#TrueWorship_EndsSuffering
यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 और अध्याय 5 मंत्र 32 में प्रमाण है कि पूर्ण परमात्मा सभी पापों का नाश कर देते हैं।
कबीर परमेश्वर की भक्ति से जीवन सुखमय बन जाता है।
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#TrueWorship_EndsSuffering
संत रामपाल जी महाराज से नाम लेकर मर्यादा में रहकर सतभक्ति करने से शुभ संस्कार बढ़ते हैं और दुख का समय भी सुख में बदलने लगता है।
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पत्थर में भगवान् सिद्ध करने वाले धर्म गुरुओं से बचें, पहले जिन्होंने किया उसे क्या मिला ये भी देखें। ध्यान रहे मनुष्य जीवन चौरासी लाख योनियाँ भुगतने के बाद प्राप्त होता है।
#GodNightWednesday
#कबीर
कबीर कथा करो करतार की, सुनो कथा करतार ।
आन कथा सुनिये नहीं, कह कबीर विचार ।।
#GodMorningWednesday
#BigMistakeOf_DrBRAmbedkarJi
कबीर जी ने उपदेश दिया है कि भक्त को चाहिए, वह केवल परमात्मा की चर्चा ही सुने और परमात्मा की चर्चा ही करे। अन्य कोई चर्चा नहीं सुननी चाहिए #कबीर
#GodNightTuesday
#BigMistakeOf_DrBRAmbedkarJi
. ज्ञान चर्चा धर्म दास व कबीर साहिब जी
धर्मदास जी ने कहा कि हे प्रभु! हे जिन्दा! तत्त्वदर्शी सन्त की क्या पहचान है तथा प्रमाणित सद्ग्रन्थों में कहाँ प्रमाण है? आपका ज्ञान आत्मा के आर-पार हो रहा है। गीता का शब्दा शब्द यथार्थ भावार्थ आप जी के मुख कमल से सुनकर युगों की प्यासी आत्मा कुछ तृप्त हो रही है तथा गदगद हो रही है।
जिन्दा परमेश्वर जी ने कहा कि परमेश्वर ने बताया कि पहले तो लक्षण सुन तत्त्वदर्शी सन्त अर्थात् पूर्ण ज्ञानी सत्गुरु के
गुरू के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना।
दूजे हरि भक्ति मन कर्म बानी, तीसरे समदृष्टि कर जानी।
चौथे वेद विधि सब कर्मा, यह चार गुरु गुण जानो मर्मा।
भावार्थ! जो तत्त्वदर्शी सन्त होगा उसमें चार मुख्य गुण होते हैं। जो निम्नलिखित है।
1. वह वेदों तथा अन्य सभी ग्रन्थों का पूर्ण ज्ञानी होता है।
2. दूसरे वह परमात्मा की भक्ति मन-कर्म-वचन से स्वयं करता है, केवल वक्ता-वक्ता नहीं होता, उसकी करणी और कथनी में अन्तर नहीं होता।
3. वह सर्व अनुयाईयों को समान दृष्टि से देखता है। ऊँच-नीच का भेद नहीं करता।
4. चौथे वह सर्व भक्तिकर्म वेदों के अनुसार करता तथा करवाता है अर्थात् शास्त्रनुकूल भक्ति साधना करता तथा करवाता है। यह ऊपर का प्रमाण तो सूक्ष्म वेद में है जो परमेश्वर ने अपने मुखकमल से बोला है। अब आप जी को श्रीमद्भगवत गीता में प्रमाण दिखाते हैं कि तत्त्वदर्शी सन्त की क्या पहचान बताई है?
श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में स्पष्ट है कि
ऊर्धव मूलम् अधः शाखम् अश्वत्थम् प्राहुः अव्ययम्।
छन्दासि यस्य प्रणानि, यः तम् वेद सः वेदवित्।।
ऊपर को मूल (जड़) वाला, नीचे को तीनों गुण रुपी शाखा वाला उल्टा लटका हुआ संसार रुपी पीपल का वृक्ष जानो, इसे अविनाशी कहते हैं क्योंकि उत्पत्ति-प्रलय चक्र सदा चलता रहता है जिस कारण से इसे अविनाशी कहा है। इस संसार रुपी वृक्ष के पत्ते आदि छन्द हैं अर्थात् भाग (च्ंतजे) हैं। (य तम् वेद) जो इस संसार रुपी वृक्ष के सर्वभागों को तत्त्व से जानता है, (सः) वह (वेदवित्) वेद के तात्पर्य को जानने वाला है अर्थात् वह तत्त्वदर्शी सन्त है।
जैसा कि गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में कहा है कि परम अक्षर ब्रह्म स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अपने मुख कमल से तत्त्वज्ञान विस्तार से बोलते हैं। परमेश्वर ने अपनी वाणी में अर्थात् तत्त्वज्ञान में बताया है कि
कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, क्षर पुरुष वाकि डार।
तीनों देवा शाखा हैं, पात रुप संसार।।
जमीन से बाहर जो वृक्ष का हिस्सा है, उसे तना कहते हैं। तना तो जानों अक्षर पुरुष, तने से कई मोटी डार निकलती हैं। उनमें से एक मोटी डार जानों क्षर पुरुष। उस डार से तीन शाखा निकलती हैं, उनको जानों तीनों देवता रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव-शंकर जी और इन शाखाओं को पत्ते लगते हैं, उन पत्तों को संसार जानो।
गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 में सांकेतिक विवरण है। तत्त्वज्ञान में विस्तार से कहा गया है। पहले गीता ज्ञान के आधार से ही जानते हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 2 में कहते हैं कि संसार रुपी वृक्ष की तीनों गुण (रजगुण ब्रह्माजी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शंकर जी) रुपी शाखाएं है। ये ऊपर (स्वर्ग लोक में) तथा नीचे (पाताल लोक) फैली हुई हैं। यह कहाँ प्रमाण है कि रजगुण ब्रह्मा है, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शंकर है?
