गायत्री साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता, पर भीतर ही भीतर भारी हेर- फेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्त्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और मनोमय कोष में जो परिवर्तन होता है, उसकी छाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टीगोचर न हो, ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढाँचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर- फेर के चिह्न शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।
साधना का अर्थ है- अपने भीतर की श्रद्धा तथा विश्वास की शक्तियों का सम्मिलन कराके एक नई शक्ति का आविर्भाव करना, जिसे सिद्धि, दैवी वरदान या चमत्कार भी कहा जा सकता है। इस प्रकार के उद्देश्य की प्राप्ति के लिये अपने पास कुछ साधन पहले भी होने आवश्यक हैं। जिसका जीवन आरम्भ से ही कलुषित, पापपूर्ण और दूषित रहा है, उसकी साधना का सम्पन्न होना असम्भव- सा ही है। इसलिये जो व्यक्ति सच्चे मन से साधना के इच्छुक हैं और उससे कोई उच्च लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनको पहले अपने मन, वचन, काया की शुद्धि का भी प्रयत्न करना चाहिये। ऐसा करने पर ही किसी प्रकार की सिद्धि की आशा कर सकते हैं।
साधना जब तक साधक के गर्भ में पकती रहती है, कच्ची रहती है, तब तक उसके शरीर में आलस्य और अवसाद के चिह्न रहते हैं, स्वास्थ्य गिरा हुआ और चेहरा उतरा हुआ दिखाई देता है; पर जब साधना पक जाती है और सिद्धि की सुकोमल सन्तति का प्रसव होता है, तो साधक में तेज, ओज, हल्कापन, चैतन्य, उत्साह आ जाता है, वैसा ही जैसा कि केंचुली बदलने के बाद सर्प में आता है। सिद्धि का प्रसव हुआ या नहीं, इसकी परीक्षा इन लक्षणों से हो सकती है। यह दस लक्षण नीचे दिये जाते हैं—
शरीर में हल्कापन और मन में उत्साह होता है।शरीर में एक विशेष प्रकार की सुगन्ध आने लगती है।त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।तामसिक आहार- विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्त्विक दिशा में मन बढऩे लगता है।स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।नेत्रों में तेज झलकने लगता है।किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है, तो उसके सम्बन्ध में बहुत- सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिभासित होती हैं, जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती हैं।दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती।भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्वाभास मिलने लगता है।शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है।
यह दस लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि साधक का गर्भ पक गया और सिद्धि का प्रसव हो चुका है। इस शक्ति- सन्तति को जो साधक सावधानी के साथ पालते- पोषते हैं, उसे पुष्ट करते हैं, वे भविष्य में आज्ञाकारी सन्तान वाले बुजुर्ग की तरह आनन्दमय परिणामों का उपभोग करते हैं। किन्तु जो फूहड़ जन्मते ही सिद्धि का दुरुपयोग करते हैं, अपनी स्वल्प शक्ति का विचार न करते हुए उस पर अधिक भार डालते हैं, उनकी गोदी खाली हो जाती है और मृतवत्सा माता की तरह उन्हें पश्चात्ताप करना पड़ता है। #📒 मेरी डायरी #☝ मेरे विचार