एस्ट्रो मनोज कौशिक बहल यंत्र मंत्र तंत्र विशेषज्ञ
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#🔯ज्योतिष #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨-- पितृदोष से मुक्ति के अचूक उपाय -- पितृऋण क्या है? *पितृऋण का अर्थ पूर्वज और पिता का ऋण। पिता के द्वारा ही हमें यह जन्म मिला है। यह ऋण हमारे पूर्वजों का माना गया है। यह पितृऋण भी कई प्रकार का होता है जिसका नीचे उल्लेख किया गया है। पितृदोष क्या है? *ज्योतिषीयों अनुसार पितृदोष कई प्रकार का होता है। कुंडली की भिन्न स्थिति अनुसार जाना जाता है कि किसी जातक को पितृदोष हैं। कहते हैं कि पितृदोष के होने से व्यक्ति की आर्थिक उन्नती रुक जाती है, गृहकलह होता है, घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं हो पाता है। * कुंडली का नौवां घर यह बताता है कि व्यक्ति पिछले जन्म के कौन से पुण्य साथ लेकर आया है। यदि कुंडली के नौवें में राहु, बुध या शुक्र है तो यह कुंडली पितृदोष की है। * कुंडली के दशम भाव में गुरु के होने को शापित माना जाता है। * सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष। * लग्न में राहु है तो सूर्य ग्रहण और पितृदोष, चंद्र के साथ केतु और सूर्य के साथ राहु होने पर भी पितृदोष होता है। * पंचम में राहु होने पर भी कुछ ज्योतिष पितृदोष मानते हैं। * जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है। * विद्वानों ने पितर दोष का संबंध बृहस्पति (गुरु) से बताया है। अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घटता है और यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है। पितृ बाधा : यदि आपके ग्रह-नक्षत्र भी सही हैं, घर का वास्तु भी सही है तब भी किसी प्रकार का कोई आकस्मिक दुख या धन का अभाव बना रहता है, तो फिर पितृ बाधा पर विचार करना चाहिए। पितृ बाधा का मतलब यह होता है कि आपके पूर्वज आपसे कुछ अपेक्षा रखते हैं, दूसरा यह कि आपके पूर्वजों के कर्म का आप भुगतान कर रहे हैं, तीसरा यह कि आपके किसी पूर्वज या कुल के किसी सदस्य का रोग आपको लगा है, चौथा कारण यह कि कोई अदृश्य शक्ति आपको परेशान करती है। निवारण : इसका सरल-सा निवारण है कि प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ना। श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धा रखना भी जरूरी है। पितृदोष उपाय : * श्राद्ध कर्म अच्छे से करना चाहिए। * दादा और पिता का अपमान नहीं करना चाहिए। * अपने से बड़े लोगों का आशीर्वाद लेते रहना चाहिए। * क्रोध और ईर्षा से दूर रहना चाहिए। * परिवार खानदान के सभी पुरुष सदस्यों से बराबरी से सिक्के लेकर उसे शनि मंदिर में दान कर देना चाहिए। * प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ते रहना चाहिए। खास उपाय : पितृ दोष या ऋण को उतारने के तीन उपाय- देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना, पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना और संतान उत्पन्न करके उसमें धार्मिक संस्कार डालना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, तेरस, चौदस, अमावस्य और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है। पितृ ऋण : पितृ ऋण कई तरह का होता है। हमारे कर्मों का, आत्मा का, पिता का, भाई का, बहन का, मां का, पत्नी का, बेटी और बेटे का। स्वऋण या आत्म ऋण का अर्थ है कि जब जातक, पूर्व जन्म में नास्तिक और धर्म विरोधी काम करता है, तो अगले जन्म में, उस पर स्वऋण चढ़ता है। मातृ ऋण से कर्ज चढ़ता जाता है और घर की शांति भंग हो जाती है। बहन के ऋण से व्यापार-नौकरी कभी भी स्थायी नहीं रहती। जीवन में संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। भाई के ऋण से हर तरह की सफलता मिलने के बाद अचानक सब कुछ तबाह हो जाता है। 28 से 36 वर्ष की आयु के बीच तमाम तरह की तकलीफ झेलनी पड़ती है। खास उपाय : इस ऋण को उतारने के तीन उपाय- देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना, पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना और संतान उत्पन्न करके उसमें धार्मिक संस्कार डालना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, तेरस, चौदस, अमावस्य और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है। ब्रह्मा ऋण : पितृ ऋण के अलावा एक ब्रह्मा ऋण भी होता है जिसे भी पितृ ऋण के अंर्तगत ही माना जा सकता है। ब्रम्हा ऋण वो ऋण है जो हम पर ब्रम्हा का कर्ज है। ब्रम्हाजी और उनके पुत्रों ने हमें बनाया तो किसी भी प्रकार के भेदवाव, छुआछूत, जाति आदि में विभाजित करके नहीं बनाया। विभाजित करके नहीं बनाया लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद हमने उनके कुल को जातियों में बांट दिया। अपने ही भाइयों से विभाजित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ की हमें युद्ध, हिंसा और अशांति को भोगना पड़ा और पड़ रहा है। दूसरी ओर यह ऋण हमारे पूर्वजों, हमारे कुल, हमारे धर्म, हमारे वंश आदि से जुड़ा है। इस ऋण को पृथ्वी का ऋण भी कहते हैं, जो संतान द्वारा चुकाया जाता है। बहुत से लोग अपने धर्म, मातृभूमि या कुल को छोड़कर चले गए हैं। उनके पीछे यह दोष कई जन्मों तक पीछा करता रहता है। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म और कुल को छोड़कर गया है तो उसके कुल के अंत होने तक यह चलता रहता है, क्यों‍कि यह ऋण ब्रह्मा और उनके पुत्रों से जुड़ा हुआ है। #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅
