕लाल किताब उपाय🔯 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 नौकरी स्‍थिर नहीं है, दांपत्‍य गड़बड़ है, तो इस ग्रह का उपाय करें, वरना परेशान ही रहेंगे नौकरी स्‍थिर नहीं है, दांपत्‍य गड़बड़ है, तो इस ग्रह का उपाय करें, वरना परेशान ही रहेंगे..! दक्षिण भारतीय ज्‍योतिष विद्वानों के अनुसार, द्वितीय मंगल चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है दक्षिण भारतीय ज्‍योतिष विद्वानों के अनुसार, द्वितीय मंगल चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है। इन भावों में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है। जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों, मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार-चार गुणा मंगल का पाप प्रभाव अलग-अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है, जैसे, लग्न भाव में मंगललग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है। यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है। इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है। सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति-पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है। अष्टम भाव: यहां मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवन साथी के लिए संकट कारक होती है द्वितीय भाव में मंगल : भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है। यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है। यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है। परिवार में तनाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां लाता है। इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है। मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतानपक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है। भाग्य का फल मंदा होता है चतुर्थ भाव में मंगल मंगल : चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है। यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है, परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है। मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है। मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है। मंगली दोष के कारण पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है। यह मंगल जीवन साथी को संकट में नहीं डालता है सप्तम भाव में मंगल : सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है। इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है। इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव बना रहता है जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है। मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है। यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है। संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है। मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां बढ़ती हैं, जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए। अष्टम भाव में मंगल अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है। इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है। अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है। जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है। धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है। रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है। इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है, तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है। मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है द्वादश भाव : यहां स्‍थित मंगल कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है। इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है। इस दोष के कारण पति-पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती है। व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है। अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है। भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है
#🔯ज्योतिष #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅ #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨ क्यों_टूटतें_हैं_प्रेमसम्बन्ध ----ग्रहों के कारण ही व्यक्ति प्रेम करता है और ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं। ज्योतिष में प्रेम विवाह के योगों के असफल रहने के कई कारण है। -----शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन शुक्र की स्थिति प्रतिकूल हो तो प्रेम संबंध टूटते हैं। सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पापयोग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। -----शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं दिलाता। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना भी असफल प्रेम का कारण है। #प्रेम_विवाह_मजबूत_करने_के_लिए ---शुक्र की पूजा करें, पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें। ब्लू टोपाज (ज्योतिषी से पूंछकर) सुखद दाम्पत्य एवं वशीकरण हेतु पहनें। ----कुण्डली के पहले, पाँचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी ज़रूर देखें क्योंकि विवाह के लिए बारहवाँ भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख का भी होता है।
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 क्यों_टूटतें_हैं_प्रेमसम्बन्ध ----ग्रहों के कारण ही व्यक्ति प्रेम करता है और ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं। ज्योतिष में प्रेम विवाह के योगों के असफल रहने के कई कारण है। -----शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन शुक्र की स्थिति प्रतिकूल हो तो प्रेम संबंध टूटते हैं। सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पापयोग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। -----शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं दिलाता। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना भी असफल प्रेम का कारण है। #प्रेम_विवाह_मजबूत_करने_के_लिए ---शुक्र की पूजा करें, पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें। ब्लू टोपाज (ज्योतिषी से पूंछकर) सुखद दाम्पत्य एवं वशीकरण हेतु पहनें। ----कुण्डली के पहले, पाँचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी ज़रूर देखें क्योंकि विवाह के लिए बारहवाँ भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख का भी होता है।