श्री राधा रानी श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं । श्री राधा रानी की कृपा से ही श्रीकृष्ण ने ब्रज गोपियों को सर्वश्रेष्ठ महारास रस का पान कराया । श्री कृष्ण रोम रोम से राधा राधा रटते रहते हैं । अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक श्रीकृष्ण भी नित्य गहवर वन की खोर में श्री राधा रानी की चरण सेवा करते हैं ।
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श्रीकृष्ण की निष्काम भक्ति करके उनकी नित्य सेवा प्राप्त करना ही जीव का एकमात्र लक्ष्य है । यह निष्काम भक्ति गुरु द्वारा बताए हुए उपदेश द्वारा ही की जाएगी, उनकी आज्ञा पालन द्वारा ही विशुद्ध भक्ति संभव है ।
श्रीजी महाराज
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बडे भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य शरीर पाना बहुत सौभाग्य की बात है, यह मनुष्य शरीर देवताओं के लिए भी दुर्लभ है ।
इस मानव देह में ही हम भक्ति करके भगवान को प्राप्त कर सकते हैं, अन्य किसी देह में भक्ति करने की छूट नहीं है । केवल मानव देह ही कर्म योनि है, बाकि सारी योनियां भोग योनियां हैं ।
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मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—जो मन को मुझमें लगाकर श्रद्धा से भक्ति करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। संसार में मन का राग नहीं होना चाहिए, केवल ईश्वर में हो ।
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ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि हे पार्थ ! जो लोग अपने सभी कर्म मुझे अर्पित करके, अनन्य रूप से केवल मुझे ही परम मानकर मेरी भक्ति करते हैं, मैं उन्हें मृत्यु रूपी संसार सागर से शीघ्र पार कराता हूँ।
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अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रभाव और दया रखता है, अहंकार रहित है, सुख-दुःख में समान रहता है—ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
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चित्त की वृत्तियां जैसे काम, क्रोध, लोभ और मोह जब तक पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हो जाएंगी, तब तक शांति, सुख की एक झलक भी प्राप्त नहीं होगी । जब तक यह वृत्तियां हमारे अंत: करण में रहेंगी, यह हमें अशांत करती रहेंगी । इन्हें समाप्त करने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपने मन को ईश्वर में लगाएं ।
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हरि गुरु के चिंतन के सिवाय साधक का अन्य चिंतन कुसंग है, अभ्यास करें कि एकमात्र हरि गुरु का ही चिंतन हो । एकांत साधना, प्रवचन श्रवण इसमें सहायक है किंतु प्रमुख है मन । हमें अपने मन को भगवान के श्री चरणों में लगाने का बार बार अभ्यास करना होगा ।
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पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
जो कोई प्रेम से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ। भगवान भक्त के प्रेम के भूखे हैं, हम प्रेम से यदि एक पत्ता भी रख देंगे तो भगवान उसे स्वीकार करेंगे । यदि प्रेम नहीं है, तो कोई छप्पन भोग, हीरों का हार भी रख दे तो ईश्वर उसे नहीं स्वीकार करते ।
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स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽत्मा संप्रसीदति॥
(भागवत 1.2.6)
मनुष्य का सर्वोत्तम धर्म वही है जिससे भगवान में निष्काम और निरंतर भक्ति उत्पन्न हो, जिससे आत्मा को शांति मिलती है।
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