#✡️सितारों की चाल🌠 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #📕लाल किताब उपाय🔯 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार -- पितृदोष से मुक्ति के अचूक उपाय -- पितृऋण क्या है? *पितृऋण का अर्थ पूर्वज और पिता का ऋण। पिता के द्वारा ही हमें यह जन्म मिला है। यह ऋण हमारे पूर्वजों का माना गया है। यह पितृऋण भी कई प्रकार का होता है जिसका नीचे उल्लेख किया गया है। पितृदोष क्या है? *ज्योतिषीयों अनुसार पितृदोष कई प्रकार का होता है। कुंडली की भिन्न स्थिति अनुसार जाना जाता है कि किसी जातक को पितृदोष हैं। कहते हैं कि पितृदोष के होने से व्यक्ति की आर्थिक उन्नती रुक जाती है, गृहकलह होता है, घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं हो पाता है। * कुंडली का नौवां घर यह बताता है कि व्यक्ति पिछले जन्म के कौन से पुण्य साथ लेकर आया है। यदि कुंडली के नौवें में राहु, बुध या शुक्र है तो यह कुंडली पितृदोष की है। * कुंडली के दशम भाव में गुरु के होने को शापित माना जाता है। * सातवें घर में गुरु होने पर आंशिक पितृदोष। * लग्न में राहु है तो सूर्य ग्रहण और पितृदोष, चंद्र के साथ केतु और सूर्य के साथ राहु होने पर भी पितृदोष होता है। * पंचम में राहु होने पर भी कुछ ज्योतिष पितृदोष मानते हैं। * जन्म पत्री में यदि सूर्य पर शनि राहु-केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ ऋण की स्थिति मानी जाती है। * विद्वानों ने पितर दोष का संबंध बृहस्पति (गुरु) से बताया है। अगर गुरु ग्रह पर दो बुरे ग्रहों का असर हो तथा गुरु 4-8-12वें भाव में हो या नीच राशि में हो तथा अंशों द्वारा निर्धन हो तो यह दोष पूर्ण रूप से घटता है और यह पितर दोष पिछले पूर्वज (बाप दादा परदादा) से चला आता है, जो सात पीढ़ियों तक चलता रहता है। पितृ बाधा : यदि आपके ग्रह-नक्षत्र भी सही हैं, घर का वास्तु भी सही है तब भी किसी प्रकार का कोई आकस्मिक दुख या धन का अभाव बना रहता है, तो फिर पितृ बाधा पर विचार करना चाहिए। पितृ बाधा का मतलब यह होता है कि आपके पूर्वज आपसे कुछ अपेक्षा रखते हैं, दूसरा यह कि आपके पूर्वजों के कर्म का आप भुगतान कर रहे हैं, तीसरा यह कि आपके किसी पूर्वज या कुल के किसी सदस्य का रोग आपको लगा है, चौथा कारण यह कि कोई अदृश्य शक्ति आपको परेशान करती है। निवारण : इसका सरल-सा निवारण है कि प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ना। श्राद्ध पक्ष के दिनों में तर्पण आदि कर्म करना और पूर्वजों के प्रति मन में श्रद्धा रखना भी जरूरी है। पितृदोष उपाय : * श्राद्ध कर्म अच्छे से करना चाहिए। * दादा और पिता का अपमान नहीं करना चाहिए। * अपने से बड़े लोगों का आशीर्वाद लेते रहना चाहिए। * क्रोध और ईर्षा से दूर रहना चाहिए। * परिवार खानदान के सभी पुरुष सदस्यों से बराबरी से सिक्के लेकर उसे शनि मंदिर में दान कर देना चाहिए। * प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ते रहना चाहिए। खास उपाय : पितृ दोष या ऋण को उतारने के तीन उपाय- देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना, पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना और संतान उत्पन्न करके उसमें धार्मिक संस्कार डालना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, तेरस, चौदस, अमावस्य और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है। पितृ ऋण : पितृ ऋण कई तरह का होता है। हमारे कर्मों का, आत्मा का, पिता का, भाई का, बहन का, मां का, पत्नी का, बेटी और बेटे का। स्वऋण या आत्म ऋण का अर्थ है कि जब जातक, पूर्व जन्म में नास्तिक और धर्म विरोधी काम करता है, तो अगले जन्म में, उस पर स्वऋण चढ़ता है। मातृ ऋण से कर्ज चढ़ता जाता है और घर की शांति भंग हो जाती है। बहन के ऋण से व्यापार-नौकरी कभी भी स्थायी नहीं रहती। जीवन में संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि जीने की इच्छा खत्म हो जाती है। भाई के ऋण से हर तरह की सफलता मिलने के बाद अचानक सब कुछ तबाह हो जाता है। 28 से 36 वर्ष की आयु के बीच तमाम तरह की तकलीफ झेलनी पड़ती है। खास उपाय : इस ऋण को उतारने के तीन उपाय- देश के धर्म अनुसार कुल परंपरा का पालन करना, पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करना और संतान उत्पन्न करके उसमें धार्मिक संस्कार डालना। