
❣️𝑲𝒖𝒎𝒂𝒓💞 𝑹𝒂𝒖𝒏𝒂𝒌💞 𝑲𝒂𝒔𝒉𝒚𝒂𝒑❣️
@k_r_kashyap
🚩भगवा की ताकत के आगे, ब्रम्हांड भी सर झुकाता हैं,
भगवान श्री हरि का दिव्य रूप और शरणागति की महिमा ✨
क्या आपने कभी भगवान विष्णु के हाथों में सजे शंख, चक्र, गदा और पद्म के गहरे अर्थ को समझा है? आइए, आज इस अद्भुत दोहे के माध्यम से प्रभु के मनमोहक रूप और सच्ची भक्ति की शक्ति को जानें... 👇
🌺 "शंख चक्र गदा पद्म कर, पीतांबर की ओट।
शरण आए जो प्रेम सों, लगे न दुख की चोट।" 🌺
🪷 पहला पद: भगवान का अलौकिक रूप
प्रभु के चार हाथों में सुशोभित ये चार दिव्य आयुध केवल हथियार नहीं, बल्कि जीवन और सृष्टि के गहरे आयाम हैं:
🐚 शंख: ज्ञान और पवित्र ध्वनि का प्रतीक।
⚙️ चक्र: काल (समय) और न्याय का प्रतीक।
🛡️ गदा: असीम शक्ति और अहंकार के दमन का प्रतीक।
🌸 पद्म (कमल): पवित्रता, सौंदर्य और सृष्टि का प्रतीक।
💛 पीतांबर की ओट: भगवान विष्णु सदैव ज्ञान और पवित्रता के प्रतीक 'पीले वस्त्र' (पीतांबर) धारण करते हैं। प्रभु इसी दिव्य आभा में सुशोभित होकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं।
🙏 दूसरा पद: सच्ची शरणागति और सुरक्षा
शरण आए जो प्रेम सों: जब कोई व्यक्ति अपना सब कुछ छोड़कर, बिना किसी डर या दिखावे के, पूरी तरह से प्रेम और सच्चे हृदय से भगवान की शरण में आ जाता है...
🛡️ लगे न दुख की चोट: ...तो ऐसे भक्त को जीवन का कोई भी दुख, कष्ट या विपत्ति छू भी नहीं सकती! प्रभु स्वयं ढाल बनकर हर परिस्थिति में उसके रक्षक बन जाते हैं।
💡 सार (The Essence):
जिस भगवान के हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं, और जो दिव्य पीतांबर धारण किए हुए हैं, जो भी व्यक्ति उनके पास निश्छल प्रेम के साथ आता है, उसे जीवन में फिर कभी कोई दुःख नहीं पहुँच सकता। श्री हरि की भक्ति परम कल्याणकारी है और सभी कष्टों का अंत करने वाली है।
प्रेम से बोलिए - राधे राधे 🙏🌺
. 🪷।। राधे राधे ।।🪷
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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✨ उबलते तेल की सजा और भगवान के दर्शन की जिद: एक भक्त की रोंगटे खड़े कर देने वाली कथा! ✨
क्या आपने महाभारत काल के उस योद्धा की कहानी सुनी है, जिसने भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए उबलते तेल के कड़ाहे में छलांग लगा दी थी? आइए, चम्पकपुरी के राजकुमार सुधन्वा की इस अद्भुत भक्ति-कथा को पढ़ें... 👇
⚖️ १. पिता का कठोर आदेश और धर्म-संकट
चम्पकपुरी के महाराजा हंसध्वज भगवान के अनन्य भक्त थे। जब पांडवों का अश्वमेध घोड़ा उनके राज्य में आया, तो राजा ने श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा में उसे रोक लिया। युद्ध की घोषणा हुई और राजा का सख्त आदेश था— "जो योद्धा समय पर रणभूमि में नहीं पहुंचेगा, उसे उबलते तेल के कड़ाहे में डाल दिया जाएगा।" राजा के छोटे पुत्र सुधन्वा अपनी पत्नी के आग्रह के कारण थोड़ा विलंब से पहुंचे। अनुशासन और मर्यादा के पक्के पिता ने बिना हिचकिचाहट अपने ही पुत्र को खौलते तेल में डालने का आदेश दे दिया!
