एस्ट्रो मनोज कौशिक बहल यंत्र मंत्र तंत्र विशेषज्ञ
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#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯कुंडली दोष #🔯वास्तु दोष उपाय #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 शनि से बनने वाले योग *शनि का नाम सुनकर ही जातक भयभीत/चिंताग्रस्त हो जाते हैं, जबकि ऐसा सोचना हमेशा सत्य नहीं होता। शनि देव को भगवान शिव ने न्यायाधीश का पद दिया है और उसका दायित्व शनिदेव पूर्ण निष्ठा से व बिना किसी दुराग्रह के संपादित करते हैं। साढ़ेसाती व ढैय्या के समय जरूर कष्ट प्रदान करते हैं परंतु पूर्ण समय तक नहीं, उसमें भी प्रभाव मित्र राशि में है या शत्रु राशि में तथा उन पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव है या अशुभ ग्रह का, तदनुसार शुभ-अशुभ फल प्राप्त होते हैं। शनि से बनने वाले विभिन्न योगों का क्रमानुसार वर्णन इस प्रकार है-* *1. शशयोग: अगर शनि देव केंद्र स्थानों में स्वराशि का होकर बैठे हां (मकर, कुंभ) तो यह योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक नौकरों से अच्छी तरह काम लेता है, किसी संस्थान समूह या कस्बे का प्रमुख और राजा होता है एवं वह सब गुणों से युक्त सर्वसंपन्न होता है।* *2. राजयोग: अगर वृष लग्न में चंद्रमा हो, दशम में शनि हो, चतुर्थ में सूर्य तथा सप्तमेश गुरु हो तो यह योग बनता है। ऐसा जातक सेनापति/पुलिस कप्तान या विभाग का प्रमुख होता है।* *3. दीर्घ आयु योग: लग्नेश, अष्टमेश, दशमेश व शनि केंद्र त्रिकोण या लाभ भाव में (11वां भाव) हो तो दीर्घ आयु योग होता है।* *4. रवि योग: अगर सूर्य दशम भाव में हो और दशमेश तीसरे भाव में शनि के साथ बैठा है तो यह योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक उच्च विचारों वाला और सामान्य आहार लेने वाला होता है। जातक सरकार से लाभान्वित, विज्ञान से ओतप्रोत, कमल के समान आंखों व भरी हुई छाती वाला होता है।* *5. पशुधन लाभ योग: यदि चतुर्थ में शनि के साथ सूर्य तथा चंद्रमा नवम भाव में हो, एकादश स्थान में मंगल हो तो गाय भैंस आदि पशु धन का लाभ होता है।* *6. अपकीर्ति योग: अगर दशम में सूर्य व श्न हो व अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस प्रकार के जातक की ख्याति नहीं होती वरन् वह कुख्यात होता है।* *7. बंधन योग: अगर लग्नेश और षष्टेश केंद्र में बैठे हों और शनि या राहु से युति हो तो बंधन योग बनता है। इसमें जातक को कारावास काटना पड़ता है।* *8. धन योग: लग्न से पंचम भाव में शनि अपनी स्वराशि में हो और बुध व मंगल ग्यारहवें भाव में हों तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक महाधनी होता है। अगर लग्न में पांचवे घर में शुक्र की राशि हो तथा शुक्र पांचवे या ग्यारहवें भाव में हो तो धन योग बनता है। ऐसा जातक अथाह संपत्ति का मालिक होता है।* *9. जड़बुद्धि योग: अगर पंचमेश अशुभ ग्रह से दृष्ट हो या युति करता हो, शनि पंचम में हो तथा लग्नेश को शनि देखता हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक की बुद्धि जड़ होती है।* *10. कुष्ठ योग: यदि मंगल या बुध की राशि लग्न में हो अर्थात मेष, वृश्चिक, मिथुन, कन्या लग्न में हो एवं लग्नेश चंद्रमा के साथ हो, इनके साथ राहु एवं शनि भी हो तो कुष्ठ रोग होता है। षष्ठ स्थान में चंद्र, शनि हो तो 55वें वर्ष में कुष्ठ की संभावना रहती है।* *11. वात रोग योग: यदि लग्न में एवं षष्ठ भाव में शनि हो तो 59 वर्ष में वात रोग होता है। जब बृहस्पति लग्न में हो व शनि सातवें में हो तो यह योग बनता है।* *12. दुर्भाग्य योग: (क) यदि नवम में शनि व चंद्रमा हो, लग्नेश नीच राशि में गया हो तो मनुष्य भीख मांग कर गुजारा करता है। (ख) यदि पंचम भाव में तथा पंचमेश या भाग्येश अष्टम में नीच राशिगत हो तो मनुष्य भाग्यहीन होता है।* *13. पापकर्म से धनार्जन योग: यदि द्वादश भाव में शनि-राहु के साथ मंगल हो तथा शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो पाप कार्यों से धन लाभ होता है।* *14. अंगहीन योग: दशम में चंद्रमा हो सप्तम में मंगल हो सूर्य से दूसरे भाव में शनि हो तो यही योग बनता है। इस योग में जातक अंगहीन हो जाता है।* *15. सदैव रोगी योग: यदि षष्ठभाव तथा षष्ठेश दोनों ही पापयुक्त हां और शनि राहु साथ हो तो सदैव रोगी होता है।