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना, भृकुटी पर शुद्ध जल का तिलक लगाना, तेरस, चौदस, अमावस्य और पूर्णिमा के दिन गुड़-घी की धूप देना, घर के वास्तु को ठीक करना और शरीर के सभी छिद्रों को अच्छी रीति से प्रतिदिन साफ-सुधरा रखने से भी यह ऋण चुकता होता है। ब्रह्मा ऋण : पितृ ऋण के अलावा एक ब्रह्मा ऋण भी होता है जिसे भी पितृ ऋण के अंर्तगत ही माना जा सकता है। ब्रम्हा ऋण वो ऋण है जो हम पर ब्रम्हा का कर्ज है। ब्रम्हाजी और उनके पुत्रों ने हमें बनाया तो किसी भी प्रकार के भेदवाव, छुआछूत, जाति आदि में विभाजित करके नहीं बनाया। विभाजित करके नहीं बनाया लेकिन पृथ्वी पर आने के बाद हमने उनके कुल को जातियों में बांट दिया। अपने ही भाइयों से विभाजित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ की हमें युद्ध, हिंसा और अशांति को भोगना पड़ा और पड़ रहा है। दूसरी ओर यह ऋण हमारे पूर्वजों, हमारे कुल, हमारे धर्म, हमारे वंश आदि से जुड़ा है। इस ऋण को पृथ्वी का ऋण भी कहते हैं, जो संतान द्वारा चुकाया जाता है। बहुत से लोग अपने धर्म, मातृभूमि या कुल को छोड़कर चले गए हैं। उनके पीछे यह दोष कई जन्मों तक पीछा करता रहता है। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म और कुल को छोड़कर गया है तो उसके कुल के अंत होने तक यह चलता रहता है, क्यों‍कि यह ऋण ब्रह्मा और उनके पुत्रों से जुड़ा हुआ है।
#🔯ज्योतिष #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯वास्तु दोष उपायसंतान प्राप्ति में ग्रहों का प्रभाव संतान प्राप्ति दाम्पत्य जीवन में पहला सुख होता है। नारी संतान प्राप्त करके धन्य हो जाती है। हर आँगन में बच्चों की किलकारी घर के सौंदर्य एवं खुशहाली में चार चाँद लगा देती है, परंतु कुछ दम्पति इस सुख से वंचित रहने से परेशान हो जाते हैं, कुछ हल निकाल लेते हैं। कुछ दम्पति अपने जीवन का अनमोल रत्न (संतान) प्राप्त न कर पाने से जीवन बर्बाद कर लेते हैं एवं प्राप्ति के बाद भी संतान सुखी नहीं रहती। देखें, बच्चे का सुख ग्रहों की शांति से कैसे प्राप्त होता है, क्योंकि ग्रह भी विशेष प्रभाव डालते हैं। कुंडली में पंचम भाव संतान का होता है। देखें ग्रह वहाँ विराजमान होकर क्या असर देते हैं। यदि अशुभ असर देते हैं तो उनका उपाय निम्न प्रयोग से कीजिए। सूर्य : पाँचवें घर में उच्च का सूर्य हो या शुभ हो तो संतान की वृद्धि करता है, परंतु अशुभ सूर्य संतान में बाधक होता है। इसके लिए हनुमानजी को चोला चढ़ाएँ, चने का भोग लगाएँ अथवा बंदरों की सेवा फल से करें। चंद्र : संतान भाव में चंद्रमा अशुभ फल दे रहा हो तो अपने शयन कक्ष में पलंग के नीचे ताँबे की प्लेट रखें। मंगल : यदि संतान भाव में मंगल अशुभ फल दे रहा हो या गर्भस्थ में बीच में तकलीफ आ रही हो तो मंगलवार के दिन हनुमानजी के पैर में नमक छुआकर नारी कमर में बाँध ले। अनुकूलता आएगी। बुध : बुध पाँचवें घर में अशुभ फल दे रहा हो तो चतुर्थी के दिन चाँदी खरीदें एवं धारण करें। स्नान में कुट का प्रयोग करें। गुरु : गुरु पाँचवें घर में संतान के लिए बाधक हो तो गुरुवार को केसर का तिलक चंदन के साथ करें एवं पीली हल्दी, पीला चंदन गुरु मंदिर में दान करें। शुक्र : शुक्र यदि संतान भाव में स्थित होकर बाधा दे रहा हो तो सफेद कपड़ा, चंदन, इत्र, दही एवं सुगंधित सफेद फूल का दान करें। शनि : शनि पाँचवें घर में संतान के लिए बाधक हो तो काले तिल जमीन में दबा दें एवं लोहे की कील, चाकू शनि मंदिर में दान करें। राहु : राहु यदि पाँचवें घर में बाधक हो तो अपने पास चाँदी का चौकोर पतरा रखें एवं लोहे की अँगूठी मध्यमा में पहनें। केतु : केतु पाँचवें घर में स्थित होकर संतान बाधक हो तो किसी कोढ़ी या गरीब व्यक्ति को कंबल दान करें एवं मंगल के दिन दोपहर में सीसे की अँगूठी गोमूत्र में धोकर धारण करें। #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨ #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅
#✡️सितारों की चाल🌠 #📕लाल किताब उपाय🔯 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार संतान प्राप्ति में ग्रहों का प्रभाव संतान प्राप्ति दाम्पत्य जीवन में पहला सुख होता है। नारी संतान प्राप्त करके धन्य हो जाती है। हर आँगन में बच्चों की किलकारी घर के सौंदर्य एवं खुशहाली में चार चाँद लगा देती है, परंतु कुछ दम्पति इस सुख से वंचित रहने से परेशान हो जाते हैं, कुछ हल निकाल लेते हैं। कुछ दम्पति अपने जीवन का अनमोल रत्न (संतान) प्राप्त न कर पाने से जीवन बर्बाद कर लेते हैं एवं प्राप्ति के बाद भी संतान सुखी नहीं रहती। देखें, बच्चे का सुख ग्रहों की शांति से कैसे प्राप्त होता है, क्योंकि ग्रह भी विशेष प्रभाव डालते हैं। कुंडली में पंचम भाव संतान का होता है। देखें ग्रह वहाँ विराजमान होकर क्या असर देते हैं। यदि अशुभ असर देते हैं तो उनका उपाय निम्न प्रयोग से कीजिए। सूर्य : पाँचवें घर में उच्च का सूर्य हो या शुभ हो तो संतान की वृद्धि करता है, परंतु अशुभ सूर्य संतान में बाधक होता है। इसके लिए हनुमानजी को चोला चढ़ाएँ, चने का भोग लगाएँ अथवा बंदरों की सेवा फल से करें। चंद्र : संतान भाव में चंद्रमा अशुभ फल दे रहा हो तो अपने शयन कक्ष में पलंग के नीचे ताँबे की प्लेट रखें। मंगल : यदि संतान भाव में मंगल अशुभ फल दे रहा हो या गर्भस्थ में बीच में तकलीफ आ रही