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#I ❤️️ इंडियन आर्मी 🇮🇳 #🇮🇳 देशभक्ति गीत 🎶 #🙌 इंडियन आर्मी पर गर्व #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स गोंदवलेधाम इंदौर
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - श्रीराम **** २४ जनवरी % % * * * * २४ नाम की साधना कैसे करें? नाम की साधना कैसे करे? पत्थर पर बहुत पानी एकदम से डाल दिया फिर पानी बह जाएगा और पत्थर सूख तो  पत्थर केवल   भिगेगा, पानी यदि बूँद बूँद पत्थर के एक ही जगह पर जाएगा।   किंतु   वह कुछ दिनों के बाद  पत्थर टूट भी जाएगा। उसी तरह किसी गिरता रहेगा तो पत्थर में छेद होगा। লযানা करने के बजाय यदि अल्प मात्रा में क्यों न हो पर नित्य रूप से, निश्चित समय पर, समय बहुत साधना परिणाम अधिक होता है। चक्की में दो पाटे निश्चित स्थान पर नामस्मरण की साधना की जाएगी तो उसका रहे तो अनाज पीसा जाता है और आटा बाहर आता होते है, उनमें से एक स्थिर रहकर यदि दूसरा घूमता है।त लेकिन यदि दोनों पाटे घूमते रहेंगे तो अनाज पीसा नहीं जाएगा और व्यर्थ परिश्रम होंगे। आदमी के दो  मन और शरीर। उनमे से मन स्थायी है और शरीर घूमने वाला पाटा है। मन को भगवान के पाटे हैं और शरीर से गृहस्थी के काम किँए जाए। नसीब की सीमा या संबंध शरीर तक होता है। स्थिर किया जाए नसीब |प्रारब्ध) रूपी खूँटा शरीररूपी पाटे में बैठकर उसे घुमाता है। मन रूपी पाटा स्थिर रहता है। प्रारब्ध पर छोड़ दिया जाए और मन को नामस्मरण में विलीन किया जाए। यही नाम साधना है। यह साधना " कोई खास व्यक्ति ही कर पाएगा ऐसा नहीं, साधना तो कोई भी कर पाएगा। गरीब को गरीबी का दुःख धनवान को अपने धन का अहंकार और लोभ होता है इसलिए होता है इसलिए साधना नहीं कर पाता, करने को समय नहीं॰ विद्वान को विद्वत्ता का घमंड होता है इसलिए और अनाडी को साधना कैसे  মাধনা यह समझता नहीं, इसलिए साधना नहीं हो पाती। शंकित मन से कितनी भी साधना की, कितना  की जाए भी नामस्मरण किया तो भी संतोष नहीं होगा। स्मरण किया गया तो आचरण ,  शास्त्र शुद्ध वर्तन, शुद्ध अंतःकरण और  भगवान का नीतिधर्म का पहुँचने पर चिठ्ठी साधक अंत तक पहुँच पाएगा और अंत तक पहुँचेगा तो लाभ होगा अन्यथा नहीं। *घर है गृहस्थी चलाते समय बुरे विचार मन में आते ही हैं॰ उसी तरह लिखो ' कहने का मतलब भी यही होता परमार्थ साधना करते समय यदि बुरे विचार मन में आते हों तो नामस्मरण करो, ऐसा करने पर बुरे विचार नामस्मरण करते रहो। जहाँ कर्तव्य जागृति है और भगवान की स्मृति है॰ वहाँ समाधान बढ़ेंगे नहीं। दृढ़ता भगवन, मैं तो तुम्हारा ही हूँ ' ऐसा निरंतर कहने से भगवंत प्रकट होते रहेंगे और  की प्राप्ति होगी ही। हमपर जो अहंता का बोझ होता है वह भी कम होता रहेगा। घोंदवलेधाम ईंदौर गोदिबलपामइिदार देह तक ही होता है। मन से भजन करने में वह वाधक नहीं हो सकता। २४ प्राग्च्ध और ग्रहा का प्रभाव श्रीराम **** २४ जनवरी % % * * * * २४ नाम की साधना कैसे करें? नाम की साधना कैसे करे? पत्थर पर बहुत पानी एकदम से डाल दिया फिर पानी बह जाएगा और पत्थर सूख तो  पत्थर केवल   भिगेगा, पानी यदि बूँद बूँद पत्थर के एक ही जगह पर जाएगा।   