
Jitendra Singh
@jitendra_singh_812
༺꧁🙏🏼 जय श्री राधे कृष्णा ग्रुप *🙏🏼 ꧂༻
एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत
पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे
से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठी –
"बेटा! कुछ पूजा-पाठ
भी करते हो या नहीं?"
बेटा बोला –
"माँ,मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ।
मैं अमेरिका में मानव के विकास
पर काम कर रहा हूँ।
विकास का सिद्धांत,
चार्ल्स डार्विन...
क्या आपने उसके बारे में सुना भी है ?"
उसकी माँ मुस्कुराई और बोली –
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा..
उसने जो भी खोज की,वह वास्तव में
#सनातन_धर्म के लिए बहुत पुरानी
खबर है।"
“हो सकता है माँ!”
बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।
“यदि तुम कुछ समझदार हो,
तो इसे सुनो..”उसकी माँ ने प्रतिकार किया।
“क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है?
विष्णु के दस अवतार?”
बेटे ने सहमति में कहा...
"हाँ ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से
क्या लेना-देना ?"
माँ फिर बोली –
"लेना-देना है..
मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन
क्या नहीं जानते हो ?"
● “पहला अवतार था 'मत्स्य',
यानि मछली।
ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में
आरम्भ हुआ।
यह बात सही है या नहीं?”
बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा...
● “उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म',
अर्थात् कछुआ।
क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर
चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)',
तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के
विकास को दर्शाया।”
●“तीसरा था 'वराह' अवतार,
यानी सूअर।
जिसका मतलब वे जंगली जानवर,
जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है।
बेटे ने आँखें फैलाते हुए सहमति जताई...
● “चौथा अवतार था 'नृसिंह',
आधा मानव,आधा पशु।
जिसने दर्शाया जंगली जानवरों
से बुद्धिमान जीवों का विकास।”
● “पाँचवें 'वामन' हुए,
बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था।
क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है ?
क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे-
होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो
सेपिअंस (मानव),और होमो सेपिअंस
ने विकास की लड़ाई जीत ली।”
बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के
स्तब्ध रह गया...
माँ ने बोलना जारी रखा –
● “छठा अवतार था 'परशुराम',
जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी)
की ताकत थी।
वे दर्शाते हैं उस मानव को,
जो गुफा और वन में रहा..
गुस्सैल और असामाजिक।”
● “सातवां अवतार थे,
'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम',
सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति।
जिन्होंने समाज के नियम बनाए और
समस्त रिश्तों का आधार।”
● आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण',
राजनेता,राजनीतिज्ञ,प्रेमी।
जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द
लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक
ढाँचे में रहकर कैसे फला-फूला जा
सकता है।”
बेटा सुनता रहा,
चकित और विस्मित...
● “नवां अवतार थे 'महात्मा बुद्ध',
वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव
के सही स्वभाव को खोजा।
उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम
खोज की पहचान की।”
● “..और अंत में दसवां अवतार
'कल्कि' आएगा।
वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो..
वह मानव,जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम
होगा।”
बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता
रह गया,,
अंत में वह बोला –
“यह अद्भुत है माँ..
हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”
वेद,पुराण,ग्रंथ,उपनिषद इत्यादि सब
अर्थपूर्ण हैं।
सिर्फ आपका देखने का नज़रिया होना
चाहिए।
फिर चाहे वह धार्मिक हो या वैज्ञानिकता...!