🔥 २. खौलते तेल में 'हरि' नाम का चमत्कार
मौत सामने थी, पर सुधन्वा तनिक भी नहीं घबराए। उन्होंने प्रभु 'हरि' का स्मरण किया और उबलते तेल के कड़ाहे में छलांग लगा दी! उनकी अटूट भक्ति के प्रताप से वह खौलता हुआ तेल एकदम शीतल हो गया। राजगुरु शंख को जब संदेह हुआ, तो उन्होंने परीक्षण के लिए तेल में एक नारियल फिंकवाया, जो भयंकर आवाज के साथ फट गया। यह देखकर गुरु को अपनी भूल का अहसास हुआ और पूरी सभा भक्त सुधन्वा के आगे नतमस्तक हो गई।
⚔️ ३. श्रीकृष्ण को बुलाने की जिद: अर्जुन से महासंग्राम
कड़ाहे की अग्निपरीक्षा से सुरक्षित निकलकर सुधन्वा रणभूमि में पहुंचे। वहां उन्होंने अपने पराक्रम से पूरी पांडव सेना के छक्के छुड़ा दिए। सुधन्वा का लक्ष्य जीतना नहीं था, वे जानते थे कि यदि अर्जुन संकट में पड़ेंगे, तो उनके रक्षक साक्षात श्रीकृष्ण को आना ही पड़ेगा! और अंततः अर्जुन की रक्षा के लिए भगवान को रणभूमि में प्रकट होना पड़ा।
🏹 ४. टूट गए अर्जुन के बाण: जब टकराईं दो महान प्रतिज्ञाएं
रणभूमि में क्रोधित अर्जुन ने तीन बाणों से सुधन्वा का सिर काटने की भयंकर प्रतिज्ञा कर ली। इधर, सुधन्वा ने भी संकल्प लिया कि वे उन तीनों बाणों को काट देंगे। भगवान ने स्वयं अपने पुण्यों का बल अर्जुन के बाणों को दे दिया, फिर भी सुधन्वा के 'एकपत्नीव्रत' और परम भक्ति के तेज ने अर्जुन के अचूक बाणों के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए!
✨ ५. प्रभु के चरणों में शीश और परम गति की प्राप्ति
सुधन्वा ने बाण काटकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की, लेकिन तीसरे बाण के अग्रभाग में स्वयं भगवान सूक्ष्म रूप में स्थित थे, जिसने सुधन्वा का मस्तक काट दिया। सुधन्वा का कटा हुआ शीश सीधा भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में जा गिरा। उनके मुख से एक दिव्य ज्योति निकली और साक्षात भगवान में विलीन हो गई।
💡 शिक्षा: सच्ची भक्ति में वो असीम शक्ति है जो उबलते तेल को भी चंदन सा शीतल कर सकती है। भगवान अपने भक्तों की निष्काम पुकार जरूर सुनते हैं।
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✨ सच्ची भक्ति का चमत्कार: जब दिल्ली के एक दर्जी का सिला तकिया सीधा भगवान जगन्नाथ के रथ पर पहुँच गया! ✨
भक्ति में इतनी शक्ति है कि मीलों दूर बैठा भक्त भी अपने भगवान को कुछ अर्पण करे, तो वह सीधा उनके श्रीचरणों में पहुँच जाता है। आइए, करीब 400 साल पुरानी एक अद्भुत और सत्य घटना पढ़ते हैं... 👇
🪡 १. कुरूप शरीर, लेकिन हृदय में साक्षात नारायण
लगभग चार सौ वर्ष पूर्व दिल्ली में परमेष्ठी नाम के एक दर्जी रहते थे। शरीर से वे कुबड़े और कुरूप थे, लेकिन उनका हृदय भक्ति और पवित्रता से भरा था। उनकी सिलाई कला इतनी निपुण थी कि स्वयं बादशाह भी उन्हीं से वस्त्र सिलवाते थे। उनका हाथ भले ही सुई-धागे पर चलता था, पर मन हमेशा भगवान के नाम-जप में लीन रहता था।
👑 २. बादशाह का आदेश और भाव-समाधि
एक बार बादशाह ने परमेष्ठी को कीमती रत्नों और मखमल से दो शानदार तकिए बनाने का आदेश दिया। जब तकिए तैयार हुए, तो परमेष्ठी को लगा— "इतनी सुंदर वस्तु तो केवल मेरे प्रभु जगन्नाथ के ही योग्य है!" उसी समय पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा चल रही थी। परमेष्ठी दिल्ली में बैठे-बैठे भाव-समाधि में चले गए और मानसिक रूप से रथयात्रा का दर्शन करने लगे।
✨ ३. एक अद्भुत चमत्कार और कालकोठरी की सजा
भाव-समाधि में परमेष्ठी ने देखा कि प्रभु के रथ पर बिछा वस्त्र थोड़ा फट गया है। उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने भावावेश में आकर वह रत्नजटित तकिया प्रभु को अर्पित कर दिया। आँखें खुली तो चमत्कार हो चुका था! वह तकिया वास्तव में जगन्नाथपुरी में प्रभु के रथ पर पहुँच गया था और दिल्ली की दुकान से गायब हो गया। जब बादशाह ने तकिया माँगा, तो परमेष्ठी ने निडर होकर पूरा सच बता दिया। लेकिन अभिमानी बादशाह ने इसे चोरी समझकर परमेष्ठी को बेड़ियों में जकड़कर जेल में डाल दिया।
🛡️ ४. जब भक्त के लिए प्रभु ने काटी बेड़ियाँ!