* *16. मतिभ्रम योग: शनि लग्न में हो मंगल नवम पंचम या सप्तम में हो, चंद्रमा शनि के साथ बारहवं भाव में हों एवं चंद्रमा कमजोर हो तो यह योग बनता है।* *17. बहुपुत्र योग: अगर नवांश में राहु पंचम भाव में हो व शनि से संयुक्त हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक के बहुत से पुत्र होते हैं।* *18. युद्धमरण योग: यदि मंगल छठे या आठवें भाव का स्वामी होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में शनि या राहु से युति करे तो जातक की युद्ध में मृत्यु होती है।* *19. नरक योग: यदि 12वें भाव में शनि, मंगल, सूर्य, राहु हो तथा व्ययेश अस्त हो तो मनुष्य नरक में जाता है और पुनर्जन्म लेकर कष्ट भोगता है।* *20. सर्प योग: यदि तीन पापग्रह शनि, मंगल, सूर्य कर्क, तुला, मकर राशि में हो या लगातार तीन केंद्रों में हो तो सर्पयोग होता है। यह एक अशुभ योग है।* *21. दत्तक पुत्र योग: शनि-मंगल यदि पांचवें भाव में हों तथा सप्तमेश 11वें भाव में हो, पंचमेश शुभ हो तो यह योग बनता है। नवम भाव में चर राशि में शनि से दृष्ट हो, द्वादशेश बलवान हो, तो जातक गोद जायेगा। यदि पांचवें भाव में ग्रह हो तथा पंचमेश व्यय स्थान में हो, लग्नेश व चंद्र बली हो तो जातक को गोद लिया पुत्र होगा।
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️सितारों की चाल🌠 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी शनि से बनने वाले योग *शनि का नाम सुनकर ही जातक भयभीत/चिंताग्रस्त हो जाते हैं, जबकि ऐसा सोचना हमेशा सत्य नहीं होता। शनि देव को भगवान शिव ने न्यायाधीश का पद दिया है और उसका दायित्व शनिदेव पूर्ण निष्ठा से व बिना किसी दुराग्रह के संपादित करते हैं। साढ़ेसाती व ढैय्या के समय जरूर कष्ट प्रदान करते हैं परंतु पूर्ण समय तक नहीं, उसमें भी प्रभाव मित्र राशि में है या शत्रु राशि में तथा उन पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव है या अशुभ ग्रह का, तदनुसार शुभ-अशुभ फल प्राप्त होते हैं। शनि से बनने वाले विभिन्न योगों का क्रमानुसार वर्णन इस प्रकार है-* *1. शशयोग: अगर शनि देव केंद्र स्थानों में स्वराशि का होकर बैठे हां (मकर, कुंभ) तो यह योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक नौकरों से अच्छी तरह काम लेता है, किसी संस्थान समूह या कस्बे का प्रमुख और राजा होता है एवं वह सब गुणों से युक्त सर्वसंपन्न होता है।* *2. राजयोग: अगर वृष लग्न में चंद्रमा हो, दशम में शनि हो, चतुर्थ में सूर्य तथा सप्तमेश गुरु हो तो यह योग बनता है। ऐसा जातक सेनापति/पुलिस कप्तान या विभाग का प्रमुख होता है।* *3. दीर्घ आयु योग: लग्नेश, अष्टमेश, दशमेश व शनि केंद्र त्रिकोण या लाभ भाव में (11वां भाव) हो तो दीर्घ आयु योग होता है।* *4. रवि योग: अगर सूर्य दशम भाव में हो और दशमेश तीसरे भाव में शनि के साथ बैठा है तो यह योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक उच्च विचारों वाला और सामान्य आहार लेने वाला होता है। जातक सरकार से लाभान्वित, विज्ञान से ओतप्रोत, कमल के समान आंखों व भरी हुई छाती वाला होता है।* *5. पशुधन लाभ योग: यदि चतुर्थ में शनि के साथ सूर्य तथा चंद्रमा नवम भाव में हो, एकादश स्थान में मंगल हो तो गाय भैंस आदि पशु धन का लाभ होता है।* *6. अपकीर्ति योग: अगर दशम में सूर्य व श्न हो व अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस प्रकार के जातक की ख्याति नहीं होती वरन् वह कुख्यात होता है।* *7. बंधन योग: अगर लग्नेश और षष्टेश केंद्र में बैठे हों और शनि या राहु से युति हो तो बंधन योग बनता है। इसमें जातक को कारावास काटना पड़ता है।* *8. धन योग: लग्न से पंचम भाव में शनि अपनी स्वराशि में हो और बुध व मंगल ग्यारहवें भाव में हों तो यह योग निर्मित होता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक महाधनी होता है। अगर लग्न में पांचवे घर में शुक्र की राशि हो तथा शुक्र पांचवे या ग्यारहवें भाव में हो तो धन योग बनता है। ऐसा जातक अथाह संपत्ति का मालिक होता है।* *9. जड़बुद्धि योग: अगर पंचमेश अशुभ ग्रह से दृष्ट हो या युति करता हो, शनि पंचम में हो तथा लग्नेश को शनि देखता हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक की बुद्धि जड़ होती है।