हो तो मंगलवार के दिन हनुमानजी के पैर में नमक छुआकर नारी कमर में बाँध ले। अनुकूलता आएगी। बुध : बुध पाँचवें घर में अशुभ फल दे रहा हो तो चतुर्थी के दिन चाँदी खरीदें एवं धारण करें। स्नान में कुट का प्रयोग करें। गुरु : गुरु पाँचवें घर में संतान के लिए बाधक हो तो गुरुवार को केसर का तिलक चंदन के साथ करें एवं पीली हल्दी, पीला चंदन गुरु मंदिर में दान करें। शुक्र : शुक्र यदि संतान भाव में स्थित होकर बाधा दे रहा हो तो सफेद कपड़ा, चंदन, इत्र, दही एवं सुगंधित सफेद फूल का दान करें। शनि : शनि पाँचवें घर में संतान के लिए बाधक हो तो काले तिल जमीन में दबा दें एवं लोहे की कील, चाकू शनि मंदिर में दान करें। राहु : राहु यदि पाँचवें घर में बाधक हो तो अपने पास चाँदी का चौकोर पतरा रखें एवं लोहे की अँगूठी मध्यमा में पहनें। केतु : केतु पाँचवें घर में स्थित होकर संतान बाधक हो तो किसी कोढ़ी या गरीब व्यक्ति को कंबल दान करें एवं मंगल के दिन दोपहर में सीसे की अँगूठी गोमूत्र में धोकर धारण करें।
#🔯ज्योतिष #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨*इस प्रकार से महिलाओं को कष्ट देते हैं राहु, मंगल और शनि-* *महिलाओं की कुण्डली में राहु, शनि या मंगल की उपस्थिति मात्र भांति-भांति के संकेत देती है। इस लेख का उद्देश्य वर्षों का अनुभव प्रकट करना है, जो शारीरिक कष्टों को देखने के लिए आवश्यक है।* *स्त्री की कुण्डली में पंचम भाव में राहु की उपस्थिति का अर्थ उनके नाभि प्रदेश से लेकर बस्ति प्रदेश तक के अंगों में आने वाले कष्टों से अभिप्रेत है।* *अधिकांश मामलों में पंचमस्थ राहु उन विषयों पर अधिकार रखते हैं जो या तो ग्रंथि रूप में हों या सर्पाकृति हों या अंतडिय़ों की तरह बहुत सारे मोड़ों वाले हों।* *बाह्य जगत में लहसुन, अदरक या कई तरह की फलियां इस श्रेणी में आ जाती हैं। शरीर के अंदर अंतडिय़ां, कभी-कभी किडनी तथा अधिकांश मामलों में फैलोपियन ट्यूब या यूट्रस संबंधी समस्याएं राहु के कारण आती हैं।* *पंचमस्थ राहु को यदि मंगल पीडि़त करें या राहु-मंगल युति हो या पंचमेश का संबंध राहु-मंगल से हो जाए तो पाराशर जी के अनुसार सर्प के श्राप से संतान क्षय बताया गया है। इन स्थितियों में सर्प की पूजा से सर्प के श्राप का निवारण करना पाराशर जी ने बताया है। हमारे अनुभव में आया है कि ये मामले संतानहीनता के न होकर संतान उत्पन्न होने के बाद उसका क्षय या गर्भधारण के बाद गर्भक्षय से संबंधित होते हैं।* *यदि पंचम भाव को केवल राहु प्रभावित करें तो यह दोष संतान क्षय न होकर फैलोपियन ट्यूब में इंफेक्शन होकर गर्भ की अक्षमता में बदल जाते हैं। काकवंध्या के योग उन मामलों में अधिक हैं जब राहु तो पंचम भाव में हों या पंचमेश के साथ हों तथा सप्तम या नवम भाव को अन्य पाप ग्रह प्रभावित कर रहे हों।* *शनि देवता पंचम भाव पर कु प्रभाव रखें तो संतान संबंधी कष्ट जीवन के मध्य काल में आते हैं। इनमें से कुछ योगों को समझना होगा।* *शनि यदि सम राशि में हो और बुध विषम राशि में हो तथा दोनों में परस्पर दृष्टि हो तो अपूर्ण गर्भ होता है।* *पंचमेश नीच राशि का हो और पंचम भाव को न देखे एवं पंचम भाव में बुध-शनि हो तो स्त्री काकवंध्या होती है।* *पंचम भाव में मिथुन, कन्या, मकर या कुंभ राशि हो और उस भाव पर शनि की दृष्टि या योग हो तो पत्नी से संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है।* *यदि पंचम स्थान में राहु हो, पंचमेश पापग्रहों से युक्त हो तथा गुरु मकर राशि में हो तो पुत्र का सुख पूर्ण नहीं होता।* *चंद्रमा से द्वितीय तथा व्यय भाव में मंगल, शनि हो (इनमें से एक व्यय में एवं एक द्वितीय में) तो मंगल व शनि इनमें से जो बलवान हो और गर्भकाल में वह जिस मास का स्वामी हो उस मास में गर्भवती स्त्री को मृत्यु तुल्य कष्ट देता है।* *चंद्रमा, मंगल या शनि दोनों में से एक से युत हो और दूसरे से दृष्ट हो तो मंगल, शनि में जो बली होगा, उसी के कारण संतान का क्षय होगा।* *लग्न में शुक्र-चन्द्र तथा शनि मंगल से युत हो और पंचम भाव में पापग्रह की राशि हो तो संतानोत्पत्ति लगभग असंभव होती है।* *सप्तम में मंगल या पाप नवांश तथा सप्तम पर शनि की दृष्टि हो तो गुप्त रोग होते हैं।* *सप्तम में राहु एवं सूर्य तथा पंचम में पापग्रह अथवा अष्टम में शुक्र-गुरु-राहु हो तो स्त्री की संतान उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती है।* *अष्टम में शुक्र-गुरु-मंगल हों या सप्तम में मंगल, शनि से दृष्ट हो तो स्त्री को गर्भपात होते रहते हैं।सूर्य, मंगल, शनि, राहु यदि बली होकर पंचम में हों तो संतान हानि करते हैं लेकिन निर्बल हों तो संतानदायी होते हैं।* *इन सबमें एक बात समान रूप से देखने को मिलती है कि पंचम भाव या पंचम से चतुर्थ या पंचम से छठा, आठवां भाव पीडि़त हो तो स्त्री की कोख पर असर आता है चाहे गर्भावस्था में या बच्चे के जन्म लेने के बाद। राहु का इन सबमें सबसे अधिक असर नजर आता है। राहु रोकने में विश्वास करते हैं और शनि या मंगल नष्ट करने में।* *जितने भी ज्योतिष शास्त्र हैं उन सबमें पूर्व जन्मकृत कर्मों के कारण ऐसी हिंसा देखने को मिलती है जिसके कारण माता-पिता सभी दुखी होते हैं। #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅
#📕लाल किताब उपाय🔯 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार *इस प्रकार से महिलाओं को कष्ट देते हैं राहु, मंगल और शनि-* *महिलाओं की कुण्डली में राहु, शनि या मंगल की उपस्थिति मात्र भांति-भांति के संकेत देती है। इस लेख का उद्देश्य वर्षों का अनुभव प्रकट करना है, जो शारीरिक कष्टों को देखने के लिए आवश्यक है।* *स्त्री की कुण्डली में पंचम भाव में राहु की उपस्थिति का अर्थ उनके नाभि प्रदेश से लेकर बस्ति प्रदेश तक के अंगों में आने वाले कष्टों से अभिप्रेत है।* *अधिकांश मामलों में पंचमस्थ राहु उन विषयों पर अधिकार रखते हैं जो या तो ग्रंथि रूप में हों या सर्पाकृति हों या अंतडिय़ों की तरह बहुत सारे मोड़ों वाले हों।* *बाह्य जगत में लहसुन, अदरक या कई तरह की फलियां इस श्रेणी में आ जाती हैं। शरीर के अंदर अंतडिय़ां, कभी-कभी किडनी तथा अधिकांश मामलों में फैलोपियन ट्यूब या यूट्रस संबंधी समस्याएं राहु के कारण आती हैं।* *पंचमस्थ राहु को यदि मंगल पीडि़त करें या राहु-मंगल युति हो या पंचमेश का संबंध राहु-मंगल से हो जाए तो पाराशर जी के अनुसार सर्प के श्राप से संतान क्षय बताया गया है। इन स्थितियों में सर्प की पूजा से सर्प के श्राप का निवारण करना पाराशर जी ने बताया है। हमारे अनुभव में आया है कि ये मामले संतानहीनता के न होकर संतान उत्पन्न होने के बाद उसका क्षय या गर्भधारण के बाद गर्भक्षय से संबंधित होते हैं।* *यदि पंचम भाव को केवल राहु प्रभावित करें तो यह दोष संतान क्षय न होकर फैलोपियन ट्यूब में इंफेक्शन होकर गर्भ की अक्षमता में बदल जाते हैं। काकवंध्या के योग उन मामलों में अधिक हैं जब राहु तो पंचम भाव में हों या पंचमेश के साथ हों तथा सप्तम या नवम भाव को अन्य पाप ग्रह प्रभावित कर रहे हों।* *शनि देवता पंचम भाव पर कु प्रभाव रखें तो संतान संबंधी कष्ट जीवन के मध्य काल में आते हैं। इनमें से कुछ योगों को समझना होगा।* *शनि यदि सम राशि में हो और बुध विषम राशि में हो तथा दोनों में परस्पर दृष्टि हो तो अपूर्ण गर्भ होता है।* *पंचमेश नीच राशि का हो और पंचम भाव को न देखे एवं पंचम भाव में बुध-शनि हो तो स्त्री काकवंध्या होती है।* *पंचम भाव में मिथुन, कन्या, मकर या कुंभ राशि हो और उस भाव पर शनि की दृष्टि या योग हो तो पत्नी से संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है।* *यदि पंचम स्थान में राहु हो, पंचमेश पापग्रहों से युक्त हो तथा गुरु मकर राशि में हो तो पुत्र का सुख पूर्ण नहीं होता।* *चंद्रमा से द्वितीय तथा व्यय भाव में मंगल, शनि हो (इनमें से एक व्यय में एवं एक द्वितीय में) तो मंगल व शनि इनमें से जो बलवान हो और गर्भकाल में वह जिस मास का स्वामी हो उस मास में गर्भवती स्त्री को मृत्यु तुल्य कष्ट देता है।* *चंद्रमा, मंगल या शनि दोनों में से एक से युत हो और दूसरे से दृष्ट हो तो मंगल, शनि में जो बली होगा, उसी के कारण संतान का क्षय होगा।* *लग्न में शुक्र-चन्द्र तथा शनि मंगल से युत हो और पंचम भाव में पापग्रह की राशि हो तो संतानोत्पत्ति लगभग असंभव होती है।* *सप्तम में मंगल या पाप नवांश तथा सप्तम पर शनि की दृष्टि हो तो गुप्त रोग होते हैं।* *सप्तम में राहु एवं सूर्य तथा पंचम में पापग्रह अथवा अष्टम में शुक्र-गुरु-राहु हो तो स्त्री की संतान उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती है।* *अष्टम में शुक्र-गुरु-मंगल हों या सप्तम में मंगल, शनि से दृष्ट हो तो स्त्री को गर्भपात होते रहते हैं।सूर्य, मंगल, शनि, राहु यदि बली होकर पंचम में हों तो संतान हानि करते हैं लेकिन निर्बल हों तो संतानदायी होते हैं।* *इन सबमें एक बात समान रूप से देखने को मिलती है कि पंचम भाव या पंचम से चतुर्थ या पंचम से छठा, आठवां भाव पीडि़त हो तो स्त्री की कोख पर असर आता है चाहे गर्भावस्था में या बच्चे के जन्म लेने के बाद। राहु का इन सबमें सबसे अधिक असर नजर आता है। राहु रोकने में विश्वास करते हैं और शनि या मंगल नष्ट करने में।* *जितने भी ज्योतिष शास्त्र हैं उन सबमें पूर्व जन्मकृत कर्मों के कारण ऐसी हिंसा देखने को मिलती है जिसके कारण माता-पिता सभी दुखी होते हैं।