किंतु   वह कुछ दिनों के बाद  पत्थर टूट भी जाएगा। उसी तरह किसी गिरता रहेगा तो पत्थर में छेद होगा। লযানা करने के बजाय यदि अल्प मात्रा में क्यों न हो पर नित्य रूप से, निश्चित समय पर, समय बहुत साधना परिणाम अधिक होता है। चक्की में दो पाटे निश्चित स्थान पर नामस्मरण की साधना की जाएगी तो उसका रहे तो अनाज पीसा जाता है और आटा बाहर आता होते है, उनमें से एक स्थिर रहकर यदि दूसरा घूमता है।त लेकिन यदि दोनों पाटे घूमते रहेंगे तो अनाज पीसा नहीं जाएगा और व्यर्थ परिश्रम होंगे। आदमी के दो  मन और शरीर। उनमे से मन स्थायी है और शरीर घूमने वाला पाटा है। मन को भगवान के पाटे हैं और शरीर से गृहस्थी के काम किँए जाए। नसीब की सीमा या संबंध शरीर तक होता है। स्थिर किया जाए नसीब |प्रारब्ध) रूपी खूँटा शरीररूपी पाटे में बैठकर उसे घुमाता है। मन रूपी पाटा स्थिर रहता है। प्रारब्ध पर छोड़ दिया जाए और मन को नामस्मरण में विलीन किया जाए। यही नाम साधना है। यह साधना " कोई खास व्यक्ति ही कर पाएगा ऐसा नहीं, साधना तो कोई भी कर पाएगा। गरीब को गरीबी का दुःख धनवान को अपने धन का अहंकार और लोभ होता है इसलिए होता है इसलिए साधना नहीं कर पाता, करने को समय नहीं॰ विद्वान को विद्वत्ता का घमंड होता है इसलिए और अनाडी को साधना कैसे  মাধনা यह समझता नहीं, इसलिए साधना नहीं हो पाती। शंकित मन से कितनी भी साधना की, कितना  की जाए भी नामस्मरण किया तो भी संतोष नहीं होगा। स्मरण किया गया तो आचरण ,  शास्त्र शुद्ध वर्तन, शुद्ध अंतःकरण और  भगवान का नीतिधर्म का पहुँचने पर चिठ्ठी साधक अंत तक पहुँच पाएगा और अंत तक पहुँचेगा तो लाभ होगा अन्यथा नहीं। *घर है गृहस्थी चलाते समय बुरे विचार मन में आते ही हैं॰ उसी तरह लिखो ' कहने का मतलब भी यही होता परमार्थ साधना करते समय यदि बुरे विचार मन में आते हों तो नामस्मरण करो, ऐसा करने पर बुरे विचार नामस्मरण करते रहो। जहाँ कर्तव्य जागृति है और भगवान की स्मृति है॰ वहाँ समाधान बढ़ेंगे नहीं। दृढ़ता भगवन, मैं तो तुम्हारा ही हूँ ' ऐसा निरंतर कहने से भगवंत प्रकट होते रहेंगे और  की प्राप्ति होगी ही। हमपर जो अहंता का बोझ होता है वह भी कम होता रहेगा। घोंदवलेधाम ईंदौर गोदिबलपामइिदार देह तक ही होता है। मन से भजन करने में वह वाधक नहीं हो सकता। २४ प्राग्च्ध और ग्रहा का प्रभाव - ShareChat
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स गोंदवलेधाम इंदौर🙏 श्री श्रीराम कोकजे गुरुजी🙏