* *10. कुष्ठ योग: यदि मंगल या बुध की राशि लग्न में हो अर्थात मेष, वृश्चिक, मिथुन, कन्या लग्न में हो एवं लग्नेश चंद्रमा के साथ हो, इनके साथ राहु एवं शनि भी हो तो कुष्ठ रोग होता है। षष्ठ स्थान में चंद्र, शनि हो तो 55वें वर्ष में कुष्ठ की संभावना रहती है।* *11. वात रोग योग: यदि लग्न में एवं षष्ठ भाव में शनि हो तो 59 वर्ष में वात रोग होता है। जब बृहस्पति लग्न में हो व शनि सातवें में हो तो यह योग बनता है।* *12. दुर्भाग्य योग: (क) यदि नवम में शनि व चंद्रमा हो, लग्नेश नीच राशि में गया हो तो मनुष्य भीख मांग कर गुजारा करता है। (ख) यदि पंचम भाव में तथा पंचमेश या भाग्येश अष्टम में नीच राशिगत हो तो मनुष्य भाग्यहीन होता है।* *13. पापकर्म से धनार्जन योग: यदि द्वादश भाव में शनि-राहु के साथ मंगल हो तथा शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो पाप कार्यों से धन लाभ होता है।* *14. अंगहीन योग: दशम में चंद्रमा हो सप्तम में मंगल हो सूर्य से दूसरे भाव में शनि हो तो यही योग बनता है। इस योग में जातक अंगहीन हो जाता है।* *15. सदैव रोगी योग: यदि षष्ठभाव तथा षष्ठेश दोनों ही पापयुक्त हां और शनि राहु साथ हो तो सदैव रोगी होता है।* *16. मतिभ्रम योग: शनि लग्न में हो मंगल नवम पंचम या सप्तम में हो, चंद्रमा शनि के साथ बारहवं भाव में हों एवं चंद्रमा कमजोर हो तो यह योग बनता है।* *17. बहुपुत्र योग: अगर नवांश में राहु पंचम भाव में हो व शनि से संयुक्त हो तो इस योग का निर्माण होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक के बहुत से पुत्र होते हैं।* *18. युद्धमरण योग: यदि मंगल छठे या आठवें भाव का स्वामी होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में शनि या राहु से युति करे तो जातक की युद्ध में मृत्यु होती है।* *19. नरक योग: यदि 12वें भाव में शनि, मंगल, सूर्य, राहु हो तथा व्ययेश अस्त हो तो मनुष्य नरक में जाता है और पुनर्जन्म लेकर कष्ट भोगता है।* *20. सर्प योग: यदि तीन पापग्रह शनि, मंगल, सूर्य कर्क, तुला, मकर राशि में हो या लगातार तीन केंद्रों में हो तो सर्पयोग होता है। यह एक अशुभ योग है।* *21. दत्तक पुत्र योग: शनि-मंगल यदि पांचवें भाव में हों तथा सप्तमेश 11वें भाव में हो, पंचमेश शुभ हो तो यह योग बनता है। नवम भाव में चर राशि में शनि से दृष्ट हो, द्वादशेश बलवान हो, तो जातक गोद जायेगा। यदि पांचवें भाव में ग्रह हो तथा पंचमेश व्यय स्थान में हो, लग्नेश व चंद्र बली हो तो जातक को गोद लिया पुत्र होगा।
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯कुंडली दोष #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 बाधक योग जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है।सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है। *सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है।लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं।* *सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है।* *षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है।* *छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है।* *यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है। किसी की कुंडली में कौन सा ग्रह दांपत्य सुख में कमी ला रहा है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह लें।* *विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं-* *सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।* *सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।यदि सप्तम भाव में सम राशि है।* *सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।सप्तमेश बली है।सप्तम में कोई ग्रह नही है।* *किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।* *दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।* *सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।* *विवाह नही होगा अगर—* *सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।* *सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।सप्तमेश नीच राशि में है।* *सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।