काशी के एक छोटे से गाँव में एक वृद्धा रहती थी जिसका नाम था, गोमती माँ। उसके पास रहने को एक टूटी झोपड़ी और भगवान कृष्ण की एक छोटी सी पत्थर की मूर्ति थी। गोमती माँ बहुत गरीब थी, लेकिन उसका नियम अटूट था—वह हर दोपहर भगवान को 'मालपुआ' का भोग लगाती थी।
पर हकीकत यह थी कि उसके पास न घी था, न शक्कर, और न ही आटा।
भाव की रसोई
गोमती माँ रोज़ दोपहर को चूल्हा जलाती, उस पर एक खाली मिट्टी की कड़ाई रखती और अपनी आँखें बंद कर लेती। वह कल्पना में भगवान के लिए मालपुए तलती। वह बड़े प्रेम से कहती:
"प्रभु, देखो घी गर्म हो गया है, अब मैं इसमें घोल डाल रही हूँ... देखो कान्हा, मालपुआ कितना सुनहरा और कुरकुरा बना है!"
वह घंटों तक इसी 'मानसिक पूजा' में मग्न रहती और अंत में एक खाली थाली भगवान के सामने रख देती। उसकी आँखों से आंसू बहते और वह कहती, "कान्हा, आज का मालपुआ सबसे मीठा बना है, चख कर देखो।"
राजा का अहंकार और पंडितों का क्रोध
गाँव के बड़े मंदिर में राजा ने एक विशाल भंडारा रखा। हज़ारों किलो असली घी और केसर से बने मालपुए तैयार हुए। लेकिन मंदिर के पंडित ने देखा कि भगवान की मूर्ति के चेहरे पर वह चमक नहीं थी, जो अक्सर होती थी।
राजा ने अहंकार में कहा, "मैंने इतना वैभव अर्पित किया है, फिर भी भगवान खुश क्यों नहीं दिख रहे?"
उसी समय मंदिर के द्वार पर गोमती माँ पहुँची। वह फटे कपड़ों में थी और उसके हाथ में एक खाली दोना (पत्तल) था। पंडितों ने उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया, "हटो यहाँ से बुढ़िया! यहाँ राजसी भोग लग रहा है, तेरी गरीबी यहाँ अपवित्रता फैलाएगी।"
अनोखा चमत्कार
जैसे ही गोमती माँ को बाहर निकाला गया, अचानक मंदिर के गर्भगृह से शुद्ध घी और इलायची की वैसी ही खुशबू आने लगी जैसे ताज़े मालपुए बन रहे हों। राजा और पंडित हैरान रह गए क्योंकि मंदिर की कड़ाइयाँ तो ठंडी हो चुकी थीं।
तभी आकाशवाणी हुई:
"राजन्, तुम्हारे पकवानों में केसर तो है पर प्रेम नहीं। मैं तो अभी गोमती माँ की झोपड़ी में उस 'अदृश्य कड़ाई' से निकले मालपुए खा रहा था। उसने मुझे अपने आँसुओं से सींचकर और अपनी भक्ति से तलकर खिलाया है।"
राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह दौड़कर गोमती माँ के पास गया और उसके पैर पकड़ लिए। उसने देखा कि गोमती माँ की उस खाली मिट्टी की कड़ाई में सचमुच घी की एक अद्भुत चमक और दिव्य सुगंध बाकी थी।
कहानी की अनोखी सीख:
ईश्वर वैभव के भूखे नहीं हैं। आप उन्हें क्या चढ़ाते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किस भाव से चढ़ाते हैं। श्रद्धा की एक खाली कड़ाई भी अहंकार के सोने के थाल से बड़ी होती है।
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जब लाला के सखा गुफा रूपी अघासुर राक्षस (अजगर) के मुख में चले गए थे तो लाला उन्हें बचाकर लायो थो।
जब सभी सखा और गईया मईया बाहर आ गए तो मधु मंगल बोलयो :- कन्हैया हम सब तो निकर आए।अब तू इहाँ कौन की बाट में खड़ो है?