शान्ताकारं भुजग
शयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगन सदृशं
मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं
योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं
सर्वलोकैकनाथम्॥
"🙏🌼🌺 #ॐ_नमो_नारायणाय🌺🌼🙏"
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#༺꧁🙏🏼 जय श्री राधे कृष्णा ग्रुप *🙏🏼 ꧂༻ #🙏🏻 मेरे भगवान 🙏🏻 #🎵 राधा-कृष्ण भजन 🙏 #🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स #Radhe Radhe jii 🙏
: _*आशा नाम नदी मनोरथजला*_
_*तृष्णातरंगाकुला,*_
_*रागग्राहवती वितर्कविहगा*_
_*धैर्यद्रुमध्वंसिनी।*_
_*मोहावर्तसुदुस्तरातिगहना*_
_*प्रोत्तुंगचिन्तातटी,*_
_*तस्या: पारगता विशुद्धमनसो*_
_*नन्दन्ति योगीश्वरा:॥*_
_*अर्थात्:--*_ आशा एक नदी है जिसमे मनोरथ रूपी जल है, तृष्णारूपी तरंगें उठ रही हैं, राग रूपी ग्राह है, वितर्करूपी पक्षी है, यह आशारूपी नदी धैर्यरूपी वृक्ष को उखाड़ फेंकनेवाली है। इसमें अज्ञानरूपी भंवर है, जिनके पर जाना कठिन है और जो अतिगहन है, इसके चिन्तारूपी तट बहुत ऊंचे हैं, उसके पार जाकर विशुद्ध मन वाले योगीराज ही आनन्दित होते हैं।
_*🌹सुप्रभात🌹*_
*🎊 तू ही तू 🎊*
*विचार पुष्प*
*संतान की परवरिश किसी साधना से कम नहीं होती है...और...माता पिता की सेवा किसी भी आराधना से कम नहीं होती है......*
*कोई भी माता-पिता यह नही कहते कि हमें..खुश रखना..वो तो यही कहते है कि ,बेटा तू सदा खुश रहना......*
*जीवन में रिश्ते बड़े नहीं होते, रिश्तों को निभाने वाले बड़े होते है.................*
*घड़ी की सुईयो की तरह जीवन में अपने आपसी रिश्तों को बनाए रखें......*
*हर पेड़..फल..दे यह जरुरी नही,किसी-किसी पेड़ की..छाया..भी बड़ा..सुकून..देती है.....*
*रिश्तों को निभानें में...विवशता...नहीं...भावनाएँ...होनी चाहिए......*
*💐शुभ प्रभात 💐*
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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2.4 भगवन्नाम महिमा भाग-1- द्वारा श्री स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती जी
नारायण, जो नाम है, वही भगवान हैं और जो भगवान हैं, वही नाम है। दोनों में परस्पर प्रीति है। असल में नाम और नामी दोनों में एक ही ईश्वर भरा हुआ है।
नाम शब्द का अर्थ होता है- अर्थात् “नमयति नामयति वा भगवन्तम्? यह भगवान को कोमल बनाकर हमारे हुदय में ले आता है अथवा भक्त के अहंकार को छुडाकर भगवान से मिला देता है । श्रीमद्भागवत में तो यहा तक लिखा है कि जैसे कोई बच्चे को नाम लेकर पुकारे 'मोहन’ और बच्चा दौड़कर आ जाये, वैसे कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण कहकर पुकारो और हाथ में बांसुरी लिये, कमर में करधनी बांधे, हाथ में कंगन और माथे पर गोरोचन का तिलक, गले में वनमाला, और वे दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ जायें, कृष्ण !
यह नाम कैसे लेना? जैसे प्यासा व्यक्ति पानी को पुकारता है - पानी, पानी, पानी या जैसे तृप्त व्यक्ति तृप्त होकर भगवान का नाम बोले और यदि वियोग की भावना हो तो प्यासे की तरह भगवान का नाम बोले। भगवान का नाम एक धुंधली सी छवि पहले आपके सामने लाकर खड़ा करेगा, पहले आभास होगा जैसे अंधकार में ही कोई चल-फिर रहा है। अगर आपके हृदय में अमावस्या की रात्रि के समान अंधकार है तो उसमें धीरे-धीरे श्रीकृष्णचन्द्र की किरणों का प्रकाश होता है। यही भगवान को कृष्णचन्द्र, रामचन्द्र कहने का भी अभिप्राय होता है। चन्द्रमा मन का देवता है और यह मन में प्यार जगाने वाला होता है ।
नाम-जप
पहली बात, जहाँ आप नाम-जप के लिए बैठे, वह स्थान पवित्र हो और एकांत हो।
दूसरी बात, जिस आसन पर बैठे वह भोजन का आसन न हो, सोने का आसन न हो, लोगों से गप्प हॉकने का आसन न हो; केवल भजन के लिये ही आसन हो ।
