
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
@k_r_kashyap
🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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🙏🌹 '' ऊं सूर्यदेवाय नमः '' 🌹🙏
अतुलनीय साहस और जज़्बे की कहानी: जब हौसले शारीरिक बाधाओं से बड़े हो गए! 🇮🇳🏹
रविवार के इस पावन दिन पर जानिए 'खेलो इंडिया पैरा गेम्स' की एक बेहद प्रेरणादायक खबर। तीरंदाजी के मैदान में दो ऐसी किशोरियों का आमना-सामना हुआ, जिनकी कहानी सुनकर हर कोई नतमस्तक हो जाए।
जम्मू-कश्मीर की बिना हाथों वाली (Armless) पैरालंपिक मेडलिस्ट शीतल देवी (18) ने ओडिशा की पायल नाग (17) को हराकर लगातार अपना दूसरा गोल्ड मेडल जीता है। पायल बचपन में करंट लगने के कारण अपने चारों अंग खो चुकी थीं और अब कृत्रिम पैरों (Prosthetic legs) के सहारे तीरंदाजी करती हैं।
मुकाबले की मुख्य बातें:
रोमांचक फाइनल: पायल ने शुरुआत में शानदार प्रदर्शन करते हुए बढ़त बनाई, लेकिन शीतल ने जोरदार वापसी करते हुए यह मैच 109-103 से अपने नाम कर लिया।
आस्था और विश्वास: अपनी जीत के बाद शीतल ने कहा, "मैं माता रानी की आभारी हूँ जिनके आशीर्वाद से मैंने अपना दूसरा गोल्ड जीता।"
अतुलनीय संघर्ष: पायल ने हवा के तेज़ बहाव और अपने कृत्रिम पैर में हुए नए बदलावों के बावजूद सिल्वर मेडल जीतकर अपनी हिम्मत का लोहा मनवाया।
अन्य गौरवशाली विजेता:
40 वर्षीय राकेश कुमार और 30 वर्षीय ज्योति बालियान ने भी अपने-अपने इवेंट में स्वर्ण पदक जीते।
झारखंड के विजय सुंडी और हरियाणा की पूजा ने भी रिकर्व ओपन में गोल्ड मेडल हासिल किया।
इन सभी खिलाड़ियों के अदम्य साहस को हमारा शत-शत नमन! यह साबित करता है कि अगर मन में सच्ची लगन और ईश्वर पर विश्वास हो, तो कोई भी शारीरिक बाधा आपको लक्ष्य से नहीं भटका सकती।
✨ अगर इन बेटियों के हौसले ने आपको भी प्रेरित किया है, तो इस पोस्ट को शेयर करें और कमेंट में 'जय हिंद' जरूर लिखें! ✨
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💎 जीवन के अनमोल नियम (भाग 2): चरित्र और श्रेष्ठ मानसिकता 💎
कल हमने स्वास्थ्य के नियमों की बात की थी। आज जानते हैं कि अपनी मानसिकता और चरित्र को कैसे श्रेष्ठ बनाया जाए:
1️⃣ समय और सत्य का महत्त्व: समय व्यर्थ न गँवाएं। नियमित रूप से अपना काम करें। हमेशा सच बोलें, किसी लालच या धमकी में आकर झूठ का सहारा न लें।
2️⃣ स्वावलंबन और साहस: अपना काम स्वयं करें, इससे मनोबल बढ़ता है। किसी भी मुश्किल या परिस्थिति से डरें नहीं, बल्कि हिम्मत से उसका सामना करें।
3️⃣ दूसरों का सम्मान: किसी का तिरस्कार, उपेक्षा या हँसी-मज़ाक कभी न करें। न किसी की निंदा करें और न सुनें।
4️⃣ ईमानदारी: चोरी कभी न करें। यदि किसी की वस्तु मांग कर लाएं, तो काम पूरा होते ही उसे सुरक्षित और तुरंत वापस लौटा दें।
5️⃣ प्रार्थना और संतुष्टि: नियमित रूप से भगवान की प्रार्थना करें, इससे अपार आत्मबल मिलता है। दूसरों की चीज़ों को देखकर ललचाएं नहीं, सदा संतुष्ट और प्रसन्न रहें।
6️⃣ मन के स्वामी बनें: अपने मन के गुलाम न बनें। छोटी-मोटी स्वार्थी इच्छाओं के लिए किसी का बुरा न करें। अपने से कमज़ोर को कभी न सताएं।
