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👏વાલો.મારો.સાચા.નો.છે.સંગાથી.જુઠા.નો.નય.બેલી👏.
#꧁☆જય દ્વારકાધીશ☆꧂
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꧁☆જય દ્વારકાધીશ☆꧂ - ध्यान विचारों को रोकना नहीं है बल्कि विचारों के बीच उस खाली स्थान को पहचानना है সমাঁ পংমামা কা নায় ট / 0 19 ச जीवन ` ाध्यात्मिक ध्यान विचारों को रोकना नहीं है बल्कि विचारों के बीच उस खाली स्थान को पहचानना है সমাঁ পংমামা কা নায় ট / 0 19 ச जीवन ` ाध्यात्मिक - ShareChat
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꧁☆જય દ્વારકાધીશ☆꧂ - निज अनुभव अब कहउँ खगेसा | নিনু ৪হি মতন ন সা্টি কলমা II शृगुरवंशी थर्मन्द्ध तिवारी  हे पक्षिराज गरुइ जी ! में अपना अनुभव कहता हूँ- भगवान हरि के भजन के बिना मनुण्य के दुख और दूर नहीं होते ।l  कष्ट कभी भृगुवंशी धर्मेन्द्र तिवारी निज अनुभव अब कहउँ खगेसा | নিনু ৪হি মতন ন সা্টি কলমা II शृगुरवंशी थर्मन्द्ध तिवारी  हे पक्षिराज गरुइ जी ! में अपना अनुभव कहता हूँ- भगवान हरि के भजन के बिना मनुण्य के दुख और दूर नहीं होते ।l  कष्ट कभी भृगुवंशी धर्मेन्द्र तिवारी - ShareChat
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꧁☆જય દ્વારકાધીશ☆꧂ - आत्म-्साक्षात्कारः महर्षि रमण का मार्ग मुख्य सारः " मैं देह हूँ " के अहंकार का नाश ही वास्तविक मुक्ति है। मोक्ष क्या है? मोक्ष कहीं बाहर से प्राप्त करने वाली वस्तु नहीं , बल्कि स्वयं में स्थित आत्मा को जान लेना है। "मैं कौन हूँ?" की खोज करें -अनुसंधान (Inquiry) करने निरंतर आत्म- से मन के संकल्प समाप्त हो जाते हैं और केवल शुद्ध आत्मा शेष रहती है। मन ही संसार का मूल है जब तक व्यक्ति स्वयं को शरीर समझता है तक बंधन हैः मन का हृदय में लीन होना q ही शांति है। ज्ञान और आत्म-समर्पण एक ही हैं पूर्ण आत्म ्समर्पण का अर्थ है " मैं" (अहंकार ) पूरी तरह लोप हो जाना, जो कि ज्ञान का भी ಹT अंतिम लक्ष्य है। का मुकुट है एकाग्रता ही सफलता 30 चाहे मूर्ति पूजा हो या मंत्र जप, इनका उद्देश्य चित्त को एकाग्र करना है ताकि वह अपने सोत (आत्मा ) तक पहुँच सके। आत्म-्साक्षात्कारः महर्षि रमण का मार्ग मुख्य सारः " मैं देह हूँ " के अहंकार का नाश ही वास्तविक मुक्ति है। मोक्ष क्या है? मोक्ष कहीं बाहर से प्राप्त करने वाली वस्तु नहीं , बल्कि स्वयं में स्थित आत्मा को जान लेना है। "मैं कौन हूँ?" की खोज करें -अनुसंधान (Inquiry) करने निरंतर आत्म- से मन के संकल्प समाप्त हो जाते हैं और केवल शुद्ध आत्मा शेष रहती है। मन ही संसार का मूल है जब तक व्यक्ति स्वयं को शरीर समझता है तक बंधन हैः मन का हृदय में लीन होना q ही शांति है। ज्ञान और आत्म-समर्पण एक ही हैं पूर्ण आत्म ्समर्पण का अर्थ है " मैं" (अहंकार ) पूरी तरह लोप हो जाना, जो कि ज्ञान का भी ಹT अंतिम लक्ष्य है। का मुकुट है एकाग्रता ही सफलता 30 चाहे मूर्ति पूजा हो या मंत्र जप, इनका उद्देश्य चित्त को एकाग्र करना है ताकि वह अपने सोत (आत्मा ) तक पहुँच सके। - ShareChat
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꧁☆જય દ્વારકાધીશ☆꧂ - प्रभु चरणों में प्रीति हो, विश्वासु | मन में अटल ( भोह  # का आवरण, নন ব্ানি নিত নাস Il नामदेव जी की कुटिया जल गयी ক্সোবত্রা प्रभु चरणों में प्रीति हो, विश्वासु | मन में अटल ( भोह  # का आवरण, নন ব্ানি নিত নাস Il नामदेव जी की कुटिया जल गयी ক্সোবত্রা - ShareChat
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