#🔯ज्योतिष #🔯ग्रह दोष एवं उपाय🪔 #🔯वास्तु दोष उपाय🌹🌹जन्म कुंडली के कुछ विशिष्ट योग एवं इनका फल.🙏 बालारिष्ट योग👉 चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है। मृतवत्सा योग👉 पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है। छत्रभंग योग👉 राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती। आडम्बरी राजयोग👉 कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है। विधुत योग👉 लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है। नागयोग👉 पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है। नदी योग👉 पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है। विश्वविख्यात योग👉 लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।★ # अधेन्द्र योग :- लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है। द्विभार्या योग👉 राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है। राजयोग👉 नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है) विपरीत राजयोग👉 6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है। दरिद्र योग👉 केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है। चाण्डाल योग👉 क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है। सुनफा योग👉 कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)। महाभाग योग👉 यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है। प्रेम विवाह योग👉 तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम 'प्रेम विवाह' में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष। गजकेसरी योग👉 लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है। बुधादित्य योग👉 10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है। पापकर्तरी योग👉 शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है। सरकारी नौकरी अथवा व्यवसाय का योग👉 जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है। विजातीय विवाह योग👉 राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है। चक्रयोग 👉 यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है। अनफा योग👉 यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है। भास्कर योग👉 सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है। चक्रवती योग👉 यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है। कुबेर योग👉 गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है। अविवाहित / विवाह प्रतिबंधक योग👉 चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीनअस्तपापपीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है। पतिव्रता योग👉 यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है। अरिश्टभंग योग👉 शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है। मूक योग👉 गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है। विशेष👉 8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।. बधिर योग👉 शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता हैl #🔯नक्षत्रों के प्रभाव✨ #🔯दैनिक वास्तु टिप्स✅
#📕लाल किताब उपाय🔯 #✡️सितारों की चाल🌠 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार 🌹🌹जन्म कुंडली के कुछ विशिष्ट योग एवं इनका फल.🙏 बालारिष्ट योग👉 चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिष्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अष्टम में पापग्रह हों, केन्द्र में भी कोर्इ शुभ ग्रह न हो तो भी बालारिष्ट योग बनता है। बालारिष्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यवस्था में उसे मृत्यु तुल्य कष्ट झेलना पड़ता है। मृतवत्सा योग👉 पंचमेश षष्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है। छत्रभंग योग👉 राहू, शनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दशम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दशमेश सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्र व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्न आते है, तरक्की नही हो पाती। आडम्बरी राजयोग👉 कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है। विधुत योग👉 लाभेश परमोच्च होकर शुक्र के साथ हो या लग्नेश केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है। नागयोग👉 पंचमेश नवमस्थ हो तथा एकादशेश चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है। नदी योग👉 पंचम तथा एकादश भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितीय व अष्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है। विश्वविख्यात योग👉 लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दशम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक विश्व में विख्यात होता है। इसे विश्वविख्याति योग कहते है।★ # अधेन्द्र योग :- लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है। द्विभार्या योग👉 राहू लग्न में पुरुष राशि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, शनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह (युति दृष्टि द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादशेश की स्थिति भी विचारनी चाहिए)। अष्टमेश सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है। राजयोग👉 नवमेश तथा दशमेश एकसाथ हो तो राजयोग बनता है। दशमेश गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादशेश, नवमेश व चन्द्र एकसाथ हो (एकादश स्थान में) तथा लग्नेश की उन पर पूर्ण दृष्ट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यश, वैभव, अधिकार बढ़ते है) विपरीत राजयोग👉 6ठें भाव से 8वें भाव का सम्बन्ध हो जाएं। अथवा दशम भाव में 4 से अधिक ग्रह एक हो जाएं। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकस्मिक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ति हो जाती है। दरिद्र योग👉 केन्द्र के चारों भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेश शनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है। चाण्डाल योग👉 क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विशेषकर गुरू-मंगल, गुरू-शनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे योग के बुरे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूषित हो जाते है। सुनफा योग👉 कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो शुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)। महाभाग योग👉 यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विषम राशि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराशि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है। प्रेम विवाह योग👉 तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृष्टि युति राशि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूष) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में शामिल हो जाए तो उनका प्रेम 'प्रेम विवाह' में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेश न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेश का ही दृष्टि, युति, राशि संबंध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूष। गजकेसरी योग👉 लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल शुभग्रहों से दृष्टयुत हो, अस्त, नीच व शत्रु राशि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को अच्छी पहचान प्रतिष्ठा दिलाता है। बुधादित्य योग👉 10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तथा सूर्य मित्र या उच्च का हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है। पापकर्तरी योग👉 शुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीड़ित होता है। अत: शुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में शुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है। सरकारी नौकरी अथवा व्यवसाय का योग👉 जन्मकुंडली में बाएं हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दाएं हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सूर्य दाएं हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। शनि बाएं हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से शनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए (दृष्टियुतिराशि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार का अध्यापन कार्य भी कराता है। विजातीय विवाह योग👉 राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: विजातीय विवाह होता है। (पुरूष राशि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है। चक्रयोग 👉 यदि किसी कुंडली में एक राशि से छ: राशि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है। अनफा योग👉 यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ शुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में सफलता तथा अपने भुजाबल से यश, धन प्राप्त होता है। भास्कर योग👉 सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यश, रूप, पराक्रम, शास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है। चक्रवती योग👉 यदि कुंडली के नीच /पाप ग्रह की राशि का स्वामी या उसकी उच्च राशि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है। कुबेर योग👉 गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान स्थिति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है। अविवाहित / विवाह प्रतिबंधक योग👉 चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीनअस्तपापपीडित हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। शुक्र व बुुध 7वें भाव में शुभग्रहों से दृष्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादशस्थ हों तथा शनि व मंगल से दृष्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो और 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। शनि व मंगल, शुक्र व चन्द्र से 180° पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है। पतिव्रता योग👉 यदि गुरू व शुक्र, सूर्य या मंगल के नवमांश में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेश व सप्तमेश नीच राशि में हो परन्तु सभी शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नवमांश में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है। अरिश्टभंग योग👉 शुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिष्ट नाशक योग होता है। जन्म राशि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में स्थित हों तो भी अरिश्टनाशक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराशि, उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो सर्वारिष्ट नष्ट होते है। चन्द्रमा