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🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - 9 बहुत काठन ह। ३२०२ स एकरूप हाना, अपना कर्तापन 9 करने से वह याचरण वह अवस्था है। 2|98 नष्ट करना ही గ్గగా प्राप्त ক পড্মান সী #ম মনাঘ करने हागा। सत्कर्म ५ * 9 क्यों नहीं होती? সাদি / और किसी रोगी के पेट में यदि कृमि हुए और यदि उसे खूब खिलाया  ।कर उतर जावे, तो वह शरीर का पोषक न होते हुए कीड़ों की ही वृद्धि होती है। उसी करें। तरह हम सत्कर्म करते समय मन में विषयों के प्रति प्रेम रखकर वह करते हैं ते विषयों का ही पोषण होता है। उससे संतोष नहीं होता। इसलिए कर्तव्य  बुद्धि से कर्म करें ।  हमारा संतोष स्थाई कैसे होगा? प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार ईश्वरपूर्ति करते हैं। ईश्वर दाता है, उसका मुझे आधार है, वह मेरा कल्याणकर्ता है। इसका  பகுமும் स्मरण रहा तो, जो प्राप्त हुआ वह ईश्वर इच्छा से ही प्राप्त हुआ ऐसी धारणा  वर्तमान परिस्थिति में संतोष बना रहेगा। जिसका संतोष ईश्वर पर निर्भर  { है, उसका संतोष हर परिस्थिति में स्थाई रहेगा। नामस्मरण की कृति करने पर शाश्वत आनंद और संतोष हमें प्राप्त हुए बिना नहीं रह सकता। जो घटित  हुआ वह ईश्वर की इच्छा से घटा ऐसी भावना से जो एक वर्ष तक रहेगा, उसे  उनको यदि हों तो यह निश्चित रूप से समझ में आएगा। वृद्ध संतोष क्या है हो तो समय भगवत भजन में व्यतीत करना चाहिए और यदि युवा अपना ক্কা সা संतोष नहीं चाहिए, यही उनको भगवत स्मरण में कर्तव्य को त्यागना 8 यहा उसे रहे 3TTTా' में काम मुख में नाम, संक्षेप में हाथ संतोष का मार्ग है। ( 9 ? 3 ) 9 बहुत काठन ह। ३२०२ स एकरूप हाना, अपना कर्तापन 9 करने से वह याचरण वह अवस्था है। 2|98 नष्ट करना ही గ్గగా प्राप्त ক পড্মান সী #ম মনাঘ करने हागा। सत्कर्म ५ * 9 क्यों नहीं होती? সাদি / और किसी रोगी के पेट में यदि कृमि हुए और यदि उसे खूब खिलाया  ।कर उतर जावे, तो वह शरीर का पोषक न होते हुए कीड़ों की ही वृद्धि होती है। उसी करें। तरह हम सत्कर्म करते समय मन में विषयों के प्रति प्रेम रखकर वह करते हैं ते विषयों का ही पोषण होता है। उससे संतोष नहीं होता। इसलिए कर्तव्य  बुद्धि से कर्म करें ।  हमारा संतोष स्थाई कैसे होगा? प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार ईश्वरपूर्ति करते हैं। ईश्वर दाता है, उसका मुझे आधार है, वह मेरा कल्याणकर्ता है। इसका  பகுமும் स्मरण रहा तो, जो प्राप्त हुआ वह ईश्वर इच्छा से ही प्राप्त हुआ ऐसी धारणा  वर्तमान परिस्थिति में संतोष बना रहेगा। जिसका संतोष ईश्वर पर निर्भर  { है, उसका संतोष हर परिस्थिति में स्थाई रहेगा। नामस्मरण की कृति करने पर शाश्वत आनंद और संतोष हमें प्राप्त हुए बिना नहीं रह सकता। जो घटित  हुआ वह ईश्वर की इच्छा से घटा ऐसी भावना से जो एक वर्ष तक रहेगा, उसे  उनको यदि हों तो यह निश्चित रूप से समझ में आएगा। वृद्ध संतोष क्या है हो तो समय भगवत भजन में व्यतीत करना चाहिए और यदि युवा अपना ক্কা সা संतोष नहीं चाहिए, यही उनको भगवत स्मरण में कर्तव्य को त्यागना 8 यहा उसे रहे 3TTTా' में काम मुख में नाम, संक्षेप में हाथ संतोष का मार्ग है। ( 9 ? 3 ) - ShareChat