(क्रमशः... कल हम जानेंगे 'सामाजिक व्यवहार और शिष्टाचार' के नियम।)
✨ क्या आप सहमत हैं कि प्रार्थना से मनोबल बढ़ता है? अपने विचार साझा करें! 🙏
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🌿 जीवन के अनमोल नियम (भाग 1): स्वास्थ्य और दिनचर्या 🌿
जीवन में सुखी रहने का पहला मंत्र है— 'स्वस्थ शरीर और शुद्ध दिनचर्या'। हमारे शास्त्रों और बड़े-बुजुर्गों ने दैनिक जीवन के लिए कुछ बहुत ही उपयोगी नियम बताए हैं:
1️⃣ सफाई सर्वोपरि: जहाँ रहते हैं, उस स्थान को और आस-पास की जगह को हमेशा साफ रखें। हाथ-पैर के नाखून बढ़ने पर काटें, उनमें मैल न भरने दें।
2️⃣ स्नान और जल का नियम: कहीं बाहर से या कड़ी धूप से आने पर तुरंत पानी न पिएं और न ही तुरंत स्नान करें। 15 मिनट विश्राम करें, पसीना सूखने दें, और हो सके तो थोड़ा गुड़ या मिश्री खाकर ही जल ग्रहण करें।
3️⃣ पहनावा कैसा हो? बहुत कसे हुए और कृत्रिम (नायलॉन आदि) कपड़ों से बचें। ढीले-ढाले सूती वस्त्र स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम होते हैं। त्वचा के स्वाभाविक सौंदर्य को बनाए रखें, अत्यधिक केमिकल वाले कॉस्मेटिक्स से बचें।
4️⃣ पैरों और आँखों का ध्यान: सुबह हरी घास पर नंगे पैर टहलें। बहुत ऊँची एड़ी या तंग जूते न पहनें। पढ़ते समय ध्यान रखें कि रोशनी न तो बहुत तेज़ हो और न ही बहुत कम। लेटकर या झुककर न पढ़ें।
5️⃣ सादा जीवन: जितना सादा भोजन और सादा रहन-सहन रखेंगे, उतने ही स्वस्थ रहेंगे।
(क्रमशः... कल हम बात करेंगे 'चरित्र और श्रेष्ठ मानसिकता' के नियमों पर।)
✨ इनमें से आप किस नियम का रोज़ पालन करते हैं? कमेंट में बताएं! 👇
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: 🗣️ दुनिया की सबसे अच्छी और सबसे बुरी चीज़ क्या है? 🗣️
(एक कहानी जो आपकी सोच बदल देगी...)
एक समय की बात है, एक अत्यंत समृद्ध और शक्तिशाली राजा था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसकी एक बहुत बड़ी खामी थी— उसकी कड़वी ज़बान! वह बात-बात पर लोगों का अपमान करता और ताने मारता था। उसका मानना था कि कठोर बोलना ही उसकी ताकत है।
एक दिन दरबार में बैठे-बैठे राजा ने एक अजीब घोषणा की— "कल सुबह तुम सब दुनिया की सबसे बुरी चीज़ लेकर आओ।" अगले दिन कोई गोबर लाया, कोई कीचड़, तो कोई सड़े हुए फल। तभी एक वृद्ध, बुद्धिमान व्यक्ति दरबार में आया। उसने कपड़ा खोला और एक मृत व्यक्ति की 'जीभ' दिखा दी।
राजा क्रोधित हो गया! "यह कैसी मूर्खता है? यह तो केवल जीभ है!"
वृद्ध ने शांत स्वर में कहा— "महाराज, यही संसार की सबसे बुरी चीज़ है। तलवार का घाव समय के साथ भर जाता है, पर जीभ से निकली कड़वी बात हृदय पर ऐसा घाव करती है जो जीवन भर नहीं भरता। सारे विवाद, अपमान और कलह इसी जीभ से जन्म लेते हैं।" राजा रात भर सो नहीं सका। अगले दिन उसने फिर आदेश दिया— "आज दुनिया की सबसे अच्छी चीज़ लेकर आओ।" दरबारी घी, शहद और फूल लेकर आए। पर वह वृद्ध व्यक्ति फिर से वही 'जीभ' लेकर आ गया! राजा चौंक गया— "कल यह सबसे बुरी थी, आज सबसे अच्छी कैसे हो गई?"
