*🔥समय की कीमत🔥*
सुबह के छह बज चुके थे।
रसोई में चूल्हे पर चाय उबल रही थी और बाहर आँगन में तुलसी के पास बैठी सरोज देवी माला जप रही थीं। बार-बार उनकी नज़र दरवाज़े की ओर जा रही थी। आज बेटे का जन्मदिन था।
कमरे से मोबाइल की तेज़ आवाज़ आई —
“अरे यार, आज भी लेट हो गया!”
अभय हड़बड़ाते हुए बाहर निकला। बाल गीले, शर्ट आधी अंदर आधी बाहर। सरोज देवी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटा, आज तो जन्मदिन है तुम्हारा, नाश्ता कर लो। तुम्हारे पसंद के आलू के पराठे बनाए हैं।”
अभय ने घड़ी देखी और बोला,
“माँ, आज क्लाइंट मीटिंग है। बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। आज टाइम बिल्कुल नहीं है।”
कहते-कहते उसने बैग उठाया और जूते पहनते हुए दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया।
“अरे बेटा, शाम को जल्दी आ जाना… पापा भी तुम्हारा इंतज़ार करेंगे।”
माँ की आवाज़ दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते धीमी पड़ गई।
दरवाज़ा बंद हो गया।
सरोज देवी चुपचाप थाली समेटने लगीं। आँखों के कोने से एक आँसू गिरा, जिसे उन्होंने जल्दी से पल्लू से पोंछ लिया।
“काम ही तो करता है, हमारा ही बेटा है,” उन्होंने खुद को समझाया।
दिन बीतते गए।
एक दिन, दो दिन, फिर हफ्ते।
अभय कभी देर रात आता, कभी दूसरे शहर चला जाता। पापा की दवाइयाँ समय पर नहीं मिल पातीं। माँ अकेले ही अस्पताल के चक्कर लगाती।
फोन करतीं तो जवाब मिलता —
“माँ, अभी कॉल बैक करता हूँ।”
पर वह कॉल कभी वापस नहीं आता।
एक रात पापा की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। पड़ोस की बहू की मदद से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा,
“वक़्त पर लाए हैं, वरना मुश्किल हो जाती।”
सरोज देवी ने काँपते हाथों से बेटे को फोन लगाया।
“बेटा, पापा…”
उधर से आवाज़ आई,
“माँ, अभी मीटिंग में हूँ। आप टेंशन मत लो, कल बात करता हूँ।”
फोन कट गया।
अस्पताल के बरामदे में बैठी सरोज देवी की नज़र दीवार पर रेंगती एक चींटी पर पड़ी। वह अपने से कई गुना बड़ा दाना खींचे जा रही थी, बार-बार गिरती, फिर उठती…
सरोज देवी को लगा जैसे वह खुद उस चींटी की तरह सब कुछ अकेले ही उठाए चल रही हैं।
कुछ दिन बाद पापा ठीक होकर घर आ गए।
अभय चार दिन बाद आया।
“सब ठीक है न?”
बस इतना ही पूछा।
माँ ने कुछ नहीं कहा।
पापा ने भी कुछ नहीं कहा।
एक शाम सरोज देवी आँगन में अकेली बैठी थीं। तुलसी के पास एक सूखा पत्ता गिरा था। उन्होंने उसे उठाया और बुदबुदाईं,
“जब समय था तब पानी नहीं मिला, अब क्या होगा…”
तभी उन्हें एहसास हुआ —
बेटा पैसे कमा रहा है, नाम कमा रहा है, पर रिश्तों से बहुत दूर जा चुका है।
प्रिय आत्मीय जनों,यह कोई कहानी नहीं, हमारे आसपास की सच्चाई है।
आज हम सब अपने काम, मोबाइल, मीटिंग और टारगेट में इतने उलझ गए हैं कि माँ-बाप की खामोशी सुनना भूल जाते हैं।
रिश्ते आवाज़ नहीं लगाते, पर जब टूटते हैं तो बहुत शोर होता है — दिल के अंदर।
याद रखिए,
पैसा ज़रूरी है,
काम ज़रूरी है,
लेकिन अपने लोग… उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं।
कहीं ऐसा न हो कि एक दिन बहुत कुछ पाने के बाद
हमारे पास बैठने के लिए
कोई अपना ही न बचे।
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ज़िंदगी रिश्तों से है,
रिश्ते समय से हैं,
और समय अगर आज नहीं दिया,
तो कल बहुत देर हो सकती है। #📒 मेरी डायरी #🙏सुविचार📿 #👫 हमारी ज़िन्दगी #☝ मेरे विचार #☝अनमोल ज्ञान