तीसरी बात, बैठें तो मानसिक रूप से पवित्र होकर बैठें और ऐसे आसन से बैठें कि हिलें-डोलें नहीं । स्थिरसुखमासनम् ! जिसमें हम पूरे आराम से बैठ सकें, उसका नाम "आसन” होता है । जितना प्रारम्भ किया जाय, उससे एक-दो मिनट बढ़ता जाये परन्तु उससे कम न हो । अगर रोगी अथवा वृद्ध न हो तो पीठ की रीढ़ सीधी रखनी चाहिये। एक स्थान पर एक दिन में बैठने के ढंग में भी विचार के संस्कार होते हैं । तो नारायण, हमको ईश्वर प्राप्त करना है और उस ईश्वर का अमुक नाम है और उसे ही नियमित रूप से ले । तुम्हारा लक्ष्य होवे, तब तो नाम का जप तुम्हारे मन को एकाग्र कर के समाधि में पहुँचायेगा और यदि ज्ञान तुम्हारा लक्ष्य होवे तो नाम का जप तुम्हारे चित्त को शुद्ध कर के महावाक्य के द्वारा आहित हृदय में ब्रह्माकार-वृत्ति कर देगा। और, यदि तुम्हें ब्रह्माकार-वृत्ति नहीं चाहिये और समाधि भी नहीं चाहिये, ज्ञान और कर्म का आवरण यदि तुम्हारे चित्त में नहीं है तो यह नाम-जप-जिसके नाम का जप होता है, उसके प्रति प्रीति उत्पन्न कर देता है । अब एक और बात आप को सुनाते हैं कि जिन लोगों का यह विचार है कि नाम-जप करने में जब एकाग्रता हो तब नाम का फल होता है, वे लोग नाम की महिमा को कम जानते हैं ।
यहाँ तक कि भागवत का तो कहना है कि, ज्ञान से जपो, चाहे अज्ञान से जपो,
जैसे अनजांने में भी छूने पर आग जला देती है, इसी प्रकार अनजाने में भी लेने पर यह नाम पाप-राशि को भस्म कर देता है। नाम पाप को मिटाने में जितना समर्थ है, उतना पाप कोई पापी कर ही नहीं सकता। हम केवल नामोच्चारण करते हैं, सो भी ईश्वर की कृपा से, ईश्वर के अनुग्रह से। वही यहाँ बैठकर हमारे मुँह से नाम की प्रेरणा देता है तब नाम का उच्चारण होता है। इसलिये जब नाम के उच्चारण में भी ईश्वर हेतु है, तो नाम के फल-दान में ईश्वर हेतु होगा-ही-होगा। अत: नाम का फल स्वातन्येण ईश्वर देता है, उसमें हमारी श्रद्धा का कोई उपयोग नहीं है। श्रद्धा इस बात की सूचक है कि शीघ्र अति शीघ्र ईश्वर की कृपा होगी। परन्तु, नाम का फल ईश्वर भी नहीं, नाम का फल तो नाम ही देता है - नाम पर विश्वास करने वाले लोग ऐसा मानते हैं। जैसे बूँद-बूँद अमृत गिर रहा हो, तो अमृत की प्रत्येक बूँद हमारे अमृतत्व और स्वाद को, रस को बढ़ाती है; इसी प्रकार यह जो हमारी जिह्वा, कण्ठ में भगवान का नाम आता है, यह नाम नहीं है, क़ृष्ण, क़ृष्ण क़ृष्ण - यह अमृत की बूँद है और न इसमें एकाग्रता की जरूरत है और न इसमें श्रद्धा की बाध्यता है। यह ईश्वर की शक्ति, ईश्वर के अनुग्रह से ही हमारा कल्याण करता है ।
एक और बात इसके सम्बन्ध में सुनाता हूँ, यदि आप नाम से अंत:करण की शुद्धि चाहते हैं और ज्ञान चाहते हैं तो नाम अपने अर्थ को प्रकाशित करेगा । नाम में प्रकाशकत्व है। प्रकाशकत्व कैसे है ? 'रूमाल लाओ” यह कहने पर आपके मन में “रूमाल” नाम की वस्तु प्रकाशित होती है । नाम अर्थ का प्रकाशक होता है, इसलिये नाम ज्ञान का जनक होता है, परन्तु, यदि आपको केवल अर्थ ही चाहिये, नाम नहीं चाहिये, तो नाम अपना अर्थ देकर लुप्त हो जायेगा ।
अब आप प्रेम की बात देखो ! नाम जब प्रेमांश का दान करता है तो प्रेमांश में न तो ज्ञान के समान अद्वेत है और न समाधि के समान अभान है, उसमें दूसरी कोई चीज अच्छी नहीं लगती, इसलिये, भक्ति की पराकाष्ठा होने पर भी भक्त के मुख से नाम का उच्चारण होता रहेगा- कृष्ण कृष्ण । वह नाम का उच्चारण जब प्रेमदान करेगा तब तो नाम छूटेगा नहीं ! प्रेम और नाम बिलकुल एक भाव हैं, इसलिये उन लोगों को नाम का आनंद आ जाता है ।
समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परस्पर प्रभु अनुगामी ।।
क्रमस : भाग-2
#༺꧁🙏🏼 जय श्री राधे कृष्णा ग्रुप *🙏🏼 ꧂༻ #🙏भक्ति 🌺 #🙏भगवान की प्रेम कथाएं😇 #🙏 वृंदावन धाम #🌸 जय श्री कृष्ण