* *चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।* *शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।* *शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।* *शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।* *शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।* *पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।* *विवाह में देरी—* *सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।* *चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।* *सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।* *चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।* *सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।* *सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।* लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान सुख प्राप्त नही होता।
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #✡️सितारों की चाल🌠 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी बाधक योग जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है।सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है। *सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है।लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं।* *सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है।* *षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है।* *छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है।* *यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है। किसी की कुंडली में कौन सा ग्रह दांपत्य सुख में कमी ला रहा है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह लें।* *विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं-* *सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।* *सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।यदि सप्तम भाव में सम राशि है।* *सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।सप्तमेश बली है।सप्तम में कोई ग्रह नही है।* *किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।* *दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।* *सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।* *विवाह नही होगा अगर—* *सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।* *सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।सप्तमेश नीच राशि में है।* *सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।* *चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।* *शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।* *शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।* *शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।* *शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।* *पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।* *विवाह में देरी—* *सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।* *चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।* *सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।* *चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।* *सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।* *सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।* लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान सुख प्राप्त नही होता।
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯कुंडली दोष #🔯वास्तु दोष उपाय #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 बार बार होते हैं एक्सीडेंट्स तो ये उपाय देगा आपको दिव्य रक्षा कवच - बहुत बार प्रारब्धवश, कुंडली की मारक दशाओं या गोचर ग्रहों के नकारात्मक योग के कारण जीवन में दुर्घटनएं बहुत बढ़ जाती है और बार बार एक्सीडेंट्स होने लगते हैं, और कुछ लोगों के साथ ये समस्या हमेशा ही रहती है के वाहन की दुर्घटनाएं उनके साथ बार बार घटती हैं तो ऐसे में दुर्घटनाओं और रोड एक्सीडेंट्स से बचाव के लिए ये उपाय बहुत चमत्कारिक ढंग से प्रभाव दिखाता है और एक