वृद्ध मुस्कुराया और बोला— "महाराज! जब यह जीभ कड़वा बोलती है, तो संबंध तोड़ देती है। लेकिन जब यही जीभ प्रेम, सम्मान और सत्य बोलती है, तो दिलों को जोड़ देती है। इसी से भगवान के भजन गाए जाते हैं और आशीर्वाद दिए जाते हैं। यह अमृत भी है और विष भी—निर्भर इस पर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं।"
राजा की आंखें खुल गईं। उसने अपनी कड़वी वाणी के लिए क्षमा मांगी और हमेशा विनम्र बोलने का प्रण लिया।
✨ इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? ✨
✅ जीभ छोटी होती है, पर उसकी शक्ति अपार है।
✅ कड़वे शब्द दिल तोड़ते हैं, और मीठे शब्द दिल जोड़ते हैं।
✅ बोलने से पहले हमेशा सोचें, क्योंकि कमान से निकला तीर और मुँह से निकले शब्द कभी लौटकर नहीं आते।
🌸 अगर आपको यह कहानी अच्छी और सच्ची लगी हो, तो कृपया लाइक और शेयर जरूर करें। आपके मीठे शब्द कमेंट बॉक्स में आमंत्रित हैं! 🙏
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🌙 अनुभूति की वंशीध्वनि: क्या भगवान को पाना इतना सरल है? 🌙
(भक्ति से सद्गति - एक अलौकिक कथा)
वंशीलाल की देह यात्रा पूर्ण हुए कुछ दिन बीत चुके थे, पर वृंदावन का वातावरण अब भी वैसा ही भावमग्न था— जैसे किसी ने अदृश्य रूप में प्रेम का दीप जला दिया हो।
उसी वृंदावन में एक युवक था— दीप। वह सेवा तो करता था, पर उसके भीतर एक गहरा प्रश्न था— "क्या सच में कोई प्रभु को पा सकता है? क्या पूर्ण समर्पण इतना सरल है?"
एक रात्रि, अशांत मन और रिक्त हृदय के साथ वह यमुना तट पर गया। चंद्रमा की चाँदनी जल पर बिखरी थी। दीप वहीं बैठ गया और पुकार उठा— "हे कृष्ण… यदि वंशीलाल सच में तुम्हें पा गया, तो क्या तुम किसी और को भी पुकारते हो?"
चारों ओर शांति थी। तभी… बहुत सूक्ष्म, बहुत मधुर स्वर गूंजा— जैसे दूर से वंशी की धुन बह रही हो। स्वर न बाहर था, न भीतर— दोनों के मध्य कहीं था। दीप ने जैसे ही नेत्र बंद किए, उसे लगा कदम्ब के पेड़ के नीचे पीताम्बर धारी, होठों पर वंशी लिए कोई बैठा है!
दीप का हृदय काँप उठा— "प्रभु…?"
वहाँ कोई शब्द नहीं था, पर एक स्पष्ट अनुभूति थी— "जो समर्पित हुआ, वह मुझमें है। जो खोज रहा है, वह मेरे पास है।"
दीप की आँखों से अश्रु बह निकले। उसे वंशीलाल की बात याद आ गई— "प्रभु को देखना नहीं पड़ता, प्रभु को मानना पड़ता है।" दीप ने भूमि पर दंडवत प्रणाम किया और रोते हुए कहा— "मैं नहीं जानता कैसे समर्पित होना है, पर आज से मैं आपका विरोध नहीं करूँगा।"
उसी क्षण उसके भीतर एक अद्भुत हल्कापन भर गया— जैसे किसी ने जन्मों का बोझ उतार दिया हो!
अगली सुबह वृंदावन के लोग हैरान थे। दीप बदल गया था। उसकी आँखों में वही असीम शांति थी, जो वंशीलाल की आँखों में हुआ करती थी।
किसी ने पूछा— "तुम्हें क्या मिल गया?"
