बिनोद कुमार शर्मा
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बिनोद कुमार शर्मा
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#जय महाकाल दर्शन।।
जय महाकाल दर्शन।। - जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* फ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि एकादशी, संवत् २०८२, তমা गुरुवार, २९ जनवरी २०२६७ * ಷ ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आढती दर्शन जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* फ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि एकादशी, संवत् २०८२, তমা गुरुवार, २९ जनवरी २०२६७ * ಷ ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आढती दर्शन - ShareChat
#🌷जया एकादशी 🌷🙏
🌷जया एकादशी - 29 और पुण्य का धर्म, भक्ति, आस्था जनवरी प्रतीक तथा पाप विनाशिनी ঠাযা 3ڈ एकादशी के पावन पर्व पर सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ माघ शुक्ल एकादशी की पावन बेला में श्रीहरि का आशीर्वाद आप पर सदा बना रहे। Binod kumar Sharma 29 और पुण्य का धर्म, भक्ति, आस्था जनवरी प्रतीक तथा पाप विनाशिनी ঠাযা 3ڈ एकादशी के पावन पर्व पर सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ माघ शुक्ल एकादशी की पावन बेला में श्रीहरि का आशीर्वाद आप पर सदा बना रहे। Binod kumar Sharma - ShareChat
#श्री रामलला दर्शन अयोध्या
श्री रामलला दर्शन अयोध्या - ಫ೯೯ श्री रामलला , अयोध्या धाम आज २९ जनवरी २०२६ Binod kumav Shava ಫ೯೯ श्री रामलला , अयोध्या धाम आज २९ जनवरी २०२६ Binod kumav Shava - ShareChat
#जय माँ विंध्यवासिनी🙏🏻🚩
जय माँ  विंध्यवासिनी🙏🏻🚩 - फ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि जया एकादशी, संवत् २०८२, दिन - गुरुवार, २९ जनवरी २०२६८ * *जय जय मैय्या विंध्यवासिनी की* a অম সাঁ विंध्यवासिनी फ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि जया एकादशी, संवत् २०८२, दिन - गुरुवार, २९ जनवरी २०२६८ * *जय जय मैय्या विंध्यवासिनी की* a অম সাঁ विंध्यवासिनी - ShareChat
#जय महाकाल दर्शन।।
जय महाकाल दर्शन।। - जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का भस्म आरती श्रृंगार दर्शन* फ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि एकादशी, संवत् २०८२, তমা गुरुवार, २९ जनवरी २०२६८* নিন ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर भस्म आरती दर्शन मिराकात जय श्री महाकाल *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का भस्म आरती श्रृंगार दर्शन* फ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि एकादशी, संवत् २०८२, তমা गुरुवार, २९ जनवरी २०२६८* নিন ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर भस्म आरती दर्शन मिराकात - ShareChat
*गजेंद्र मोक्ष कथा* *अति प्राचीन काल की बात है। द्रविड़ देश में एक पाण्ड्यवंशी राजा राज्य करते थे। उनका नाम था इंद्रद्युम्न। वे भगवान की आराधना में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। यद्यपि उनके राज्य में सर्वत्र सुख-शांति थी। प्रजा प्रत्येक रीति से संतुष्ट थी तथापि राजा इंद्रद्युम्न अपना समय राजकार्य में कम ही दे पाते थे। वे कहते थे कि भगवान विष्णु ही मेरे राज्य की व्यवस्था करते है। अतः वे अपने इष्ट परम प्रभु की उपासना में ही दत्तचित्त रहते थे।* *भगवान नारायण गजेन्द्र की रक्षा करते हुए* *राजा इंद्रद्युम्न के मन में आराध्य-आराधना की लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। इस कारण वे राज्य को त्याग कर मलय-पर्वत पर रहने लगे। उनका वेश तपस्वियों जैसा था। सिर के बाल बढ़कर जटा के रूप में हो गए थे। वे निरंतर परमब्रह्म परमात्मा की आराधना में तल्लीन रहते। उनके मन और प्राण भी श्री हरि के चरण-कमलों में मधुकर बने रहते। इसके अतिरिक्त उन्हें जगत की कोई वस्तु नहीं सुहाती। उन्हें राज्य, कोष, प्रजा तथा पत्नी आदि किसी प्राणी या पदार्थ की स्मृति ही नहीं होती थी।