1. श्री मार्कण्डेय पुराण (सचित्रा मोटा टाईप गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित) के 123 पृष्ठ पर कहा है कि रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शंकर, तीनों ब्रह्म की प्रधान शक्तियाँ है, ये ही तीन देवता हैं। ये ही तीन गुण हैं।
2. श्री देवी महापुराण संस्कृत व हिन्दी अनुवाद (श्री वैंकटेश्वर प्रैस बम्बई से प्रकाशित में तीसरे स्कंद अध्याय 5 श्लोक 8 में लिखा है कि शंकर भगवान बोले, हे मात! यदि आप हम पर दयालु हैं तो मुझे तमोगुण, ब्रह्मा रजोगुण तथा विष्णु सतोगुण युक्त क्यों किया?
उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शंकर जी हैं। तीनों शाखाएं ऊपर नीचे फैली हैं, का तात्पर्य है कि गीता का ज्ञान पृथ्वी लोक पर बोला जा रहा था। तीनों देवता की सत्ता तीन लोकों में है। 1. पृथ्वी लोक, 2. स्वर्ग लोक तथा 3. पाताल लोक। ये तीन मन्त्र हैं, एक-एक विभाग के मन्त्र हैं। रजगुण विभाग के श्री ब्रह्मा जी, सतगुण विभाग के श्री विष्णु जी तथा तमगुण विभाग के श्री शिव जी। गीता अध्याय 15 श्लोक 3 में कहा है कि हे अर्जुन! इस संसार रुपी वृक्ष का स्वरुप जैसे यहाँ अर्थात् तेरे और मेरे गीता के ज्ञान की चर्चा में नहीं पाया जाता अर्थात् मैं नहीं बता पाऊँगा क्योंकि इसके आदि और अन्त का मुझे अच्छी तरह ज्ञान नहीं है।
इसलिए इस अतिदृढ़ मूल वाले अर्थात् जिस संसार रुपी वृक्ष की मूल है। वह परमात्मा भी अविनाशी है तथा उनका स्थान सत्यलोक, अलख लोक, अगम लोक तथा अकह लोक, ये चार ऊपर के लोक भी अविनाशी हैं। इन चारों में एक ही परमात्मा भिन्न-भिन्न रुप बनाकर सिंहासन पर विराजमान हैं। इसलिए इसको ‘‘सुदृढ़मूलम्’’ अति दृढ़ मूल वाला कहा है। इसे तत्त्वज्ञान रुपी शस्त्रा से काटकर अर्थात् तत्त्वदर्शी सन्त से तत्त्वज्ञान समझकर।
फिर गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि उसके पश्चात् परमेश्वर के उस परमपद अर्थात् सत्यलोक की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते। जिस परमेश्वर से संसार रुपी वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है अर्थात् जिस परमेश्वर ने सर्व संसार की रचना की है। उसी परमेश्वर की भक्ति को पहले तत्त्वदर्शी सन्त से समझो! गीता ज्ञान दाता अपनी भक्ति को भी मना कर रहा है।
गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में तीन प्रभु बताये हैं। क्षर पुरुष, अक्षर पुरुष ये दोनों नाशवान हैं। तीसरा परम अक्षर पुरुष है जो संसार रुपी वृक्ष का मूल है। वह वास्तव में अविनाशी है। जड़ से ही वृक्ष के सर्व भागों ‘‘तना, डार-शाखाओं तथा पत्तों‘‘ को आहार प्राप्त होता है। वह परम अक्षर पुरुष ही तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है। उसी मालिक की पूजा करनी चाहिए। इस विवरण में तत्त्वदर्शी सन्त की पहचान तथा गीता ज्ञान दाता की अल्पज्ञता अर्थात् तत्त्वज्ञानहीनता स्पष्ट है। #कबीर
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हरि के नाम बिन, राजा ऋषभ होय ।
मिट्टी लदे कुम्हार के, घास न नीरे कोय ।।
भगवान की भक्ति न करने से राजा गधे का
शरीर प्राप्त करता है कुम्हार के घर मिट्टी ढोता है।
घास स्वयं जंगल में खाकर आता है।
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#किसान_मसीहा_संतरामपालजी
किसानों की आंखों के आंसू मुस्कान में बदल गए जब उनके डूबे खेतों में फिर से गेहूं की फसल लहलहाई।
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