दीप मुस्कुराया और बोला— "मुझे कुछ नहीं मिला… बस मैंने अपना विरोध छोड़ दिया।"
उस रात कदम्ब तले वंशी फिर बजी... और वृंदावन का एक और हृदय उस दिव्य ध्वनि को पहचान चुका था।
📙✨ कथा का संदेश: ✨
सद्गति केवल अंत नहीं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बनती है। एक भक्त का समर्पण दूसरे हृदय में जागरण का कारण बनता है।
प्रभु की वंशी सबको पुकारती है— पर उसे वही सुन पाता है, जो प्रश्नों से आगे बढ़कर 'समर्पण' की ओर झुक जाए।
🌸 जय श्री कृष्णा! 🌸
(अगर इस कथा ने आपके हृदय को छुआ हो, तो कृपया लाइक, शेयर और कमेंट में 'राधे-राधे' जरूर लिखें।)
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शीर्षक: 🚩 क्या अर्जुन को उर्वशी का श्राप केवल एक कोरी कल्पना है? 🚩
(महाभारत का एक अनसुना मनोवैज्ञानिक सच!)
देवताओं के राजा इंद्र की 'इंद्रपुरी' (स्वर्ग) में जीवन का मुख्य आधार ही 'भोग' था। वहाँ सुरा और सुंदरी वर्जित नहीं माने जाते थे। अप्सराओं के साथ संबंध कोई अत्याचार नहीं, बल्कि वहाँ के उन्मुक्त जीवन के उपभोग का हिस्सा थे।
इसी वातावरण में जब स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ अप्सरा 'उर्वशी' का मन अर्जुन पर आ गया, तो वह स्वयं अपना प्रस्ताव लेकर अर्जुन के पास गई।
अब ऐसा नहीं था कि अर्जुन हमेशा से वीतरागी या 'दूध के धुले' थे। इससे पहले जब वे घर से निकले थे, तो कई विवाह करके अंत में सुभद्रा के साथ इंद्रप्रस्थ लौटे थे। पर इस बार का अर्जुन पहले से अलग था! इस बार वह लंबी तपस्या करके साक्षात 'महादेव' से साक्षात्कार कर चुका था। उसकी चेतना का स्तर बहुत ऊँचा उठ चुका था। इसलिए उसने उर्वशी के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि— "मुझे आपमें अपनी माता कुंती का स्वरूप दिखता है।"
उर्वशी, जिसने जीवन भर स्वर्ग में चारों तरफ केवल 'भोग' ही देखा था, यह यकीन ही नहीं कर पाई कि कोई पुरुष उसके जैसी अप्सरा को मना कर सकता है! लाख अनुरोध के बाद भी जब अर्जुन नहीं माने, तो उर्वशी के मन में यही आया कि यह 'नपुंसक' है। क्योंकि उसने आज तक किसी सक्षम पुरुष को अप्सरा को ठुकराते देखा ही नहीं था।
💡 यहाँ एक बहुत गहरा मनोविज्ञान है:
जो लोग अय्याशी में डूबे होते हैं, वे यह सोच ही नहीं पाते कि कोई सर्वगुण संपन्न व्यक्ति स्वेच्छा से भी वासना से दूर रह सकता है।
ठीक ऐसा ही राजसूय यज्ञ के समय हुआ था! जब पितामह भीष्म ने श्रीकृष्ण की अग्रपूजा की बात कही, तो भड़के हुए शिशुपाल ने भीष्म पितामह को 'नपुंसक' कह दिया था। क्योंकि शिशुपाल जैसा विलासी व्यक्ति यह मान ही नहीं सकता था कि कोई पुरुष स्वेच्छा से जीवन भर अखंड ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है।
अज्ञातवास और 'बृहन्नला' का सच:
तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो अर्जुन को कोई श्राप नहीं मिला था! अज्ञातवास में 'बृहन्नला' बनने के पीछे ठोस व्यावहारिक कारण थे:
1️⃣ अर्जुन ने स्वर्ग में गंधर्व चित्रसेन से संगीत और नृत्य की विधिवत शिक्षा ली थी, जो भेष बदलने के काम आई।
2️⃣ सबसे बड़ा कारण: एक महान योद्धा होने के कारण अर्जुन के शरीर पर शूरवीरता और चोटों के अनगिनत निशान थे। साड़ी और स्त्री भेष धारण करने से योद्धा के वे सारे निशान आसानी से छिप जाते थे।
अतः, श्राप वाली बात केवल एक कल्पना या बात का बतंगड़ मात्र प्रतीत होती है। सत्य तो अर्जुन का आत्म-संयम और उनकी बुद्धिमानी थी।
✨ हमारे फेसबुक परिवार से विनती है कि अगर हमारी यह जानकारी और विश्लेषण आपको अच्छा लगा हो, तो लाइक, शेयर और कमेंट जरूर करें। आपके विचार कमेंट बॉक्स में आमंत्रित हैं! धन्यवाद। 🙏
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