अरुण सुर्यवंशी
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@gotya0602018
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अरुण सुर्यवंशी
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#प्रेरणादायी काव्य #मराठी #📝कविता / शायरी/ चारोळी #☺️प्रेरक विचार #अरुण
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मराठी - संवाद कविता कहूँ नुमसे . मेरी व्यथा है निराली! ' নতা क्या कहना१ खुलकर कहो.. न सहेली! कितना लालची.. कितना स्चार्थी! সঃ সালন , ऐसा लगता है- कब उठेगी... मेरी अर्थीः..? किए जा रहे नष्ट , घने ्हरे जंगल.. எ<a Ge! विकास " के नाम पर.. নিমরন সীন্সা ই ব্তুসন ? কপ্ী इन पेडों की भी सांस होती है.. इन चिड़ियों की भी आस होती है... तक यूँ चुपचाप बैठी रहना.. ? কল यह विनाशकाल. यह अत्थाचार सहना...? तुम ही बताओ ' मुज्ते अब - मिलेगा मुज्े... न्याय 6எ..? तप्त ज्वाला भड़़क रही चारों और, बेबस गूँज रहा प्राणनपखेरू का शोर! अपनी ही माँ को लूटे   इतना निर्दयी, क्या कहं मानव है इतना पापी! धरती रो रही है.. आसमान भी आज मौन है.. के इस पाप का- সালন্র कोई कानून है...? क्या कोई प्राथशचित , अगरआज भी नहीं जागे हम - सिर्फ राख बचेगी! कल होंगे. जीवन होगा. రౌరసాల सिर्फ इंसान की. अपनी ही बनाई हुरई.. चिता जलेगी! Arun Suryavanshi uote.in Your संवाद कविता कहूँ नुमसे . मेरी व्यथा है निराली! ' নতা क्या कहना१ खुलकर कहो.. न सहेली! कितना लालची.. कितना स्चार्थी! সঃ সালন , ऐसा लगता है- कब उठेगी... मेरी अर्थीः..? किए जा रहे नष्ट , घने ्हरे जंगल.. எ<a Ge! विकास " के नाम पर.. নিমরন সীন্সা ই ব্তুসন ? কপ্ী इन पेडों की भी सांस होती है.. इन चिड़ियों की भी आस होती है... तक यूँ चुपचाप बैठी रहना.. ? কল यह विनाशकाल. यह अत्थाचार सहना...? तुम ही बताओ ' मुज्ते अब - मिलेगा मुज्े... न्याय 6எ..? तप्त ज्वाला भड़़क रही चारों और, बेबस गूँज रहा प्राणनपखेरू का शोर! अपनी ही माँ को लूटे   इतना निर्दयी, क्या कहं मानव है इतना पापी! धरती रो रही है.. आसमान भी आज मौन है.. के इस पाप का- সালন্র कोई कानून है...? क्या कोई प्राथशचित , अगरआज भी नहीं जागे हम - सिर्फ राख बचेगी! कल होंगे. जीवन होगा. రౌరసాల सिर्फ इंसान की. अपनी ही बनाई हुरई.. चिता जलेगी! Arun Suryavanshi uote.in Your - ShareChat