तब लाला मन ही मन बोलयो :- बाबा।
असल में गोप बालक तो अघासुर के मुख को गुफा समझ कर वामे घुमने के मन ते गए हते।परन्तु बाबा वाकू एकांत कंदरा समझ कर भजन करबे के मन ते चलो गयो थो।और एक कोने में जाकर बैठ गयो थो।
अब जो चिल्लायो वो तो बचके बाहर आ गयो।परन्तु जो ना चिल्लायो वाकी भी तो याहे खबर रहे हैं।
अब तुम सोच रहे होंगे जब लाला कू पहले ते खबर हती तो गोप बालकों के संग ही क्यों न ले आयो? असल में उस समय तक बाबा का नियम पूरा ना भयो थो।तो लाला ने सोची इतनी देर में बाकी सबन कू निकारूगो।इतनी देर में बाबा को नियम भी पूरो ह जाएगो।
अब जब बाबा को नियम पूरा भयो तो वाकू बाहरी जगत की सुधी आई।इतनी देर में अघासुर के विष ने अपनो असर दिखानो शुरू कर दियो थो।
अब बाबा के प्राण संकट मे है।परन्तु वाकू पतो है कि मैं चिल्लाऊँगो तो लाला बचाइबे आएगो। और बाबा काऊ कीमत पर भी लाला के प्राणन कू संकट मे ना डाल सकतो।यामारे स्वयं ही प्रयास कर रहयो है।परन्तु मन में बैठो तो मन की जाने है।
लाला एक बार फिर भीतर गयो और बाबा कू भी निकार लायो।
बाबा बोलयो :- लाला मुझ बूढ़े के काजे काहे तुने अपने प्राण संकट मे डाले?
लाला :- बाबा मेरे प्राण तो तेरे भजन में बसत है।तेरो भजन बंद ह गयो तो इन प्राणन कू रखकर मैं काह करूँगो।तेरो भजन चलतो रहे हैं मेरी श्वास चलती रहें हैं।
भावार्थ :- जितनों नाम चलतो रहेगो।उतनी हमारे लाला की आयु बढ़ती रहेगी।
तो यामारे
।।सांस सांस सुमिरो गोविन्द।।
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सुख शान्ति समृद्धि
इन तीनों मोतियों से
आप सभी के जीवन की
डोर हमेशा बंधी रहे..
सुप्रभात सभी को राधे राधे🌹🌹🙏 #🌺राधा कृष्ण💞 #🙏गुरु महिमा😇 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🤗जया किशोरी जी🕉️ #😊कृष्ण कथाएं
बाबा की आदत है कि जिस मंदिर में भी दर्शन करबे जाएगो।वहाँ के ठाकुर को चिल्लाकर कहेगो :- लाला संग चलेगो?
क्या पता कौन से ठाकुर को बाबा की वात्सल्य भरी पुकार भा जाए और वो बाबा के संग हो ले।
बस कल कछु ऐसो ही राधावल्लभ के संमुख भी भयो।जैसे ही बाबा ने चिल्लाकर कही :- लाला संग चलेगो?
लाला ने तो कछु उत्तर ना दियो।परन्तु गोसाईं जी बाबा पे भड़क गए।
गोसाईं जी :- बाबा तू फेर आ गयो। चलो जा यहाते।वरना ऐसी मार पड़ेगी तोमे कि वृंदावन छोड़के भागेगो।
गोसाईं जी की बात सुन बाबा मुस्कुरातो भयो वहाँ ते हट गयो।
गोसाईं जी कू लगी कि बाबा चलो गयो परन्तु बाबा एक ओर ओट में ह के दर्शन कर रहयो थो और मन ही मन कह रहयो थो कि लाला संग चलेगो?
इतनी देर में गोसाईं जी ते काउ भगत ने कही :- अरे महाराज काहे को वा बावरे बाबा पे चिल्लाओ हो।तुम्हें तो पतो है कि वो पागल है। सभी मंदिरन में जाके ऐसो ही करे है।
गोसाईं जी :- भईया जिसे तू पागल बता रहयो है।मोहे वाते डर लगे हैं।तुने वाके नेत्रन में कभी झांक के ना देखो।काउ दिन राधावल्लभ की दृष्टि वाके नेत्रन पे पड़ गई तो सच्ची में संग चल देंगे फिर बैठे रहियो इहाँ झांझ मंजीरा ले के।वो बावरो ना हैं।परन्तु काउ दिन हमें जरूर वावरो कर जाएगो।
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ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नमः #🌺राधा कृष्ण💞 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏गुरु महिमा😇 #😊कृष्ण कथाएं
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