भगवान अपने सच्चे भक्त का अपमान कैसे सह सकते थे? रात के अंधेरे में कारागार में स्वयं भगवान ने दर्शन देकर परमेष्ठी की बेड़ियाँ काट दीं। उसी रात भगवान ने बादशाह को भी स्वप्न में दर्शन दिए और अपने निर्दोष भक्त को सताने के लिए उसे कड़ी फटकार लगाई। सुबह उठते ही भयभीत बादशाह दौड़ता हुआ आया, परमेष्ठी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और उन्हें पूरे सम्मान के साथ आज़ाद किया।
🚶♂️ ५. मान-सम्मान से विरक्ति और सच्चा वैराग्य
इस घटना के बाद पूरे राज्य में परमेष्ठी की जय-जयकार होने लगी। लेकिन एक सच्चे भक्त को झूठी ख्याति से क्या लेना-देना? अपनी मान-प्रतिष्ठा और जय-जयकार देखकर परमेष्ठी को ग्लानि होने लगी। दिखावे की इस दुनिया से दूर रहने के लिए उन्होंने उसी समय दिल्ली छोड़ दी और अपना शेष जीवन एकांत में प्रभु के भजन में बिता दिया।
💡 सार: ईश्वर केवल हमारे भाव के भूखे हैं। यदि हमारा प्रेम और समर्पण सच्चा है, तो भगवान हमारे हर कष्ट को हरने के लिए दौड़े चले आते हैं।
प्रेम से बोलिए - राधे राधे 🙏🌺
जय जगन्नाथ! 🪷
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✨ वैशाख मास विशेष: तुलसी जल दान की अद्भुत महिमा और एक कुत्ते के उद्धार की कथा! ✨
वैशाख की चिलचिलाती धूप में जहाँ प्रकृति तपने लगती है, वहीं श्रीहरि के भक्तों के लिए यह मास अपार कृपा पाने का एक सुनहरा अवसर लेकर आता है। आइए जानते हैं कि इस पावन महीने में तुलसी माता को जल क्यों चढ़ाना चाहिए और शास्त्रों में इसकी क्या महिमा है... 👇
🌿 १. वैशाख में तुलसी जल दान का महत्व
गर्मी के कारण वैशाख मास में सूर्य का ताप बहुत बढ़ जाता है। ऐसे में भगवान विष्णु (श्रीहरि) को शीतलता प्रदान करने के लिए, उनसे अभिन्न स्वरूप 'तुलसी जी' को जल दान करने से प्रभु अत्यंत प्रसन्न होते हैं। तुलसी जी श्रीकृष्ण की प्रेयसी हैं; उनकी कृपा के बिना हम भगवान की सेवा का अवसर प्राप्त नहीं कर सकते।
📜 २. शिवजी और पद्मपुराण के अनुसार तुलसी की महिमा
पद्मपुराण में भगवान शिव अपने पुत्र कार्तिकेय से कहते हैं- "समस्त पत्रों और पुष्पों में तुलसी सर्वश्रेष्ठ हैं।" जो व्यक्ति भक्ति भाव से प्रतिदिन तुलसी मंजरी अर्पण कर श्रीहरि की आराधना करता है, उसके पुण्यों का वर्णन स्वयं महादेव भी नहीं कर सकते। जहाँ तुलसी का वन होता है, वहीं साक्षात श्री गोविंद, माता लक्ष्मी, ब्रह्मा और सभी देवता वास करते हैं।
💧 ३. साढ़े तीन करोड़ तीर्थों का वास
ब्रह्मवैवर्त पुराण और महर्षि वेदव्यास जी के अनुसार, तुलसी देवी के मूल (जड़) में पृथ्वी के साढ़े तीन करोड़ तीर्थ निवास करते हैं। गंगा आदि समस्त पवित्र नदियां और ब्रह्मा, विष्णु, महेश सर्वथा तुलसी दल में विराजमान रहते हैं। केवल तुलसी देवी के नाम उच्चारण मात्र से ही पापों का नाश होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
🐕 ४. एक कुत्ते के परम उद्धार की अद्भुत कथा
शास्त्रों में तुलसी के मूल में बचे हुए जल के पान की भी अद्भुत महिमा है। एक बार एक वैष्णव जन तुलसी जी को जल चढ़ाकर गए। पीछे से एक भूखा कुत्ता आया और तुलसी के गमले की मिट्टी में पड़े उस जल को पी लिया। तभी एक बाघ ने उस कुत्ते पर हमला कर उसे मार दिया।
कुत्ते के पूर्व जन्म के पापों के कारण यमदूत उसे ले जाने आए, लेकिन तभी वहां विष्णुदूत प्रकट हो गए! विष्णुदूतों ने कहा- "यद्यपि यह पापी था, लेकिन मृत्यु से ठीक पहले इसने तुलसी के मूल का पवित्र जल पी लिया है। इसलिए इसके सारे पाप नष्ट हो चुके हैं।" वह कुत्ता तुरंत एक सुंदर दिव्य रूप धारण कर विष्णुदूतों के साथ वैकुंठ धाम चला गया।
🪨 ५. श्री शालिग्राम शिला की सेवा
तुलसी जी (श्रीमती राधारानी का स्वरूप) के साथ-साथ वैशाख में भगवान के शालिग्राम स्वरूप को भी जल अर्पण करने का विशेष महत्व है। चारों वेदों के अध्ययन से जो फल मिलता है, वह केवल शालिग्राम शिला की अर्चना और उनके चरणामृत का पान करने से प्राप्त हो जाता है।