दिव्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है - उपाय - एक सफ़ेद कागज़ पर लाल पैन से महामृत्युंजय मंत्र लिखें फिर उसे अपने पूजास्थल पर रखकर महामृत्युंजय मंत्र का एक माला जाप करें और फिर इस कागज़ को जब भी आप बाहर जाएँ या वाहन चलाएं उस समय अपने पॉकेट (ऊपर वाली जेब) में रखें तो निश्चित ही इससे आपको एक दिव्य सुरक्षा कवच मिलता है और दुर्घटनाओं से रक्षा होती है मंत्र - ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️सितारों की चाल🌠 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी बार बार होते हैं एक्सीडेंट्स तो ये उपाय देगा आपको दिव्य रक्षा कवच - बहुत बार प्रारब्धवश, कुंडली की मारक दशाओं या गोचर ग्रहों के नकारात्मक योग के कारण जीवन में दुर्घटनएं बहुत बढ़ जाती है और बार बार एक्सीडेंट्स होने लगते हैं, और कुछ लोगों के साथ ये समस्या हमेशा ही रहती है के वाहन की दुर्घटनाएं उनके साथ बार बार घटती हैं तो ऐसे में दुर्घटनाओं और रोड एक्सीडेंट्स से बचाव के लिए ये उपाय बहुत चमत्कारिक ढंग से प्रभाव दिखाता है और एक दिव्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है - उपाय - एक सफ़ेद कागज़ पर लाल पैन से महामृत्युंजय मंत्र लिखें फिर उसे अपने पूजास्थल पर रखकर महामृत्युंजय मंत्र का एक माला जाप करें और फिर इस कागज़ को जब भी आप बाहर जाएँ या वाहन चलाएं उस समय अपने पॉकेट (ऊपर वाली जेब) में रखें तो निश्चित ही इससे आपको एक दिव्य सुरक्षा कवच मिलता है और दुर्घटनाओं से रक्षा होती है मंत्र - ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯वास्तु दोष उपाय #🔯कुंडली दोष #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 गर्भ धारण करने के लिए उपाय : अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें। लाल किताब में बताया गया है कि जब जन्मपत्री में राहु कुण्डली के पांचवें घर में हो और संतान सुख में कठिनाई आ रही है। ऐसी स्थिति में राहु दोष को दूर करने के लिए घर के मुख्य दरवाजे के नीचे चांदी का पत्तर रखना चाहिए। अगर आप यह काम नहीं कर पाते हैं 40 दिनों तक पांच मूली पत्नी के सिरहाने रखें और सुबह मूली को शिव मंदिर में रख आएं। इससे संतान प्राप्ति की संभावना बढ़ेगी।
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #✡️सितारों की चाल🌠 #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी गर्भ धारण करने के लिए उपाय : अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें। लाल किताब में बताया गया है कि जब जन्मपत्री में राहु कुण्डली के पांचवें घर में हो और संतान सुख में कठिनाई आ रही है। ऐसी स्थिति में राहु दोष को दूर करने के लिए घर के मुख्य दरवाजे के नीचे चांदी का पत्तर रखना चाहिए। अगर आप यह काम नहीं कर पाते हैं 40 दिनों तक पांच मूली पत्नी के सिरहाने रखें और सुबह मूली को शिव मंदिर में रख आएं। इससे संतान प्राप्ति की संभावना बढ़ेगी।
#✡️ज्योतिष समाधान 🌟 #💰धन के लिए वास्तु टिप्स🔯 #🔯कुंडली दोष #🔯वास्तु दोष उपाय #💰आर्थिक समस्याओं का समाधान🔯 गर्भ धारण करने के लिए उपाय : अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें। लाल किताब में बताया गया है कि जब जन्मपत्री में राहु कुण्डली के पांचवें घर में हो और संतान सुख में कठिनाई आ रही है। ऐसी स्थिति में राहु दोष को दूर करने के लिए घर के मुख्य दरवाजे के नीचे चांदी का पत्तर रखना चाहिए। अगर आप यह काम नहीं कर पाते हैं 40 दिनों तक पांच मूली पत्नी के सिरहाने रखें और सुबह मूली को शिव मंदिर में रख आएं। इससे संतान प्राप्ति की संभावना बढ़ेगी।
#📕लाल किताब उपाय🔯 #🐍कालसर्प दोष परिहार #✡️सितारों की चाल🌠 #🌟देखिए खास ज्योतिष उपाय #💫राशि के अनुसार भविष्यवाणी गर्भ धारण करने के लिए उपाय : अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें। लाल किताब में बताया गया है कि जब जन्मपत्री में राहु कुण्डली के पांचवें घर में हो और संतान सुख में कठिनाई आ रही है। ऐसी स्थिति में राहु दोष को दूर करने के लिए घर के मुख्य दरवाजे के नीचे चांदी का पत्तर रखना चाहिए। अगर आप यह काम नहीं कर पाते हैं 40 दिनों तक पांच मूली पत्नी के सिरहाने रखें और सुबह मूली को शिव मंदिर में रख आएं। इससे संतान प्राप्ति की संभावना बढ़ेगी।