* *एक बार की बात है, राजा इन्द्रद्युम्न प्रतिदिन की भांति स्नानादि से निवृत होकर सर्वसमर्थ प्रभु की उपासना में तल्लीन थे। उन्हें बाह्य जगत का तनिक भी ध्यान नहीं था। संयोग वश उसी समय महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ वहां पहुँच गए। लेकिन न पाद्ध, न अघ्र्य और न स्वागत। मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परम प्रभु के ध्यान में निमग्न थे। इससे महर्षि अगस्त्य कुपित हो गए। उन्होंने इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया- “इस राजा ने गुरुजनो से शिक्षा नहीं ग्रहण की है और अभिमानवश परोपकार से निवृत होकर मनमानी कर रहा है। ऋषियों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।” महर्षि अगत्स्य भगवदभक्त इंद्रद्युम्न को यह शाप देकर चले गए। राजा इन्द्रद्युम्न ने इसे श्री भगवान का मंगलमय विधान समझकर प्रभु के चरणों में सिर रख दिया।* *क्षीराब्धि में दस सहस्त्र योजन लम्बा, चौड़ा और ऊंचा त्रिकुट नामक पर्वत था। वह पर्वत अत्यंत सुन्दर एवं श्रेष्ठ था। उस पर्वतराज त्रिकुट की तराई में ऋतुमान नामक भगवान वरुण का क्रीड़ा-कानन था। उसके चारों ओर दिव्य वृक्ष सुशोभित थे। वे वृक्ष सदा पुष्पों और फूलों से लदे रहते थे। उसी क्रीड़ा-कानन ऋतुमान के समीप पर्वतश्रेष्ठ त्रिकुट के गहन वन में हथनियों के साथ अत्यंत शक्तिशाली और अमित पराक्रमी गजेन्द्र रहता था।* *एक बार की बात है। गजेन्द्र अपने साथियो सहित तृषाधिक्य (प्यास की तीव्रता) से व्याकुल हो गया। वह कमल की गंध से सुगंधित वायु को सूंघकर एक चित्ताकर्षक विशाल सरोवर के तट पर जा पहुंचा। गजेन्द्र ने उस सरोवर के निर्मल,शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया। पहले तो उसने जल पीकर अपनी तृषा बुझाई, फिर जल में स्नान कर अपना श्रम दूर किया। तत्पश्चात उसने जलक्रीड़ा आरम्भ कर दी। वह अपनी सूंड में जल भरकर उसकी फुहारों से हथिनियों को स्नान कराने लगा। तभी अचानक गजेन्द्र ने सूंड उठाकर चीत्कार की। पता नहीं किधर से एक मगर ने आकर उसका पैर पकड़ लिया था। गजेन्द्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगाई परन्तु उसका वश नहीं चला, पैर नहीं छूटा। अपने स्वामी गजेन्द्र को ग्राहग्रस्त देखकर हथिनियां, कलभ और अन्य गज अत्यंत व्याकुल हो गए। वे सूंड उठाकर चिंघाड़ने और गजेन्द्र को बचाने के लिए सरोवर के भीतर-बाहर दौड़ने लगे। उन्होंने पूरी चेष्टा की लेकिन सफल नहीं हुए।* *वस्तुतः महर्षि अगत्स्य के शाप से राजा इंद्रद्युम्न ही गजेन्द्र हो गए थे और गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू महर्षि देवल के शाप से ग्राह हो गए थे। वे भी अत्यंत पराक्रमी थे। संघर्ष चलता रहा। गजेन्द्र स्वयं को बाहर खींचता और ग्राह गजेन्द्र को भीतर खींचता। सरोवर का निर्मल जल गंदला हो गया था। कमल-दल क्षत-विक्षत हो गए। जल-जंतु व्याकुल हो उठे। गजेन्द्र और ग्राह का संघर्ष एक सहस्त्र वर्ष तक चलता रहा। दोनों जीवित रहे। यह द्रश्य देखकर देवगण चकित हो गए।* *अंततः गजेन्द्र का शरीर शिथिल हो गया। उसके शरीर में शक्ति और मन में उत्साह नहीं रहा। परन्तु जलचर होने के कारण ग्राह की शक्ति में कोई कमी नहीं आई। उसकी शक्ति बढ़ गई। वह नवीन उत्साह से अधिक शक्ति लगाकर गजेन्द्र को खींचने लगा। असमर्थ गजेन्द्र के प्राण संकट में पड़ गए। उसकी शक्ति और पराक्रम का अहंकार चूर-चूर हो गया। वह पूर्णतया निराश हो गया। किन्तु पूर्व जन्म की निरंतर भगवद आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई। उसने निश्चय किया कि मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूं। इस निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा।* *गजेन्द्र की स्तुति सुनकर सर्वात्मा सर्वदेव रूप भगवान विष्णु प्रकट हो गए। गजेन्द्र को पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से उक्त सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने हाथ में चक्र लिए गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तीव्रता से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुन्दर पुष्प अपनी सूंड में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा- “नारायण ! जगद्गुरो ! भगवान ! आपको नमस्कार है।”* *गजेन्द्र को अत्यंत पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और गजेन्द्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए और तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।