💡 निष्कर्ष: तुलसी के दर्शन से पाप नष्ट होते हैं, जल दान से यमराज का भय दूर होता है, और उन्हें रोपने से कृष्ण भक्ति बढ़ती है। इसलिए इस वैशाख मास में नियमित रूप से तुलसी जी को जल अवश्य अर्पित करें।
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🌸 भोलेपन की जीत: जब 27 दिन तक भूखे भक्त के लिए साक्षात प्रकट हुए भगवान! 🌸
क्या आपने कभी सुना है कि किसी के अटूट विश्वास के कारण भगवान को स्वयं धरती पर आकर भोजन करना पड़ा? आइए पढ़ते हैं कमलावती नगरी के एक सीधे-सादे ग्वाले की यह हृदयस्पर्शी कथा... 👇
🐄 अनपढ़ गोपाल और उसकी सहज भक्ति
कमलावती नगरी में गोपाल नाम का एक बिल्कुल अनपढ़ और सरल ग्वाला रहता था। उसका पूरा दिन गाय चराने में बीतता और वह सहज भाव से हर पल 'राम-राम' जपता रहता। लोग अक्सर उसके इस भोलेपन का मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन एक बार एक सिद्ध संत ने उसका पक्ष लेते हुए कहा- "इसके नाम जप में वो शक्ति है कि इसे एक दिन सच्चे गुरु अवश्य मिलेंगे।"
📿 गुरु का एक वाक्य और जीवन का संकल्प
संत की बात से गोपाल के मन में गुरु से मिलने की गहरी तड़प उठ गई। एक दिन जब एक अन्य संत गाँव में पधारे, तो गोपाल ने उन्हें ही अपना गुरु मान लिया। उसकी प्रार्थना और सरलता देखकर संत ने उसे बस एक ही नियम दिया: "बेटा! जो कुछ भी खाना, पहले भगवान गोविंद को भोग लगाकर ही खाना।"
⏳ 27 दिन की कठिन परीक्षा: भूखा-प्यासा पर अडिग
अगले दिन जब गोपाल अपनी सूखी रोटियां लेकर खाने बैठा, तो उसने पूरी श्रद्धा से भगवान को पुकारा। उसे लगा भगवान खुद आकर उसके साथ खाएंगे। लेकिन जब साक्षात भगवान नहीं आए, तो उसने भी अन्न का एक दाना नहीं खाया। उसका सीधा सा तर्क था- "गुरु की आज्ञा है, बिना गोविंद के खाए मैं कैसे खा सकता हूँ?"
✨ भक्त के हठ के आगे झुके भगवान
इसी तरह राह देखते-देखते पूरे 27 दिन बीत गए! भूखा-प्यासा गोपाल सूखकर कांटा हो गया, शरीर दुर्बल हो गया, लेकिन उसका विश्वास हिमालय की तरह अडिग रहा। अंततः, एक भोले भक्त की निष्काम भक्ति और प्रेम भरे हठ के आगे भगवान को पिघलना ही पड़ा। प्रभु स्वयं वहां प्रकट हुए, अपने हाथों से गोपाल की रोटियाँ खाईं और उसे अपने दिव्य दर्शन देकर निहाल कर दिया!
💡 कहानी की सीख
जैसे ही गोपाल ने भगवान का जूठा प्रसाद ग्रहण किया, उसकी सारी शारीरिक और मानसिक थकान चमत्कारिक रूप से दूर हो गई। यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी बड़े पांडित्य, ज्ञान या धन-दौलत की नहीं, बल्कि एक बच्चे जैसे भोलेपन और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।
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#गोपाल_भाई: एक बच्चे के निश्चल विश्वास की अद्भुत कहानी ✨
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर तर्क और ज्ञान के पीछे भागते हैं, लेकिन भगवान तो केवल सच्चे और सरल मन के भूखे हैं। आइए, आज एक ऐसी ही दिल को छू लेने वाली पौराणिक कथा पढ़ते हैं... 🙏
📖 माँ की अनोखी सीख और नन्हे मोहन का डर 👩👦
एक छोटे से गाँव में एक गरीब विधवा ब्राह्मणी अपने छः साल के बेटे मोहन के साथ रहती थी। मोहन को पढ़ने के लिए घने जंगल के रास्ते से दो कोस दूर पाठशाला जाना पड़ता था। शाम को लौटते समय जंगल के सन्नाटे और अंधेरे से नन्हा मोहन बहुत डरता था।
गरीबी के कारण माँ नौकर तो नहीं रख सकती थी, इसलिए उसने भावुक होकर मोहन से कहा- "बेटा, डरना मत! जंगल में तेरा 'गोपाल भाई' रहता है। जब भी डर लगे, उसे पुकार लेना, वह तेरी रक्षा के लिए दौड़ा आएगा।" ❤️
🌟 जब पुकार सुनी 'गोपाल भाई' ने... 👦🧒
भोले मोहन ने माँ की बात पर सौ प्रतिशत विश्वास कर लिया। अगले दिन जब जंगल में उसे डर लगा, तो उसने व्याकुल होकर पुकारा- "गोपाल भाई, तुम कहाँ हो?"