के 10वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, शुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिष्ट नष्ट होते है। मूक योग👉 गुरू व षष्ठेश लग्न में हो अथवा बुध व षष्ठेश की युति किसी भी भाव (विशेषकर दूसरे) में हो। अथवा क्रूर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृश्चिक व मीन राशि के बुध को अमावस्य का चन्द्र सम्बन्ध है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है। विशेष👉 8 व 12 राशि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राशि के अंतिम अंशो में वृष राशि का चन्द्र हो तथा चंद्र पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।. बधिर योग👉 शनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा षष्ठेश त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व शुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-शुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना शुभ ग्रहों से दृष्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे षष्ठेश पर शनि की दृष्टि न हो तो भी बधिर योग होता हैl
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🔯ज्योतिष - महाशिवरात्रि का व्रत कैसे करें महाशिवरात्रि के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में 1. उठकर स्नान करें। २. साफ वस्त्र पहनकर भगवान शिव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। ३. घर या मंदिर में शिवलिंग की स्थापना कर गंगाजल से अभिषेक करें। ४. शिवलिंग पर बेलपत्र , धतूरा , भस्म और सफेद पुष्प अर्पित करें।  5.  3ঁ নম: থিনরায" মন্প ক্া 3থ্থিক যী 30 अधिक जाप करें। ६. दिनभर फलाहार करें या केवल जल ग्रहण करें। ७. मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें, क्रोध से दूर रहें। और नकारात्मकता ८. रात्रि में शिव जी की पूजा कर जागरण करें। ९. अगले दिन सुबह शिव आरती के बाद व्रत का पारण करें। १०. इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न होते 35 हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। महाशिवरात्रि का व्रत कैसे करें महाशिवरात्रि के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में 1. उठकर स्नान करें। २. साफ वस्त्र पहनकर भगवान शिव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। ३. घर या मंदिर में शिवलिंग की स्थापना कर गंगाजल से अभिषेक करें। ४. शिवलिंग पर बेलपत्र , धतूरा , भस्म और सफेद पुष्प अर्पित करें।  5.  3ঁ নম: থিনরায" মন্প ক্া 3থ্থিক যী 30 अधिक जाप करें। ६. दिनभर फलाहार करें या केवल जल ग्रहण करें। ७. मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें, क्रोध से दूर रहें। और नकारात्मकता ८. रात्रि में शिव जी की पूजा कर जागरण करें। ९. अगले दिन सुबह शिव आरती के बाद व्रत का पारण करें। १०. इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न होते 35 हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। - ShareChat
#📕लाल किताब उपाय🔯 #✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #✡️सितारों की चाल🌠 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी #🐍कालसर्प दोष परिहार
📕लाल किताब उपाय🔯 - महाशिवरात्रि का व्रत कैसे करें महाशिवरात्रि के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में 1. उठकर स्नान करें। २. साफ वस्त्र पहनकर भगवान शिव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। ३. घर या मंदिर में शिवलिंग की स्थापना कर गंगाजल से अभिषेक करें। ४. शिवलिंग पर बेलपत्र , धतूरा , भस्म और सफेद पुष्प अर्पित करें।  5.  3ঁ নম: থিনরায" মন্প ক্া 3থ্থিক যী 30 अधिक जाप करें। ६. दिनभर फलाहार करें या केवल जल ग्रहण करें। ७. मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें, क्रोध से दूर रहें। और नकारात्मकता ८. रात्रि में शिव जी की पूजा कर जागरण करें। ९. अगले दिन सुबह शिव आरती के बाद व्रत का पारण करें। १०. इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न होते 35 हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। महाशिवरात्रि का व्रत कैसे करें महाशिवरात्रि के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में 1. उठकर स्नान करें। २. साफ वस्त्र पहनकर भगवान शिव का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। ३. घर या मंदिर में शिवलिंग की स्थापना कर गंगाजल से अभिषेक करें। ४. शिवलिंग पर बेलपत्र , धतूरा , भस्म और सफेद पुष्प अर्पित करें।  5.  3ঁ নম: থিনরায" মন্প ক্া 3থ্থিক যী 30 अधिक जाप करें। ६. दिनभर फलाहार करें या केवल जल ग्रहण करें। ७. मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें, क्रोध से दूर रहें। और नकारात्मकता ८. रात्रि में शिव जी की पूजा कर जागरण करें। ९. अगले दिन सुबह शिव आरती के बाद व्रत का पारण करें। १०. इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न होते 35 हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। - ShareChat