* *ब्रह्मादि देवगण श्री हरि की प्रशंसा करते हुए उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे। सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म भगवान विष्णु का गुणगान करने लगे। ग्राह दिव्य शरीर-धारी हो गया। उसने विष्णु के चरणो में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान विष्णु के गुणों की प्रशंसा करने लगा।* *भगवान विष्णु के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पाप मुक्त होकर अभिशप्त हूहू गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रेलोक्य वन्दित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया। भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गन्धर्व,सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे। गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा- “प्यारे गजेन्द्र ! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूँगा।”* *यह कहकर भगवान विष्णु ने पार्षद रूप में गजेन्द्र को साथ लिया और गरुडारुड़ होकर अपने दिव्य धाम को चले गए।* *-रामकृपा-* #किस्से-कहानी
#👌 अच्छी सोच👍
👌 अच्छी सोच👍 - प्रेम और करुणा मानवीय जीवन के दो स्तंभ हैं॰.ये भावनाएं हमें दूसरों से जोड़ती हैं, संबंधों को मजबूत  बनाती हैं और दुनिया को एक बेहतर जगह बनाती  हैं। रामकृपा * आप दुसरो की नकल करने में लगे रहते है *अगर इससे आपके जीवन की बर्बादी होती है, अपनी a पहचान स्वयं बनाये तभी आप जीवन मेँ समय का उपयोग कर सकते है।-रामकृपा* प्रेम और करुणा मानवीय जीवन के दो स्तंभ हैं॰.ये भावनाएं हमें दूसरों से जोड़ती हैं, संबंधों को मजबूत  बनाती हैं और दुनिया को एक बेहतर जगह बनाती  हैं। रामकृपा * आप दुसरो की नकल करने में लगे रहते है *अगर इससे आपके जीवन की बर्बादी होती है, अपनी a पहचान स्वयं बनाये तभी आप जीवन मेँ समय का उपयोग कर सकते है।-रामकृपा* - ShareChat
🌹🌷🙏 #शुभ गुरुवार 🙏🌷🌹
शुभ गुरुवार - शुभ गुरुवार 29/01/26 ~प्रातः वदन~ 3 वासुदेवाय नारायणाय नमः नमः ऊँ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्रो विष्णु प्रचोदयात्। | -रामकृपा- श्री विष्णुदेव की कृपा से आप सपरिवार सदा ga gசி स्वस्थ रहें। शुभ गुरुवार 29/01/26 ~प्रातः वदन~ 3 वासुदेवाय नारायणाय नमः नमः ऊँ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्रो विष्णु प्रचोदयात्। | -रामकृपा- श्री विष्णुदेव की कृपा से आप सपरिवार सदा ga gசி स्वस्थ रहें। - ShareChat
#जय महाकाल दर्शन।।
जय महाकाल दर्शन।। - তম সী মঙ্াব্ধাল *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* *७ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि - दशमी, संवत् २०८२, दिन - २८ जनवरी २०२६७ * बुधवार, ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आरती दर्शन  N তম সী মঙ্াব্ধাল *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का सायंकालीन आरती श्रृंगार दर्शन* *७ माघ, शुक्ल पक्ष, तिथि - दशमी, संवत् २०८२, दिन - २८ जनवरी २०२६७ * बुधवार, ऊँ नमः शिवाय* श्री महाकालेश्वर संध्या आरती दर्शन  N - ShareChat
#लाला लाजपत राय की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं
लाला लाजपत राय की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं - २८ जनवरी में राष्ट्रीयता की 57-57 भावना जागृत करने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , माँ भारती के अमर सपूत 'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय जो ক্ী সযনী ৭ং ক্রীহি- कोटि नमन। मेरे शरीर पर पड़ी एक॰एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक॰एक कील का काम करेगी ' -्लाला लाजपत राय Binod kumar Sharma २८ जनवरी में राष्ट्रीयता की 57-57 भावना जागृत करने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , माँ भारती के अमर सपूत 'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय जो ক্ী সযনী ৭ং ক্রীহি- कोटि नमन। मेरे शरीर पर पड़ी एक॰एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक॰एक कील का काम करेगी ' -्लाला लाजपत राय Binod kumar Sharma - ShareChat