अपने भक्त की पुकार सुनकर भगवान कृष्ण भला कैसे न आते? वे एक ग्वालबाल (चरवाहे) के रूप में प्रकट हुए और मोहन का हाथ पकड़कर उसे जंगल पार कराया। अब तो यह रोज़ का नियम बन गया। मोहन पुकारता और गोपाल भाई आकर उसके साथ खेलते हुए रास्ता पार कराते। 🤝
🥛 दूध के छोटे लोटे का बड़ा चमत्कार ✨
एक बार गुरुजी के घर श्राद्ध था। मोहन ने अपने गोपाल भाई से गुरुजी के लिए भेंट मांगी। भगवान ने उसे एक छोटा सा लोटा दूध दिया। पाठशाला में गुरुजी ने उस तुच्छ से लोटे को देखकर मोहन का उपहास किया।
लेकिन जैसे ही लोटे से दूध उड़ेलना शुरू किया, एक चमत्कार हुआ! 😮 बड़े-बड़े बर्तन भर गए, पर वह छोटा सा लोटा खाली ही नहीं हुआ। यह देखकर गुरुजी दंग रह गए और उन्हें मोहन की असाधारण भक्ति का अहसास हुआ।
🙌 सच्ची भक्ति की महिमा: गुरु को दर्शन 💫
गुरुजी ने मोहन के साथ जंगल जाकर गोपाल भाई को देखना चाहा, लेकिन उन्हें केवल एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। भगवान ने स्पष्ट किया कि वे मोहन के निष्कपट मन और अटूट विश्वास के कारण ही उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं।
अंत में, जब गुरुजी मोहन के घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि साक्षात् भगवान उस बूढ़ी ब्राह्मणी की गोद में बालक रूप में विराजमान हैं! 🙇♂️
💡 शिक्षा (The Moral):
भगवान को पाने के लिए बहुत ज्ञानी या धनी होना ज़रूरी नहीं है। वे तो बालक जैसी सरलता और सच्चे विश्वास से ही प्राप्त हो जाते हैं।❤️
💕 प्रेम से बोलो - राधे राधे 💕
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🚩 पत्थर से बहने लगा था खून! जानिए शनि शिंगणापुर की स्वयंभू मूर्ति के प्रकटीकरण की अलौकिक गाथा 🚩
जय श्री शनिदेव! 🙏
अहमदनगर (महाराष्ट्र) का एक छोटा सा गांव, शनि शिंगणापुर, आज पूरी दुनिया में विख्यात है। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान शनिदेव खुले आसमान के नीचे एक ऊँचे चबूतरे पर विराजमान हैं, और गाँव के घरों में आज भी दरवाजे नहीं लगते!
लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनिदेव की यह काली, पत्थरनुमा 5 फुट 9 इंच लंबी भव्य स्वयंभू मूर्ति यहाँ कैसे प्रकट हुई?
आज हम आपको ले चलते हैं 350 साल पुराने उस इतिहास में, जहाँ से यह चमत्कारी गाथा शुरू हुई:
🌊 वो प्रलयंकारी बाढ़ और 'पानसनाला':
लगभग साढ़े तीन सौ साल पहले, शिंगणापुर में ऐसी मूसलधार बारिश हुई जैसी पहले कभी नहीं देखी गई थी। गाँव के पास बहने वाला 'पानसनाला' उफान पर था। इसी बाढ़ के पानी में बहते हुए भगवान शनिदेव की यह श्याम वर्ण शिला आई और पड़ोस के ही एक बेर के पेड़ में अटक कर रुक गई।
🩸 जब शिला से बहने लगा 'खून':
बाढ़ कम होने पर चरवाहे (गोपाल) जब मवेशी चराने निकले, तो उन्हें बेर के पेड़ में फंसी यह विशाल काली शिला दिखी। उत्सुकतावश, उन्होंने एक लाठी की नोक से शिला को स्पर्श किया और कुरेदने लगे।
तभी एक भयानक चमत्कार हुआ! जैसे ही लाठी शिला पर लगी, उस स्थान से 'टप-टप' खून बहने लगा। पत्थर से रक्तस्राव होते देख लड़के बुरी तरह डर गए और भागकर गाँव वालों को बुला लाए। पूरा गाँव यह अजूबा देखकर सन्न रह गया।
💤 शनिदेव का स्वप्न-दृष्टांत और अनोखी शर्त:
उसी रात, शनिदेव गाँव के एक निष्ठावान भक्त के सपने में आए और कहा- 'मैं साक्षात शनिदेव हूँ। जो तुमने देखा वो सच है। मुझे वहाँ से उठाकर मेरी प्रतिष्ठापना करो।'
अगले दिन पूरा गाँव बैलगाड़ी लेकर मूर्ति लेने पहुँचा, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी मूर्ति टस से मस नहीं हुई।
शनिदेव फिर भक्त के सपने में आए और अपनी स्थापना के लिए दो अनोखी शर्तें रखीं:
1️⃣ मुझे उठाने वाले रिश्ते में सगे मामा-भांजे होने चाहिए।