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🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - ३६६ ३१   दिसवर नाम चिरंतन है, उसे समाप्ति नहीं तिरा करोड़ रामनाम के जप के समाप्ति के दिन किया हुआ  निरूपण यदि सच कहा जाए तो हम जप कीजो समाप्ति करते हबह केवत नाम  चिरंतन है और अज्ञान  के कारण , कयोकि কাল स॰परेहा उसकी समझना बहुत कठिन है। भगवान को अत्यंत महानता यदि प्रिय बह है उसका नाम। बह हम लें तो बह हमारा हो जाएगा। भगवान नाम के बिना  = - सकत त्रिवेणी का संगम यदि कोई है तो बह है भगवान भक्त और नाम। जहा எ हबहा I नाम और भक्त होता है और जहाँ भक्त होता है बहाँ नाम और भगवान होता है।॰ उसका लोगों ने बहुत सेवा की है। सचमुच ही जप की समाप्ति समारोह संपन्न নুস करकाकई   राजा लुज्जित हो जाएगा ऐसा समारोह तुमने संपन्न किया है। अब राम के पास ऐसा कुछ माँगो  भी कि पुनश्च कुष्ठ  मोँगने की इच्छा ही न हो। हम यदि कोई मामली चीज माँगे तो भगवान हँसेंगे कि मैं इतना बडा " अब उससे कुष्ठ माँगना हो तो, हे भगवान् ऐतीतकरपाँ तो भी तुम यह क्या तुच्छ चीज माँगते  करो कि॰मेरा संतोष निरंतर बना रहे और तुम्हारे नाम का हौ प्रेम दो॰यही उससे माँगो। भगवानकृफी  मेरे हाथ मे नहीं है॰ हबराम ,को अनन्य शरण जाकर उससे कहो, ९ मैं जो हूँ ऐसा हूँ॰ इसमें सुधार होना . স तुम्हारा नाम मरते दम तक लूँगा, तभी जिंदा रहूँगा। ' और स्त्रियाँ यही करें कि पति को भगवान के मानकर देह से उसकी हो जाएँ और मन से भगवान की। होने के लिए क॰ परमार्थ का लाभ गृहस्थी  ஈ में भी उलझें नहीं किसी भी उपाधि के फंदे में मत अटको। उपाधिरहित रहने का साधन यानी  उपगधरहित भगवान का नाम निरंतर लेते रहना। नाम  लेने से श्रद्धा दृढ होगी और नाम के लिए रुचि पैदा होगी पानी जमने पर जैसे बर्फ हो जाती है बैसे नाम लेने से श्रद्धा अति दृढ होती है। श्रद्धा के कारण भगवान " तुम्हे সিলনা ही़॰ होगा। तुम निरंतर नाम लेते रहो, तुम्हें भगवान निश्चय ही मिलेंगे, इसका विश्वास रखो।  fasa संदेह मत करो। परमार्थ और व्यवहार का अच्छा समन्चय करें। परमार्थ के बारे में अकारण शंकाएँ नहीं निर्माण करनी चाहिए।  आज के इस दिन से, हम अपने बेटे को जितनी आत्मीयता से हैं उतनी आत्मीयता से पुकारते  भगवान को पुकारो और अब तक जितने प्रेम से भगवान का लिया है उतने ही अथवा नाम उससे भी সধিক ঈস সা নিম্বা ম ভমক্কা নাপ লীl সনক্কাল ৭ মন ম গনিস छूटनेवाली  वस्त भगवान का नाम हो। नाम में ही हमारी अंतिम साँस निकलें। नाम इतना गहरा पहुँचना चाहिए कि प्राण के साथ ही बह बाहर निकलें। इस प्रकार जो नाम लेता है, उसे देह के सुख दुख का भान ही नहीं रहेगा। वह आनंद में रहगा घौंदवलेधामईंदौर ३६६. नाम में ही अंतिम सांस वाहर निकले इसलिए अभी से निरंतर नाम में रहने का प्रयल करो।  ३६६ ३१   दिसवर नाम चिरंतन है, उसे समाप्ति नहीं तिरा करोड़ रामनाम के जप के समाप्ति के दिन किया हुआ  निरूपण यदि सच कहा जाए तो हम जप कीजो समाप्ति करते हबह केवत नाम  चिरंतन है और अज्ञान  के कारण , कयोकि কাল स॰परेहा उसकी समझना बहुत कठिन है। भगवान को अत्यंत महानता यदि प्रिय बह है उसका नाम। बह हम लें तो बह हमारा हो जाएगा। भगवान नाम के बिना  = - सकत त्रिवेणी का संगम यदि कोई है तो बह है भगवान भक्त और नाम। जहा எ हबहा I नाम और भक्त होता है और जहाँ भक्त होता है बहाँ नाम और भगवान होता है।॰ उसका लोगों ने बहुत सेवा की है। सचमुच ही जप की समाप्ति समारोह संपन्न নুস करकाकई   राजा लुज्जित हो जाएगा ऐसा समारोह तुमने संपन्न किया है। अब राम के पास ऐसा कुछ माँगो  भी कि पुनश्च कुष्ठ  मोँगने की इच्छा ही न हो। हम यदि कोई मामली चीज माँगे तो भगवान हँसेंगे कि मैं इतना बडा " अब उससे कुष्ठ माँगना हो तो, हे भगवान् ऐतीतकरपाँ तो भी तुम यह क्या तुच्छ चीज माँगते  करो कि॰मेरा संतोष निरंतर बना रहे और तुम्हारे नाम का हौ प्रेम दो॰यही उससे माँगो। भगवानकृफी  मेरे हाथ मे नहीं है॰ हबराम ,को अनन्य शरण जाकर उससे कहो, ९ मैं जो हूँ ऐसा हूँ॰ इसमें सुधार होना . স तुम्हारा नाम मरते दम तक लूँगा, तभी जिंदा रहूँगा। ' और स्त्रियाँ यही करें कि पति को भगवान के मानकर देह से उसकी हो जाएँ और मन से भगवान की। होने के लिए क॰ परमार्थ का लाभ गृहस्थी  ஈ में भी उलझें नहीं किसी भी उपाधि के फंदे में मत अटको। उपाधिरहित रहने का साधन यानी  उपगधरहित भगवान का नाम निरंतर लेते रहना। नाम  लेने से श्रद्धा दृढ होगी और नाम के लिए रुचि पैदा होगी पानी जमने पर जैसे बर्फ हो जाती है बैसे नाम लेने से श्रद्धा अति दृढ होती है। श्रद्धा के कारण भगवान " तुम्हे সিলনা ही़॰ होगा। तुम निरंतर नाम लेते रहो, तुम्हें भगवान निश्चय ही मिलेंगे, इसका विश्वास रखो।  fasa संदेह मत करो। परमार्थ और व्यवहार का अच्छा समन्चय करें। परमार्थ के बारे में अकारण शंकाएँ नहीं निर्माण करनी चाहिए।  आज के इस दिन से, हम अपने बेटे को जितनी आत्मीयता से हैं उतनी आत्मीयता से पुकारते  भगवान को पुकारो और अब तक जितने प्रेम से भगवान का लिया है उतने ही अथवा नाम उससे भी সধিক ঈস সা নিম্বা ম ভমক্কা নাপ লীl সনক্কাল ৭ মন ম গনিস छूटनेवाली  वस्त भगवान का नाम हो। नाम में ही हमारी अंतिम साँस निकलें। नाम इतना गहरा पहुँचना चाहिए कि प्राण के साथ ही बह बाहर निकलें। इस प्रकार जो नाम लेता है, उसे देह के सुख दुख का भान ही नहीं रहेगा। वह आनंद में रहगा घौंदवलेधामईंदौर ३६६. नाम में ही अंतिम सांस वाहर निकले इसलिए अभी से निरंतर नाम में रहने का प्रयल करो। - ShareChat
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#✍अजब-गजब वैज्ञानिक तथ्य👨‍🔬
✍अजब-गजब वैज्ञानिक तथ्य👨‍🔬 - दोस्ती कारण अभिमान टुटने का faR कारण क्रोध। टुटने ChT दोस्ती कारण अभिमान टुटने का faR कारण क्रोध। टुटने ChT - ShareChat