2️⃣ जो बैलगाड़ी जोती जाएगी, उसके बैल भी काले रंग के और रिश्ते में मामा-भांजे होने चाहिए।
🙌 शर्त पूरी हुई और स्थापित हुए शनिदेव:
अगले दिन गाँव वालों ने वैसा ही किया। ताज्जुब की बात यह थी कि जिस मूर्ति को सैंकड़ों लोग नहीं हिला पाए थे, उसे सगे मामा-भांजे ने आसानी से उठा लिया और काले बैलों की जोड़ी उसे खींच लाई।
जमीन ने नहीं दी जगह:
कहा जाता है कि वो भक्त चाहता था कि मूर्ति उसकी जमीन पर स्थापित हो, लेकिन मूर्ति वर्तमान स्थान पर आकर रुक गई। आज जिस ऊँचे चबूतरे पर भगवान विराजमान हैं, उसके बनने की कहानी भी दिलचस्प है।
एक नि:संतान भक्त, शेठ जवाहरमल ने मन्नत मांगी थी कि पुत्र होने पर वो चबूतरा बनाएंगे। मन्नत पूरी हुई और चबूतरा बना।
आश्चर्य की बात यह भी है कि जब भक्तों ने मूर्ति के नीचे की खुदाई कर उसे पूरा निकालने की कोशिश की, तो वे जितना खोदते, मूर्ति उतनी ही नीचे धंसती चली जाती थी। अंततः, ईश्वरीय आदेश पाकर खुदाई रोक दी गई। इसीलिए कहा जाता है कि शनिदेव की मूर्ति जितनी ऊपर दिखती है, उतनी ही जमीन के नीचे भी है।
🚩 आज भी शनि शिंगणापुर में भगवान शनिदेव धूप, ठंड और बरसात में रात-दिन खुले आकाश के नीचे रहकर अपने भक्तों की रक्षा कर रहे हैं।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!
जय श्री शनिदेव महाराज की! 🙏
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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"आज तू मेरे अंग लगा है, आज से ये संसार तुझे गुरु अंगद देव के नाम से जानेगा।" 🚩
एक दिन गुरु नानक देव जी ने अजब वेश धारण किया: काले वस्त्र, हाथ में चिमटा, एक झोला और साथ में कुछ खूंखार कुत्ते। बिल्कुल काल भैरव का रूप धरकर वे करतारपुर नगर से बाहर की तरफ जाने लगे। उनके पीछे-पीछे सारी संगत भी चल पड़ी।
कुछ दूर चलकर गुरु नानक साहेब ने मुड़कर देखा, अपने झोले में हाथ डाला, सोने के सिक्के निकाले और संगत की तरफ उछाल दिए। कुछ लोग वो सिक्के इकट्ठे करने लग गए और वहीं रुक गए। गुरु साहेब आगे बढ़ गए।
कुछ दूर जाकर उन्होंने झोले से हीरे निकाले और संगत की तरफ फेंके। फिर कुछ आगे जाकर रत्न, फिर पन्ने... हर बार दुनियावी चीजों के मोह में पड़कर लोग वहीं रुकते गए और संगत कम होती गई।
जब मुट्ठी भर लोग ही पीछे रह गए, तो महाराज ने उन पर खूंखार कुत्ते छोड़ दिए। डर के मारे सब भाग गए, बस दो सिख रह गए— भाई लहणा जी और बाबा बुड्ढा जी। अब गुरु नानक साहेब ने उन्हें चिमटे से पीटना शुरू कर दिया, पर वे मौन रहकर मार सहते रहे और पीछे चलते रहे।
गुरु नानक साहेब ने बाबा बुड्ढा जी को रुकने का इशारा किया, तो वे भी गुरु का हुक्म मानकर वहीं हाथ जोड़कर रुक गए। गुरु जी ने पूछा, "लहणे, देख सारे मुझे छोड़ कर चले गए, मेरा सबसे बड़ा सेवक बुड्ढा भी रुक गया, तू क्यों नहीं जाता?"
भाई लहणा जी ने हाथ जोड़कर कहा:
"सतगुरु... जिनको तुझसे संतान की आस थी, वो मुराद पा कर मुड़ गए। कोई सोने की चाह में सोना ले गया, कोई हीरे की चाह में हीरे। कोई तेरी रम्ज़ में छुपे भले को नहीं देख पाया, तो तेरे दिए दुख से डर कर चला गया। किसी को तूने रुकने का इशारा कर दिया तो वो तेरे हुक्म में रुक गया... लेकिन दाता, मैं कहाँ जाऊँ? मेरा कुनबा भी तू, मेरी ओट भी तू, मेरा आसरा भी तू, मेरा बल भी तू, मेरी बुद्धि भी तू, और मेरा धन भी तू। मैं आपके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता।"
यह सुनकर गुरु नानक साहेब ने कहा, "लहणे, जब तेरा सब कुछ मैं हूँ, तो ठीक है। वहां जो वो एक मुर्दा शरीर पड़ा है, जा उसे खा कर आ।"
भाई लहणा जी उठे, उस मुर्दे के निकट गए और बैठ गए। गुरु नानक साहेब बोले, "लहणे बैठा क्यों है? मुर्दा खा।"
भाई लहणा जी ने नम्रता से पूछा, "सतगुरु, कहाँ से खाना शुरू करूँ? पैर की तरफ से या सिर की तरफ से?"
हुक्म हुआ— "सिर की तरफ से।"
भाई लहणा जी ने जैसे ही कफ़न हटाया, तो वहाँ कोई मुर्दा था ही नहीं, बल्कि प्रसाद था! गुरु नानक साहेब दौड़ कर आए और भाई लहणा जी को गले से लगा लिया।
"भाई लहणे... तूने सतगुरु को अपना सब कुछ माना है। तेरी सेवा धन्य है। आज तू मेरे अंग लगा है, आज से ये संसार तुझे 'गुरु अंगद देव' के नाम से जानेगा।"
. 🪷।। राधे राधे ।।🪷
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
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क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को भी त्रिपुरासुर का वध करने से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा क्यों करनी पड़ी थी? 🔱 बुधवार के दिन गजानन की आराधना से कैसे दूर होते हैं जीवन के बड़े-बड़े कष्ट, आइए जानते हैं। 👇
बुधवार को विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा है अतिलाभकारी 🌺🙏
हिन्दू संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान श्री गणेश की पूजा अनिवार्य है। स्वयं देवताओं ने भी उनकी अग्रपूजा का विधान बनाया है ताकि उनके कार्यों में कोई विघ्न न आए।
🔱 भगवान शिव को भी करनी पड़ी थी गणेश जी की पूजा!
शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान महादेव त्रिपुरासुर का वध करने में असफल हुए, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वे गणेश जी की अर्चना किए बिना ही युद्ध में चले गए थे। इसके बाद शिव जी ने भगवान गणेश का पूजन कर उन्हें लड्डुओं का भोग लगाया, और तब जाकर त्रिपुरासुर का वध संभव हो सका।
🙏 श्री गणेश पूजा की सरल विधि:
प्रातः काल स्नान के बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
एक ताम्र पत्र पर श्री गणेश यंत्र (या प्रतिमा) स्थापित करें।
पुष्प, धूप, दीप, कपूर, रोली, लाल चंदन, दूर्वा और मोदक अर्पित कर आरती करें।
अंत में "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
✨ जीवन के कष्टों को दूर करने वाले चमत्कारिक मंत्र:
🔸 बिगड़े काम बनाने के लिए (21 बार जाप करें):
त्रयीमयायाखिलबुद्धिदात्रे बुद्धिप्रदीपाय सुराधिपाय। नित्याय सत्याय च नित्यबुद्धि नित्यं निरीहाय नमोस्तु नित्यम्।
(अर्थात: आप बुद्धियों को देने वाले, सत्य और नित्य बोधस्वरूप हैं। आपको मेरा नमन।)
🔸 ग्रह दोष और शत्रुओं से बचाव के लिए (11 बार जाप करें):
गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बक:। नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक:।।
धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक:। गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्।।
🌸 सुख-समृद्धि के लिए बुधवार के 4 अचूक उपाय:
नकारात्मकता दूर करने के लिए: घर में सफेद रंग के गणपति की स्थापना करें, इससे समस्त प्रकार की तंत्र शक्तियों का नाश होता है।
धन प्राप्ति के लिए: श्री गणेश को घी और गुड़ का भोग लगाएं और बाद में उसे गाय को खिला दें। यह धन संबंधी समस्याओं का सटीक निदान है।
पारिवारिक कलह मिटाने के लिए: दूर्वा के गणेश जी की प्रतीकात्मक मूर्ति बनाकर घर के देवालय में स्थापित करें और नित्य पूजा करें।
सुख-शांति के लिए: घर के मुख्य दरवाजे पर गणेश जी की प्रतिमा लगाएं, इससे घर में कोई भी नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती है।
गणपति बप्पा मोरया! 🙏✨
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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🔱 असुरों के गुरु 'महर्षि शुक्राचार्य' के वो अनसुने रहस्य, जो शायद ही आप जानते होंगे! 🔱
हम सभी महर्षि शुक्राचार्य को केवल दैत्यों (असुरों) के गुरु के रूप में जानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनके पास मरे हुए को जीवित करने की विद्या थी? या फिर उनका नाम 'शुक्र' कैसे पड़ा और वे एक आँख वाले (एकाक्ष) कैसे हुए?
आइए जानते हैं महर्षि शुक्राचार्य से जुड़े कुछ बेहद रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक तथ्य: 👇
1️⃣ कौन थे महर्षि शुक्राचार्य?
महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य का जन्म का नाम 'शुक्र उशनस' (कवि) था। एक मान्यता के अनुसार ये भृगु ऋषि और हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र थे, जबकि कुछ पुराणों में इनकी माता का नाम ख्याति बताया गया है। भगवान शिव इनके इष्टदेव थे।
2️⃣ मृतसंजीवनी विद्या और शिव का वरदान
देवासुर संग्राम में असुरों को अमर करने के लिए शुक्राचार्य ने भगवान शंकर की घोर तपस्या की और 'मृतसंजीवनी विद्या' प्राप्त की। इस विद्या से वे युद्ध में मारे गए असुरों को फिर से जीवित कर देते थे।
🔸 मृतसंजीवनी महामंत्र: ॐ ह्री हंस: संजीवनी जूं हंस: कुरू कुरू कुरू सौ: सौ: हसौ: सहौ: सोsहं हंस: स्वाहा।
3️⃣ भगवान शिव ने क्यों निगल लिया था शुक्राचार्य को?
जब शुक्राचार्य मृतसंजीवनी का उपयोग कर असुरों की संख्या बढ़ाने लगे, तब देवता शिव जी की शरण में गए। क्रोधित होकर महादेव ने शुक्राचार्य को पकड़कर निगल लिया। एक दिव्य वर्ष तक शिव के उदर (पेट) में रहने के बाद, जब वे भगवान शंकर के शरीर से शुक्ल कांति (वीर्य/शुक्र) के रूप में बाहर आए, तब से उनका नाम 'शुक्र' पड़ा। शिव जी ने उन्हें अपने पुत्र के समान मानकर जीवनदान दिया।
4️⃣ कैसे फूटी शुक्राचार्य की एक आँख? (एकाक्ष)
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी, तो शुक्राचार्य समझ गए कि यह विष्णु की चाल है। राजा बलि को संकल्प लेने से रोकने के लिए वे सूक्ष्म रूप धारण करके बलि के कमंडल (जलपात्र) की टोंटी में बैठ गए। तब वामन भगवान ने कमंडल की टोंटी में एक कुशा (तिनका) डाल दी, जो शुक्राचार्य की एक आँख में जा लगी। इसी कारण वे आजीवन 'एकाक्ष' (काने) कहलाए।
5️⃣ महान नीतिकार (शुक्र नीति)
शुक्राचार्य केवल एक गुरु नहीं, बल्कि महान अर्थशास्त्री और नीतिकार भी थे। उनका एक प्रसिद्ध श्लोक मैनेजमेंट का अद्भुत सूत्र है:
"अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं। अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ:॥"
(अर्थात: कोई अक्षर ऐसा नहीं जिससे मंत्र न बने, कोई जड़ ऐसी नहीं जिससे औषधि न बने, और कोई भी इंसान अयोग्य नहीं होता, बस उसका सही उपयोग करने वाला मैनेजर (योजक) दुर्लभ है।)
6️⃣ पुत्री देवयानी और राजा ययाति की रोचक कथा
शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाद हो गया था। अपमान का बदला लेने के लिए शुक्राचार्य ने दैत्यों का त्याग करने की धमकी दी, जिससे डरकर दैत्यराज ने अपनी पुत्री शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बना दिया। बाद में देवयानी का विवाह राजा ययाति से हुआ। जब ययाति ने दासी शर्मिष्ठा से भी संबंध बनाए, तो शुक्राचार्य ने ययाति को समय से पहले 'वृद्ध' (बूढ़ा) होने का श्राप दे दिया था।
7️⃣ क्या शुक्राचार्य अरब चले गए थे? (एक ऐतिहासिक मान्यता)
कुछ प्राचीन कथाओं और विद्वानों के अनुसार, जब राजा बलि पाताल लोक गए, तो शुक्राचार्य भी उनके साथ गए। ऐसा माना जाता है कि गुजरात के समुद्र के पार का क्षेत्र पाताल था। बाद में वे अपने पोते 'और्व' (Aurv) के पास चले गए। कहा जाता है कि 'और्व' या 'हर्ब' नाम का ही अपभ्रंश होते-होते आज का 'अरब' (Arab) देश बन गया। 'हिस्ट्री ऑफ पर्शिया' जैसी पुस्तकों में भी इसका जिक्र मिलता है।
8️⃣ ज्योतिष में शुक्र ग्रह का महत्व ✨
भारतीय ज्योतिष में नवग्रहों में शुक्र एक अत्यंत शुभ और लाभदाता ग्रह है। वृषभ और तुला राशियों के स्वामी शुक्र देव रोमांस, कामुकता, कला, संगीत, विलासिता, विवाह और भौतिक सुखों के प्रतीक हैं। शुक्र की कृपा से ही व्यक्ति को सुख-समृद्धि, वाहन और ख्याति की प्राप्ति होती है।
#क्रमशः
क्या आपको महर्षि शुक्राचार्य से जुड़ी ये बातें पता थीं? कमेंट्स में अपने विचार जरूर साझा करें! 🙏👇
।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।
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